महाभारत महाकाव्य में मूषक एवं विडाल की अल्पकालिक मित्रता की कथा

मानव समाज में परस्पर के संबंध स्वार्थ पर आधारित रहते हैं। इस तथ्य से जुड़ी मूषक एवं विडाल की अल्पकालिक मित्रता की महभारत की कथा का जिक्र इस चिट्ठे में किया गया है।

निकट भविष्य में देश में लोकसभा चुनाव होने हैं। अपने-अपने हित साधने या अस्तित्व बचाने के लिए राजनैतिक दल मेल-बेमेल गठबंधन बनाने में जुटे हैं। बेमेल गठबंधनों को देखने पर मुझे महाकाव्य महाभारत (शान्ति पर्व, अध्याय १३८) में वर्णित विडाल (बिलाव) एवं मूषक (मूस) की अल्पकालिक मित्रता की एक कथा याद आ रही है। उसी कथा से संबंधित कुछएक नीतिवचनों का उल्लेख यहां पर कर रहा हूं।

संक्षेप में कथा कुछ इस प्रकार है — किसी वन में एक विशाल पेड़ था, जिसके जड़ के पास एक मूस (बड़े आकार का चूहा) बिल बनाकर रहता था। उसी पेड़ पर एक बिलाव (बिल्ला) भी रहा करता था। बिल्ले से बचते हुए मूस बिल के बाहर भोजन की तलाश में निकला करता था।

एक बार एक बहेलिये ने पेड़ के पास जाल बिछा दिया, जंगली जानवरों एवं पक्षियों को फंसाकर कब्जे में लेने के लिए। उसका इरादा दूसरे दिन प्रातः आकर…

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अंग्रेजी छोड़ेंगे नहीं, आम आदमी समझे या न समझे परवाह नहीं

अपना देश भारत, जिसे इंडिया कहना देशवासियों को पसंद है, एक विचित्र देश है विरोधाभासों तथा विडंबनाओं से भरा। भाषा के क्षेत्र में विरोधाभास साफ-साफ झलकता है। एक तरफ भारतीय भाषाओं को सम्मान देने और उन्हें अधिकाधिक अपनाने की बात कही जाती है, दूसरी ओर अंग्रेजी के प्रति अप्रतिम लगाव कोई छोड़ने को तैयार नहीं। इस बात की परवाह कोई नहीं करता कि उसकी अंग्रेजी दूसरों को परेशानी में डाल सकता है। भाषा से जुड़े कल के अपने अनुभव को मैं यहां कथा रूप में प्रस्तुत कर रहा हूं।

मैं कल अपने बैंक की निकट की शाखा में गया। मैं बचत-खाता-पटल (काउंटर) पर पहुंचा। मुझे इंटरनेट के माध्यम से किए गए लेन-देन के असफल होने के कारण के बारे में जानना था। तत्संबंधित असफलता का संदेश मेरे मोबाइल फोन पर प्राप्त हुआ था किंतु उस असफलता का कारण स्पष्ट नहीं था। मैं बैंककर्मी द्वारा पहले से ही किये जा रहे कार्य के पूरा होने की प्रतीक्षा करने लगा। इसी बीच एक युवक उस पटल पर आया। वह अपने मोबाइल पर बैंक द्वारा भेजे गए एक संदेश का मतलब जानना चाहता था। काउंटर के पारदर्शी शीशे के दूसरी तरफ़ बैठे बैंक-कर्मी को संदेश दिखाते हुए उसने पूछा, “जरा देखिए तो मेरे फोन पर यह क्या मैसेज आया है।

अपने अन्य कार्य में व्यस्त बैंक-कर्मी ने कहा, “आप खुद पढ़िए न और मुझे भी सुना दीजिए

युवक ने कहा, “मेरे समझ में नहीं आ रहा है। आप देख दीजिए न

बैंक-कर्मी ने कहा, “ठीक है, पढ़िए क्या लिखा है।

युवक क्षण भर हिचकिचाया और फिर बोला, “दरअसल मैसेज अंग्रेजी में है और इतना पढ़ा-लिखा नहीं हूं मैं।

मैं उस युवक की समस्या समझ गया। बैंक-कर्मी अपने हाथ में आया काम निपटा ले यह सोचकर मैंने उस युवक से कहा, “लाइए अपना मैसेज मुझे दिखाइए।

संदेश सामान्य प्रकार का था, बैंक एटीएम से निकाले गए पैसे के बारे में जानकारी। मैंने युवक को समझाया, “आपने एटीएम से पैसा निकाला था क्या?

