दवा-विक्रेता की सदाशयता

मुझे अपनी यात्राओं के दौरान अथवा उस काल के प्रवास-स्थान पर अक्सर सदाशयी जन मिल जाते हैं। मेरी समस्याओं का वे समाधान सुझाने में सहायक सिद्ध होते हैं। अधिकांश अवसरों पर मुझे कोई असुविधा नहीं होती है। यदि कहीं कोई अड़चन आन पड़ती है तो वह अपने देश की दोषपूर्ण व्यवस्था के कारण होती है, न कि किसी व्यक्ति-विशेष के कारण।

विगत अगस्त माह मैं बेंगलूरु शहर अपने बेटे-बहू-पोते के पास तीनएक सप्ताह के लिए गया था। वे लोग ह्वाइटफ़ील्ड नामक इलाके में रहते हैं। एक दिन मुझे गिरिनगर नामक स्थान जाना था। दरअसल गिरिनगर में “सम्भाषण-सन्देशः” नामक संस्कृत पत्रिका का कार्यालय है। मैं इस पत्रिका का लंबे अंतराल से ग्राहक-पाठक हूं। चूंकि मैं सितंबर माह से कुछ महीनों के लिए वाराणसी से बाहर रहने वाला था, अतः चाहता था कि केवल डाक से प्राप्य यह पत्रिका  व्यवस्थापकों द्वारा उस काल में मुझे न भेजी जाए। इस आशय से पत्रिका के गिरिनगर स्थित कार्यालय जाने का विचार मेरे मन में उठा।

गिरिनगर ह्वाइटफ़ील्ड से २०-२२ किलोमीटर दूर है। मुख्यतः कन्नड़-भाषी बेंगलूरु शहर मेरे लिए नितांत अनजाना शहर है। ह्वाइटफ़ील्ड शहर का अपेक्षया नया इलाका है जहां प्रमुखतया आईटी प्रौद्योगिकी एवं कॉर्पोरट औद्योगिकी के  कार्यालय स्थित हैं, जिनमें देश के लगभग सभी इलाकों के युवक-युवतियां कार्य करते हैं। फलतः उस इलाके में हिन्दी बोलने-समझने वालों की संख्या काफी है। लेकिन गिरिनगर पुराने बेंगलूरु में है, जहां हिन्दी नाममात्र ही बोली-समझी जाती है। इसलिए वहां जाने और संभाषण संदेश कार्यालय खोजना मेरे लिए कठिन होगा यह शंका मेरे मन में रही। अस्तु।

मैंने नगर-बस-सेवा के डे-पास (एक-दिवसीय अनुमति-पत्र) का उपयोग किया। बेंगलूरु में बस परिचालक हिन्दी समझ और कुछ हद तक बोल लेते हैं ऐसा मुझे वहां के प्रवास के दौरान अनुभव हुआ। अत: मुझे खास दिक्कत नहीं हुई। बस कंडक्टर ने गिरिनगर से ७-८ कि.मी. दूर कॉर्पोरेशन (नगर निगम कार्यालय) के पास मुझे यह कहते हुए उतरने की सलाह दी कि चूंकि गिरिनगर के लिए वहां बहुत कम बसें चलती हैं, अतः ऑटो-रिक्शा से जाना सुविधाजनक होगा।

मैंने ऑटो भाड़े पर लिया और उसके चालक ने गिरिनगर  के एक मुख्य मार्ग के किनारे फेज़ ८ पर मुझे पहुंचा दिया यह कहते हुए कि आसपास ही सभी फेज़-क्षेत्र हैं, किंतु फेज़ २ (मेरा गंतव्य) ठीक-ठीक कहां है बता पाना कठिन है। कदाचित में फेज़-व्यवस्था सुनियोजित नहीं थी। मैंने वहां दिख रहे लोगों एवं दुकानदारों से पूछा, किंतु ठीक-ठीक कोई बता नहीं पाया। इसी बीच मेरी नजर एक दवा-दुकान पर पड़ी और मैं उस दुकान पर पहुंचा। संयोग से दुकानदार महोदय कन्नड़-हिन्दी-अंग्रेजी त्रिभाषी निकले। उन्होंने मुझसे १०-१२ मिनट बातें कीं कि कहां से आए हैं और कहां जाना है।

