आलस्य अथवा अकर्मण्यता की कोई सीमा नहीं होती !

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः ।

नास्ति उद्यमसमो बन्धुः कर्माणो नावसीदति ।।

(भर्तृहरिरचित नीतिशतकम्, 86)

अर्थात मनुष्य के शरीर में स्थित सबसे बड़ा शत्रु आलस्य ही है । उद्यम (किसी न किसी कर्म में संलग्नता) के समान बन्धु (मित्र, सहायक) कोई नहीं जिसे करने पर दुःखानुभूति नहीं होती है ।

मेरा एक मित्र है अनंत खन्ना मेरा हमउम्र, जिसे संगी-साथी खन्ना सा’ब कहकर पुकारते हैं । मेरे ही नगर में रहता है लेकिन मेरे घर से दूर, नगर के एक छोर पर मैं और दूसरे छोर पर वह । इसलिए उससे मुलाकातें कम ही हो पाती हैं, बमुश्किल 2-3 बार वर्ष भर में । टेलीफोन पर कभी-कभार बात हो जाती है । फिलहाल बीते कुछ महीनों से उससे भेंट नहीं हो सकी है । इसलिए दो रोज पहले मन में आया कि क्यों न उससे मिलने चला जाऊं । बरसात का मौसम होने के बावजूद उस दिन पानी बरसने की आसार न के बराबर थे । आसमान पर बादलों की हलकी-सी चादर बिछी थी और मौसम कमोबेश सुहावना था । उस दिन मेरे उपवास का भी दिन था इसलिए खाने-पीने का भी झंझट नहीं था । अतः पूर्वाह्न ही में जाने का कार्यक्रम बना लिया, ताकि दो-तीन घंटे उसके साथ बिताया जा सके । हम दोनों ही सेवानिवृत्त हैं इसलिए समय की कमी नहीं रहती । बस दूरी की वजह से मिलना नहीं हो पाता है । अनंत खन्ना को फोन से अपने आने की खबर दे दी थी ।

          अपने नगर वाराणसी में यातयात की ढंग की सुविधा है नहीं । इस उम्र में अब स्कूटर जैसा वाहन चलाने की मेरी हिम्मत नहीं होती है विशेषतः नगर के अंदरूनी क्षेत्र में । अपने पास कार नहीं है, अगर होती भी तो उसे चलाने का भी जोखिम मैं न उठा पाता । बेतरतीब अनियंत्रित यातयात, न जाने कब कहां जाम लगा हो । और आज के युवा बाइक-चालकों का भी तो कोई भरोसा नहीं कि कब भीड़भाड में रफ्तार के साथ आपके दायें-बांये घुस जायें और आपको टक्कर मारकर चल दें । आटोरिक्शा से जाना ही एकमेव विकल्प है मेरे पास ।

          सवा-डेड़ घंटे में मैं मित्र के घर पहुंच गया । देखा कि उसके मकान के बाहर जो थोड़ी-सी खुली जगह है उसी में वह कुर्सी डालकर बैठा है । उसके सामने ही एक और कुर्सा पड़ी थी खाली; उसका इंतिजाम शायद मेरे बैठने के लिए ही किया था । मैं उसी पर बैठ गया । लग रहा था कि घर पर वह अकेला ही है । मुझे मालूम था कि उसकी पत्नी मायके गई हैं । अब तक लौटीं कि नहीं यह जानने के लिए मैंने पूछा, “लगता है अभी अकेले ही हो, भाभीजी लौटीं नहीं क्या ?”

खन्ना बोला, “कहां लौटीं ? फिलहाल लौटने की संभावना कम ही है । गईं थीं अपने बीमार माता-पिता से मिलने । लेकिन इस बीच उनके पिताजी की तबियत कुछ अधिक ही खराब हो गई । हैं भी तो करीब 85 वर्ष के । घर में कोई और है नहीं । छोटा भाई और उसकी पत्नी नौकरी-पेशे वाले हैं, और वह भी दूसरे शहर में । इसलिए वह वहीं रुक गई हैं पिताजी की सेवा-शुश्रूषा करने । समझ लो कि 2-3 महीनों की छुट्टी तो हो ही गई ।”

“अच्छा ? तब तो भोजन-पानी की दिक्कत हो रही होगी । क्या प्रबंध किए हो ?” मैंने पूछा ।

“उसकी दिक्कत है नहीं । इसका इंतिजाम वह पहले ही कर चुकी थीं । दरअसल पिछले कई महीनों से उन्होंने खाना बनाने वाली को रख लिया था । झाड़ू-पोंछा वाली तो वर्षों से ही काम कर रही है । … चाय पियोगे न ? साथ में मीठा-नमकीन ?” इतना कहते हुए वह उठा और खिड़की पर जाकर अंदर आवाज देने लगा, “अरे चंदा, जरा दो कप चाय बनाकर ले आना तो ।”

फिर लौटकर कुर्सी पर बैठते हुए मुझसे बोला, “चंदा खाना बनाने वाली का नाम है । अभी खाना बनाकर रख जाएगी; बाद में जब झाड़ू-पोंछे वाली आएगी तो वह गर्म करके मुझे खिला देगी ।”