उसका जवाब हां में था। आगे मैंने उसको बताया, “ऐसी जानकारी बैंक अपने ग्राहकों को भेजते रहते हैं ताकि वे देख सकें कि किसी और ने तो लेनदेन की धोखाधड़ी तो नहीं की है। ऐसे संदेशों को सावधानी से देख लेना चाहिए ताकि कुछ गड़बड़ होने पर बैंक को सूचित किया जा सके।

उसकी समझ में बात आ गई और वह बैंक शाखा से बाहर चला गया।

मैं सोचने लगा क्या अजीव विडंबना है कि आज भी इस देश में अंग्रेजी और केवल अंग्रेजी का राज चल रहा है। हिन्दी को राजभाषा की “उपाधि” दे तो दी गई, किंतु उसे व्यवहार में लेना सरकारी संस्थानों ने अभी तक नहीं सीखा है। अन्य भारतीय भाषाओं का तो नंबर ही नहीं आने का।

मुश्किल से 15-16% देशवासी होंगे जो अंग्रेजी ठीक से समझ पाते हों। अपने-अपने कार्यालयों के कार्यों की अंग्रेजी उनको समझ में आ जाती होगी, क्योंकि वह एक स्थापित ढर्रे की भाषा होती है। लेकिन उसके परे दूसरे कार्य-क्षेत्रों की अलग प्रकार की भाषा उनको अच्छी तरह समझ में आती होगी इसमें मुझे शंका है। अस्तु।

बैंक जैसी संस्थाओं को तो हिन्दी अथवा क्षेत्रीय भाषा में भी ग्राहकों को संदेश देना ही चाहिए ताकि अंग्रेजी के संदेशों को समझने के लिए दूसरों के पास किसी को न जाना पड़े। वे क्षेत्रीय भाषाओं के इस्तेमाल का दावा तो करते हैं, लेकिन अंकीय (डिजिटल) माध्यम से संदेश-प्रेषण में अभी बहुत पीछे हैं।

ऐसी घटनाओं को देखने पर मुझे गांव में बिताए अपने बचपन के दिन (1960 के आसपास) याद आते हैं जब त्वरित संदेश के लिए “तार” (टेलीग्राम) भेजे जाते थे, जो केवल अंग्रेजी में अंकित रहते थे। तब साक्षरता वैसे ही कम थी और तिस पर अंग्रेजी जानने वाले तो विरले ही होते थे, जिनके पास दूर-दूर से लोग आते थे तार का मज़मून समझने के लिए। – योगेन्द्र जोशी

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बच्चे दो मांगें मां से एकल स्मार्टफोन

हम डिजिटल तकनीकी के युग में जी रहे हैं। और इस युग की सबसे बड़ी खासियत है स्मार्टफोन नामक युक्ति की उपलब्धता। स्मार्टफोनों की कीमत शुरुआती दौर में इतनी अधिक हुआ करती थी कि उसे खरीदने से पहले आदमी दस बार सोचता था। लेकिन जल्दी ही उसके सस्ते लेकिन कारगर मॉडल बाज़ार में आ गए। अब स्थिति यह है कि कई जनों के हाथों में अक्सर एक नहीं दो-दो तीन-तीन स्मार्टफोन भी दिख जाते हैं। इतना ही नहीं, स्मार्टफोन का आकर्षण छोटे बच्चों तक पहुंच चुका है। समाज के मध्यवर्ग में यह भी देखने को मिल रहा है कि जैसे ही नवजात शिशु के हाथ की अंगुलियां कोई भी चीज पकड़ने की सामर्थ्य पा जाते है वह भी मोबाइल से बतौर खिलौना खेलने लगता है। और जब तक वह खड़ा होना सीख पाता है तब तक वह अपने काम के वीडिओ भी देखने लगता है। बच्चों में पनप रहे मोबाइल के प्रति यह लगाव मेरी दृष्टि में जोखिम भरा है। लेकिन कई लोग अपने बच्चे की “स्मार्ट्नेस” से गर्वान्वित अनुभव करते हैं और स्मार्टफोन से उसे दूर रखने की जरूरत नहीं समझते हैं। इस स्थल पर मैं स्मार्टफोन के लाभ-हानि की विवेचना करने का प्रयास नहीं कर रहा हूं, बल्कि उससे जुड़ा एक अनुभव साझा कर रहा हूं।