वार्तालाप में उन्होंने कहा, “यह इलाका उडुपी ब्राह्मणों का है लेकिन मैं स्वयं जैनी हूं। मैंने संस्कृत पत्रिका के बारे में सुना तो है परंतु उसका कार्यालय कहां पर है यह मैं सोच नहीं पा रहा हूं।”

मैने कहा, “कार्यालय के पते में फेज़ २ दिया गया है। यह कहां हो सकता है यह बता दीजिए। मैं कार्यालय खोज लूंगा।”

कुछ क्षण सोचने के बाद उन सज्जन ने कहा, “मुझे ख्याल आ रहा है कि पत्रिका का कार्यालय राघवेन्द्र स्वामी मठ में है।” फिर हाथ के इशारे के साथ वे बोले, “आप इसी फुटपाथ पर चलते जाइए। आगे मुख्य मार्ग से जो सड़क दाहिनी तरफ़ निकलती है उसी पर एक ओर आपको वह मठ दिख जाएगा। कदाचित् वहीं वह कार्यालय मिलेगा। अन्यथा मठ के लोग अधिक जानकारी दे सकेंगे। अवश्य ही उन्हें मालूम होगा।”

मैंने दवा-विक्रेता को धन्यवाद देते विदा ली और आगे बढ़ गया। किंचित् दूरी चलने के बाद मुझे वह गली मिल गई जिस पर राघवेन्द्र स्वामी मठ बताया गया था। मैं दाहिने मुड़कर दो कदम चला ही था कि स्क्रूटर पर सवार दवा-विक्रेता महोदय अनायास मेरे बगल में आकर रुकते हुए बोले, “आइए, स्कूटर पर बैठिए मैं मठ पर छोड़ देता हूं।”

अप्रत्याशित अपने बगल उन्हें स्कूटर पर देखकर चौंकते हुए मैंने पूछा, “आप भला यहां क्योंकर पहुंच गए?”

वे बोले, “आप जगह खोजने में खामखाह परेशान होंगे, सो मैंने सोचा कि क्यों न मैं ही आपको वहां पहुंचा दूं।”

उनके इतना कहते-कहते हम मठ पर पहुंच गये। मुझे उतार कर वे अधिक कुछ बोले बिना तुरंत लौट गये।

मैं सोचने लगा क्या गजब की दुनिया है यह जहां अजनबी परेशान न होवे इस विचार से कभी-कभी कोई व्यक्ति मदद को दौड़ पड़ता है। ऐसा आम तौर पर होता नहीं, इसलिए कुछ अचरज तो होता ही है। – योगेन्द्र जोशी

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साफ-सफाई की ध्वस्त नागरिक व्यवस्था

 

 

 

 

 

 

 

 

दैनिक जागरण समाचार-पत्र के २१ अगस्त के अंक में वाराणसी की ध्वस्त सफाई व्यवस्था की कुछ तस्वीरें छपी हैं जिनमें से एक यहां प्रस्तुत है। तस्वीरों के पृष्ठ का लिंक पेश कर रहा हूं:

https://epaper.jagran.com/epaper/21-aug-2019-45-varanasi-city-edition-varanasi-city-page-10.html#

      इन तस्वीरों को देख मेरा मन हुआ कि कचरा निबटारे की अपनी निजी व्यवस्था का और साथ ही घर-घर कूड़ा-उठान से जुड़े अनुभव का जिक्र कर डालूं।

