स्वतंत्रता दिवस 2016: देश ने वह नहीं पाया जिसकी उम्मीद थी

सूचनात्मक टिप्पणी

यह आलेख मैंने कल १५ अगस्त के उपलक्ष पर अपने दूसरे ब्लॉग (https://indiaversusbharat.wordpress.com) के लिए लि्खा था। किंतु भूलवश मैं इसे यहां पोस्ट कर बैठा। गलती कैसे हुई इसका ध्यान नहीं है। अब इसे वहां स्थानांतरित कर दिया है। (https://indiaversusbharat.wordpress.com/2016/08/16/) पाठकों से क्षमायाचना।

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जांच अधिकारी

वह पुलिस महकमे से प्रतिनियुक्ति पर आया एक सीबीआई अधिकारी था । अपने कार्य के प्रति समर्पित निष्ठावान कर्मठ अधिकारी था वह । मुश्किल से डेड़-दो साल हुए होंगे उसे नयी संस्था में आए हुए । वह चाहता था कि जिस जांच में उसे लगाया गया हो उसे पूरा करने का उसे अवसर मिले । वह समझ नहीं पा रहा था कि इस अल्पकाल में ही विभाग के भीतर उसके दो तबादले क्यों हो गये । उच्चाधिकारी से पूछने पर दोनों बार यही जवाब मिला कि उसकी जरूरत दूसरी जगह महसूस की जा रही है । यह उसकी योग्यता का प्रमाण था या कुछ और यह उसके लिए समझ से परे था । अस्तु, आदेश मानना उसका कर्तव्य था, अतः वह आधा-अधूरा कार्य छोड़ दूसरी जांच में मनोयोग से जुट जाता । अब वह रसूखदार और चर्चित किसी राजनेता की  आपराधिक संलिप्तता की जांच में जुटा था । उसे दाल में बहुत कुछ काला दिख रहा था और वह आशान्वतित था कि जांच के सार्थक परिणाम शीघ्र ही उसके हाथ लगेंगे । किंतु आज उसके उच्चाधिकारी ने जो कहा उससे उसे मानसिक कष्ट के साथ निराशा हो गयी ।

शाम को वह घर पहुंचा और सोफ़े के कोने पर हत्थे के सहारे बैठ गया । आम दिनों की तरह वह हाथमुंह धोकर तरोताजा होने वाशबेसिन या बाथरूम नहीं गया । थोड़ी देर में पत्नी उसके लिए हल्के नाश्ते के साथ चाय बना के ले आई । उसका मुरझाया चेहरा देख पत्नी ने पूछा, “काम के बोझ से तुम थके-हारे तो अक्सर दिखते हो, लेकिन आज तुम्हारे चेहरे पर परेशानी के भाव उभर रहे हैं । तबियत तो ठीक है न ? कोई खास बात तो नहीं हो गयी आफ़िस में ?”

पत्नी उसकी बगल में आकर बैठ गई । वह कुछ क्षणों तक शांत रहा । फिर प्रश्न भरी निगाह से देख रही पत्नी की ओर मुखातिब होते हुए बोला, “हां कुछ ऐसा ही हो गया आफिस में ।” और पुनः शांत होकर सुनी आंखों से छत की ओर ताकने लगा । पत्नी असमंजस में थी कि कुछ आगे पूछे या उसे अपनी बाहों में भरकर उसके उद्वेग को किंचित दूर करे ।

“लो, चाय पी लो, ठंडी हो रही होगी ।” कहते हुए पत्नी ने उसके हाथ में चाय का प्याला पकड़ाया । उसने चाय की दो-चार चुस्कियां जब ले लीं तो पत्नी की हिम्मत थोड़ी बढ़ी कि आगे कुछ पूछे । “बताओ कुछ हुआ क्य़ा आफिस में ? मैं आफ़िस की समस्या का हल नहीं दे सकती, किंतु मुझे बताके तुम अपना मन हल्का तो कर ही सकते हो न !”