उसके खिला देगी कहने पर मुझे कुछ ऐसा लगा कि जैसे कोई मां अपने बच्चे को खिलाने लगेगी । मन में सोचने लगा कि वह खुद ही खाना गर्म करके खा सकता था । इतना भी नहीं कर सकता ! परंतु मैंने उससे यह सब नहीं कहा और सहजता से पूछा, “चलो अच्छा है कि भोजन-पानी आदि की कोई समस्या नहीं है । लेकिन भाभीजी की गैरमौजूदगी में अकेलापन थोड़ा खलता होगा, है न ? … और साग-सब्जी, राशन-पानी की भी व्यवस्था करनी पड़ती होगी ? उसकी आदत तो होगी ही पहले से ।”

“अरे नहीं, वह तो मैं पहले भी नहीं करता था । किचन से जुड़े सभी काम वही किया करती थीं ।”

“राशन-पानी तो घर में भर गई होंगी, मान लेता हूं । लेकिन साग-सब्जी का तो कुछ इंतिजाम होना ही चाहिए । क्या किए हो ?” मैंने सवाल किया ।

“खाना बनाने वाली ही कर लेती हैं सब काम ।”

“अच्छी किस्म्त है यार तुम्हारी । फिर भी कभी-कभार   वह न आ पाए तो कुछ तो करना ही पड़ता होगा ।” मैंने टिप्पणी की

“ऐसी नौबत अभी तक नहीं आई है । दरअसल खाना बनाने वाली और झाड़ू-पोंछा वाली के बीच अच्छी अंडरस्टैंडिंग (समझ) है । उनमें से कोई एक जब दो-तीन दिन नहीं आ पाती है तो दूसरी उसके हिस्से का जरूरी काम कर जाती है ।”

“मतलब यह है कि जिंदगी आराम से कट रही है । लत्ते-कपड़े धोना धोबी का काम । तब बचता ही क्या है ? हां एक काम रह जाता होगा तुम्हारे जिम्मे – नहाने के बाद पहने हुए अंतर्वस्त्र (अंडरवियर-बनियान) धोने का काम ।”

“उसकी भी कोई समस्या नहीं है । दरअसल झाड़ू-पोंछे वाली ही कपड़े धोने का काम कर जाती है । घर में 6-7 जोड़ी अंडरवियर-बनियान रखे रहता हूं । जब वह छुट्टी पर रहती है, पहनेे हुए धोने के लिए रख देता हूं । बाद में धुल जाते हैं ।”

मन हुआ पूछूं कि अंडरबनियान जैसे अंतर्वस्त्र किसी अन्य से और वह भी किसी गैर-महिला से धुलवाने में कुछ अटपटा-सा या अजीब-सा या ऐसा ही कुछ नहीं लगता क्या ? पर सवाल नहीं उठाता; पता नहीं क्या प्रतिक्रिया होगी । घर-परिवार से जुड़ी कई बातें मैं पूछ सकता था लेकिन पूछा नहीं, और बातों का सिलसिला मैंने किसी और दिशा में मोड़ दिया । तब तक चंदा चाय-नाश्ता ले आई । मैंने खन्ना  बताया कि मेरा उपवास है इसलिए सिर्फ चाय पीयूंगा, कुछ खाऊंगा नही ।

मैंने उसके साथ डेड़-दो घंटे बिताए । घर लौटते समय सोचने लगा कि क्या खन्ना अपने अंडरबियर-अनियान भी नहीं धो सकता । मैं अपने अंतर्वस्त्र किसी से नहीं धुलवाता अपनी पत्नी से भी नहीं, जब तक कि कोई आकस्मिकता न आन पड़े । मुझे अजीब-सा लगता है । मेरी नजर में ये कपड़े एक प्रकार से निजता (प्राइवेसी) के द्योतक मालूम देते हैं । मैंने कुछ घरों में देखा है कि परिवार के पुरुष सदस्य नहाते समय उतरे कपड़े स्नानागार में ही छोड़ आते हैं जिन्हें बाद में घर की महिलाएं धोती हैं ।

खन्ना इतना आरामतलब होगा इसका अंदाजा मुझे नहीं था । मैं समझ नहीं पाता क्योंकर कोई धेले भर का भी शारीरिक श्रम नहीं करना चाहता । इसे आलस्य कहूं या अकर्मण्यता ? – योगेन्द्र जोशी

 

 

 

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आदमी जीता चला जाता है, आखिर क्यों ? – एक प्रश्न

मैं अपने घर से निकल कर सामने के मुख्य मार्ग पर प्रातःकाल सजने वाली सब्जी-विक्रताओं की दुकानों की ओर चल पड़ता हूं । ये दुकानें घर से बहुत दूर नहीं हैं, फिर भी मैं साग-सब्जी प्रतिदिन नहीं खरीदता, बल्कि एक बार में 2-3 दिनों के लिए खरीद लेता हूं ।

रास्ते में मुझे एक मिनीट्रक खड़ी दिखती है जिसका पिछला हिस्सा मेरे सामने है । उसका पिछला दाहिना चक्का सड़क के पक्के हिस्से में है तो दूसरा किनारे की कच्ची जमीन पर । किंचित दूर से मुझे उसके एक कोने पर एक वृद्ध महोदय खड़े दिखते हैं । आगे बढ़ते हुए मैं उनके निकट पहुंचता हूं और देखता हूं कि वे थोड़ा झुकते हुए जमीन पर पड़ी अपने सहारे की छड़ी उठाने का असफल प्रयास कर रहे हैं । उनके कपड़ों को देख मुझे नहीं लगता कि वे किसी खाते-पीते परिवार से होंगे । वे शायद वृद्धावस्था के चलते अशक्त हो चुके होंगे, अथवा यह भी संभव है कि वे शारीरिक अस्वस्थता के शिकार हों । मुझे लगता है कि उन्होंने छड़ी को ट्रक के सहारे खड़ा किया होगा, लेकिन वह सरककर जमीन पर गिर पड़ी होगी । अस्तु, मैं छड़ी उठाकर उनके हाथ में सोंपता हूं और आगे बढ़ जाता हूं ।

