“ ‘बिच्छू’ से तैयार होगा कपड़ा, देगा रोजगार”

बीते एक पखवाडे पहले दैनिक जागरण समाचार-पत्र  के मुखपृष्ठ पर उक्त वक्यांश बतौर शीर्षक देख मेरे मन में जिज्ञासा उपजी कि बिच्छू से कैसे कपड़ा तैयार होगा भला। दरअसल समाचार-पत्र के मुखपृष्ठ पर केवल संक्षेप में उस समाचार का जिक्र होता है जिसका विस्तृत ब्योरा बाद के किसी पृष्ठ पर रहता है। उक्त मामले की अधिक जानकारी पृ.९ पर है यह मैंने देखा और फिर जागरण के समाचार पृष्ठवार पढ़ना आरंभ किया। मन में रह-रह के उक्त सवाल भी उठता रहा। समाचार पढ़ते हुए सोच भी रहा था कि बिच्छू के मामले में रेशम के कीड़े की भांति ‘कोकून’ तो बनता नहीं जिससे रेशम-धागा पाया जाता है। न ही वह मकड़ी की तरह कोई जाल बुनती है जिससे धागा मिल सकता हो। खैर, अंत में पृ. ९ पर पहुंचा और यह देख चौंका और तसल्ली भी हुई कि कपड़े ‘बिच्छू घास’ से बनेंगे न कि बिच्छू से।

समाचारपत्र में बिच्छू घास की बात पढ़कर मुझे अपने बचपन के दिन याद आ गये जब हम बच्चों को कभी-कभी बिच्छू घास का दंश झेलना पड़ता था। बता दूं कि मेरा जन्म उत्तराखंड राज्य के कुमाऊं क्षेत्र में हुआ था जहां मेरे जीवन के शुरुआती १२-१३ वर्ष बीते थे। हमारे गांव के पैदल रास्तों के किनारे उगी झाड़ियों के साथ यह घास भी कहीं-कहीं उगी रहती थी। जब बच्चे २-४ साल या और बड़े  हो जाते लेकिन अनुभवहीन रहते तब कभी न कभी इस घास के शारीरिक संपर्क में आ जाते। त्वचा के संबंधित स्थान पर तेज जलन, चरचराहट, एवं दर्द की मिश्रित अनुभूति होती है। बिच्छू का डंक कैसा होता है इसका ज्ञान मुझे नहीं। अपने गांव में मैंने कभी बिच्छू देखा हो ऐसा याद नहीं आता। शायद बिच्छू का डंक़ कुछ वैसा ही होता होगा जैसा इस घास को छू लेने पर।

स्थानीय बोली में इस घास को सिसूण या सियूंण कहा जाता है। कुछ अन्य क्षेत्रों के बाशिंदे शायद कनाली भी कहते हैं। इंटरनेट पर जुटाई जानकारी से पता चला कि इस घास में रोगनिवारण के गुण भी मौजूद हैं। किंतु मैंने कभी बुजुर्गों के मुख से इसकी चिकित्सकीय उपयोगिता की बात नहीं सुनी थी। उस काल के अनुभवों को ५५-६० साल बीत चुके हैं। फिर भी एक बात मुझे याद आती है जिसके बारे में सुनिश्चित नहीं हूं। पैर में मोच आने पर हल्की मुरझाई इस घास से झाडने से आराम मिलता था। एक और बात याद है कि इस घास के कोपलों, पत्तियों एवं मुलायम डंठलों वाले हिस्सों के धूप में मुरझा चुकने के बाद सूखा साग बनाने के काम में भी लिया जाता था।

इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारी से पता चलता है कि इस घास की डंठल तथा पत्तियों की (खास तौर पर उल्टी) सतह पर महीन रोवों के रूप मे सख्त कांटे होते हैं। शरीर की त्वचा के संपर्क में आते ही ये उसमें चुभ जाते हैं और ये कांटे त्वचा में एक रसायन छोड़ते हैं। त्वचा के उस स्थान पर तेज जलन, चरचराहट, एवं दर्द की मिश्रित अनुभूति होती है। इस घास को अंग्रेजी में स्टिंगिंग घास (stinging-nettle एवं वैज्ञानिक नाम urtica dioica) कहा जाता है। (देखें विकीपीडिया)

जैसा आरंभ में कहा है बिच्छू घास से कपड़ा बनेगा, परंतु कैसे यह मुझे पता नहीं चल पाया। कदाचित इसके तने की रेशेदार छाल से यह संभव हो जैसा भांग के पौधे की छाल से होता है। यह भांग वही है जिससे गांजा तथा चरस जैसा नशा मिलता है। देखे विकीपीडिया 

 भांग उत्तराखंड के कुमाऊ अंचल में काफी लोकप्रिय है नशे के लिए ही नहीं बल्कि भोज्य पदार्थ के रूप में। भांग के दाने (बीज) स्वादिष्ट एवं पौष्टिक होते हैं और इनमें नशा नहीं होता। इसी भांग के पौधे के सीधे तने से मिलने वाले बेहद मजबूत रेशे से थैले, बोरे, चादरें बनाई जाती हैं, जैसे जूट से। कदाचित बिच्छू घास से सीधे तने की छाल का भी ऐसा ही प्रयोग हो सकता है। -योगेन्द्र जोशी

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लॉकडाउन काल में मन में उपजे छिटपुट छितराए विचार (२)

इंडिया बनाम भारत

इस समय बेंगलूरु में हूं गृहनगर वाराणसी से दूरलॉकडाउन में कुछ ढील मिल चुकी है। कहने को रेलयात्रा एवं हवाईयात्रा की सुविधा आरंभ हो चुकी है। लेकिन भ्रम इतना फैला है कि वापसी यात्रा की तिथि तय नहीं हो पा रही है। मैं २४ घंटे व्यस्तता से बिता सकता हूं, परंतु दो-अढाई मास के इस अनियोजित प्रवास में अपनी आम दैनिक चर्या से वंचित हूं, जिसका एहसास रह-रह के बेचैन करता है। अन्यथा इंटरनेट से प्राप्य विविध जानकारी, लैपटॉप पर भंडारित पाठ्यसामग्री, और मन में उठते विचारों को लेकर ब्लॉग-लेखन यहां भी चल ही रहा है। यहां बहुमंजिली २३ इमारतों वाले विस्तृत परिसर के चारों ओर टहलने में सुबह-शाम आधा-आधा घंटा लग जाता है। टहलते समय परिसर के पर्यावरण, परिसर-निवासियों भाषा-जीवनशैली, कोरोना महामारी, लॉकडाउन एवं समाचारों को लेकर तरह-तरह के विचार मन में उठते हैं। परस्पर असंबद्ध, संक्षिप्त, तथा बिखरे हुए विचार पूर्ववर्ती आलेख तथा इस स्थल पर…