चाय की चुस्कियों और पत्नी के सान्निध्य ने अब तक उसके मन का बोझ कुछ कम कर दिया था । उसने कहना शुरू किया, “आज मेरे बॉस ने मुझे बुलाया और मुझसे कहा कि मैं जांच का काम धीमी गति से करूं । जल्दी से जल्दी परिणाम पाने की कोशिश मैं न करूं और मामले को कुछ हद तक लटकाये रहूं । मैं उनकी बात मानना नहीं चाहता था । मेरा सोचना है कि ऐसा करना मेरे व्यवसाय के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं हो सकता है और न ही दायित्वों के निर्वाह में ढीला रवैया मुझे व्यक्तिगत तौर पर स्वीकार्य है । मैंने अपना पक्ष रखते हुए उनसे जानना चाहा कि वे ऐसी सलाह क्यों दे रहे हैं । पहले तो वे टालते रहे फिर बोले कि ऐसा अलिखित निर्देश ऊपर से आया है । ऊपर का मतलब मंत्री के स्तर से है यह मैं समझ गया । फिर वे कहने लगे, ‘मुझे मालूम है कि यह बात तुम्हें पसंद नहीं । मुझे भी यह सब पसंद नहीं, परंतु अनुभव ने मुझे सिखा दिया है कि यहां ऐसा कुछ चलता रहता है । चुनाव नजदीक हैं उस समय यह मुद्दा सत्तापक्ष के काम आ सकता है यह मेरा अनुमान है । राजनेताओं के मामले ऐसे ही लटकाए रखे जाते हैं । न चाहते हुए भी हमें बहुत कुछ करना पड़ता है ।’ उसके बाद मैंने अधिक बात नहीं की और मैं अपने कार्यालय लौट आया । तुम्हें मालूम है ऐसी स्थिति में मुझे तकलीफ़ होती है ।”

“हां, मुझे मालूम है । इतना तो तुम्हें समझती ही हूं । मुझे भी बहुत-सी बातें ठीक नहीं लगती हैं, पर कर भी क्या सकते हैं ? बहुत-से मौकों पर समझौते करने पड़ते है । परिवार के भीतर, मित्र-परिचितों के स्तर पर, राह चलते अजनबियों के बीच, बताओ हम कहां-कहां समझौते नहीं करते ? इतना दुःखी न होओ । … चलो टीवी चलाती हूं, आज की खबरें सुनो ।”  पत्नी ने अपने तरीके से उसे आश्वस्त करने का प्रयास किया । वह टीवी ऑन करने उठी तो उसने उसका हाथ खींचकर वापस अपने साथ बिठा लिया ।

“फ़र्क है । सामाजिक जीवन में हमारे समझौते हमारी व्यक्तिगत लाभहानि की कीमत पर होते हैं, हम अपनी सुख-सुविधा या वैचारिक प्रतिबद्धता दांव पर लगाते हैं। लेकिन शासन-प्रशासन में समझौतों का मतलब है देशहित की अनदेखी करना, अपने दायित्व को न निभाना जिनके लिए देश से आर्थिक लाभ ले रहे होते हैं । इस फ़र्क को समझो ।” उसने अपनी धारणा स्पष्ट की ।

उसने आगे कहना आरंभ किया, “इससे तो अच्छा है अपने राज्य में रहकर ही काम करना ।  जब शासन में बैठे लोग किसी से काम नहीं लेना चाहते हैं तो उसे ऐसी जगह भेज दिया जाता है जहां बंधा-बंधाया काम (रूटीन वर्क) करना काफ़ी होता है । तब इस बात की ग्लानि नहीं होती है कि मैं अपना दायित्व नहीं निभा रहा हूं । लेकिन इस महकमे में तो किसी न किसी जांच से जुड़ना ही होता है और तमाम दबाव झेलने होते हैं ।”

उस रात उसे काफ़ी देर तक नींद नहीं आई । वह सोचने लगा कि जिस संस्था में किसी न किसी बहाने दायित्व निभाने से रोका जाये वहां टिके रहना चाहिए अथवा नहीं ।

दूसरे दिन रोज की भांति वह वह कार्यालय के लिए तैयार हुआ । पत्नी ने प्रातःकालीन नाश्ता कराया और दोपहर के भोजन के लिए लंचबाक्स थमाते हुए बोली, “अगर शाम को जल्दी लौट सको तो कुछ देर के लिए कहीं घूमने निकल चलेंगे ।” वह चुप रहा, कोई जवाब नहीं दिया ।

घर से निकलते-निकलते वह पत्नी से बोला, “मेरी प्रतिनियुक्ति निरस्त करके मुझे अपने मूल राज्य वापस भेज दिया जाए इस आशय का निवेदन मैं आज कार्यालय को सोंप दूंगा ।” – योगेन्द्र जोशी

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अलविदा, अवाच् मित्रो !

Huron Woods Pathway

आज मैं करीब डेड़ माह के लंडन प्रवास के बाद स्वदेश लौट रहा हूं । यह इंग्लैंड का सुविख्यात शहर लंडन नहीं है, यह तो है उसी नाम से कनाडा के पूर्वी प्रांत ओंटारियो में बसा हुआ एक छोटा-सा शहर, जिसकी आबादी पांच लाख से भी कम आंकी जाती है । शहर विस्तृत भूभाग में विरलतया बसा है, पेड़-पौधों से पटा, भीड़भाड़ से मुक्त शहर ।

