मानव समाज में भेदभाव की भावना सर्वव्यापी है । भेदभाव का आधार सभी समाजों में एक ही हो ऐसा नहीं है । अपने देश में जातीय भेदभाव सामान्य बात है और दुनिया के प्रमुख देशों में शायद ही कोई अन्य हो जहां हमारी तरह का जातिवाद देखने को मिले । इसके विपरीत नस्ली दुर्भावना, जो कई देशों में आम बात है, अपने देश में कदाचित् है ही नहीं । इसका कारण यह हो सकता है कि नस्ल की दृष्टि से हम भारतीय मिश्रित माने जा सकते हैं । शारीरिक बनावट और रंगरूप के आधार पर हम किसी नस्ल के नहीं कहे जा सकते हैं । विदेशियों के साथ अगर कभी कोई दुर्व्यवहार की बात अपने यहां घटती है तो वह नस्ली आधार पर नहीं बल्कि किसी अन्य कारण से होता है । परंतु पश्चिम के देशों, जहां के मूल बाशिंदे गोरे कहे जाते हैं, में नस्लभेद कोई नई बात नहीं रही है । विश्व के जिन भूक्षेत्रों में वे उपनिवेश स्थापित करके और बहुसंख्यक बनके बस गये, वहां भी नस्ली भेद की आशंका की जा सकती है ।
यह अवश्य है कि सामान्यतः नस्लवाद की मौजूदगी हिंसक वारदातों के रूप में बहुत कम देखने को मिले । अपने यहां ही देखिए, जातिवाद की जड़ें गहरी हैं, किंतु खुलेआम जातिगत दुर्व्यवहार के मामले गिनेचुने ही होते हैं । भावना रहती है, लेकिन उजागर नहीं होती है । काले-गोरे, देशी-विदेशी, मुस्लिम-ईसाई, आदि की भावनाओं से मानव समाज कहीं भी मुक्त नहीं है, बस ये प्रायः सर्वत्र नियंत्रण में रहती हैं । फिर भी कभी-कभार कुछ कमजोर प्रकृति के लोग अपनी वैमनस्य की अथवा किसी प्रकार की असुरक्षा की भावना से प्रेरित होकर उल्टा-सीधा करने निकल पड़ते हैं, जैसा कि आजकल आस्ट्रेलिया में भारतीयों के विरुद्ध कुछएक घटनाओं में हुआ है । पश्चिमी देशों में विदेशियों या विदेशी मूल के नागरिकों की मौजूदगी कइयों को नागवार लगती है ऐसा मैंने खुद अनुभव किया है, अपने इंग्लैंड प्रवास के दौरान ।
मेरे अनुभव पिछली शताब्दि के नौवें दशक के मध्य के हैं । तब से अब तक इंग्लैंड में माहौल बहुत कुछ बदल चुका होगा । मैं तब वहां साउथ्हैम्टन विश्वविद्यालय में उच्चाध्ययन के लिए गया था दो वर्ष के प्रवास पर । एक बात का खुलासा मैं आरंभ में ही कर दूं कि हम हिंदुस्तानियों की अंग्रेजी प्रायः किताबी होती है, अर्थात् पुस्तकों से पढ़-पढ़कर सीखी हुई । इस भाषा के व्याकरण के ज्ञान में हम औसत अंगरेज से बेहतर हो सकते हैं, लेकिन हमारे बोलने-चालने में नैसर्गिक प्रवाह कम ही रहता है । रोजमर्रा के बोलचाल में हम में से कम ही लोग उसका व्यवहार करते हैं । हम हिंदुस्तानियों का लहजा एक ठेठ अंगरेज से भिन्न रहता है और ‘एक्सेंट’ के मामले में तो हम काफी पीछे माने जायेंगे । कहने का मतलब यह है कि यदि किसी हिंदुस्तानी को अचानक इंग्लैंड में आम अंगरेजों के बीच में बिठा दिया जाये, तो उसे अपना अंगरेजी ज्ञान अपर्याप्त ही लगेगा । कम से कम मुझे तो आंरभ में यही लगा था । तब मुझे विश्वविद्यालय में खास दिक्कत नहीं हुई थी, क्योंकि वहां के पढ़े-लिखे लोगों के मुख से ‘मानक’ साफ-सुथरी अंगरेजी सुनने और समझने को मिल जाती थी । लेकिन सड़कों और बाजारों में सभी प्रकार के लोग मिल जाते थे, जिनमें से किसी-किसी की अंगरेजी मुझे कभी-कभी समझ से परे लगती थी ।