वाराणसी में कूड़े-कचरे के निपटारे की कोई कारगर व्यवस्था पहले कभी नहीं थी। लोग सड़क के किनारे रखे गए बड़े-बड़े कूड़ेदानों अथवा खुले में कूड़ा-कचरा डाल देते थे। नगर-निगम की गाड़ी बीच-बीच में आकर उसे उठा लेती थी। 8-10 वर्ष पूर्व घरों से कूड़ा-उठान की नयी योजना आरंभ की गई थी। मेरे मुहल्ले में इस कार्य का जिम्मा “ए-टु-ज़ेड” नाम की संस्था को मिली थी। संस्था को हर घर से 50 रुपये बतौर शुल्क के इकट्ठा करने की जिम्मेदारी भी दी गयी थी। इस योजना में एक समस्या थी। लोग पैसा देने में टालमटोल करते थे।इसी दौरान कार्यदायी संस्था का नगर निगम के साथ विवाद भी पैदा हो गया और उसने कार्य करना बंद कर दिया। तब मैंने कच्चे (गीले) कचरे को सड़ाकर खाद बनाने का रास्ता अपनाया। इस हेतु मैंने अहाते के एक स्थान पर अपने हाथों से ईंट-सीमेंट आदि से एक “कचरा-दान” बना लिया जिसकी तस्वीर यहां प्रस्तुत है।

 

 

 

 

 

 

सूखे के लिए सड़क वाली व्यवस्था ही रहने दी, जो यथावत बनी रही। दरअसल घर-घर से बटोरे गये कूड़े-कचरे को सफाईकर्मी भी सड़क पर ही डालते हैं, जहां से उसे नगर-निगम की कूड़ागाड़ी उठाती है। कूड़ा-कचरा निस्तारण पर पहले भी मैंने अपने ब्लॉग (12 दिसम्बर 2015)  पर लेख लिखा है।

कुछ महिनों के बाद “ए-टु-ज़ेड” कंपनी फिर से काम पर लौट आई। इस संस्था के क्षेत्रीय पर्यवेक्षक ने मुझे आश्वस्त किया कि कार्य सुचारु चलेगा। डेड़-दो वर्ष तक कार्य चलता रहा। एक दिन संस्था का नगर निगम के साथ फिर से मतभेद पैदा हो गये और उसने स्थाई तौर पर शहर से अपना बोरिया-बिस्तर समेट लिया। मैं वापस अपनी निजी व्यवस्था पर लौट आया।

फिर कुछ महीनों के बाद “कियाना सेर्विसेज़ एंड सॉलुशन्ज़” नामक एक नयी संस्था ने कूड़े-कचरे के निस्तारण की जिम्मेदारी ले ली। घरों से कूड़ा-उठान फिर आरंभ हो गया। मैंने उस संस्था की सेवाएं लेना शुरू कर दिया। जो सफाईकर्मी हमारी गली से कूड़ा उठाता था उसका रवैया संतोषप्रद नहीं रहा।  रविवार तो उसे अवकाश मिलता ही था, लेकिन वह अन्य साप्ताहिक दिनों पर भी किसी न किसी बहाने अक्सर गायब हो जाता था। दिक्कत तब होने लगी जब वह  कभी-कभी लगातार चार-छ: दिनों तक गायब हो जाता था। खीजकर मैंने संस्था की सेवा लेना बंद कर दी।

दो-तीन सप्ताह बाद संस्था का स्थानीय पर्यवेक्षक शुल्क (पहले की तरह 50 रुपया प्रतिमाह) वसूलने आया तो मैंने उससे कहा, “इस गली का सफाईकर्मी अपने काम में अनियमितता बरतता है। किसी वाजिब कारण से यदि वह 4-4 6-6 दिनों अनुपस्थित रहे बात सनझ में आती है, लेकिन तब उस अंतराल के लिए अन्य कर्मी को यहां का कार्य सोंपा जाना चाहिए। अगर ऐसा न हो तो फिर आपकी सेवा लेना बेकार है।”

पर्यवेक्षक ने उत्तर दिया, “आपको अब शिकायत का मौका नहीं मिलेगा। हम समुचित व्यवस्था करेंगे। आपको मौजूदा व्यवस्था में सहयोग देना चाहिए। आप ही लोग ऐसे मना करेंगे तो व्यवस्था कैसे चल सकेगी? इसलिए हमारी सेवा लेना बंद मत करें।”