अभी प्रातःकाल है और चंद घंटों के बाद मेरी हवाई उड़ान शुरू होनी है । रोज की भांति मैं आज भी टहलने निकल पड़ता हूं अपने अस्थाई आवास के सामने फैले ‘ह्यूरान वुड्ज’ (ह्यूरान उपवन) के अंदरूनी भाग में बने मार्ग पर । यह मार्ग है पैदल टहलने तथा शौकिया साइकिल-चालन के लिए । इस मार्ग के दोनों ओर हरे-भरे पेड़-पौधे तथा झाड़ियां हैं और बगल में बीस-तीस फुट की दूरी पर बहती है टेम्स नदी । अंगरेजों ने अपने बसाए इस शहर को लंडन नाम तो दिया ही साथ में इस नदी को भी टेम्स नाम से संबोधित किया, भले ही इंग्लैंड की टेम्स नदी की तुलना में यह बहुत छोटी है ।

इस मार्ग पर प्रायः रोज ही प्रातः या सायं अथवा दोनों वक्त मेरे टहलने की दैनिक चर्या होती रही है । किंतु आज का टहलना कुछ विशेष है – अपने लंडन प्रवास के अंतिम दिन का टहलना । संध्याकाल होते-होते तो मैं इस देश को छोड़ चुका होऊंगा । यह टहलना इसलिए भी विशेष है कि आज मुझे इस अवाच् (वाणीरहित) उपवन से, इसके पेड़-पौधों से, टेम्स नदी से विदा लेनी है । इस अल्पकालिक प्रवास के दौरान इन सब से मेरा एक प्रकार का लगाव हो चुका है । समय के बीते अंतराल में मुझे लगा है कि मैं इनके साथ घनिष्टतया जुड़ चुका हूं । भीड़भाड़ एवं कोलाहल से दूर, कभी-कभार इक्का-दुक्का लोगों के अगल-बगल से गुजर जाने के अलावा यहां कोई मानवीय हलचल नहीं रही है । इस स्थिति में मुझे अनुभव होता रहा कि मेरी इन पेड़-पौधों से, पक्षियों से, नदी से, मित्रता हो गई है; ये मुझे जानने लगे हैं, मेरे मनोभावों को ये भी महसूस करने लगे हैं, और ये स्वयं मुझे मूक संदेश देते आ रहे हैं ।

अपने इन मानवेतर अवाच् मित्रों के सान्निध्य से मैं आज वंचित होने जा रहा हूं । इनसे विदा लेते मुझे अच्छा नहीं लग रहा है । आज का मेरा टहलना अन्य दिनों की भांति नहीं हो रहा है । अपनी स्वाभाविक तीव्र गति से मैं आज नहीं टहल रहा हूं । मैं बीच-बीच में ठहर जाता हूं । कभी किसी विशाल वृक्ष के शिखर की ओर दृष्टि डालता हूं तो कभी किसी पौधे के फूलों को ध्यान से देखता हूं । कभी किसी चहकती चिड़िया को पेड़ों की शाखाओं के बीच ढूढ़ने का प्रयास करता हूं । वह मुझे दिखती नहीं, बस उसका चहकना भर सुन पाता हूं । मैं टेम्स नदी के किनारे चला जाता हूं । नदी पर तैरती बत्तखों का एक झुंड मेरी ओर बढ़ता है, मुझसे दाना-चारा पाने की उम्मीद के साथ । आज मेरी जेब में उनके खाने योग्य कुछ भी नहीं । मैं माफी मांगता हूं और अस्फुट शब्दों में ‘अलविदा’ कहते हुए मन ही मन हाथ हिलाते हुए लौट आता हूं । लगता हैं कि बत्तखें पंख फड़फड़ाकर मुझे शुभयात्रा का संदेश दे रही हैं ।

उस मार्ग पर बीच-बीच में रुकते हुए मैं अपने इन मित्रों के साथ मूक वार्तालाप करता हूं । मैं एक पौधे के फूलों को ध्यान से देखता हूं । मेरे होंठ कांपते हैं; लगता है मैं उन फूलों से कहना चाहता हूं, “तुम बहुत सुन्दर हो; मैं रोज तुम्हें और तुम्हारे साथी फूलों को प्रतिदिन निहारता आया हूं; पर आज इस पल के बाद नहीं देख पाऊंगा, क्योंकि मैं जा रहा हूं तुम सब से दूर, बहुत दूर । पता नहीं कभी दुबारा यहां आना हो भी पाएगा कि नहीं ।” मंद-मंद प्रवाहित हो रही वायु के साथ हिलते हुए उन फूलों का मूक प्रत्युत्तर लगता है मैं सुन पा रहा हूं, “आना-जाना तो लगा ही रहता है, मित्र । हम ही को देखो, हमारी काया यानी यह पौधा पूर्व में यहां नहीं थी और आगामी शीत ऋतु के हिमपात होते-होते यह अपना अस्तित्व खो देगी । उसके बाद के बसंत काल में हमारी वह अगली पीढ़ी यहां पर होगी जिसे हम बीज रूप में छोड़ जाएंगे । आवागमन तो प्रकृति का नियम है, कभी काया का स्थान परिवर्तन होता है तो कभी जीवात्मा का । रूको नहीं आगे बढ़ो हमारी शुभकामनाओं के साथ ।”

