हिंदी, अंग्रेजी और फ़्रांसीसी: पेरिस का अनुभव

आज से करीब ढाई दशक पहले की एक घटना की मुझे सदा याद आती है । उन दिनों में इंग्लैंड में उच्चाध्ययन के लिए गया हुआ था । मेरे साथ मेरा परिवार भी था जिसमें तीन-चार साल के दो बच्चे तथा पत्नी शामिल थे ।

एक बार ग्रीष्मकाल में हमने पेरिस देखने का कार्यक्रम बनाया । इस हेतु हमने पर्यटन संचालित करने वाली एक संस्था के छोटे जहाज (फेरी) की सेवा ली । हमारा जहाज रात्रि द्वितीय प्रहर इंग्लैंड के दक्षिण-पूर्वी तट पर अवस्थित पोर्ट्समथ शहर से रवाना हुआ और अगले सबेरे तड़के फ्रांस के कैलल्स पहुंचा । वहां से करीब तीन घंटे की बस-यात्रा द्वारा हम पेरिस पहुंच गये, जहां पर्यटन संचालक ने हमें दिन भर घूमने-फिरने के लिए छोड़ दिया । संध्याकाल सूर्यास्त के समय हमारी वापसी यात्रा नियत की गयी थी । पेरिस में हमने मुख्य-मुख्य पर्यटक स्थलों का दर्शन किया जिनमें प्रमुख था विश्वप्रसिद्ध ‘एफिल टावर’ देखना और नगर की ‘सेन’ नदी पर नौकाभ्रमण करना ।

उस दिन दोपहर के समय एफिल टावर के नजदीक किसी पार्क में हम लोगों ने थोड़ी देर आराम किया, क्योंकि हम सभी, खासकर बच्चे, काफी थक चुके थे । वहीं हमने दोपहर का भोजन किया जो हम अपने साथ ले आये थे । कुछ देर घूमने-फिरने के बाद हम पार्क से निकल मुख्य मार्ग पर आने लगे । पार्क के प्रवेशद्वार पर मिले एक फ्रांसीसी नौजवान से हमने कुछ जानकारी लेनी चाही । जैसा अभी तक चलता आ रहा था, हमने अपना सवाल अंग्रेजी में उससे पूछा । उसने फ्रांसीसी में कुछ उत्तर दिया जो हमारी समझ से परे था । हमने उसे बताने की कोशिश की कि उसकी बात हम समझ नहीं सके और वह कृपया अंग्रेजी में जवाब दे दे । उसने फ्रांसीसी में फिर कुछ कहा । हमने अंग्रेजी में धन्यवाद दिया और पार्क से बाहर आ गये ।

मुख्य मार्ग पर फिर एक व्यक्ति से हमने वांछित जानकारी लेनी चाही । इस व्यक्ति का भी व्यवहार संयत और शिष्ट था, किंतु उसका भी उत्तर फ्रांसीसी में ही था । हमने इस बात का संकेत देना चाहा कि हम भारतीय पर्यटक हैं और फ्रांसीसी न जानने के कारण अंग्रेजी में उत्तर चाहते हैं । इस बार भी हमें निराशा ही हुयी ।

बाद में हमारी समस्या का हल एक रेस्तरां में मिल सका जहां बैठकर हमने कुछ खाया-पिया । वहीं एक कर्मचारी से हमने वांछित जानकारी प्राप्त की । क्षमायाचना के साथ हमने उससे पूछा, “माफ कीजियेगा, आपके पेरिस में लोग अंग्रेजी नहीं जानते क्या ? मैं सोचता था कि यहां अंग्रेजी का अच्छा-खासा चलन होगा ।”

रेस्तरां के उस कर्मचारी ने मुस्कराते हुए (अंग्रेजी में) जवाब दिया, “नहीं, ऐसी बात नहीं है । यहां अंग्रेजी जानने वाले ढेरों मिल जायेंगे । हां, ऐसे कम लोग होंगे जिन्हें बढ़िया अंग्रेजी आती हो । पर काम लायक अंग्रेजीज्ञान तो कमोबेश बहुतों को होगा । … क्यों कोई खास बात है क्या ?”

“दरअसल आपसे पहले हमने अन्य दो लोगों से बात की थी । वे दोनों व्यवहार से संभ्रांत लग रहे थे, किंतु हमें वांछित जानकारी नहीं दे पाये । हमें लगा कि कदाचित् उन्हें अंग्रेजी बिल्कुल नहीं आती है । संयोग ही कुछ ऐसा बन पड़ा होगा ।”

उस व्यक्ति ने हमें समझाते हुए कहा, “आपका अनुमान शायद गलत हो । इसकी गुंजाइश कम ही है कि उन्हें अंग्रेजी न आती हो । फिर भी अंग्रेजी में उत्तर न देने के उनके कारण हैं । हम फ्रांसीसियों को अंग्रेजी स्वीकार्य नहीं है । आपस में हम न अंग्रेजी बोलते हैं और न ही किसी को बोलने की छूट देते हैं । मैं भी अंग्रेजी का प्रयोग यथसंभव नहीं करता । परंतु इस रेस्तरां में विदेशी पर्यटक आते रहते हैं जिनकी मदद के लिए मैं अंग्रेजी बोलता हूं । अंग्रेजी ही नहीं, मैं तो कामचलाऊ जर्मन तथा इतालवी भाषा भी बोलता हूं । यह हमारी व्यावसायिक विवशता है । अन्यथा अपनी भाषा या फिर संभव हो तो सामने खड़े मुसाफिर की भाषा का चुनाव हमारी नीति है ।”

जीवन में वह पहला क्षण था जब मुझे लगा कि हम भारतीयों के मन में भी उन लोगों की तरह अपनी देसी भाषाओं के प्रति आदर भाव होना ही चाहिए ।

इस ब्लाग पर मैं अपने रोजमर्रा के अनुभवों पर आधारित किस्से प्रस्तुत करने जा रहा हूं और यह मेरी पहली प्रविष्ठि है । आज चौदह सितंबर, हिन्दी दिवस, है । मैंने सोचा कि क्यों न शुरुआत पेरिस के उस भाषायी अनुभव से ही की जाये । — योगेन्द्र

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1 टिप्पणी

Filed under अंग्रेजी, अनुभव, आपबीती, कहानी, मानव व्यवहार, लघुकथा, हिन्दी, Uncategorized

One response to “हिंदी, अंग्रेजी और फ़्रांसीसी: पेरिस का अनुभव

  1. योगेंद्र जी!
    आपकी पेरिस यात्रा की दास्तान पढ़ी। आपकी ही भाँति बहुत लोग मर्माहत हुए हैं और ऐसा ही संस्मरण उन लोगों ने भी लिखा है। परंतु नीति निर्माताओं को तो लगता ही नहीं कि अपनी भाषा से प्रेम चाहिए है या इसकी कोई आवश्यकता है। राष्ट्रीय ज्ञान आयोग ने तो देश भर में पहली कक्षा से अंग्रेज़ी का बोझ लादने की योजना लागू कर दी है। हिंदी थोपने की बात करते हैं और अंग्रेज़ी थोपने से बाज़ नहीं आते हैं। हिंदी सेवी तो अपना कर्तव्य निभाने में लगें ही रहेंगे। आपकी निष्ठा से मैं प्रभावित हूं।
    जवाब के लिए धन्यवाद।

    सादर,

    डॉ. दलसिंगार यादव

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