मैंने उसकी बात मान ली। स्वयं मेरा मानना था शहर में कूड़ा-निस्तारण की व्यवस्था होनी चाहिए और नागरिकों ने अपने स्तर पर उसमें सहयोग देना चाहिए। सफाईकर्मी तो वही रहा फिर भी कूड़ा उठाने का कार्य सुचारु चलने लगा। वह कभी-कभार 1 या 2 दिन के लिए गायब हो जाता था, जिसकी हम अनदेखी कर देते थे। आवश्यकता होने पर विकल्पतः अन्य कर्मी भी आ जाया करता था। लेकिन यह सब अधिक समय तक नहीं चल पाया।

बीती होली के दूसरे दिन वह आया और घर से “त्योहारी” मांग ले गया। फिर 8-9 दिनों तक गायब रहने के बाद लौटा। अनुपस्थिति पर हमने नाखुशी जताई तो उसने उल्टे हमसे ही रूखेपन से सवाल किया, “आप बाहर नहीं जाते क्या कभी?”

तब हमने उसे कूड़ा उठाने से मना कर दिया। वह चला गया और हम फिर से अपनी व्यव्स्था पर लौट आए।

मैंने संस्था के स्थानीय कार्यालय को फोन किया, “मुहल्ले की मेरे गली में जिस सफाई-कर्मी की ड्यूटी लगी थी वह हफ्ता-दस-दिन गायब रहा। अब हमने उसे मना कर दिया है। यदि इस गली में मौजूदा सफाईकर्मी ही कार्य करेगा तो उसे कूड़ा नहीं सोंपेंगे।”

मुझे प्रत्युत्तर मिला, “हमारा पर्यवेक्षक आपके से मिलेगा और आपकी समस्या को हल करेगा।”

तब से न पर्यवेक्षक आया और न ही कोई और। हमारी तरफ से जो देय शुल्क था उसे वसूलने भी कोई नहीं आया। हाल यह हैं कि गली में 8-10 मकान हैं। उनमें से 3-4 मकान से ही कूड़ा उठता है; शेष ने अपनी व्यवस्था कर रखी है। बनारस स्मार्टसिटी शायद ऐसे ही बनेगा!

जो होना चाहिए वह होता नहीं। बस जिन्दगी यों ही चलती है। – योगेन्द्र जोशी

 

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वे छोटी-छोटी बातें जिनके बारे में सोचते नहीं लोग

मेरे गृह-परिसर के प्रवेशद्वार पर आकर एक गाय अक्सर लेट जाती थी। अपने शहर वाराणसी में छुट्टा कुत्ते-गाय-सांड़ सड़कों पर इधर-उधर घूमते ही रहते हैं। इतना ही नहीं बंदरों का आतंक भी झेलना पड़ता है। ऐसी ही एक छुट्टा गाय कुछ दिन पहले मुहल्ले की मेरी गली में भूले भटके आ टपकी, और उसने आराम फरमाने के लिए मेरे घर के प्रवेशद्वार को चुन लिया। उसके कारण आने-जाने में असुविधा तो होती ही थी, अलावा उसके वह गोबर-मूत्र की गंदगी भी उस स्थल पर फैला जाती थी। हर रोज घर की खिड़की से बीच-बीच में प्रवेशद्वार की ओर नजर डालना और उसे हटाना हमारा रोज का नियम-सा बन गया। कुछ दिन तक यह सिलसिला चलता रहा और फिर एक दिन उसने अपना ठिकाना बदल दिया। उसने मोहल्ले की दूसरी गली को चुन लिया।

उसके ‘स्थाई’ तौर पर चले जाने के बाद एक सवाल मेरे मन में उठा कि क्या गाय ने यह सोचा होगा कि अमुक जगह छोड़ देनी चाहिए, क्योंकि यहां से उसे बार-बार भगा दिया जाता है? उसने क्या यह सोचा होगा कि मेरी वजह से इन लोगों को परेशानी होती है, इसलिए मुझे कहीं अन्यत्र चले जाना चाहिए? या कुछ और उसके दिमाग में आया होगा? अथवा घटना की वारंवारता से प्रेरित हो उसकी नैसर्गिक सहज वृत्ति ने उसका व्यवहार बदल दिया? पशुओं के प्रशिक्षण में इसी वारंवारता का ही तो महत्व होता है। आम धारणा यही है कि कोई भी पशु सोच-समझकर खास तरीके से व्यवहार नहीं करता, बल्कि वह वारंवारता से वैसा करने के लिए प्रकृतितः ढल जाता है।