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लॉकडाउन काल में मन में उपजे छिटपुट छितराए विचार

लॉकडाउन काल में मन में अनेक बातें आई-गईं। उनमें से कुछ को यहां लिख डाला।

इंडिया बनाम भारत

इस समय हम बेंगलूरु में हैं अपने बेटे के पास। एक मास के नियोजित बेंगलूरु-प्रवास के बाद तारीख २२ मार्च को लौटना था अपने गृहनगर वाराणसी को, किंतु पहले “जनता” कर्फ्यू फिर लॉकडाउन घोषित हो जाने पर यात्रा स्थगित कर दी। इस समय उसका चौथा चरण चल रहा है। बीते २१ ता. को हमारे अनियोजित प्रवास के दो माह हो गये। हवाई सेवा प्रारंभ होने की खबर है लेकिन सर्वत्र भ्रम फैला है।

अब ऊब होने लगी है। वैसे मेरे लिए २४ घंटे व्यस्तता से बिताना कोई कठिन काम नहीं है। परंतु इस अनियोजित प्रवास में मेरी जो आम दैनिक चर्या होती थी उससे वंचित हूं, जिसका एहसास रह-रह के बेचैन करता है। अन्यथा इंटरनेट से प्राप्य विविध जानकारी, लैपटॉप पर भंडारित पाठ्यसामग्री, और मन में उठते विचारों को लेकर ब्लॉग-लेखन यहां भी चल ही रहा है।

हम बहुमंजिली इमारतों और उनके बहु-अपार्टमेंटों के विस्तृत परिसर में रह रहे हैं।

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कोरोना महाप्रकोप का सकारात्मक प्रभाव

इस समय पूरा विश्व कोरोना-जनित महामारी की चपेट में है। कोरोना नामक विषाणु चीन के वुहान शहर से निकलकर सर्वत्र फैल चुका है। खुद चीन में यह कहां से आया यह स्पष्ट नहीं हो पाया है। कहा जाता है कि वुहान में चमगादड़ों के साथ-साथ अन्य पशु-पक्षियों का मांस बिकता है और विषाणु वहां के चमगादड़-मांस से लोगों के बीच फैला। कुछ लोगों का कहना है कि वुहान की एक विषाणु प्रयोगशाला में ही कोरोना का जन्म हुआ और किसी चूक से यह बाहर नगरवासियों में फैल गया। एक मत यह भी है कि आर्थिक तौर पर दुनिया को पंगु करने के लिए चीन ने इसे ईजाद किया और दुनिया में फैलने दिया। ऐसे अनेक मत व्यक्त किए जा सकते हैं। वास्तविकता क्या है यह अभी कोई नहीं जानता। बस इतना सच है कि इस विषाणु ने दुनिया की बहुत बड़ी आबादी को रोगग्रस्त कर दिया है और लाखों को काल के गाल में पहुंचा दिया है।

कोरोना के महाप्रकोप को रोकने का कोई कारगर उपाय किसी के पास नहीं है। न ही रोगग्रस्त लोगों के लिए कोई प्रभावी इलाज अभी तक मिल सका है। ऐसी स्थिति में कोरोना संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए दुनिया की विभिन्न सरकारों ने “लॉकडाउन” का सहारा लिया है। यह ऐसा शब्द है जिसका इतना व्यापक प्रयोग पहले कभी सुना नहीं गया था। लॉकडाउन ने खुद अपने किस्म की समस्याएं पैदा कर दी हैं। पूरी सामाजिक व्यवस्था अस्तव्यस्त हो गयी है। आर्थिक क्रियाकलाप रुक गये हैं और अधिकांश लोग अपने-अपने घरों में कैद हो गये। सबसे विकट समस्या उन लोगों के सामने है जो घर-परिवार से दूर जहां थे वहीं फंस के रह गये हैं।

अपने देश में लॉकडाउन से कोरोना के प्रसार पर संतोषप्रद नियंत्रण मिल सका तो यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि तथा राहत की चीज होगी। लॉकडाउन की जो कीमत चुकानी पड़ रही है उसे स्वीकार कर लिया जाएगा, विवशता में ही सही। फिर भी यह तो कहना ही पड़ेगा कि कोरोना ने लॉकडाउन की आवश्यकता को जन्म दिया और लॉकडाउन ने लोगों की जिंदगी को अप्रत्याशित कष्ट में धकेल दिया।

लेकिन इस लॉकडाउन के कुछएक सकारत्मक पहलू भी देखने को मिल रहे हैं। जो लोग घरों में अधिक टिक नहीं सकते थे, उन्होंने घर में टिकना और परिवारी जनों के साथ समय बिताना सीख लिया। लोगों में एक प्रकार की उपकारिता की भावना भी जागृत हुई है। पुलिसबल का व्यवहार काफी कुछ बदला नजर आने लगा है। अधिकांश जन कोरोना से लड़ाई के प्रति योगदान देने को प्रेरित भी हो रहे हैं। ये सब संतोष की बातें है। आगे के सामय में ये बातें कुछ हद तक स्थायित्व भी पा सकती हैं।