मैं आगे बढ़ जाता हूं । कुछ कदमों की दूरी पर मुझे हिसालू (रैस्पबेरी या रासबेरी) की झाड़ी दिखती है । मैं उसके पास ठहरता हूं । देखता हूं कि उसके कुछ फल सूख चुके हैं या झड़ चुके हैं । कुछ पककर गहरे कत्थई रंग धारण कर चुके हैं तो कुछ अभी कच्चे है । मुझे लगता है कि वह झाड़ी कह रही है, “इन फलों को मेरी ओर से भेंट मानकर ग्रहण कर लो । तुम नहीं तो कोई और इन्हें स्वीकारेगा, या ये अंत में भूमिशायी हो जाऐंगे और कालांतर में पंचतत्व में विलीन हो जाऐंगे ।” मैं हिसालू के चार-छः फलों को चुनकर मुख में डाल लेता हूं और उस झाड़ी को धन्यवाद देते हुए अपने कदम आगे बढ़ाता हूं ।

मुझे उस मार्ग के ओर कम घने एक पेड़ पर गौरैया सदृश एक चिड़िया चीं-चीं की ध्वनि करते हुए एक शाखा से दूसरी, दूसरी से तीसरी, आदि के क्रम से फुदकती दिखाई देती है । बीच-बीच में वह पत्तों के मध्य ओझल भी हो रही है । मुझे लगता है वह मुझसे कह रही हैं, “मुझे देखो मैं एक स्थान पर नहीं ठहरती, इधर-उधर फुदकती रहती हूं । जो स्थावर है उसी के लिए स्थिरता नियत है; जंगम के लिए प्रकृति ने चलते ही रहने का नियम बनाया है । तुम्हारे मुख के भावों से मैं समझ चुकी हूं कि तुम आज जा रहे हो । अवश्य ही जावो और स्मरण करो ऐतरेय ब्राह्मण गंथ के ‘चरैवेति चरैवेति’ के संदेश को । इस उपवन की शुभकामना के साथ हमसे विदा ले लो ।”

मैं पैदल मार्ग के उस छोर पर पहुंचता हूं जहां वह मेरे अस्थायी आवास के निकट के मुख्यमार्ग से जुड़ता है । उस मुख्यमार्ग पर कदम रखने के पहले मैं पीछे मुड़कर अपने हाथ ऊपर की ओर उठाता हूं । उस उपवन के अपने अवाच्‍मित्रों की ओर अंतिम बार देखता हूं और मन ही मन कहता हूं, “मित्रो, तुम सबके सुखद सान्निध्य की स्मृति के साथ मैं विदा लेता हूं । अलविदा !” – योगेन्द्र जोशी

(चित्र में प्रदर्शित रासबेरी के रसीले फल को हमारे कुमाऊं, उत्तराखंड, में हिसालू कहा जाता है ।)

 

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अटैचियों को जंजीर से बांधकर सुरक्षित रखने का असमंजस

 

रेलगाड़ी से यात्रा करते समय बहुत-से यात्रियों के सामने यह समस्या प्रायः आ खड़ी होती है कि रात के समय अटैचियों-बैगों को कैसे सुरक्षित रखा जाये । उत्तर भारत में यह समस्या बहुत आम है, खास तौर पर उत्तर प्रदेश और बिहार में । जब कोई  यात्री रात में गहरी निद्रा में सोया रहता है, तो उसे यह डर बना रहता है कि चोर-उचक्के डिब्बे में घुसकर उसके सामान पर चुपचाप हाथ साफ कर सकते हैं । सामान सुरक्षित रहे इस प्रयोजन के लिए अक्सर सिकड़ी (जंजीर) का प्रयोग किया जाता है । सामान को शायिका (बर्थ) के नीचे लगे छल्ले से सिकड़ी के सहारे बांध दिया जाता है । मैं स्वयं इसी विधि से सामान सुरक्षित रखता हूं; भरोसा नहीं रहता है न कि सामान सुरक्षित रहेगा !