कुछ दिनों पूर्व मैं पंजाब के शहर लुधियाना से शताब्दी एक्सप्रेस नामक (चेयरकार) रेलगाड़ी द्वारा नई दिल्ली आ रहा था। मैं गाड़ी के डिब्बे में गलियारे से लगी हुई पहली पंक्ति की सीट पर बैठा था और उसी पंक्ति में गलियारे के दूसरी तरफ तीनों सीटों पर दो महिलाएं और दो बच्चे बैठे थे। छोटा ब्च्चा कोई ५ साल का रहा होगा और उससे बड़ी बच्ची, अनुमानतः उसकी बहिन, डेढ़-दो साल बड़ी रही होगी।

बच्चों की मां के पास एक स्मार्टफोन था। गाड़ी के प्रस्थान करने के थोड़ी देर बाद छोटे बच्चे ने अपना मनपसंद वीडियो देखने के लिए मां से स्मार्टफोन हथिया लिया। जब बड़ी बहिन ने देखा कि स्मार्टफोन पर भाई ने कब्जा जमा लिया है तो उसे लगा कि फोन के प्रयोग का अधिकार उसे भी मिलना चाहिए। थोड़ी देर तक उसकी नजर फोन पर चल रहे वीडियो पर बनी रही। उसके हावभावों से लग रहा था कि उसे वह वीडियो उबाऊ लग रहा है। अंततः अधीर होकर उसने बहलाते-फुसलाते हुए भाई से स्मार्टफोन छीन लिया और अपने मन का वीडियो चलाने के लिए उसके ऊपर उंगलिया फेरना शुरू कर दिया। इससे छोटे भाई का रोना-गाना आरंभ होना स्वाभाविक था। मां ने उससे स्मार्टफोन वापस लेकर भाई को सौंप दिया। अब रोने-चीखने की बारी बहिन की थी।

उस मां की समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे दोनों को शांत करे। उसने स्मार्टफोन बच्चों से लेकर अपने पर्स में रख लिया। किंतु ऐसा करना कारगर नहीं रहा। दोनों ने रोना शुरू कर दिया। उसने स्मार्टफोन पर्स से निकालकर एक ऐसा वीडिओ खोजा जो दोनों बच्चों को बहला सके। दोनों ने मिलकर हाथ में फोन लिया और वीडियो देखते हुए शांत हो गए। तब कुछ समय के लिए शान्ति छा सकी।

बच्चों की चीख-पुकार सुनना मुझे अच्छा नहीं लग रहा था। आसपास के यात्रियों की नींद में या उनके पत्र-पत्रिका पढ़ने में उनके रोने-गाने से अवश्य ही खलल पड़ रहा होगा। लेकिन बच्चों की जिद के सामने भला कोई कर भी क्या सकता था? गतंव्य तक पहुंचने का इंतिजार सभी को ही था।

निःसंदेह बच्चों की उस हरकत को देखना कुछ हद तक दिलचस्प भी लग रहा था। मैं सोच रहा था कि स्मार्टफोन किस कदर बच्चों के आकर्षण की चीज बनता जा रहा है। मुझे तो यह सब भविष्य के खतरे की ओर संकेत करता हुआ-सा दिख रहा था। ये बच्चे आने वाले समय में क्या आत्मसंयमी हो सकेंगे? क्या वे एकाग्रचित्त हो पाने की कला सीख पाएंगे? क्या इन युक्तियों पर उपलब्ध होने वाले इलेक्ट्रॉनिक यानी कंप्यूटर खेलों से अपने को अलग रख पाएंगे? इस प्रकार के अनेक प्रश्न मेरे मन में उठने लगे। – योगेन्द्र जोशी

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“न विश्वसेत् अविश्वस्ते …” – पंचतंत्र में वर्णित कौवे एवं चूहे की नीतिकथा