इस कोरोना-संक्रमण काल में कुछ लोग बहुत-से वे कार्य कर रहे हैं जिसके बारे में उन्होंने कभी सोचा नहीं होगा। इसी क्रम में मुझे अपने एक मित्र की दैनिक चर्या में विवशता-जनित परिवर्तन के बारे में सुनने को मिला। इस समय मैं स्वयं अपने घर से दूर अन्य शहर में अटका हुआ हूं। मैंने कई बार उनसे फोन पर बात करने और हालचाल पूछने का प्रयास किया। लेकिन संपर्क साधने में सफल नहीं हुआ। अन्य मित्रों एवं परिचितों से उनकी कुशलक्षेम की जानकारी मुझे मिल गई। मुझे पता चला कि वे चाय-नाश्ता और भोजन-सामग्री बनाना सीख रहे हैं। यह समाचार मेरे लिए रोचक एवं अविश्वनीय था। क्यों, बताता हूं।

मेरे मित्र महोदय उम्र में सत्तर-प्लस हैं। सेवानिवृत्त हैं और अकेले रहते हैं। परिवार में कोई और उनके साथ नहीं रहता। इसलिए उन्होंने लगभग सभी दैनिक कार्यों के लिए परिचारक-परिचारिकाओं  यानी घरेलू सहायक का सहयोग लिया है। ये सहायक सुबह-शाम का नाश्ता, दोपहर-रात्रि का भोजन, घर का झाड़ू-पोछा, लत्ते-कपड़ों की धुलाई, आदि लगभग सभी कार्य करते हैं। निर्धारित समय पर आते हैं, अपने-अपने हिस्से का कार्य निपटाते हैं, और लौट जाते हैं। इसलिए मित्र महोदय को कोई काम नहीं करना पड़्ता है। यह सिलसिला पिछले कई वर्षों से चला आ रहा है। अभी तक उनके कार्य सुचारु रूप से चल रहे थे।

लेकिन इस बार लॉकडाउन ने उनके सामने गंभीर समस्या पैदा कर दी है। चूंकि लोगों को यथासंभव घर तक सीमित रहना है, और केवल जरूरी कामों के लिए बाहर निकलने की छूट मिल पा रही है मगर वह अधिक देर के लिए नहीं। इसलिए उनके घरेलू सहायकों का आना-जाना बंद हो गया। चाय कौन बनाए, भोजन कैसे बनेगा, झाड़ू भी लग पायेगा क्या, गंदे कपड़ों का क्या होगा, आदि प्रश्न उनके सामने उठ खड़े हो गये। ऐसे मौकों पर आदमी अपनी झल्लाहट या गुस्सा किसी न किसी पर उतारना तो चाहेगा ही। सामने कोई हो तो उसी को दो-चार बातें सुना दे लेकिन उनके घर में कोई और हो तब न? जिसने इस लॉकडाउन का निर्णय लिया उसी पर उन्होंने कल्पना में गुस्सा उतार दिया। कर भी क्या सकते हैं?

पिछले कई वर्षों से वे घरेलू सहायकों पर ही निर्भर रहे इसलिए चाय बनाना भी अब बेहद मुश्किल का काम लग रहा था। करते क्या? शनैः-शनैः चाय-नाश्ता-भोजन बनाना शुरू कर दिया, जैसा भी बन पड़ा। पिछली बार परिचितों-मित्रों से इतना तो मुझे खबर मिली। झाड़ू-पोछा करना और कपड़े धोना अभी शुरू हुआ कि नहीं पता नहीं चला। ये दोनों कुछ दिन टल सकते हैं लेकिन भोजन-पानी नहीं। मोबाइल फोन पर मुझे उत्तर मिलता नहीं। सोचता हूं सब ठीक ही चल रहा होगा। – योगेन्द्र जोशी

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कोरोना वाइरस (विषाणु) – मेरे कार्यक्रम निरस्त, दैनिक चर्या बदल गई

कोरोना विषाणु (वाइरस) ने दुनिया में कहर ढा रखा है। अपने महीने भर के पूर्वतः चयनित कार्यक्रम को निरस्त करते हुए अपने शहर से दूर महानगरी में चार हफ्ता रुकना पड़ गया है। नई दिनचर्या अपनानी पड़ी है। उसी का लेखा-जोखा।

इंडिया बनाम भारत

कोरोना संक्रमण

पूरी दुनिया इस समय ऐसी विपदा झेल रही है जिसकी दूर-दूर तक किसी को आशंका नहीं थी। चीन से चले कोरोना (COVID-19) नामक विषाणु ने अनेक विश्व-नागरिकों को तेजी से रोगग्रस्त कर दिया है और उनमें से कई काल के गाल में भी समा गए हैं। यह विषाणु कहां से आया, कैसे पैदा हुआ, जैसे प्रश्न फिलहाल अनुत्तरित हैं। विश्वसमुदाय में कई जन मिल जाएंगे जो इसे चीनियों के उस खानपान से जोड़कर देखते हैं जिसमें कुछ भी अखाद्य नहीं होता यदि वह विषैला न हो तो। कहते हैं कि वहां कुत्ते-बिल्ली, मेढक-सांप, चूहे-चमगादड़, आदि सभी का मांस भक्षणीय माना जाता है। कदाचित इस विषाणु का स्रोत चमगादड़ है। कदाचित!

लेकिन लोग इस संभावना से आगे चलकर भी देखते हैं। कइयों को शंका है कि यह चीन की किसी चूक का दुष्परिणाम है; अथवा चीन ने यह विषाणु जैविक हथियार के तौर पर ईजाद किया है और जानबूझ…

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सिगरेट का शौक छोड़ना आसान नहीं

मैं आजकल चार-एक हफ्तों के प्रवास पर बेंगलूरु (बंगलौर) के ह्वाइट्फ़ील्ड इलाके में हूं जहां आइ-टी यानी इंफ़र्मेशन टेक्नॉलॉजी (सूचना तकनीकी) तथा अन्य प्रकार के अधिकांश कार्यालय हैं। मैं सुबह-शाम और कभी-कभी दोपहर में बाहर कार्यालयों के आसपास टहलने के लिए निकलता हूं। मुझे यह शहर उतना सुव्यवस्थित नहीं लगा जितने की मैंने कल्पना की थी। सड़कें साफ-सुथरी और यातायात सुव्यस्थित हो ऐसा मैंने नहीं पाया।