करीब तीन साल पहले मैं पत्नी के साथ पुद्दुचेरी (पांडिचेरी) पर्यटक के तौर पर गया । हमें हैदराबाद होकर जाना था । वहां से हम पूर्वनिर्धारित आरक्षण के अनुसार रात्रिकालीन रेलगाड़ी द्वारा चेन्नै के लिए रवाना हुए । नौ बजे के बाद हमारा सोने का उपक्रम आरंभ हुआ । सोने से पहले सदा की तरह सोचा कि अपने अटैची-बैग को शायिका के नीचे सिकड़ी से बांधकर सुरक्षित कर लिया जाए । साथ लाए गए बैग से हमने सिकड़ी भी निकाल ली । लेकिन तब हमें असमंजस का एहसास होने लगा । दरअसल डिब्बे में चढ़े हुए या चढ़ रहे अन्य यात्रियों को हम  देख रहे थे कि वे अपना-अपना सामान शायिकाओं के नीचे सरकाते हुए निश्चिंत होकर अपनी-अपनी शायिका पर सोने जा चुके हैं या जा रहे हैं । कोई ऐसा यात्री नजर नहीं आया जिसने सिकड़ी से सामान बांधा हो ।

मैंने पत्नी से कहा, “यहां कोई भी अपने सामान के लिए चिंतित नहीं दिखता । उन लागों को देखते हुए सिकड़ी से सामान बांधने का ख्याल मुझे कुछ अटपटा-सा लग रहा है । तुम्हारा क्या सोचना है ?”

वे बोलीं, “हां, सामान चेन करने में अजीब-सा तो मुझे भी लग रहा है । ऐसा लगता है कि यहां सामान सुरक्षित रखने के लिए सिकड़ी वाला तरीका कोई नहीं अपनाता है । ऐसे में कोई देखेगा तो मन ही मन हंसेगा ।”

“तब चेन करने का ख्याल ही छोड़ दिया जाये । उसमें कोई जोखिम नहीं लगता ।” मैंने प्रत्युत्तर में कहा ।

उन्होंने हामी भरी और अटैची-बैग को हमने शायिका के नीचे यूं ही छोड़ दिया । अगली सुबह हम सकुशल चेन्नै पहुंच गए ।

बहुत-सी बातें हैं जिनके सापेक्ष मैंने दक्षिण भारत को उत्तर भारत से बेहतर पाया है । उत्तर भारतीयों को उनसे कुछ सीखना चाहिए । इस कथन पर कुछ लोगों को आपत्ति हो सकती है, किंतु हकीकत तो हकीकत ही होती है । – योगेन्द्र जोशी

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दारोगा की धुनाई

चंद रोज पहले टीवी के किसी चैनल पर पंजाब राज्य के पुलिस बल से जुड़ा एक समाचार देखने-सुनने को मिला । चैनल पर दिखाए गये वीडियो क्लिप में पुलिस के दो-तीन जवान एक युवक को बेरहमी से पीटते नजर आ रहे थे । उस आम युवक – जाहिर है कि वह कोई “खास श्रेणी” का रसूखदार व्यक्ति नहीं था – की गलती यह थी कि वह अपने किसी मित्र की उन पुलिसवालों के साथ हो रही बहस की वीडियो क्लिप मोबाइल पर रिकार्ड कर रहा था । पुलिस के जवानों की नजर जब उस पर पड़ी तो उन्हें उसकी हरकत किसी “अपराध” से कम नहीं लगी । उन्होंने उसका मोबाइल छीनकर वीडियो रिकाडिंग मिटा दी और “कानून की मर्यादा बनाए रखने” तथा सबक सिखाने के लिए उसकी पिटाई भी कर दी । वे मोबाइल अपने साथ ले गए कि नहीं यह मुझे स्पष्ट नहीं हो सका । उनको शायद यह पता नहीं रहा होगा कि पास के एक दुकान का सीसीटीवी कैमरा घटना की रिकार्डिंग कर रहा है ।

उसी दिन पुलिस बल से जुड़ी दूसरी घटना के समाचार की भी जानकारी मिली । महाराष्ट्र राज्य से संबंधित उस समाचार के अनुसार तीन पुलिस वाले अर्धरात्रि के समय मिठाई की उस समय बंद एक दुकान में घुस गये ताला तोड़कर । और “संवेदनशीलता का परिचय देते हुए” उन्होंने वहां सो रहे कर्मचारियों की तबियत से मरम्मत की । समाचार में बताया गया कि वे दुकान के किसी कर्मचारी से खफा थे ।

इन दो समाचारों ने मुझे लगभग उसी समय की एक स्थानीय घटना की याद दिला दी । मैं घर के पास की सब्जीसट्टी पर सब्जियां और फल खरीदने गया था । वहां एक पेड़ के नीचे एक सब्जी विक्रेता जमीन पर सब्जियों की ढेरियां लगाकर बेच रहा था । मैं खरीदफरोख्त करने लगा । इसी दौरान ठेले पर भूरे जटाधारी नारियल (पुष्ट लेकिन पानी वाले) बेच रहा एक आदमी उसके पास पहुंचा और बोला, “कल खूब धुनाई हुई उसकी ।”

सब्जी वाला उस घटना से पहले से ही वाकिफ रहा होगा जिसके संदंर्भ में उक्त बात कही होगी । उस नारियल वाले से मैं भी यदाकदा नारियल खरीदा करता हूं और उस नजर से देखें तो वह एक प्रकार से मेरा भी परिचित था, सीमित अर्थ में ही सही । मुझे घटना के बारे में जिज्ञासा हुई, अतः मैंने उससे पूछा, “क्यों, क्या हुआ, किसकी धुनाई हो गई ?”