ट्रक के आगे पहुंचने पर मुझे लगता है कि उनका कोई और सामान भी शायद जमीन में पड़ा है । मैं मुड़कर देखता हूं कि सड़क पर उनके पैरों के निकट धूसर-सलेटी रंग का थैला पड़ा है जिसे वे उठाने का यत्न कर रहे हैं । मैं लौटकर उनके पास आता हूं और जमीन से थैला उठाकर उनके हाथ में सोंपता हूं । वे उसे कंधे पर लेने की कोशिश करते हैं । मैं उनकी मदद करता हूं किंतु थैला कंधे पर टिकता नही और हाथ पर कलाई तक सरक जाता है । मैं दो-एक बार प्रयास करता हूं परंतु सफलता नहीं मिलती है । अंत में झोले को कलाई के सहारे लटकाते हुए उसके उपरी हिस्से को मुट्ठी में पकड़े रहने की सलाह देता हूं । वे मुश्किल-से सुनाई दे सकने वाली धीमी आवाज में मुझे धन्यवाद देते हैं । और मैं आगे बढ़ जाता हूं ।

आगे बढ़ते हुए और वांछित सामग्री खरीदने के बाद लौटते हुए मैं एक वैचारिक द्वंद्व से घिर जाता हूं । मन में एक प्रश्न उठता है, ऐसा प्रश्न जो पहले भी कई बार मेरे मन में उठ चुका है । मैं हर बार उसका उत्तर खोजने की चेष्टा करता हूं, कभी खुद चिंतन-मनन की प्रक्रिया अपनाकर तो कभी चित-परिचितों से साथ विचार-मंथन करके । मेरा प्रश्न अपने स्थान पर आज भी यथावत है । प्रश्न है कि मनुष्य क्यों जीता चला जाता है ? क्यों कभी यह नहीं सोचता कि काफी हो चुका है, अब मुझे इस धरती को अपने संसाधनों के साथ दूसरों के लिए छोड़ देना है । मृत्यु को हम भयावह, घृणास्पद, सर्वथा त्याज्य इत्यादि नकारात्मक विशेषणों से क्यों जोड़ते हैं ? मैं उन लोगों के मामलों से परिचित हूं जो हताश-निराश हो चुकते हैं, जिन्हें यह लगने लगता है कि उनकी मनोकामनाएं पूरा नहीं हो सकती हैं, और उस स्थिति से फलीभूत जीवन की कटुता का सामना करने का साहस खो बैठते हैं और अपनी इहलीला समाप्त कर देते हैं । जीवन के प्रति उनका मोह समाप्त नहीं होता है अपितु वे वस्तुस्थिति झेलने की सामर्थ्य खो बैठते हैं । मैं दूसरी श्रेणी के उन लोगों की बात करना चाहता हूं जिनके सामने ऐसी समस्या न हो, फिर भी जो सोचते हों कि जीवन के प्रति कभी न समाप्य मोह क्यों हो ? हम कभी हंसते हुए लेकिन पूर्ण गंभीरता के साथ अपने निकटस्थों ये यह क्यों नहीं कह पाते हैं, “क्यों भई कब तक हमसे जीते रहने को कहोगे ? इतना कम है क्या ? बताओ, एक दिन हमने यह इच्छा नहीं व्यक्त करनी चाहिए कि अब चलना चाहिए, ठीक वैसे ही जैसे कि कोई मुलाकाती कहे अब चलना चाहिए, काफी देर हो चुकी है ।”

मैं उपर्युल्लिखित शरीरतः अशक्त सज्जन के बारे में कह नहीं सकता कि उनकी पारिवारिक स्थिति कैसी है, आर्थिक दशा के क्या हाल हैं, जीवन को लेकर उनके मन में कोई विचार उठते भी हैं या नहीं, अगर मन में विचार आते हैं तो वे क्या रहते हैं, इत्यादि । परंतु मैं जब उन लोगों को देखता हूं जिनके जीवन में न कुछ करने को रह जाता है और न कुछ भोगने को तब सोचता हूं कि क्या अब भी जिजीविषा बनी रहनी चाहिए । जब जीवन अपनी अर्थवत्ता खो चुका हो तो उस व्यक्ति को मृत्यु के साक्षात्कार की इच्छा नहीं हो जानी चाहिए ? उससे जुड़े सुहृदों को भी मुक्ति की कामना नहीं करनी चाहिए क्या ? इस प्रकार के तमाम प्रश्न मन में आज तक अनुत्तरित रहे हैं और कदाचित आगे भी अनुत्तरित रहेंगे । – योगेन्द्र जोशी

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मीटर से भाड़ा तय करने वाले ऑटोरिक्शा