एक बात जिस पर मैंने गौर किया वह यह है कि इस शहर में सिगरेट पीने का काफी चलन है। मैं शहर के भीतरी और पुराने इलाकों के बारे में कह नहीं सकता, क्योंकि मेरा घूमना-फिरना तीन-चार किलोमीटर के सीमित दायरे में ही रहा है। ह्वाइटफ़ील्ड के इस इलाके में सड़क के किनारे चलते-फिरते या पान-सिगरेट के स्टॉल के पास सिगरेट पीते हुए कई लोग दिख जाते हैं। सिगरेट का शौक नवयुवतियों-महिलाओं में भी देखने को मिला है मुझे। यह बात भारतीय समाज के संदर्भ में काफी असामान्य कही जाएगी। मेरा मन होता रहा कि उन लोगों से उनकी इस आदत के बारे में दो-चार बातें पूछूं, किंतु किसी के पास जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।

कल मैंने हिम्मत जुटा ही ली। सड़क के किनारे चबूतरे की शक्ल की एक जगह पर दो युवतियां बैठी थीं सिगरेट के कश खींचती हुईं। उनके पास जाने से मैंने स्वयं को रोक लिया, क्योंकि उनकी प्रतिक्रिया क्या होगी इसका अनुमान लगाना कठिन था। लेकिन दो कदम आगे बढ़कर मुझे कुछ युवा दिख गये, उम्र से कदाचित तीस-चालीस साल के। तीन जने तो आपस में बतियाते हुए पान-सिगरेट खरीद रहे थे और दो कदम की दूरी पर अन्य व्यक्ति एक पेड़ के तने के सहारे अकेले खड़े होकर धूम्रपान का आनंद ले रहा था। मैं उसके पास गया और हिन्दी में बात करने लगा। उसके इशारे से मैं समझ गया कि वह हिन्दी में बात नहीं समझ पायेगा। तब मैंने अंग्रेजी में कहा, “आपसे माफी चाहूंगा; क्या मैं निजता (प्राइवेसी) से जुड़ा एक सवाल पूछ सकता हूं?”

“जी, पूछिए।” उसने जवाब दिया।

मैं सीधे अपने सवाल पर आया, “आप सिगरेट पीते हैं। क्या आप जानते हैं कि सार्वजनिक स्थल (पब्लिक प्लेस) में धूम्रपान कानूनी तौर पर प्रतिबंधित है और संबंधित व्यक्ति पर जुर्माना लग सकता है?”

उस व्यक्ति ने कोई उत्तर नहीं दिया। बल्कि वह यह कहते हुए आगे बढ़ गया कि उसे ऑफिस की देरी हो रही है।

दूसरे दिन मैंने इस विषय पर फिर से कुछ ’ज्ञान’ प्राप्त करने का प्रयास किया। जहां मैं ठहरा था उसके प्रवेशद्वार के निकट ’फोरम मल्टिप्लेक्स’ नामक व्यापारिक संस्थान है। उसी के सामने सड़क के दूसरी ओर पटरी या फुटपाथ के किनारे चाय-काफी, पान-सिगरेट, आदि की छोटी-मोटी दुकानें सजी मिलती हैं जहां आसपास के कार्यालय-कर्मी दोपहर के अवकाश के समय चाय-पानी आदि के लिए आते हैं।

उसी पटरी पर घूमते-फिरते मैं एक स्थल पर रुक गया। पास ही युवक-युवती का एक जोड़ा मुझे दिख गया। वे नारियल पानी ख्ररीद रहे थे। जब तक दुकानदार नारियल-फल काटछांट कर तैयार करता, उस युवक ने एक सिगरेट लेकर सुलगा ली। उस युगल में मेरी दिलचस्पी बढ़ गई। हिम्मत करके मैं उनके निकट पहुंचा और युवक की ओर मुखातिब होकर मैंने अंग्रेजी में पूछा, आपसे एक निजी सवाल पूछना चहता हूं। अगर बुरा न मानें तो पूछूं?”

मैंने प्रथमतः अपना परिचय दिया कि मैं वाराणसी से आया पर्यटक हूं और कहा कि यहां सिगरेट पीने का काफी चलन है। मेरे वाराणसी कहने पर दोनों (युवक-युवती) एक साथ बोल पड़े, “तब तो आप हिन्दी बोलते होंगे?”

मेरे हांमी भरने पर युवक ने बताया कि वह उत्तर प्रदेश का रहने वाला है। युवती ने खुद को देहरादून (उत्तराखंड) की बताया। उस वार्तालाप में वैयक्तिक स्तर की कुछएक बातें हम लोगों के बीच भी हुईं। इस बीच नारियल पानी भी आ चुका था जिसे वे पीने लगे। उन्होंने मुझे भी पेश किया जिसे मैंने सधन्यवाद मना कर दिया। फिर मैं असल मुद्दे पर लौट आया और युवक से पूछने लगा, “आप सिगरेट पीते हैं। आपको मालूम है …”

मैं अपना सवाल पूरा कर पाता कि उसके पहले ही वह बोल पड़ा, “मालूम है कि यह ’हेल्थ’ (तन्दुरुस्ती ) के लिए नुकसानदेह है। लेकिन काम के बोझ तले तनाव से इससे कुछ राहत मिल जाती है। यों कहें कि अब आदत बन चुकी है।”

मैं बोल पड़ा, “मैं मुद्दे के दूसरे पहलू की बात करना चाहता हूं। वह यह है कि धूम्रपान कानूनी तौर पर सार्वजनिक स्थल पर वर्जित है और इस पर जुर्माना भरना पड़ सकता है।”

यह देख मुझे आश्चर्य हुआ कि वे दोनों संबंधित कानून से अनभिज्ञ थे। कुछ देर बाद लौटने का समय हो गया कहते हुए वे सड़क पार कर अपने संस्थान ’फोरम’ की ओर चल दिए। दस-पंद्रह मिनट की उस बातचीत के दौरान और पिछले दिन की घटना से यह तो मेरे समझ में आ ही गया कि जिन्हें धूम्रपान का शौक लग गया वे अपनी तन्दुरुस्ती के प्रति लापरवाह हो जाते हैं। इसके अलावा उनमें से कुछ लोग संबंधित कानून से भी परिचित नहीं होते या वे उसकी परवाह नहीं करते। – योगेन्द्र जोशी