“अरे कुछ नहीं … । आजकल एक दारोगा इस सड़क पर गस्त लगाता है । उसी की धुनाई कर दी कुछ लड़कों ने ।”  उसने जवाब दिया ।

“आखिर मामला क्या था, क्या बात हो गई थी ।” मैंने पूछा ।

“दो-तीन रोज पहले उसने बी.एच.यू. (बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय) में पढ़ने वाले एक लड़के को किसी बहाने पीट दिया और उसका मोबाइल भी छीन लिया । वह लड़का जब बाद में बी.एच.यू. गया और उसने अपने दोस्तों को घटना के बारे में बताया तो उन्होंने तय किया कि दारोगा को सबक सिखाया जाए । तय हुआ कि वह लड़का उसी इलाके में जाए और देखे कि उससे फिर से सामना हो जाए । तब वह दोस्तों को खबर कर दे । कल 25-30 की संख्या में जुटकर वे लोग अपनी योजना में सफल हो गये । उन्होंने दारोगा की पिटाई कर दी ।”

“लेकिन अखबार में तो इस बारे में कोई खबर नहीं आई ।” मैंने घटना के प्रति शंका जताई ।

“अखबार में हर बारदात के बारे में थोड़े ही छपता है । कोई बहुत बड़ी घटना तो थी नहीं । ऐसी बातें तो शहर में अक्सर होती ही रहती हैं । किसी ने शिकायत भी नहीं की होगी । लड़के क्योंकर शिकायत करते ? और दारोगा भी सोचता होगा कि मामले में कहीं वही न फंस जाए ।”

मैंने घटना की सत्यता के बारे कुछ लोगों से जानना चाहा । किसी ने कहा कि ऐसी कोई जानकारी उसे नहीं है तो किसी और ने कहा कि उसने भी ऐसी घटना के बारे में सुना । अन्य किसी ने कहा कि ऐसी छोटी-मोटी बातें तो होती ही रहती हैं । पुलिस का रवैया अधिकांशतः अच्छा नहीं रहता यह बात लोग अवश्य मानते दिखे ।

परतंत्र भारत में पुलिस व्यवस्था अंगरेजों ने अपने हित साधने के लिए स्थापित की थी । अतः पुलिस जनों में तब आम लोगों के प्रति सेवाभाव न रहा हो तो बात समझ में आती है । लेकिन स्वतंत्र भारत में दो से अधिक पीढ़ियां बीत जाने के बाद भी पुलिस-बल उसी ढर्रे पर चल रहा हो तो अपने को तकलीफ तो होती ही है । समाचार माध्यमों में उनके अवैधानिक कारनामों तथा लापरवाही की खबरें छपती रहती हैं।  उनकी मानसिकता कभी बदलेगी क्या ? इस सवाल का जवाब मेरा मन नहीं में ही देता है । – योगेन्द्र जोशी

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नीयत डोल गयी मूंगफली की चंद फलियों पर

मैं घर के पास के मुख्य मार्ग से लौट रहा हूं । रास्ते में सड़क के किनारे कच्ची जमीन पर भट्टी सुलगाए हुए दो भाई मूंगफली भूनकर बेच रहे हैं । बड़े-से कड़ाह में एक भाई भूनने का काम करता है तो दूसरा ग्राहकों को तौलकर बेचता है । मैं इनको करीब दो महीनों से यहां अपना छोटा-सा कारोबार करते हुए देख रहा हूं । पिछले वर्षों तक मैंने इनको यहां कभी नहीं देखा था । पूछे जाने पर बताते हैं कि ये इसी साल पहली बार मेरे शहर में रोजीरोटी की तलाश में पहुंचे हैं । मूंगफली भूनकर बेचने का धंधा उनकी समझ में आया, सो उसी पर लग गये।

उस रास्ते से कभी-कभार आते-जाते मैं भी उनसे मूंगफली खरीद लेता हूं । वे पच्चीस रुपया पाव बेचते हैं, जब कि आम ठेलों पर भुनी मूंगफली बेचने वालों की दर 35 रुपया पाव है । दाम के साथ मूंगफली में अंतर जरूर रहता है । ठेले वाले कच्ची मूंगफली को छानकर-फटककर साफ करते हैं, अपुष्ट या खोखली फलियों को हटाते हैं और तब भूनते हैं, जब कि ये भाई बाजार से बोरों में भरी मूंगफली को जैसा का तैसा ही इस्तेमाल करते हैं ।