मैं यदाकदा दिल्ली एवं मुम्बई जैसे महानगरों का चक्कर लगाता रहता हूं । अभी हाल ही में मैं कुछ दिनों के लिए मुम्बई रहा । तब मुझे अपने पौत्र के जन्म के समय अस्पताल के कई चक्कर लगाने पड़े थे । उस दौरान मेरे गमनागमन का साधन ऑटोरिक्शा ही रहा । जाहिर है कि मेरा सापका अलग-अलग ऑटारिक्शॉ वालों से पड़ा । तब मुझे पता चला कि मुम्बई मे ऑटोरिक्शे बिना मीटर के नहीं चलते । मेरा अनुभव दिल्ली में बिल्कुल उल्टा रहा है । मैंने पाया है कि ऑटोरिक्शों पर मीटर तो अवश्य लगे रहते हैं, लेकिन उनका प्रयोग यात्रियों का भाड़ा तय करने में होता है ऐसा मुझे कभी नहीं लगा । आम तौर पर ऑटारिक्शा वाले के साथ मोलभाव करके भाड़ा तय करना पड़ता है । मैंने अक्सर देखा है कि वे वाजिब से डेड़-दो गुना भाड़ा मांगते हैं और मोलभाव के बाद भी सही भाड़े पर वे तैयार हो गये होंगे इस बात को लेकर अश्वस्त नहीं हुआ जा सकता है । जिसे भाड़े का अंदाजा न हो उसके लिए धोखा खा जाना स्वाभाविक है । ऐसे लोगों को ‘प्रिपेड’ऑटोरिक्शा की शरण में जाना पड़ता है ।

लेकिन इधर चार-छः दिनों के दिल्ली प्रवास के दौरान मुझे यह देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि वहां भी कुछ ऑटोरिक्शा वाले मीटर के अनुसार भाड़ा लेने को तैयार होने लगे हैं । इस बात का प्रथम अनुभव मुझे तब हुआ जब मैं एक दिन अपने गंतव्य पर ऑटोरिक्शा के माध्यम से गया । मैंने अधिकांश दूरी दिल्ली की मेट्रो रेलसेवा से तय की और शेष भाग के लिए ऑटोरिक्शा भाड़े पर लिया । मेट्रो स्टेशन पर उतरने के बाद प्लेटफॉर्म से बाहर आकर मैंने एक ऑटोरिक्शा वाले से पूछा कि क्या वह अमुक स्थान को चलेगा । वह तैयार हुआ तो भाड़ा पूछा, “कितना पैसा लेंगे ?” उत्तर मिला, “सत्तर रुपया लगेगा ।”

मेरा अगला सवाल था, “इतना तो ज्यादा है । वहां तक का इतना होता नहीं । … अच्छा, आपके ऑटोरिक्शा पर मीटर लगा है क्या ? … और वह काम भी करता है क्या ?”

जवाब था, “मीटर है, सा’ब । मीटर से चलेंगे क्या ? मीटर से भी वही पड़ेगा ।”

मैंने कहा, “ठीक है, मीटर से ही चलिए । जितना भी लगे देखा जाएगा । दिल्ली में मीटर के हिसाब से भाड़ा तय करने का अनुभव भी तो ले लें । पहली बार देख रहा हूं कि कोई मीटर से भी चलने को तैयार है ।”

गंतव्य पर पहुंचने पर मीटर ने उनसठ रुपया – एक कम साठ रुपया! – भाड़े की रीडिंग दिखाई । मैंने ऑटोरिक्शा चालक को साठ रुपया देते हुए कहा, “यह तो साठ भी नहीं हुआ; आप तो सत्तर मांग रहे थे ।”

“इसी इलाके के फलां सिरे तक चले होते तो इतना हो जाता ।” उसने सफाई पेश की ।

बात खत्म हुई और मैं आगे बढ़ गया ।

अगले दिन मुझे कहीं अन्यत्र जाना था । मैं निकटतम चौराहे पर गया और वहां खड़े ऑटोरिक्शा चालकों से पूछा । उनमें से एक मुझे गंतव्य तक पहुंचाने को तैयार हो गया । बीते दिन के अनुभव को ध्यान में रखते हुए मैंने पूछा, “आपके वाहन पर मीटर लगा हुआ दिख रहा है; काम करता है क्या ? मैं मीटर के हिसाब से चलना चाहूंगा ।”

उसने जवाब दिया, “मीटर है और वह चलता भी है । मैं उसी के हिसाब से भाड़ा लूंगा । दरअसल मैं मीटर से ही चलता हूं । ऐसा करने पर पैसेंजर से झक-झक नहीं करनी पड़ती है ।”

“ताज्जुब है । मैं तो देखता आया हूं कि यहां ऑटोरिक्शों पर लगे मीटर अक्सर काम तक नहीं करते और जिनके काम करते भी हैं वे मीटर से चलने को तैयार नहीं होते ।” मैंने प्रतिक्रिया व्यक्त की ।

उसने उत्तर दिया, “अब माहौल कुछ बदल रहा है । कई पैसेंजर अब मीटर से चलने की बात करते हैं और कई आटो-ड्राइवर उसके हिसाब से चलने भी लगे हैं । बारगेनिंग के मामले में पैसेंजर को शक बन रहता है कि आटो-भाड़ा कहीं अधिक तो नहीं लिया जा रहा है और कभी-कभी वे ड्राइवर से उलझ भी जाते हैं । मैं तो अब मीटर से ही चलता हूं ।”

उसकी बात सुन मुझे भरोसा होने लगा कि मुम्बई की भांति यहां भी देरसबेर ‘मीटर्ड’आटो चलने लगेंगे । – योगेन्द्र जोशी

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आल्हादित होना उन बच्चों का कुछ पलों के लिए