क्या पशुओं में सोचने-समझने की क्षमता बिल्कुल नहीं होती है? वैज्ञानिक ऐसा नहीं मानते हैं। शोधकर्ताओं ने पाया है कि जंगलों में रहने वाला गोरिल्ला दरिया पार करते समय उसकी गहराई का अनुमान लगाने के लिए पेड़ की टहनी का इस्तेमाल करता है। वह अलग-अलग जगहों पर टहनी डुबोकर पता लगाता है कि किस स्थल पर दरिया अधिक छिछला है। इसी प्रकार कड़े खोल वाले गिरीदार (खाद्य बीज वाले) फलों को तोड़ने के लिए पत्थर का प्रयोग करते हुए चिंपाजियों को देखा गया है। प्रयोगशाला में किए गए अध्ययनों में वयस्क चिंपाजियों की औसत बुद्धि 2-3 वर्ष के सामान्य बच्चे के बराबर पाई गई है। कौवों पर किए गये अध्ययन भी रोचक पाए गये हैं। ऐसा लगता है कि अत्यल्प मात्रा में ही सही सोचने-समझने जैसी कुछ क्षमता मानवेतर उन्नत पशु-पक्षियों में भी होती है।

 मनुष्यों का एकसमान तरीके से न सोच-समझ पाने की क्षमता का अनुभव मैं लंबे अरसे से करते आ रहा हूं। अर्थात्‍ कुछ लोग वस्तुस्थिति की बारीकी से निरीक्षण करने में समर्थ और उस सामर्थ्य के इस्तेमाल के आदी होते हैं। लेकिन सब इतने सचेत नहीं होते। कदाचित् पशुओं में भी इसी प्रकार का भेद होता होगा ऐसा मेरा मानना है। एक ही प्रजाति के सभी पशु समान प्रशिक्षण के बावजूद एकसमान क्षमता हासिल नहीं करते हैं।

     मनुष्य को बुद्धिमान प्राणी कहा जाता है। कहने को तो वह सोच-समझ सकता है, निर्णय ले सकता है और निर्णय का कार्यान्वयन कर सकता है। पर क्या सभी मनुष्य विभिन्न मुद्दों पर विचार करने की पर्याप्त सामर्थ्य रखते हैं? विचार करने का भाव भी क्या सबके मन में उठता है? मुझे लगता है कि वह भी बहुधा एक पशु या निम्न-स्तर के रोबोट की भांति प्रचलित ढर्रे पर चलता है, आगे-पीछे सोचे बिना और विकल्पों पर विचार किए बिना। मैं अपना मंतव्य एक दृष्टांत से स्पष्ट करता हूं।

     मेरे पड़ोस में एक सज्जन रहते हैं। हाल ही में वे बतौर किराएदार आए हैं। वे घर से बाहर निकलते समय मुख्य द्वार की अर्गला (सिटकनी) बंद करके ताला चढ़ा जाते हैं। ऐसा करते समय वे अर्गला की बेलनाकार छड़ दायें-बांये घुमा-घुमाकर सरकाते हैं। चिकनाहट न होने एवं किंचित जंग लगे होने के कारण छड़ आसानी से नहीं सरक पाती है। फलतः उसकी चूं-चां की कर्कश ध्वनि पड़ोस में हमारे कानों तक पहुंचती है। अवश्य ही उन सज्जन को भी मेहनत करनी पड़ती होगी। हमें वह आवाज खलती है, लेकिन अभी तक परिचय न हो पाने तथा एक प्रकार की हिचक की वजह से हम उन्हें यह सुझाव नहीं दे पाए हैं कि उस पर मोबाइल या ‘ग्रीज’ का लेपन कर लें, ताकि उस पर चिकनाहट आ जाए। सरसों या नारियाल आदि के तेल से भी वे काम चला सकते हैं