पंचतंत्र के नीतिवचनों पर आधारित अपनी 7 फरवरी 2010 की पोस्ट में मैंने ग्रंथ का संक्षिप्त और एक प्रकार से अधूरा परिचय दिया था। उसके बारे में इस स्थल पर विस्तार से बताना मेरा उद्देश्य नहीं है। फिर भी इतना कहना चाहूंगा कि इसमें व्यावहारिक जीवन से संबंधित सार्थक नीति की तमाम बातें कथाओं के माध्यम से समझाई गयी हैं । इन कथाओं में अधिकतर पात्र मनुष्येतर प्राणी यथा लोमड़ी, शेर, बैल, कौआ आदि हैं। कथाएं आपस में शृंखलाबद्ध तरीके जुड़ी हुई हैं अर्थात्‍ एक कथा में दूसरी कथा और उसमें तीसरी आदि के क्रम से कथाओं का बखान किया गया है। उक्त ग्रंथ पांच खंडों में विभक्त है जिन्हें “तंत्र” पुकारा गया है। ये हैं:

1. मित्रभेदः, 2. मित्रसंप्राप्तिः, 3. काकोलूकीयम्, 4. लब्धप्रणाशम्, एवं 5. अपरीक्षितकारकम् ।

प्रत्येक तंत्र में किसी एक प्रकार की विषयवस्तु लेकर कथाएं रची गई हैं, जैसे मित्रभेदः में वे कथाएं हैं जो दिखाती हैं कि…

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वह जिसकी आप चर्चा करते नहीं

क्या आपने कभी ऐसे व्यक्ति को देखा है जो सार्वजनिक मंच से यह कहे कि भ्रष्टाचार इतनी खराब चीज नहीं है कि उससे परहेज किया जाए? मैंने ऐसे किसी व्यक्ति को न कभी देखा है और न ही उसके बारे में सुना है। मेरा अपना ख्याल है कि यदि लोगों के बीच में से यादृच्छिक तरीके से किसी को चुन लिया जाए और उसे मंच से भ्रष्टाचार पर कुछ शब्द बोलने को कहा जाए तो वह भ्रष्टाचार की हिमायत नहीं करेगा, बल्कि उसके विरुद्ध ही बोलेगा। (यादृछिक = अंग्रेजी में रैंडम, यानी चुनने की कोई निर्धारित शर्त के बिना जिसे आंख मूंदके चुनना कहा जाएगा।) मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि भ्रष्टाचार में लिप्त व्यक्ति भी सार्वजनिक तौर पर भ्रष्टाचार का विरोध ही करेगा। मेरा अनुमान है कि भारतीय समाज में भ्रष्टाचार का विरोध अधिकांशतः एक दिखावा होता है, उससे वास्तविक परहेज होता नहीं। मन ही मन सभी समझते होंगे कि परहेज करने लगेंगे तो जियेगे कैसे! बहुत से मौकों पर भ्रष्टाचार होते हुए भी लोगों को दिखता नहीं।

     मैं अपने एक हालिया अनुभव की चर्चा करता हूं। डेढ़-दो सप्ताह पूर्व मेरे गेट पर एक युवक पहुंचा। उसने बताया कि वह शहर (वाराणसी) के जलापूर्ति विभाग ‘जलकल’ से आया है और भवन-स्वामियों से मकान संख्या, उसके मूल्यांकन (टैक्स), पानी-टैक्स आदि की जानकारी इकट्ठा कर रहा है। उस जानकारी का प्रयोग भवनों पर वॉटर-मीटर लगाने में किया जाना था। यों तो यह जानकारी जलकल विभाग के पास होनी ही चाहिए, क्योंकि उसी के आधार पर तो जलापूर्ति की जाती है। किंतु सरकारी विभागों की कार्य-शैली ऐसी ही बेतुकी होती है कि अपने अभिलेखों को खंगालने के बजाय वे उपभोक्ता से पूछने लगते हैं। दिलचस्प बात यह है कि मीटर पहले से ही लगे हैं, परंतु उनकी रीडिंग होती नहीं। मेरे अपने मकान पर मीटर 25-26 वर्ष पहले लगा था। अब तक तो वह काम करना भी बंद कर चुका होगा। बता दूं कि वाराणसी में अभी तक जलापूर्ति “अन्मीटर्ड” है। लोग पानी की अंधाधुंध बरबादी करते हैं। सर्वजनिक स्थानों पर तो अक्सर पानी फालतू बहते दिख जाता है। “मीटर्ड” जलापूर्ति होने पर पानी की बरबादी शायद रुक सके, क्योंकि तब लोगों को खरचे गए पानी के अनुपात में कीमत चुकानी पड़ेगी।