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दवा-विक्रेता की सदाशयता

मुझे अपनी यात्राओं के दौरान अथवा उस काल के प्रवास-स्थान पर अक्सर सदाशयी जन मिल जाते हैं। मेरी समस्याओं का वे समाधान सुझाने में सहायक सिद्ध होते हैं। अधिकांश अवसरों पर मुझे कोई असुविधा नहीं होती है। यदि कहीं कोई अड़चन आन पड़ती है तो वह अपने देश की दोषपूर्ण व्यवस्था के कारण होती है, न कि किसी व्यक्ति-विशेष के कारण।

विगत अगस्त माह मैं बेंगलूरु शहर अपने बेटे-बहू-पोते के पास तीनएक सप्ताह के लिए गया था। वे लोग ह्वाइटफ़ील्ड नामक इलाके में रहते हैं। एक दिन मुझे गिरिनगर नामक स्थान जाना था। दरअसल गिरिनगर में “सम्भाषण-सन्देशः” नामक संस्कृत पत्रिका का कार्यालय है। मैं इस पत्रिका का लंबे अंतराल से ग्राहक-पाठक हूं। चूंकि मैं सितंबर माह से कुछ महीनों के लिए वाराणसी से बाहर रहने वाला था, अतः चाहता था कि केवल डाक से प्राप्य यह पत्रिका  व्यवस्थापकों द्वारा उस काल में मुझे न भेजी जाए। इस आशय से पत्रिका के गिरिनगर स्थित कार्यालय जाने का विचार मेरे मन में उठा।

गिरिनगर ह्वाइटफ़ील्ड से २०-२२ किलोमीटर दूर है। मुख्यतः कन्नड़-भाषी बेंगलूरु शहर मेरे लिए नितांत अनजाना शहर है। ह्वाइटफ़ील्ड शहर का अपेक्षया नया इलाका है जहां प्रमुखतया आईटी प्रौद्योगिकी एवं कॉर्पोरट औद्योगिकी के  कार्यालय स्थित हैं, जिनमें देश के लगभग सभी इलाकों के युवक-युवतियां कार्य करते हैं। फलतः उस इलाके में हिन्दी बोलने-समझने वालों की संख्या काफी है। लेकिन गिरिनगर पुराने बेंगलूरु में है, जहां हिन्दी नाममात्र ही बोली-समझी जाती है। इसलिए वहां जाने और संभाषण संदेश कार्यालय खोजना मेरे लिए कठिन होगा यह शंका मेरे मन में रही। अस्तु।

मैंने नगर-बस-सेवा के डे-पास (एक-दिवसीय अनुमति-पत्र) का उपयोग किया। बेंगलूरु में बस परिचालक हिन्दी समझ और कुछ हद तक बोल लेते हैं ऐसा मुझे वहां के प्रवास के दौरान अनुभव हुआ। अत: मुझे खास दिक्कत नहीं हुई। बस कंडक्टर ने गिरिनगर से ७-८ कि.मी. दूर कॉर्पोरेशन (नगर निगम कार्यालय) के पास मुझे यह कहते हुए उतरने की सलाह दी कि चूंकि गिरिनगर के लिए वहां बहुत कम बसें चलती हैं, अतः ऑटो-रिक्शा से जाना सुविधाजनक होगा।

मैंने ऑटो भाड़े पर लिया और उसके चालक ने गिरिनगर  के एक मुख्य मार्ग के किनारे फेज़ ८ पर मुझे पहुंचा दिया यह कहते हुए कि आसपास ही सभी फेज़-क्षेत्र हैं, किंतु फेज़ २ (मेरा गंतव्य) ठीक-ठीक कहां है बता पाना कठिन है। कदाचित में फेज़-व्यवस्था सुनियोजित नहीं थी। मैंने वहां दिख रहे लोगों एवं दुकानदारों से पूछा, किंतु ठीक-ठीक कोई बता नहीं पाया। इसी बीच मेरी नजर एक दवा-दुकान पर पड़ी और मैं उस दुकान पर पहुंचा। संयोग से दुकानदार महोदय कन्नड़-हिन्दी-अंग्रेजी त्रिभाषी निकले। उन्होंने मुझसे १०-१२ मिनट बातें कीं कि कहां से आए हैं और कहां जाना है।

वार्तालाप में उन्होंने कहा, “यह इलाका उडुपी ब्राह्मणों का है लेकिन मैं स्वयं जैनी हूं। मैंने संस्कृत पत्रिका के बारे में सुना तो है परंतु उसका कार्यालय कहां पर है यह मैं सोच नहीं पा रहा हूं।”

मैने कहा, “कार्यालय के पते में फेज़ २ दिया गया है। यह कहां हो सकता है यह बता दीजिए। मैं कार्यालय खोज लूंगा।”

कुछ क्षण सोचने के बाद उन सज्जन ने कहा, “मुझे ख्याल आ रहा है कि पत्रिका का कार्यालय राघवेन्द्र स्वामी मठ में है।” फिर हाथ के इशारे के साथ वे बोले, “आप इसी फुटपाथ पर चलते जाइए। आगे मुख्य मार्ग से जो सड़क दाहिनी तरफ़ निकलती है उसी पर एक ओर आपको वह मठ दिख जाएगा। कदाचित् वहीं वह कार्यालय मिलेगा। अन्यथा मठ के लोग अधिक जानकारी दे सकेंगे। अवश्य ही उन्हें मालूम होगा।”

मैंने दवा-विक्रेता को धन्यवाद देते विदा ली और आगे बढ़ गया। किंचित् दूरी चलने के बाद मुझे वह गली मिल गई जिस पर राघवेन्द्र स्वामी मठ बताया गया था। मैं दाहिने मुड़कर दो कदम चला ही था कि स्क्रूटर पर सवार दवा-विक्रेता महोदय अनायास मेरे बगल में आकर रुकते हुए बोले, “आइए, स्कूटर पर बैठिए मैं मठ पर छोड़ देता हूं।”

अप्रत्याशित अपने बगल उन्हें स्कूटर पर देखकर चौंकते हुए मैंने पूछा, “आप भला यहां क्योंकर पहुंच गए?”