मैं यदाकदा अपने शहर से बाहर अन्यत्र मित्र-परिचितों से मिलने अथवा पर्यटन हेतु निकल जाता हूं । इन अवसरों पर प्रातः-सायं टहलने निकलने पर मैं अपनी जेब में कभी-कभार एक कैमरा भी रख लेता हूं, यह सोचकर कि कहीं कोई दृश्य कैमरे में कैद करने का मन हो जाय तो वह साथ रहे । आवश्यक नहीं कि मैं दर्शनीय स्थलों की ही तस्वीरें खींचूं, जैसा कि आम पर्यटक करता होगा । मुझे कुछ नया, अवांछित, घृणास्पद ही सही, या अन्यथा, कुछ भी दिखे वह मेरे लिए तस्वीर का विषय बन सकता है ।

कुछ समय पहले मैं मुंबई गया था अपने बेटे के पास जो पश्चिम भांडुप में रहता है । उसका आवास एलबीएस रोड (लाल बहादुर शास्त्री मार्ग) के निकट एक बहुमंजिली इमारत में है । मैं अधिकांश दिनों उस इमारत के परिसर में ही टहला करता था, किंतु कभी-कभी उक्त सड़क पर भी निकल जाता था । एक प्रात मैं कैमरा साथ ले गया था । मैंने देखा कि सड़क के किनारे फुटपाथ पर कुछ लोग (खानाबदोश) अपने रहने का ठिकाना बनाए हुए हैं । मैंने एक तस्वीर खींच ली जो यहां प्रस्तुत है । तीन खंडों की इस तस्वीर के आरंभ में वही है ।

तस्वीर  खींचकर मैं आगे बढ़ गया । दो-चार कदम बढ़ा था कि मैंने दो बच्चों – कदाचित् उन्हीं खानाबदोशों के – को अपने आगे जाते हुए देखा । वे अपने हाथों में पारदर्शी प्लास्टिक की बोतलें तथा एक ‘गैलन’(करीब एक गैलन की क्षमता वाला प्लास्टिक का बर्तन या कनस्तर) लिए हुए थे और उन्हें हाथों से ढोल-नगाड़े के माफिक पीटकर आवाज निकाल रहे थे । मैंने पीछे से उनकी तस्वीर खींच ली (दी गयी तस्वीर में दूसरा खंड) । मेरा मन हुआ कि आगे बढ़कर उनकी सामने से भी तस्वीर ले लूं ।

जैसे ही मैं उनके सामने पहुचा जिज्ञासु बच्चों की भांति उनकी नजर मेरे कैमरे पर पड़ी । लालायित-से वे बोल पड़े, “हमारी भी एक फोटो खींच दो न” । और मैंने फोटो खींची और उन्हें दिखा दी (तीसरे खंड की तस्वीर)। वे खुशी के मारे एक-दूसरे को और फिर मुझे देखकर खिलखिलाने लगे । वे प्रसन्न थे, आल्हादित थे, गोया कि उन्हें कुछ कीमती चीज देखने को मिल गई हो । मैंने मुस्कुराते हुए उनकी तरफ हाथ हिलाया और आगे बढ़ गया ।

रास्ते में मैं सोचने लगा कि आजकल तो मध्यवर्गीय और उसके ऊपर के परिवारों में कैमरे की उपलब्धता आम बात है । उन परिवारों में गाहे-बगाहे तस्वीरें खिंचती ही रहती हैं । लेकिन इन बच्चों के लिए किसी अपरिचित व्यक्ति के द्वारा उनकी फोटो खींची जाना ही खुशी की बात थी, भले ही वह फोटो उन्हें दुबारा देखने को ही न मिले । अवश्य ही यह खुशी तात्कालिक एवं अस्थाई होती है, मात्र कुछ मिनटों की, लेकिन होती जरूर है । अथवा खुशी कुछ घंटों तक रह सकती है, जब तक कि वे अपने लोगों के बीच जाकर उसकी चर्चा न कर लें । मेरे लिए उनका खुश हो जाना अपने किस्म का एक अनुभव था ।  जीवन में खुशियां क्षणिक, अल्पकालिक या अपेक्षया दीर्घकालिक होती हैं किंतु शाश्वत नहीं । – योगेन्द्र जोशी

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जेब में पैसा लेकर न चलने का खामियाजा

किसी व्यक्ति के अनुभवों को मैं मोटे तौर पर दो श्रेणियों में बांटकर देखता हूं । पहले में वे हैं जो उन घटनाओं से जुड़े होते हैं जिनका व्यक्ति स्वयं भोक्ता के रूप में अनुभव करता है, और जो कभी-कभी उसके स्मृति-पटल पर लंबे अर्से के लिए अंकित हो जाते हैं, सुस्वप्न अथवा दुःस्वप्न के तौर पर । दूसरी श्रेणी के अनुभवों का साक्षात्कार व्यक्ति तब करता है जब वह संबंधित घटनाओं को निष्पक्ष दर्शक के तौर पर अपने समक्ष घटित होते देखता है । आम तौर पर ये घटनाएं भुला दी जाती हैं क्योंकि उनका कोई प्रभाव उसके जीवन पर नहीं पड़ता है । फिर भी तात्कालिक स्तर पर वे दिलचस्प हो सकते हैं और उनमें सार्थक संदेश निहित पाया जा सकता है । ऐसे ही एक वाकये का जिक्र मैं यहां पर कर रहा हूं ।