हां तो मैं उस युवक की बात पर लौटता हूं। हमारा (घर का) नियम है हम गेट पर आए किसी भी आगंतुक का स्वागत चाय-पानी की पेशकश के साथ करते हैं। तदनुसार हमने उसको गेट के अंदर बुलाकर कुर्सी पर बिठाकर संबंधित कागजात दिखाए। साथ ही उनको मीठे के साथ ठंडा पानी पीने को दिया, जिसे उसने सहज रूप से स्वीकार कर लिया। इस दौरान उससे कुछ औपचारिक और कुछ अनौपचारिक बातें भी कर लीं।

वार्तालाप में उसने बताया, “मैं जलकल का कर्मचारी नहीं हूं, बल्कि उस क्षेत्र के जेई (जूनिअर एंजीनियर) द्वारा इस काम में लगाया गया हूं। … आप देख ही रहे हैं, इस समय काफी गर्मी पड़ रही है। ऐसे में जेई सा’ब कहां फील्ड में उतरने वाले। इसलिए उन्होंने यह काम मुझे सौंप दिया हैं।”

     मैं समझ गया कि माजरा क्या है। मुझे मालूम है कि कुछ सरकारी कर्मचारी मौका मिलने पर अपना कार्य दूसरों से करवाते हैं और बदले में कुछ पैसा उन्हें थमा देते हैं। इसे मैं नौकरी ‘सबलेट करना’ कहता हूं। प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्र के विद्यालयों में ऐसा कभी-कभार देखने को मिल जाता है। कुछ अध्यापक विद्यालय से अनुपस्थित रहते हैं और अपने बदले बेरोजगार युवक/युवतियों को पढ़ाने भेज देते हैं ऐसा मेरे सुनने में आता है। ऐसा ही एक वाकया मुझे याद आता है। विश्वविद्यालय के मेरे विभाग में एक सफाई कर्मचारी आंखों से कमजोर हो चला था। अतः वह अपने बदले किसी और को विभाग में भेजता था। ऐसे अपवाद विश्वविद्याल्य में शायद एक-दो ही रहे होंगे।

     यह अप्रत्यक्ष भ्रष्टाचार का एक रोचक उदाहरण है। किसी सरकारी मुलाजिम द्वारा अपना काम स्वयं न करन सर्वथा अनुचित है। उस व्यक्ति का ऐसा आचरण और साथ में बेरोजगार का शोषण आम तौर पर किसी को कहां पता चलता है?

उस युवक से अधिक बात करने का मेरा मन नहीं हुआ। क्या पता वह अपनी बेरोजगारी का दुखड़ा सुनाने लगता, जिसे सुनना अच्छा न लगता। मेरे पास किसी की बेरोजगारी का कोई इलाज तो है नहीं।

     मुझे लगता है कि भ्रष्ट आचरण हम भारतीयों के चरित्र का अभिन्न अंग बन चुका है। मैं सोचता हूं किसी को भी अपने अनुचित आचरण को लेकर कभी आत्मग्लानि नहीं होती होगी। धर्मकर्म और पापपुण्य की बातें करने वाले समाज में आचरण संबधी विरोधास मैं कई मौकों पर देखता आ रहा हूं। – योगेन्द्र जोशी

 

 

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दूसरों को स्वर्ग का रास्ता दिखाने का ठेका?

मेरे पड़ोस में एक युवक रहता है। अधिक पढ़ा-लिखा नहीं। मैंने उससे कभी पूछा भी नहीं कितने तक पढ़े हो। अवश्य ही १०+२ से अधिक नहीं, या शायद उतना भी नहीं। एससी-एसटी वर्ग का होने के बावजूद आरक्षण का लाभ वह नहीं ले सका है। पिछले कुछ वर्षों से टैस्की चलाने का काम कर रहा है। जब भी सड़क पर मिल जाता है तो उसके हालचाल पूछ लेता हूं।

आज प्रातः वाहन साफ करते हुए उसे मैंने देखा। रुककर पूछा कि उसका आज का क्या कार्यक्रम है। उसने बताया, “आजकल केरला से फ़ादर लोग आए हुए हैं। उन्हीं को अलग-अलग गांवों में घुमाफिरा रहा हूं।”

‘फ़ादर! यानी इसाई धर्म के पादरी या धर्मोपदेशक!