    मेरी समस्या उस कर्कश ध्वनि तक सीमित नहीं है। वह आवाज मुझे खलती जरूर है, लेकिन मेरे लिए उससे भी अधिक अहमियत इन सवालों का है कि वह आवाज खुद पड़ोसी सज्जन को क्यों नहीं खलती होगी? और यह भी कि उस पर चिकनाई चढ़ाकर अर्गला बंद करना सरल हो जाएगा यह विचार उनको क्यों नहीं आता होगा? कोई घटना एक-दो बार हो तो उसकी अनदेखी हो सकती है, लेकिन जिसका सामना रोज करना पड़े उस पर तनिक विचार तो होना ही चाहिए न? मुझे लगता है कि कई बातें लोगों के दिमाग में स्वयमेव नहीं आती हैं। यह मानव समाज से जुड़ा एक रोचक तथ्य है। इसे में “विचारशून्यता” कहता हूं।

     मैंने आरंभ में गाय का जो उदाहरण दिया वह अपनी इसी धारणा को व्यक्त करने के लिए है। निःसंदेह मैं स्वयं भी इस तुलना को अतिरंजनायुक्त (अतिशयता वाला) कहूंगा, लेकिन ऐसा अपनी इस बात पर जोर डालने के लिए कर रहा हूं कि सामान्य जीवन में बहुत-से कार्य होते हैं जिनके संदर्भ में “मैं इसे करूं या न?”; “अगर करूं तो कैसे?”; “क्या कोई विकल्प बेहतर होगा?”; “मेरे कार्य से निकटवर्ती लोग प्रभावित तो नहीं होंगे?” जैसे तमाम सवाल मनुष्य होने के नाते हमारे मस्तिष्क में उठने चाहिए। परंतु ऐसा अकसर नहीं होता। मैं उस स्थिति में सोचने लगता हूं कि हमारा व्यवहार पशुओं से एकदम भिन्न सदैव नहीं होता है।

     विचारशून्यता के अनेक उदाहरण रोजमर्रा की जिंदगी में देखने को मिल जाते हैं, जैसे अपना वाहन दूसरे के मकान के प्रवेश द्वार पर खड़ा कर देना, वाहन से चलते हुए पान की पीक पिच्चकर थूक देना, खाते-खाते केले का छिलका सड़क पर फेंक देना, सार्वजनिक पानी-टोंटी से लापरवाही से पानी बहने देना, सड़क पर दुधारू गाय-भेंस बांध के रखना। मेरे शहर वाराणसी में ऐसी बातें आम हैं। – योगेन्द्र जोशी

 

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महाभारत महाकाव्य में मूषक एवं विडाल की अल्पकालिक मित्रता की कथा

मानव समाज में परस्पर के संबंध स्वार्थ पर आधारित रहते हैं। इस तथ्य से जुड़ी मूषक एवं विडाल की अल्पकालिक मित्रता की महभारत की कथा का जिक्र इस चिट्ठे में किया गया है।

निकट भविष्य में देश में लोकसभा चुनाव होने हैं। अपने-अपने हित साधने या अस्तित्व बचाने के लिए राजनैतिक दल मेल-बेमेल गठबंधन बनाने में जुटे हैं। बेमेल गठबंधनों को देखने पर मुझे महाकाव्य महाभारत (शान्ति पर्व, अध्याय १३८) में वर्णित विडाल (बिलाव) एवं मूषक (मूस) की अल्पकालिक मित्रता की एक कथा याद आ रही है। उसी कथा से संबंधित कुछएक नीतिवचनों का उल्लेख यहां पर कर रहा हूं।

संक्षेप में कथा कुछ इस प्रकार है — किसी वन में एक विशाल पेड़ था, जिसके जड़ के पास एक मूस (बड़े आकार का चूहा) बिल बनाकर रहता था। उसी पेड़ पर एक बिलाव (बिल्ला) भी रहा करता था। बिल्ले से बचते हुए मूस बिल के बाहर भोजन की तलाश में निकला करता था।