आजकल मैं अपने शहर वाराणसी से दूर अपेक्षया अपरिचित एक महानगर में हूं चार-छः सप्ताह के लिए । आज मुझे कुछ फल खरीदने थे जिसके लिए मैं प्रातःकाल अपने स्थानीय आवास से निकल पड़ा । यहां बाजार में फलों की सभी दूकानें अगल-बगल एक ही जगह पर हों ऐसा नहीं है । केले बेचने वाले ठेले पर उन्हें सजाए हुए रास्तों पर कुछ-कुछ दूरी पर यत्रतत्र मिल जाते हैं । मेरा सोचना हैं कि ऐसा वे सकारण करते हैं । मैंने देखा है कि राह चलते कई लोग दो-चार केले खरीदकर वहीं पर खा लेते हैं । ऐसा अन्य फलों के साथ आम तौर पर नहीं होता है, जिन्हें लोग घर या आवास पर खाने के लिए साथ लिए जाते हैं । इसलिए ठेलों पर केलों को सजाकर बेचते हुए विक्रेता उन जगहों पर भी मिल जाते हैं जहां अन्य फल न बेचे जा रहे हों ।

अनार-अमरूद आदि फलों को खरीदने के बाद मैं केलों वाले एक ठेले पर रुक गया । केला-विक्रेता एक युवक से उलझ रहा था । मैं रुक गया यह सोचते हुए कि पैसे के लेन-देन की बात चल रही होगी । मैंने देखा कि उनके बीच बहस कुछ लंबी ही खिंच रही है । मुझे भी जिज्ञासा हुई मामले को समझने की, इसलिए इंतिजार करने लगा । अंत में जब वह युवक पैसा चुकता करके चल दिया तो मैंने विक्रेता से केले लिए और उसकी कीमत अदा करने लगा । लगे हाथ मैंने उससे पूछ लिया, “क्यों भई, क्या बात थी जो काफी देर तक आप दोनों बहस में उलझे हुए थे ?”

“अरे सा’ब, आपको क्या बताएं । वे जनाब घंटा भर पहले मुझसे केला लेकर खा गये, और जब पेमेंट की बात आई तो बोले कि अभी मेरे पास पैसा नहीं, बटुआ घर पर छूट गया है । कहने लगे शाम को जब कंपनी से लौटूंगा तो पैसा दे दूंगा ।” केला विक्रेता का जवाब था ।

वह आगे बोला, “मैंने उनसे कहा कि जब आपके पास पैसा ही नहीं था तो केला खाने की क्या जरूरत थी । पहले अपनी जेब टटोल लेनी चाहिए थी । मैं न आपको जानता हूं और न ही आपको इधर से आते-जाते कभी ही देखा है । तो फिर उधारी कैसे दे दूं ? ऐसे तो मेरा बिजनेस चल चुका । अगल-बगल का कोई दुकानदार कहे तो भी कुछ भरोसा कर सकता । जब तक पेमेंट नहीं होगा आप नहीं जाएंगे ।”

विक्रेता के कथनानुसार जब उस युवक ने देखा कि उसका अनुरोध कारगर नहीं हो पा रहा है तो वह अपना मोबाइल धरोहर के तौर पर वहां छोड़ गया और चला गया अपनी कंपनी या अन्यत्र पैसे का प्रबंध करने । मैं जब केला खरीदने जा रहा था तभी वह लौटा था पैसा चुकता करने और मोबाइल वापस लेने । अपनी नाखुशी व्यक्त करने के लिए ही वह उस समय विक्रेता से उलझा हुआ था ।

इस घटना में एक संदेश छिपा है । महानगरीय जीवन की खासियत यह है कि लोगों की भीड़ में प्रायः सभी अजनबी होते हैं । जिंदगी की भागदौड़ में पड़ोसी तक पड़ोसी से अपरिचित बना रहता है । राह चलते कोई किसी में दिलचस्पी नहीं लेता । ऐसे में किसी से मौके-बेमौके मदद की उम्मीद नहीं की जा सकती । गंभीर दुर्घटना के समय तक विरले ही मदद के लिए आगे बढ़ते हैं । ऐसी स्थिति में आदमी को जेब में बिना पैसे के चलना ही नहीं चाहिए । पैसा ही मित्र सिद्ध होता है ! – योगेन्द्र जोशी

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कभी दुधारू रह चुकी उस बूढ़ी गाय की व्यथा

मुझे एक गाय मुहल्ले की अपनी गली के नुक्कड़ पर घास चरती हुई मिल गयी । आजकल बरसात का मौसम है । बारिस के नाम पर इस मौसम में अपेक्षा से बहुत कम पानी बरसा है अपने इलाके में, फिर भी जमीन में इतनी नमी तो आ ही गई है कि सड़कों-गलियों की कच्ची जमीन पर मौसमी घास उग सके । बस वही घास वह गाय चर रही थी । मैं पास से गुजरने लगा तो उसने मुझे गौर से देखा । उसे शायद मेरा चेहरा देखा-पहचाना-सा लग रहा था ।

Stray Cow

मैंने उसकी ओर मुखातिब होकर पूछा, “क्यों भई गैया माई, आज इधर कैसे ? आजतक तो आपको ऐसे चरते हुए नहीं देखा; कम से कम अपनी इस गली में तो कभी नहीं ।”

“बस यों ही, समझ लें तफरी लेने निकल पड़ी मैं भी । कभी-कभी जिन्दगी में कुछ चेंज भी तो होना चाहिए ।” उसका जवाब था ।
उसकी बात मैं समझ नहीं पाया । अधिक कुछ और पूछे बिना मैं आगे बढ़ गया ।