वे बोले, “आप जगह खोजने में खामखाह परेशान होंगे, सो मैंने सोचा कि क्यों न मैं ही आपको वहां पहुंचा दूं।”

उनके इतना कहते-कहते हम मठ पर पहुंच गये। मुझे उतार कर वे अधिक कुछ बोले बिना तुरंत लौट गये।

मैं सोचने लगा क्या गजब की दुनिया है यह जहां अजनबी परेशान न होवे इस विचार से कभी-कभी कोई व्यक्ति मदद को दौड़ पड़ता है। ऐसा आम तौर पर होता नहीं, इसलिए कुछ अचरज तो होता ही है। – योगेन्द्र जोशी

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साफ-सफाई की ध्वस्त नागरिक व्यवस्था

 

 

 

 

 

 

 

 

दैनिक जागरण समाचार-पत्र के २१ अगस्त के अंक में वाराणसी की ध्वस्त सफाई व्यवस्था की कुछ तस्वीरें छपी हैं जिनमें से एक यहां प्रस्तुत है। तस्वीरों के पृष्ठ का लिंक पेश कर रहा हूं:

https://epaper.jagran.com/epaper/21-aug-2019-45-varanasi-city-edition-varanasi-city-page-10.html#

      इन तस्वीरों को देख मेरा मन हुआ कि कचरा निबटारे की अपनी निजी व्यवस्था का और साथ ही घर-घर कूड़ा-उठान से जुड़े अनुभव का जिक्र कर डालूं।

वाराणसी में कूड़े-कचरे के निपटारे की कोई कारगर व्यवस्था पहले कभी नहीं थी। लोग सड़क के किनारे रखे गए बड़े-बड़े कूड़ेदानों अथवा खुले में कूड़ा-कचरा डाल देते थे। नगर-निगम की गाड़ी बीच-बीच में आकर उसे उठा लेती थी। 8-10 वर्ष पूर्व घरों से कूड़ा-उठान की नयी योजना आरंभ की गई थी। मेरे मुहल्ले में इस कार्य का जिम्मा “ए-टु-ज़ेड” नाम की संस्था को मिली थी। संस्था को हर घर से 50 रुपये बतौर शुल्क के इकट्ठा करने की जिम्मेदारी भी दी गयी थी। इस योजना में एक समस्या थी। लोग पैसा देने में टालमटोल करते थे।इसी दौरान कार्यदायी संस्था का नगर निगम के साथ विवाद भी पैदा हो गया और उसने कार्य करना बंद कर दिया। तब मैंने कच्चे (गीले) कचरे को सड़ाकर खाद बनाने का रास्ता अपनाया। इस हेतु मैंने अहाते के एक स्थान पर अपने हाथों से ईंट-सीमेंट आदि से एक “कचरा-दान” बना लिया जिसकी तस्वीर यहां प्रस्तुत है।

 

 

 

 

 

 

सूखे के लिए सड़क वाली व्यवस्था ही रहने दी, जो यथावत बनी रही। दरअसल घर-घर से बटोरे गये कूड़े-कचरे को सफाईकर्मी भी सड़क पर ही डालते हैं, जहां से उसे नगर-निगम की कूड़ागाड़ी उठाती है। कूड़ा-कचरा निस्तारण पर पहले भी मैंने अपने ब्लॉग (12 दिसम्बर 2015)  पर लेख लिखा है।

कुछ महिनों के बाद “ए-टु-ज़ेड” कंपनी फिर से काम पर लौट आई। इस संस्था के क्षेत्रीय पर्यवेक्षक ने मुझे आश्वस्त किया कि कार्य सुचारु चलेगा। डेड़-दो वर्ष तक कार्य चलता रहा। एक दिन संस्था का नगर निगम के साथ फिर से मतभेद पैदा हो गये और उसने स्थाई तौर पर शहर से अपना बोरिया-बिस्तर समेट लिया। मैं वापस अपनी निजी व्यवस्था पर लौट आया।

फिर कुछ महीनों के बाद “कियाना सेर्विसेज़ एंड सॉलुशन्ज़” नामक एक नयी संस्था ने कूड़े-कचरे के निस्तारण की जिम्मेदारी ले ली। घरों से कूड़ा-उठान फिर आरंभ हो गया। मैंने उस संस्था की सेवाएं लेना शुरू कर दिया। जो सफाईकर्मी हमारी गली से कूड़ा उठाता था उसका रवैया संतोषप्रद नहीं रहा।  रविवार तो उसे अवकाश मिलता ही था, लेकिन वह अन्य साप्ताहिक दिनों पर भी किसी न किसी बहाने अक्सर गायब हो जाता था। दिक्कत तब होने लगी जब वह  कभी-कभी लगातार चार-छ: दिनों तक गायब हो जाता था। खीजकर मैंने संस्था की सेवा लेना बंद कर दी।

दो-तीन सप्ताह बाद संस्था का स्थानीय पर्यवेक्षक शुल्क (पहले की तरह 50 रुपया प्रतिमाह) वसूलने आया तो मैंने उससे कहा, “इस गली का सफाईकर्मी अपने काम में अनियमितता बरतता है। किसी वाजिब कारण से यदि वह 4-4 6-6 दिनों अनुपस्थित रहे बात सनझ में आती है, लेकिन तब उस अंतराल के लिए अन्य कर्मी को यहां का कार्य सोंपा जाना चाहिए। अगर ऐसा न हो तो फिर आपकी सेवा लेना बेकार है।”

पर्यवेक्षक ने उत्तर दिया, “आपको अब शिकायत का मौका नहीं मिलेगा। हम समुचित व्यवस्था करेंगे। आपको मौजूदा व्यवस्था में सहयोग देना चाहिए। आप ही लोग ऐसे मना करेंगे तो व्यवस्था कैसे चल सकेगी? इसलिए हमारी सेवा लेना बंद मत करें।”

मैंने उसकी बात मान ली। स्वयं मेरा मानना था शहर में कूड़ा-निस्तारण की व्यवस्था होनी चाहिए और नागरिकों ने अपने स्तर पर उसमें सहयोग देना चाहिए। सफाईकर्मी तो वही रहा फिर भी कूड़ा उठाने का कार्य सुचारु चलने लगा। वह कभी-कभार 1 या 2 दिन के लिए गायब हो जाता था, जिसकी हम अनदेखी कर देते थे। आवश्यकता होने पर विकल्पतः अन्य कर्मी भी आ जाया करता था। लेकिन यह सब अधिक समय तक नहीं चल पाया।

बीती होली के दूसरे दिन वह आया और घर से “त्योहारी” मांग ले गया। फिर 8-9 दिनों तक गायब रहने के बाद लौटा। अनुपस्थिति पर हमने नाखुशी जताई तो उसने उल्टे हमसे ही रूखेपन से सवाल किया, “आप बाहर नहीं जाते क्या कभी?”