एक बार एक बहेलिये ने पेड़ के पास जाल बिछा दिया, जंगली जानवरों एवं पक्षियों को फंसाकर कब्जे में लेने के लिए। उसका इरादा दूसरे दिन प्रातः आकर…

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अंग्रेजी छोड़ेंगे नहीं, आम आदमी समझे या न समझे परवाह नहीं

अपना देश भारत, जिसे इंडिया कहना देशवासियों को पसंद है, एक विचित्र देश है विरोधाभासों तथा विडंबनाओं से भरा। भाषा के क्षेत्र में विरोधाभास साफ-साफ झलकता है। एक तरफ भारतीय भाषाओं को सम्मान देने और उन्हें अधिकाधिक अपनाने की बात कही जाती है, दूसरी ओर अंग्रेजी के प्रति अप्रतिम लगाव कोई छोड़ने को तैयार नहीं। इस बात की परवाह कोई नहीं करता कि उसकी अंग्रेजी दूसरों को परेशानी में डाल सकता है। भाषा से जुड़े कल के अपने अनुभव को मैं यहां कथा रूप में प्रस्तुत कर रहा हूं।

मैं कल अपने बैंक की निकट की शाखा में गया। मैं बचत-खाता-पटल (काउंटर) पर पहुंचा। मुझे इंटरनेट के माध्यम से किए गए लेन-देन के असफल होने के कारण के बारे में जानना था। तत्संबंधित असफलता का संदेश मेरे मोबाइल फोन पर प्राप्त हुआ था किंतु उस असफलता का कारण स्पष्ट नहीं था। मैं बैंककर्मी द्वारा पहले से ही किये जा रहे कार्य के पूरा होने की प्रतीक्षा करने लगा। इसी बीच एक युवक उस पटल पर आया। वह अपने मोबाइल पर बैंक द्वारा भेजे गए एक संदेश का मतलब जानना चाहता था। काउंटर के पारदर्शी शीशे के दूसरी तरफ़ बैठे बैंक-कर्मी को संदेश दिखाते हुए उसने पूछा, “जरा देखिए तो मेरे फोन पर यह क्या मैसेज आया है।

अपने अन्य कार्य में व्यस्त बैंक-कर्मी ने कहा, “आप खुद पढ़िए न और मुझे भी सुना दीजिए

युवक ने कहा, “मेरे समझ में नहीं आ रहा है। आप देख दीजिए न

बैंक-कर्मी ने कहा, “ठीक है, पढ़िए क्या लिखा है।

युवक क्षण भर हिचकिचाया और फिर बोला, “दरअसल मैसेज अंग्रेजी में है और इतना पढ़ा-लिखा नहीं हूं मैं।

मैं उस युवक की समस्या समझ गया। बैंक-कर्मी अपने हाथ में आया काम निपटा ले यह सोचकर मैंने उस युवक से कहा, “लाइए अपना मैसेज मुझे दिखाइए।

संदेश सामान्य प्रकार का था, बैंक एटीएम से निकाले गए पैसे के बारे में जानकारी। मैंने युवक को समझाया, “आपने एटीएम से पैसा निकाला था क्या?

उसका जवाब हां में था। आगे मैंने उसको बताया, “ऐसी जानकारी बैंक अपने ग्राहकों को भेजते रहते हैं ताकि वे देख सकें कि किसी और ने तो लेनदेन की धोखाधड़ी तो नहीं की है। ऐसे संदेशों को सावधानी से देख लेना चाहिए ताकि कुछ गड़बड़ होने पर बैंक को सूचित किया जा सके।

उसकी समझ में बात आ गई और वह बैंक शाखा से बाहर चला गया।

मैं सोचने लगा क्या अजीव विडंबना है कि आज भी इस देश में अंग्रेजी और केवल अंग्रेजी का राज चल रहा है। हिन्दी को राजभाषा की “उपाधि” दे तो दी गई, किंतु उसे व्यवहार में लेना सरकारी संस्थानों ने अभी तक नहीं सीखा है। अन्य भारतीय भाषाओं का तो नंबर ही नहीं आने का।