मैंने उसे सुबह-शाम जब भी देखा घर के नजदीक की मुख्य सड़क के किनारे के एक मकान के सामने ही बंधा देखा था दो-तीन अन्य गायों के साथ । जरूर उस मकान के मालिक ने पाल रखा होगा उन सबको । उस दुमंजिले मकान के भूतल पर किराने की दुकान है उसी मकान मालिक की; और साथ में चलता है गाय-भैंसों के चारे का कारोबार । एक आटा-चक्की भी चलती है वहां; मैं कभी-कभार आटा खरीद ले आता हूं वहां से । ऐसे ही मौकों पर अथवा वहां से सड़क पर पैदल गुजरते हुए मैंने उस गाय को खूंटे से बंधे और नांद से चारा-पानी खाते हुए देखा है । लेकिन कभी भी शहर के आम छुट्टा जानवरों की तरह उसे इधर-उधर घूमते-चरते नहीं देखा । वह पालतू जो थी ।

मुझे जिज्ञासा हुई देखूं कि माजरा क्या है । मैंने सड़क पर आते-जाते उस खूंटे पर गौर करना शुरू किया । अब वह गाय उस खूंटे से बंधी नहीं दिखाई देती, कभी नहीं । मैं समझ गया वह अब बेकार हो चुकी है; वह बूढ़ी हो रही होगी और बछड़े-बछिया जनकर दूध देने की क्षमता खो चुकी होगी । इसलिए उसके मालिक ने उसे अपने हाल पर छोड़ दिया है । अब वह छुट्टा गाय बन गई है दूसरे कई अन्य गायों की तरह ।

मुझे गांव में बिताए अपने बचपन के पचास-पचपन साल पहले के वे दिन याद आते हैं जब हमारे घरों में गायें पहली थीं । बारह-चौदह साल तक दूध देने के बाद वे इस कार्य से निवृत्त हो जाती थीं । उन्हें तब खदेड़कर जंगल में नहीं छोड़ दिया जाता था, बल्कि अन्य गाय-भेंसों के साथ वे भी पलती रहती थीं । लेकिन वे अधिक दिन नहीं जी पाती थीं और दो-तीन साल में दम तोड़ देती थीं । अवश्य ही तब उनके शवों को जंगल में डाल दिया जाता था । उनका मांस गिद्धों एवं जानवरों का भोजन बनता था । लेकिन यहां वह सब नहीं था ।

लंबे अर्से के बाद एक दिन वह मोहल्ले की ही किसी गली में मुझे मिल गयी लंगड़ाते हुए । मैंने उससे पूछा, “ये पैर में चोट कैसे लगी ?”

जवाब था, “क्या बताऊं, सड़क पार करते वक्त एक कार से टकरा गई ।”

“देखकर चला करिए, अपने शहर में सड़कें पार करना इतना आसान थोड़े ही है ।” मैंने सलाह दी ।

“देखकर ही चल रही थी, कारवाले को ही शायद नहीं दिखाई दिया ।”

“यानी कि कारवाला आपसे टकराया । यही न ?”

“यह मैं कैसे कहूं ? कारवाला बड़ा आदमी होता है, उसको भला कैसे दोष दिया जा सकता है । दोषी तो सदा कमजोर ही माना जाएगा न । यही तो इस दुनिया का उसूल है ।”

उसकी इस टिप्पणी का क्या जवाब दूं मैं सोच नहीं पा रहा रहा था । “चलिए, कुछ दिन में आपका पांव ठीक हो जाए यही प्रार्थना है मेरी ।” कहते हुए मैं वहां से चल दिया ।

यह मेरी उससे अंतिम मुलाकात थी । उसके बाद मैंने उसे कभी नहीं देखा । वह शायद दिवंगत हो गई होगी । या फिर कुछ और …। मैं स्वयं से पूछता हूं कि गोसेवा का दंभ भरने वाले भारतीय समाज में क्या कोई वाकई गोसेवक होता हैं या गोशोषक । – योगेन्द्र जोशी

 

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जहां चाह वहां राह : वे अंत में वाइस-चांसलर बन ही गये!

अपने देश में उच्च एवं उच्चतम न्यायालयों के न्यायाधीशों का नियुक्तियां अभी तक ‘कॉलेजियम’ नाम की चयन समिति की संस्तुति के आधार पर होती आ रही थीं । इस समिति में उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एवं उनके चार वरिष्टतम सहयोगी भाग लेते थे । पिछले कुछ समय से यह बहस छिड़ी हुई थी कि इस पद्धति में सही चयन अक्सर नहीं होते हैं और अपेक्षया बेहतर योग्यता वाले व्यक्तियों के छूट जाने की संभावना अधिक रहती है । मौजूदा शासन इस पद्धति को समाप्त करके उसके बदले राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (नैशनल जुडिशियल अपॉइंटमेंट कमिशन) का गठन करने जा रही है, जिसमें शासन की ओर से भी कुछ सदस्य होंगे ।

कॉलेजियम पद्धति के विरुद्ध ये तर्क दिया जा रहा था कि इसमें समिति के सदस्य अपने मित्रों-परिचितों-संबंधियों के प्रति झुकाव रखते हुए पक्षपातपूर्ण रवैया अपना लेते हों इस बात की संभावना रहती है । मैं इस पद्धति का पक्षधर नहीं हूं, लेकिन यह विश्वास भी नहीं कर पाता कि नये आयोग के साथ ऐसी संभावना नहीं हो सकती । मैंने अपने अध्यापन-काल में यह अनुभव किया है कि विश्वविद्यालय जैसी संस्था में जहां चयन-प्रक्रिया प्रमुखतया साक्षात्कार पर आधारित रहती है ईमानदारी से कार्य होता हो ऐसा सामान्यतः नहीं होता । इन समितियों में प्रायः पांच या अधिक सदस्य रहते हैं, जिसके सदस्यगण आम तौर पर अभ्यर्थियों को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से जानते हैं अथवा उनकी सिफारिशें लिए रहते हैं । उनकी पूरी कोशिश रहती है कि जिनके प्रति वे झुकाव रखते हैं उनका चयन हो ।