मेरे इस सवाल पर कि गांव-गांव घूमने का उनका मकसद क्या रहता है, उसने जवाब दिया, “वे लोग इसाई धर्म का प्रचार करने आए हुए हैं। उनके स्थानीय कार्यकर्ता लोगों की भीड़ इकट्ठा करते हैं और ये फ़ादर लोग उनको उपदेश देते हैं कि आओ प्रभु ईसू की शरण में आओ। वे आपका उद्धार करेंगे।”

“उनकी बातें सुनकर मेरा मन हुआ कि मैं भी कुछ कहूं।” उसने कहा।

“ऐसी क्या बात हुई उन लोगों से तुम्हारी?”

दरअसल वे बोल रहे थे, “क्या रखा है इस धरती के सुख-चैन में। प्रभु की शरण में आने पर स्वर्ग उपलब्ध होगा जहां सुख ही सुख होगा।”

“तब मैंने कहा सर, आप जिस जमाने की बात कर रहे हैं वह कभी का गुजर चुका है। आज सभी लोग रोजी-रोटी के इंतिजाम में लगे हैं। उनकी चिंता इसी धरती पर पेट भरने की है। अब देखिए न कि जिन गांवों में आप घूम रहे हैं वहां के किसान फसल काटने-संभालने में लगे हैं। उनको आपकी बात सुनने-समझने का मौका भला कहां?”

“हां भई, आपकी बात तो कुछ हद तक सही है। फिर भी हमारी कोशिश रहती है कि उन्हें ‘रास्ता’ दिखाएं।”

“क्यों आप रास्ता दिखाना चाहते हैं? उनको अपना रास्ता खुद खोजने दीजिए।”

उस युवक ने मुझसे कहा, “दरअसल उनके पास मेरे सवालों का संतोषजनक उत्तर नहीं था।”

कम शिक्षित होने के बावजूद उस युवक की बातों में दम था ऐसा मुझे लगा। वस्तुतः टैक्सी चलाते हुए वह तमाम प्रकार के लोगों के संपर्क में आता है। कभी पर्यटकों से वास्ता पड़ता है तो कभी तीर्थयात्रियों से, और कभी विश्वविद्यालय में सेमिनार-कॉन्फ़रन्स के प्रतिभागियों से, इत्यादि। उनसे बातें करके वह काफी कुछ सीखता रहता है।

मैं इस प्रश्न पर विचार करने लगा कि इस धरती पर जो है वह तो सभी को दिखता है। स्वर्ग जैसी कोई चीज होती भी है क्या? किसी ने उसे देखा है? उस अज्ञात स्वर्ग की अधिक अहमियत है या इस धरती की जिसके सहारे हम सब जी रहे हैं? सोचिए।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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वोट? किसी को भी नहीं !

मेरे पड़ोसी शंकरलालजी संध्याकाल घर पर आ धमके। आम तौर पर उनसे घर के बाहर सड़क पर ही मुलाकात हो जाती है और तभी कुशलक्षेम की दो-चार बातों का आदान-प्रदान हो जाया करता है। लेकिन आज वे घर पर ही पहुंच गए। मैंने अनुमान लगाया कि आज चुनाव में मतदान का दिन था, इसलिए चुनाव संबंधी जिज्ञासा लेकर आए होंगे। किसको वोट दिया, कौन जीतेगा, सरकार किसकी बनेगी, आदि की जिज्ञासा आम तौर पर सभी नागरिकों को रहती है, किंतु शंकरलालजी विशेष रूप से उत्सुक रहते हैं। पड़ोसियों-मित्रों से बातचीत के लिए चुनावी मौसम में यही उनका प्रिय विषय रहता है।

घर के अंदर दाखिल होते ही उच्च स्वर में बोल पड़े, “भाई साहब, किसको वोट देकर आए? किस पार्टी को जिता रहे हैं?”

मैंने कहा, “किसी को नहीं।”

उलाहना के अंदाज में वे बोले, “किसी को नहीं? यह तो गलत बात है। वोट डालना तो सभी नागरिकों का कर्तव्य है।”

“ऐसा नहीं हैं। … वोट डालने तो मैं भी गया, परंतु किसी भी प्रत्याशी के पक्ष में वोट नहीं डाला। दरअसल मैं ‘नोटा’ का पक्षधर हूं और उसी के अनुसार मैंने नोटा बटन दबाया।”

“नोटा दबाने से क्या फायदा? यह तो अपना वोट बरबाद करना हुआ।”