इनके पास पहुंचकर मैं ठहर जाता हूं । दो-तीन गाहक पहले से मौजूद हैं । मुझसे ठीक पहले बारी आती है एक दंपती की । महिला बाइक से उतरकर मूंगफली खरीदती हैं, मेरे अनुमान से पाव भर, और उनके पति बाइक पर बैठे प्रतीक्षा करते हैं । महिला मूल्य चुकाते हुए दुकानदार से मूंगफली भरी पॉलिथीन की थैली थाम लेती हैं । जिज्ञासावश मैं उनके हावभाव गौर से देख रहा हूं । चलते-चलते वे मुठ्ठी में कुछ मूंगफली उठा लेती हैं । हो सकता कि उनके मन में बाइक पर बैठे उन्हें ठूंगने का विचार हो । मैं सोचने लगता हूं कि बाइक में बैठकर अपने को संतुलित रखते हुए यह कार्य आसान तो नहीं ही होगा । लेकिन ऐसा कुछ होना नहीं है । वे मुठ्ठी की सामग्री अपनी झोली में डालती हैं, बाइक पर बैठती हैं, और बाइक चल देती हैं । उस समय मैं अकेला गाहक बच जाता हूं ।

मैं विक्रेता से पूछता हूं, “आपके खरीददार ढेरी में से बिना पूछे कुछ मूंगफली उठा लेते हैं क्या ?”

जवाब मिलता है, “हां, कोई-कोई गाहक खरीदते-खरीदते लगे हाथ दो-चार फलियां ठूंग ही लेते हैं । पर सब ऐसा नहीं करते ।”

मैं अपनी साइकिल पर सवार होकर घर की ओर बढ़ जाता हूं । उस महिला की मुठ्ठी में भला कितनी मूंगफली समाई होगी इस बात का मैं रास्ते में अनुमान लगाता हूं । मुझे लगता है कि मुश्किल से बीस-तीस पैसे की रही होगी, या थोड़ा अधिक पचास पैसे की, या उससे कुछ अधिक की ।

जीवन की यह एक विडंबना ही तो है कि कभी-कभी खाते-पीते व्यक्ति की नीयत उतने कम पर भी डोल जाती है । कुछ ऐसा ही अनुभव मुझे मिला है अंगूर और जामुन के साथ भी । – योगेन्द्र जोशी

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“हे भगवन्, अगला जनम मोहे अमरीका में दीजो ।”

सोमबार, 15 अक्टूबर, का दिन है और अभी संध्याकाल का समय है । मैं घर के पास की दवा की दुकान पर पहुंचा हूं । परिचित होने के नाते दवा-विक्रेता से दो-चार मिनट बतियाते हुए काउंटर के एक तरफ खड़ा रहता हूं । तभी एक युवक तेजी से दुकान पर पहुंचता है । दवाविक्रेता से वांछित दवा मांगते हुए वह समाचार देता है, “जानते हो, गोदौलिया और उसके आसपास कर्फ्यू लग गया है ।”

दवाविक्रेता पूछता है, “क्यों ? क्या हो गया वहां ?”

युवक बताता है, “मालूम नहीं है क्या ? आज साधु-संतों  ने प्रतिकार दिवस मनाने का कार्यक्रम रखा था । गोदौलिया क्षेत्र में उनका विरोध-प्रदर्शन चल रहा था । जुलूस लेकर शहर के अन्य जगहों पर पहुंचने का इरादा रहा होगा प्रदर्शनकारियों का । पुलिस ने उनको आगे बढ़ने से रोकना चाहा । बस, क्या था, भगदड़ मच गयी । उपद्रवी लोगों को मौका मिल गया और उतर गये आगजनी और लूटपाट पर ।”

“अभी एक-दो घंटा हो रहा होगा घटना हुए । यहां गोदौलिया से दूर हम लोगों को तुरंत खबर कहां लगती है, वह भी दुकानदारी की व्यस्तता के समय । शहर की ओर से कोई आ रहा हो तो उसी के मुख से सुनने को मिलता है ।” दुकानदार घटना के बारे में अनभिज्ञता जताता है ।

अन्य नगरवासियों की भांति मुझे भी तथाकथित साधु-संतों के प्रतिकार दिवस की पृष्ठभूमि का अंदाजा है । बीते 22 सितंबर को ये साधु-संन्यासी इस मांग को लेकर आंदोलन पर उतर आए थे कि उन्हें गंगाजी में ही मूर्ति-विसर्जन की इजाजत दी जाए । कुछ दिनों पहले गणेशोत्सव मनाया गया था । उस समय गणेश-प्रतिमाओं को गंगाजी में विसर्जित करने पर रोक लगाई गयी थी । गंगाजी में लगातार बढ़ रहे प्रदूषण के मद्देनजर प्रशासन ने उसके जल में मूर्ति-विसर्जन को प्रतिबंधित कर रखा है । आस्था के नाम पर इन साधु-संन्यासियों को वैकल्पिक व्यवस्था स्वीकार्य नहीं है । शायद उस समय की कुछ प्रतिमाएं अभी विसर्जित होनी हैं । चंद रोज बाद दशहरा-पूजा पर देवी-प्रतिमाएं प्रतिष्ठापित होंगी, तब उनके विसर्जन की भी समस्या होगी । उस 22 सितंबर को इन लोगों के आंदोलन ने हिंसक रूप ले लिया था और पुलिस ने भीड़ नियंत्रित करने का वही पुराना तरीका अपनाया था । साधु-संतों पर लाठियां बरसीं थीं और कई गंभीर रूप से घायल हो गए थे । आज की प्रतिकार रैली उस दिन की लाठीचार्ज की घटना के प्रति विरोध दर्ज करने के उद्येश्य से आयोजित थी । प्रायः हर ऐसे मौके पर बात अंत में बिगड़ ही जाती है । मतलब कि इस बार फिर से लाठीचार्ज हुआ ।

