हाल ही में मुझे अपने घर के दरवाजों-पल्लों की मरम्मत संबंधी छोटे-मोटे काम करवाने थे । मैंने अपनी कालोनी के आसपास ही रहने वाले एक बढ़ई से संपर्क साधा । वह सुबह-शाम घर पर आकर कार्य संपन्न करने को तैयार हो गया । तदनुसार वह रोज ही दो-एक घंटे काम कर जाता था । अपने साथ वह किसी सहायक को नहीं लाता था, अतः जहां कहीं जरूरत होती मुझे ही उसकी मदद करनी पड़ रही थी । उसके साथ कार्य करते समय मैं उससे आम चर्या की बातें भी कर लेता था ।
इसी दौरान एक दिन मैंने उससे उसके बालबच्चों के बारे में पूछ लिया । उसने बताया, “सा’ब, मेरे तीन बच्चे हैं, दो लड़कियां और सबसे छोटा एक लड़का ।”
बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के बारे में पूछे जाने पर उसने कहा, “सा’ब, बड़ी लड़की गूंगी-बहरी है, इसलिए उसके स्कूल जाने का सवाल ही नहीं । दूसरी लड़की +2 में पढ़ रही है । तीसरा स्कूल ही नहीं जाता । क्या करें कहना नहीं मानता और दिन भर मुहल्ले के आवारा लड़कों के साथ अपना समय जाया करता है । मैंने उसे अपने साथ काम पर लगाने की कोशिश की कि कुछ सीख लेगा और अपनी रोजी-रोटी कमाने लगेगा । लेकिन वह किसी की सुनता ही नहीं ।”
बड़ी लड़की के बारे में उसने बताया कि वह कहीं खो गयी है । मेरे यह पूछने पर कि कब और कैसे गायब हुई, उसने बताया, “दो साल पहले इसी विजयादशमी के मौके पर वह मोहल्ले के लोगों के साथ डीएलडब्ल्यू परिसर में रावणदहन देखने चली गयी, जहां उन लोगों का साथ छूट गया । गूंगी बहरी वह किसी को कुछ बता ही नहीं पाई होगी ।”
अपना दुखड़ा सुनाते-सुनाते उसने आगे कहा, “उसको खोजने में मेरे लाख-एक का खर्चा भी हो गया, लेकिन वह मिली नहीं । इधर किसी ने बताया है कि भदोही में एक ज्योतिषी जी रहते हैं, जो खोए हुए आदमी के बारे में सटीक बता देते हैं । कल उनके पास भी जाने की सोच रहा हूं । शायद लड़की का कुछ पता चले ।”
और दूसरे दिन वह भदोही भी हो आया । अगली सुबह मेरे काम पर आने पर उसने कहा, “सा’ब, ज्योतिषी जी ने बताया है कि मेरी लड़की चुनार में किसी भले मानुष के घर पर सकुशल रह रही है । अब एक चक्कर वहां का भी लगाना है ।”
फिर दोएक रोज के बाद वह चुनार भी हो आया । अगले दिन उसने चुनार तक हो आने की बात बताई और कहा कि वहां भी लड़की का कुछ पता नहीं चला । मैंने उससे जानना चाहा, “क्या आपने कभी पुलिस में गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाई ? उन्होंने मदद का आश्वासन दिया क्या ?
उसने कहा, “पुलिस कहां हम गरीबों की सुनती है, सा’ब । कह दिया जाकर खुद ही खोजो । हम रोज कमाकर पेट पालने वाले लोग हैं । काम छोड़ कहां-कहां जाएं और कितने-कितने दिन के लिए जाएं ?”
उस दिन उसके चले जाने के बाद मैं सोचने लगा कि भारत वाकई अजीब देश है । यहां पुलिस आम लोगों की मदद के लिए नहीं होती । अगर रसूखदार आदमी का कुत्ता भी गायब हो जाए, तो पूरा पुलिस बल उसे खोजने निकल पड़ता है । किंतु किसी साधारण आदमी के घर का सदस्य खो जाए, तब वह भुक्तभोगी को दुत्कार कर भगा देती है । इस जमाने में तो संचार-प्रसार के सक्षम माध्यम मौजूद हैं, और किसी की भी तस्वीर का प्रसारण करके गुमशुदा व्यक्ति के बारे में जानकारी जुटाई जा सकती है । फिर भी पुलिस की उदासीनता और अक्षमता के चलते आम जन को कोई मदद नहीं मिल पाती है ।
उस रात मेरे दिलो-दिमाग में उस लड़की को लेकर एक सवाल रह-रहकर उठने लगा । न जाने क्या हाल होंगे उस लड़की के । वह जिंदा तो होगी ही, क्योंकि मौत आसानी से आती नहीं । आदमी में जिजीविषा की भावना बहुत प्रबल होती है । वह मांग-मूंगकर भी पेट भर लेता है और जिंदा रह पाता है । लेकिन एक लड़की होने के नाते वह बेहद असुरक्षित अवश्य होगी । मुझे लगने लगा कि अब तक उसके साथ कोई न कोई जरूर बलात्कार कर चुका होगा । हो सकता है किसी पुलिस वाले ने ही उसे अपना शिकार बनाया हो । भरोसा नहीं पुलिस का ! आखिर इस संसार में मानव भेड़ियों की कोई कमी थोड़े ही है । और …, और वह गर्भवती भी हो चुकी होगी । अब तो दो साल बीत चुके हैं । क्या पता इस बीच उसने किसी मासूम को जन्म भी दे डाला हो, जिसे गोदी में लेकर वह दर-दर ठोकर खा रही हो । भला उसे किसने शरण दी होगी, किसने उसकी मदद की होगी ? ऐसी तमाम संंभावनाएं मेरे विचारों में छाने लगीं ।
… जिंदगी की वास्तविकता कभी-कभी बड़ी डरावनी लगती है मुझे । – योगेन्द्र जोशी
टिप्पणी -
‘भदोही’ वाराणसी के नजदीक एक छोटी-सी नगरी एवं जिला मुख्यालय है जो कालीन व्यवसाय के लिए विख्यात है । ‘चुनार’ वाराणसी से सटे मिर्जापुर जिले का एक कस्बा है जो सस्ते प्रकार के चाइना क्ले के बने कप-प्लेटों तथा सजावटी सामानों के लिए जाना जाता है । वहां एक किला भी है ।




आपकी पोस्ट पढ़कर आँख भीग आई.
दुनिया में सच में बड़ा दुःख है.
और उसपर गरीब होना अभिशाप है.
गरीबों की कोई सुनवाई नहीं होती.
मुसीबतें भी उन्हें खोजती रहती हैं.
डर स्वाभाविक है। स्थिति सचमुच भयानक है…पुलिस, इन सबको तो सरकारी चोर कहन में हर्ज नहीं ही है…