तब हमने उसे कूड़ा उठाने से मना कर दिया। वह चला गया और हम फिर से अपनी व्यव्स्था पर लौट आए।

मैंने संस्था के स्थानीय कार्यालय को फोन किया, “मुहल्ले की मेरे गली में जिस सफाई-कर्मी की ड्यूटी लगी थी वह हफ्ता-दस-दिन गायब रहा। अब हमने उसे मना कर दिया है। यदि इस गली में मौजूदा सफाईकर्मी ही कार्य करेगा तो उसे कूड़ा नहीं सोंपेंगे।”

मुझे प्रत्युत्तर मिला, “हमारा पर्यवेक्षक आपके से मिलेगा और आपकी समस्या को हल करेगा।”

तब से न पर्यवेक्षक आया और न ही कोई और। हमारी तरफ से जो देय शुल्क था उसे वसूलने भी कोई नहीं आया। हाल यह हैं कि गली में 8-10 मकान हैं। उनमें से 3-4 मकान से ही कूड़ा उठता है; शेष ने अपनी व्यवस्था कर रखी है। बनारस स्मार्टसिटी शायद ऐसे ही बनेगा!

जो होना चाहिए वह होता नहीं। बस जिन्दगी यों ही चलती है। – योगेन्द्र जोशी

 

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वे छोटी-छोटी बातें जिनके बारे में सोचते नहीं लोग

मेरे गृह-परिसर के प्रवेशद्वार पर आकर एक गाय अक्सर लेट जाती थी। अपने शहर वाराणसी में छुट्टा कुत्ते-गाय-सांड़ सड़कों पर इधर-उधर घूमते ही रहते हैं। इतना ही नहीं बंदरों का आतंक भी झेलना पड़ता है। ऐसी ही एक छुट्टा गाय कुछ दिन पहले मुहल्ले की मेरी गली में भूले भटके आ टपकी, और उसने आराम फरमाने के लिए मेरे घर के प्रवेशद्वार को चुन लिया। उसके कारण आने-जाने में असुविधा तो होती ही थी, अलावा उसके वह गोबर-मूत्र की गंदगी भी उस स्थल पर फैला जाती थी। हर रोज घर की खिड़की से बीच-बीच में प्रवेशद्वार की ओर नजर डालना और उसे हटाना हमारा रोज का नियम-सा बन गया। कुछ दिन तक यह सिलसिला चलता रहा और फिर एक दिन उसने अपना ठिकाना बदल दिया। उसने मोहल्ले की दूसरी गली को चुन लिया।

उसके ‘स्थाई’ तौर पर चले जाने के बाद एक सवाल मेरे मन में उठा कि क्या गाय ने यह सोचा होगा कि अमुक जगह छोड़ देनी चाहिए, क्योंकि यहां से उसे बार-बार भगा दिया जाता है? उसने क्या यह सोचा होगा कि मेरी वजह से इन लोगों को परेशानी होती है, इसलिए मुझे कहीं अन्यत्र चले जाना चाहिए? या कुछ और उसके दिमाग में आया होगा? अथवा घटना की वारंवारता से प्रेरित हो उसकी नैसर्गिक सहज वृत्ति ने उसका व्यवहार बदल दिया? पशुओं के प्रशिक्षण में इसी वारंवारता का ही तो महत्व होता है। आम धारणा यही है कि कोई भी पशु सोच-समझकर खास तरीके से व्यवहार नहीं करता, बल्कि वह वारंवारता से वैसा करने के लिए प्रकृतितः ढल जाता है।

क्या पशुओं में सोचने-समझने की क्षमता बिल्कुल नहीं होती है? वैज्ञानिक ऐसा नहीं मानते हैं। शोधकर्ताओं ने पाया है कि जंगलों में रहने वाला गोरिल्ला दरिया पार करते समय उसकी गहराई का अनुमान लगाने के लिए पेड़ की टहनी का इस्तेमाल करता है। वह अलग-अलग जगहों पर टहनी डुबोकर पता लगाता है कि किस स्थल पर दरिया अधिक छिछला है। इसी प्रकार कड़े खोल वाले गिरीदार (खाद्य बीज वाले) फलों को तोड़ने के लिए पत्थर का प्रयोग करते हुए चिंपाजियों को देखा गया है। प्रयोगशाला में किए गए अध्ययनों में वयस्क चिंपाजियों की औसत बुद्धि 2-3 वर्ष के सामान्य बच्चे के बराबर पाई गई है। कौवों पर किए गये अध्ययन भी रोचक पाए गये हैं। ऐसा लगता है कि अत्यल्प मात्रा में ही सही सोचने-समझने जैसी कुछ क्षमता मानवेतर उन्नत पशु-पक्षियों में भी होती है।

 मनुष्यों का एकसमान तरीके से न सोच-समझ पाने की क्षमता का अनुभव मैं लंबे अरसे से करते आ रहा हूं। अर्थात्‍ कुछ लोग वस्तुस्थिति की बारीकी से निरीक्षण करने में समर्थ और उस सामर्थ्य के इस्तेमाल के आदी होते हैं। लेकिन सब इतने सचेत नहीं होते। कदाचित् पशुओं में भी इसी प्रकार का भेद होता होगा ऐसा मेरा मानना है। एक ही प्रजाति के सभी पशु समान प्रशिक्षण के बावजूद एकसमान क्षमता हासिल नहीं करते हैं।