हां, तो मैं अपने अनुभव की चर्चा पर लौटता हूं । वहां के मेरे प्रवास के आरंभिक दिनों की बात है । तब मैं उस नये वातावरण से परिचित होने की प्रक्रिया में था । हर सायंकाल शहर के किसी न किसी कोने पर पहुंच जाता था । शाम के दो-तीन घंटे वहां के बाजारों, दुकानों, सड़कों, पार्कों, और लोगों के तौर-तरीकों की जानकारी हासिल करने में निकल जाते थे । एक दिन मैं ‘सिटी सेंटर’ की ओर निकल गया, और एक सड़क के किनारे खड़े होकर वहां का नजारा देखने लगा । तभी एक उम्रदराज व्यक्ति मेरे बगल में आ खड़ा हुआ और मुझसे सटते हुए-सा कुछ बोलने लगा । वह कद-काठी में सामान्य था और उसके पहनावे तथा हावभाव से मुझे यही लगा कि वह वहां के संपन्न वर्ग का अंगरेज नहीं था । मैं उसकी बातों को समझने की कोशिश करने लगा, लेकिन समझ में ठीक-से कुछ आ नहीं रहा था । उसके चेहरे पर उभरे नाखुशी या असंतोष के भावों को मैं अनुभव कर रहा था । असहज महसूस करने पर कुछ सेकंडों के बाद मैं एक-दो कदम बगल की ओर में खिसक लिया । वह फिर मेरे बगल में सटकर खड़ा हो गया और कुछ बोलता रहा । मुझे लगा कि उसे मेरी मौजूदगी ठीक नहीं लग रही थी । ऐसा लग रहा था कि उसे मुझसे चिड़-सी हो रही है और वह शायद मेरे प्रति अपशब्द बोल रहा था, परंतु क्यों इस बात को मैं समझ नहीं पा रहा था । उस क्षण नस्लभेद जैसी बात का विचार भी मेरे मन में नहीं आया था । मुझे लगा कि वहां से हट जाना ही ठीक रहेगा । और मैं तेज कदमों से आगे बढ़ गया । बाद में रात्रि विश्राम के समय मेरा ध्यान दिन की उस घटना की ओर गया । तब मुझे लगा कि बात कुछ ‘वैसी’ ही है ।
बात कुछ ‘वैसी’ ही रही होगी इस बात का एहसास मुझे बाद में अपने कार्यस्थल (विश्वविद्यालय) के एक कर्मचारी के रवैये से भी लगा । मैं अपने विभाग के भंडार (स्टोर) से कागज-कलम, पेंसिल-इरेजर आदि सामग्री यदाकदा आवश्यकतानुसार लेने जाया करता था । वहां मेरा सामना कभी-कभी एक अधेड़ उम्र के कर्मचारी से हो जाया करता था । वह व्यक्ति गाहे-बगाहे मुझसे अप्रासंगिक सवाल पूछ बैठता था, जैसे ‘इंडिया से यहां क्यों आये हो ?’, ‘इंडिया कब लौट रहे हो ?’, ‘अभी तुम इंडिया लौटे नहीं ?’, इत्यादि । मैं सोचता कि यह आदमी हर बार ऐसे ही सवाल क्यों पूछता है । आंरभ में तो मुझे ऐसे प्रश्न सहज जिज्ञासा से प्रेरित लगे थे, किंतु बाद में मुझे ये दुर्भावना-जनित लगने लगे ।
इतना अवश्य कहना चाहूंगा कि उक्त प्रकार की घटनाएं अपवाद रूप में ही घटीं और वह भी विशेष गंभीर नहीं थीं । किंतु उनमें छिपा संदेश स्पष्ट था । अन्यथा यह सुयोग ही रहा कि मेरे दो वर्ष के प्रवास में वहां के आम बाशिंदों के व्यवहार में शायद ही कभी कोई कमी मैंने पाई । – योगेन्द्र
Tags: जातिवाद, नस्लवाद, नस्ली भेदभाव, casteism, racial discrimination, racialism
June 25, 2009 at 1:49 am |
भारतीयों से अधिक नस्लवादी कोई नहीं है,
हमें दुल्हन सुन्दर और गोरी ही चाहिए, बच्चा गोरा चाहिए,
किसी भारतीय के काले रंग का मजाक उड़ा देना सहज है,
मराठी-बिहारी उत्तर-दक्षिण हिंदी-द्रविड़ जैसे भेदभाव आम हैं,
चीनी या नीग्रो पर्यटकों पर नस्लभेदी टिप्पणियां होते मैंने खुद देखी हैं.
हम अपने उत्तर पूर्वी प्रदेशों के नागरिकों पर भद्दे कमेन्ट करते हैं.
जाती प्रथा पूरी तरह नस्लवाद और भेदभाव ही है.
हर एक जाती में दूसरी जाती/वर्ग के प्रति पूर्वाग्रह हैं.
किसी अँगरेज़ के आ जाने पर लोग बेवजह ही अदब से बर्ताव करने लगते हैं, भले ही भारतियों से कितने ही रुखा व्यव्हार करते हों.
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