“नोटा से क्या लाभ-हानि है यह तो लंबी बहस का विषय है। नोटा का विकल्प यों ही नहीं उपलब्ध हुआ है। उसके लिए कुछ उत्साही जनों ने लंबी लड़ाई लड़ी है। … अस्तु, अभी मैं उसकी बहस में पड़ना नहीं चाहता। केवल इतना कहना चाहूंगा कि मेरी नज़र में कोई भी राजनैतिक दल वोट पाने के योग्य नहीं है। लोकतंत्र-लोकतंत्र का ढिंढोरा पीटने भर से क्या विश्वसनीय और फलदायी लोकतंत्र आ जाता है? मेरा तो सभी दलों से मोहभंग हो चुका है। तब किसे वोट दूं? अपने मतदान के अधिकार को छोड़ना भी नहीं चाहता; सो नोटा का प्रयोग करके अपना फर्ज निभा लिया।”

“राजनैतिक दलों से इतनी नाराजगी? सरकारें बनें इसके लिए वोट तो देना ही पड़ेगा न? सभी लोग नोटा दबाने लगेंगे तो सरकारें कैसे बनेंगी?”

मैंने उनको तसल्ली देते हुए जवाब दिया, “अरे भाई, सरकारें बनने की चिंता मत करिए। हर प्रत्याशी के समर्थक तो होते ही हैं वोट डालने के लिए। जिसको एक वोट भी अधिक मिल जाए वह जीतेगा ही, भले ही मतदान पांच-दस प्रतिशत ही क्यों न हो। असल समस्या वह नहीं है। समस्या है लोकतंत्र की गुणत्ता की। समस्या है राजनेताओं के आचरण की। समस्या है दलों और उनके सदस्यों के सिद्धांतों की।”

“मैं समझ नहीं पाया कि आप कहना क्या चाहते हैं?”

मैंने उन्हें संक्षेप में समझाने की कोशिश की, “देश के लोकतंत्र को दशकों तक देखने के बाद मेरी धारणा बन चुकी है कि जिन नेताओं ने लोकतांत्रिक व्यवस्था का ‘ठेका’ ले रखा है वे स्वयं लोकतांत्रिक नही हैं अपने कार्य-व्यापार में। सब जनप्रतिनिधि चुने जाने के बाद सबसे पहले अपने हितों को साधने की कोशिश करते पाये जाते हैं। देश के लिए कायदे-कानून बनाने वाले खुद ही उनका उल्लंघन करते हैं और उल्लंघन करने वाले अपने समर्थकों-चहेतों के बचाव में उतर पड़ते हैं। कितने राजनैतिक दल हैं जिनमें आंतरिक लोकतंत्र है? दल का मुखिया ताउम्र मुखिया बना रहता है या अपने पारिवारिक किसी सदस्य को कमान ऐसे सोंपता है जैसे वारिसों को धन-संपदा सोंपी जाती है। दल के अन्य नेता बंधुआ मजदूरों की तरह मुखिया की हां में हां मिलाते हैं। इतना ही नहीं, सभी दलों में कोई एक-तिहाई से एक-चौथाई नेता आपराधिक पृष्टभूमि के बताए जाते हैं। क्या आम जनता के बीच इसी अनुपात में आपराधिक वृत्ति के लोग मिलते हैं? हरगिज नहीं। तब क्या यह कहना गलत होगा कि देश की राजनीति आपराधिक सोच वालों की शरण्स्थली बन चुकी है? जो बात मुझे सबसे अधिक खलती है वह है इन दलों का समाज को बांटो और राज करो की अलोकतांत्रिक नीति। कोई दलितों की बात करता है तो कोई पिछ्ड़ों की, कोई यादवों की तो कोई जाटों की, कोई हिंदुओं की तो कोई मुस्लिमों की, कोई मराठाओं की तो कोई गैर-मराठाओं की। है कोई जो भारत और भारतीय नागरिकों की बात करता हो? है कोई उन समस्याओं की बात करने वाला जिनका सभी देशवासियों से सरोकार है? जरा ऐसे सवालों पर गहराई से विचार करें तो मेरी बात समझ में आ जाएगी। दिलचस्प है लोग एक तरफ जनप्रतिनिधियों की आलोचना करते हैं और दूसरी तरफ उन्हीं को वोट देने दौड़े चले आते हैं। चुनाव का बहिष्कार क्यों नहीं करते वे? नोटा बटन क्यों नहीं दबाते वे?”

शंकरलालजी के पास मेरे सवालों का समुचित उत्तर नहीं था। इसलिए उन्होंने बातचीत का विषय बदल देना ही ठीक समझा। – योगेन्द्र जोशी

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