मैं उस अपरिचित युवक की ओर मुखातिब होकर पूछता हूं । “भीड़ को काबू करने के लिए पुलिस ने लाठियां भांजी होंगी । बेचारी पुलिस करे भी क्या ! भीड़ को नियंत्रित करने के लिए उसके पास सदा लाठी का ही तो एकमात्र सहारा होता है । और जनता है कि ढेलेबाजी से जवाब देना वह भी नहीं भूलती है ।”

मेरी बात पर सहमत होते हुए युवक कहता है, “पता नहीं इस देश को क्या हो गया है । जब देखो जहां देखो कुछ न कुछ अनिष्ट घटित होता दिख जाएगा । कहीं गोमांस को लेकर लोग आपस में लड़ रहे हैं । कहीं सड़क पर मामूली विवाद पर लोगों का कत्ल हो जा रहा है । कहीं किसी युवती या बच्ची के साथ दुष्कर्म हो रहा है । कही पुलिस अपनी हिरासत में ही आरोपी को मार डालती है । कभी बात-बात पर रेलगाड़ियां रोक दी जाती हैं, तो कभी सड़क पर वाहनों को आग लगा दी जाती है, और कभी बाजार में लूटपाट शुरू हो जाती है । यह सब उस देश में हो रहा है जहां के लोग अपनी सभ्यता, संस्कृति और धर्मनिष्ठा का ढिंडोरा पीटने से नहीं अघाते हैं ।”

“अपनी बात में इतना और जोड़ लीजिए कि जनता की सेवा का ढोंग रचने वाले हमारे राजनेताओं ने तो संयत और शिष्ट भाषा न बोलने की कसम खा रखी है । दो-चार दिन में बिहार में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं । अपने चुनाव अभियान में नेतागण कैसी भाषा बोल रहे हैं ? वे अपने विपक्षियों के विरुद्ध गाली-गलौज की भाषा में आरोप-प्रत्यारोप में जुटे हैं । लोकतंत्र में शालीनता होनी चाहिए कि नहीं ? समाज के समक्ष अनुकरणीय उदाहरण पेश करते देखा है आपने कभी उनको ?” मैं भी दो शब्द उसकी बातों में जोड़ देता हूं ।

“यही सब देखकर तो मन खिन्न हो जाता है, अंकलजी । समझ में नहीं आता है कि देश के हालात कभी बेहतर भी होंगे ।” उसने मेरी ओर देखकर कहता है । वह मेरी उम्र देखते हुए मुझे ‘अंकलजी’ कहकर संबोधित करता है । पिछले कुछएक दशकों से उम्रदराज आदमियों को अंकल शब्द से पुकारने की परिपाटी समाज में चल चुकी है ।

उसकी खिन्नता मुझे वास्तविक लगती है । मैं खुद भी देश के हालात को निराशाप्रद पाता हूं । मैं उसके कहता हूं, “यह देश सुधरने वाला नहीं है । मैं पचास-एक सालों से देश के हालातों को देखते आ रहा हूं । अवश्य ही देश भौतिक उपलब्धियों के नजरिये से आगे बढ़ा है; लोगों की संपन्नता बढ़ी है, सुख-सुविधा और ऐशो-आराम के साधन बढ़े हैं । लेकिन सामाजिक स्तर पर गिरावट आती गई है । ईमानदारी घटी है, संवेदनशीलता में कमी आई है, आपसी विश्वास पहले जैसा नहीं रहा, लोभ-लालच बहुत बढ़ गया है, असहिष्णुता बढ़ी है, लोग अधिक हिंसक हो चले हैं, और भी बहुत कुछ मेरे देखने में आया है । क्या-क्या बताऊं ?”

“अंकलजी, कभी-कभी मेरा मन होता है कि भगवान से प्रार्थना करूं, ‘हे भगवान, अगले जनम में मुझे अमेरिका में पैदा करना ।’” कहते हुए वह युवक अपनी दवा उठाकर चल देता है । – योगेन्द्र जोशी

 

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