वाइस-चासंलरों, जिन्हें कुछ संस्थाओं में कुलपति कहा जाता है तो अन्यत्र उपकुलपति, की नियुक्ति तो अधिक निष्ठा से होनी चाहिए, किंतु उसमें भी ‘अपनों’ को उपकृत करने की परंपरा रही है । इस अहम पद के लिए कदाचित सभी जगह केन्द्र अथवा राज्य सरकार प्रायः तीन सदस्यों की एक ‘खोज समिति’ (सर्च कमेटी) का गठन करती है, जिसके द्वारा संस्तुति-प्राप्त प्रत्याशियों में से किसी एक की नियुक्ति राष्ट्रपति/राज्यपाल (जो भी इस कार्य के लिए अधिकार-संपन्न हो) द्वारा की जाती है ।  मेरा उद्येश्य इस मुद्दे पर विस्तार से चर्चा करना नहीं है । कॉलेजियम के गुणदोषों पर टीवी बहसों को देखते और तत्संबंधित लेखों को पढ़ते समय मुझे एक घटना याद आती रही कि किस प्रकार मेरे एक परिचित ने वाइस-चांसलर (वीसी) पद के लिए जी-जोड़ प्रयास किया और सफल भी हुए । उनकी नियुक्ति में संबंधित जनों ने पर्याप्त ईमानदारी बरती होगी ऐसा मुझे लगता नहीं ।

जिस समाज में भ्रष्ट आचरण का मतलब केवल अवैध तरीके से धन कमाना लिया जाता हो, लेकिन जाति-धर्म आदि के आधार पर किसी के पक्ष में निर्णय लेना सामान्य परंपरा बन चुकी हो, परिचितों-मित्रों के भाई-भतीजों को अहमियत दी जाती हो, व्यक्ति के विवेकाधीन का अर्थ उसकी मनमर्जी माना जाता हो, सिफारिशें करना/मानना आम चलन में हो, उस समाज में कोई भी पद्धति अपनाई जाये सही कार्य होगा इस पर कम से कम मैं भरोसा नहीं कर पाता ।

अस्तु, मैं उन सज्जन के वीसी बनने की कहानी पर लौटता हूं । संबंधित व्यक्तियों/स्थानों को संदर्भ हेतु मैं काल्पनिक नामों से संबोधित कर रहा हूं । कोई दस-बारह वर्ष पुरानी घटना होगी जब मैं अपने दो सहशिक्षकों के साथ सांध्यकालीन चाय पीने हेतु विश्वविद्यालय (वि.वि.) परिसर स्थित विश्वनाथ मंदिर जा रहा था । मंदिर से किंचित दूरी पर ही उन सज्जन से भेंट हो गई जो रास्ते के दूसरी ओर से आ रहे थे । शिष्टाचार के नाते हम कुछ देर के लिए रुक गये और उनसे सामान्य बातचीत करने लगे । लगे हाथ हम में से किसी ने उन्हें छेड़ दिया, “अरे भई सक्सेना साहब, हमने सुना है कि आप जल्दी ही कौशाम्बी वि.वि. के वीसी बनने वाले हैं । कब जा रहे हैं अपने नये दायित्व पर ?”

“अरे यार क्या बताएं सब गड़बड़ हो गया । सब कुछ लगभग तय हो चुका था । चयन समिति में अपने भी परिचित थे, अतः अपना नाम तो आगे बढ़ा ही था । मैं पिछले कुछ समय से गर्वनर महोदय के पीए से भी मिलता आ रहा था । हाल ही में उन्होंने बताया भी था कि आप अपनी नियुक्ति हुई ही समझो, बस फाइनल सिग्नेचर होने की देरी है । मैं तो पूरी तरह आश्वस्त था, लेकिन क्या बताएं ! …” फिर मेरे सहयोगी की ओर मुखातिब होकर कहने लगे, “अरे, आपके वे प्रोफेसर शर्मा हैं न,  … आप तो उन्हें जानते ही हैं । पता नहीं वे कहां से टपक पड़े । बस, हमारा पत्ता काट दिया उन्होंने । धोखा खा गए ।”

हम लोगों ने चुटकी ली, “ये सब तो चलता रहता है । अभी खेल खत्म थोड़े ही हो गया है । कोशिशें जारी रखेंगे तो फिर मौका मिलेगा । हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं ।”

इतना कहते हुए हमने उनसे विदाई ली और चल दिए मंदिर की ओर चाय पीने । अपनी मंजिल तो मंदिर के पास का टी-स्टाल था न कि प्रदेश का राजभवन ।

सक्सेना साहब के प्रयास चलते रहे और एक दिन खबर मिली कि वे राज्य के किसी अन्य वि.वि. के वीसी नियुक्त हो गये हैं । उनकी पहुंच ने अंततः उन्हें मंजिल तक पहुचा ही दिया । यह कोर्ई माने नहीं रखता कि बाद में उन पर लगे आरोपों की चर्चा भी प्रादेशिक अखबारों में छपी थीं । अहम बात तो यह है कि पूर्व-कुलपति रह चुकने का तमगा तो उन्हें मिल ही गया । ऐसे तमगों का भी अपना आनन्द होता है । – योगेन्द्र जोशी

 

 

 

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