     मनुष्य को बुद्धिमान प्राणी कहा जाता है। कहने को तो वह सोच-समझ सकता है, निर्णय ले सकता है और निर्णय का कार्यान्वयन कर सकता है। पर क्या सभी मनुष्य विभिन्न मुद्दों पर विचार करने की पर्याप्त सामर्थ्य रखते हैं? विचार करने का भाव भी क्या सबके मन में उठता है? मुझे लगता है कि वह भी बहुधा एक पशु या निम्न-स्तर के रोबोट की भांति प्रचलित ढर्रे पर चलता है, आगे-पीछे सोचे बिना और विकल्पों पर विचार किए बिना। मैं अपना मंतव्य एक दृष्टांत से स्पष्ट करता हूं।

     मेरे पड़ोस में एक सज्जन रहते हैं। हाल ही में वे बतौर किराएदार आए हैं। वे घर से बाहर निकलते समय मुख्य द्वार की अर्गला (सिटकनी) बंद करके ताला चढ़ा जाते हैं। ऐसा करते समय वे अर्गला की बेलनाकार छड़ दायें-बांये घुमा-घुमाकर सरकाते हैं। चिकनाहट न होने एवं किंचित जंग लगे होने के कारण छड़ आसानी से नहीं सरक पाती है। फलतः उसकी चूं-चां की कर्कश ध्वनि पड़ोस में हमारे कानों तक पहुंचती है। अवश्य ही उन सज्जन को भी मेहनत करनी पड़ती होगी। हमें वह आवाज खलती है, लेकिन अभी तक परिचय न हो पाने तथा एक प्रकार की हिचक की वजह से हम उन्हें यह सुझाव नहीं दे पाए हैं कि उस पर मोबाइल या ‘ग्रीज’ का लेपन कर लें, ताकि उस पर चिकनाहट आ जाए। सरसों या नारियाल आदि के तेल से भी वे काम चला सकते हैं

    मेरी समस्या उस कर्कश ध्वनि तक सीमित नहीं है। वह आवाज मुझे खलती जरूर है, लेकिन मेरे लिए उससे भी अधिक अहमियत इन सवालों का है कि वह आवाज खुद पड़ोसी सज्जन को क्यों नहीं खलती होगी? और यह भी कि उस पर चिकनाई चढ़ाकर अर्गला बंद करना सरल हो जाएगा यह विचार उनको क्यों नहीं आता होगा? कोई घटना एक-दो बार हो तो उसकी अनदेखी हो सकती है, लेकिन जिसका सामना रोज करना पड़े उस पर तनिक विचार तो होना ही चाहिए न? मुझे लगता है कि कई बातें लोगों के दिमाग में स्वयमेव नहीं आती हैं। यह मानव समाज से जुड़ा एक रोचक तथ्य है। इसे में “विचारशून्यता” कहता हूं।

     मैंने आरंभ में गाय का जो उदाहरण दिया वह अपनी इसी धारणा को व्यक्त करने के लिए है। निःसंदेह मैं स्वयं भी इस तुलना को अतिरंजनायुक्त (अतिशयता वाला) कहूंगा, लेकिन ऐसा अपनी इस बात पर जोर डालने के लिए कर रहा हूं कि सामान्य जीवन में बहुत-से कार्य होते हैं जिनके संदर्भ में “मैं इसे करूं या न?”; “अगर करूं तो कैसे?”; “क्या कोई विकल्प बेहतर होगा?”; “मेरे कार्य से निकटवर्ती लोग प्रभावित तो नहीं होंगे?” जैसे तमाम सवाल मनुष्य होने के नाते हमारे मस्तिष्क में उठने चाहिए। परंतु ऐसा अकसर नहीं होता। मैं उस स्थिति में सोचने लगता हूं कि हमारा व्यवहार पशुओं से एकदम भिन्न सदैव नहीं होता है।

     विचारशून्यता के अनेक उदाहरण रोजमर्रा की जिंदगी में देखने को मिल जाते हैं, जैसे अपना वाहन दूसरे के मकान के प्रवेश द्वार पर खड़ा कर देना, वाहन से चलते हुए पान की पीक पिच्चकर थूक देना, खाते-खाते केले का छिलका सड़क पर फेंक देना, सार्वजनिक पानी-टोंटी से लापरवाही से पानी बहने देना, सड़क पर दुधारू गाय-भेंस बांध के रखना। मेरे शहर वाराणसी में ऐसी बातें आम हैं। – योगेन्द्र जोशी

 

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महाभारत महाकाव्य में मूषक एवं विडाल की अल्पकालिक मित्रता की कथा

मानव समाज में परस्पर के संबंध स्वार्थ पर आधारित रहते हैं। इस तथ्य से जुड़ी मूषक एवं विडाल की अल्पकालिक मित्रता की महभारत की कथा का जिक्र इस चिट्ठे में किया गया है।

निकट भविष्य में देश में लोकसभा चुनाव होने हैं। अपने-अपने हित साधने या अस्तित्व बचाने के लिए राजनैतिक दल मेल-बेमेल गठबंधन बनाने में जुटे हैं। बेमेल गठबंधनों को देखने पर मुझे महाकाव्य महाभारत (शान्ति पर्व, अध्याय १३८) में वर्णित विडाल (बिलाव) एवं मूषक (मूस) की अल्पकालिक मित्रता की एक कथा याद आ रही है। उसी कथा से संबंधित कुछएक नीतिवचनों का उल्लेख यहां पर कर रहा हूं।

संक्षेप में कथा कुछ इस प्रकार है — किसी वन में एक विशाल पेड़ था, जिसके जड़ के पास एक मूस (बड़े आकार का चूहा) बिल बनाकर रहता था। उसी पेड़ पर एक बिलाव (बिल्ला) भी रहा करता था। बिल्ले से बचते हुए मूस बिल के बाहर भोजन की तलाश में निकला करता था।

एक बार एक बहेलिये ने पेड़ के पास जाल बिछा दिया, जंगली जानवरों एवं पक्षियों को फंसाकर कब्जे में लेने के लिए। उसका इरादा दूसरे दिन प्रातः आकर…

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