मुश्किल से 15-16% देशवासी होंगे जो अंग्रेजी ठीक से समझ पाते हों। अपने-अपने कार्यालयों के कार्यों की अंग्रेजी उनको समझ में आ जाती होगी, क्योंकि वह एक स्थापित ढर्रे की भाषा होती है। लेकिन उसके परे दूसरे कार्य-क्षेत्रों की अलग प्रकार की भाषा उनको अच्छी तरह समझ में आती होगी इसमें मुझे शंका है। अस्तु।

बैंक जैसी संस्थाओं को तो हिन्दी अथवा क्षेत्रीय भाषा में भी ग्राहकों को संदेश देना ही चाहिए ताकि अंग्रेजी के संदेशों को समझने के लिए दूसरों के पास किसी को न जाना पड़े। वे क्षेत्रीय भाषाओं के इस्तेमाल का दावा तो करते हैं, लेकिन अंकीय (डिजिटल) माध्यम से संदेश-प्रेषण में अभी बहुत पीछे हैं।

ऐसी घटनाओं को देखने पर मुझे गांव में बिताए अपने बचपन के दिन (1960 के आसपास) याद आते हैं जब त्वरित संदेश के लिए “तार” (टेलीग्राम) भेजे जाते थे, जो केवल अंग्रेजी में अंकित रहते थे। तब साक्षरता वैसे ही कम थी और तिस पर अंग्रेजी जानने वाले तो विरले ही होते थे, जिनके पास दूर-दूर से लोग आते थे तार का मज़मून समझने के लिए। – योगेन्द्र जोशी

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बच्चे दो मांगें मां से एकल स्मार्टफोन

हम डिजिटल तकनीकी के युग में जी रहे हैं। और इस युग की सबसे बड़ी खासियत है स्मार्टफोन नामक युक्ति की उपलब्धता। स्मार्टफोनों की कीमत शुरुआती दौर में इतनी अधिक हुआ करती थी कि उसे खरीदने से पहले आदमी दस बार सोचता था। लेकिन जल्दी ही उसके सस्ते लेकिन कारगर मॉडल बाज़ार में आ गए। अब स्थिति यह है कि कई जनों के हाथों में अक्सर एक नहीं दो-दो तीन-तीन स्मार्टफोन भी दिख जाते हैं। इतना ही नहीं, स्मार्टफोन का आकर्षण छोटे बच्चों तक पहुंच चुका है। समाज के मध्यवर्ग में यह भी देखने को मिल रहा है कि जैसे ही नवजात शिशु के हाथ की अंगुलियां कोई भी चीज पकड़ने की सामर्थ्य पा जाते है वह भी मोबाइल से बतौर खिलौना खेलने लगता है। और जब तक वह खड़ा होना सीख पाता है तब तक वह अपने काम के वीडिओ भी देखने लगता है। बच्चों में पनप रहे मोबाइल के प्रति यह लगाव मेरी दृष्टि में जोखिम भरा है। लेकिन कई लोग अपने बच्चे की “स्मार्ट्नेस” से गर्वान्वित अनुभव करते हैं और स्मार्टफोन से उसे दूर रखने की जरूरत नहीं समझते हैं। इस स्थल पर मैं स्मार्टफोन के लाभ-हानि की विवेचना करने का प्रयास नहीं कर रहा हूं, बल्कि उससे जुड़ा एक अनुभव साझा कर रहा हूं।

कुछ दिनों पूर्व मैं पंजाब के शहर लुधियाना से शताब्दी एक्सप्रेस नामक (चेयरकार) रेलगाड़ी द्वारा नई दिल्ली आ रहा था। मैं गाड़ी के डिब्बे में गलियारे से लगी हुई पहली पंक्ति की सीट पर बैठा था और उसी पंक्ति में गलियारे के दूसरी तरफ तीनों सीटों पर दो महिलाएं और दो बच्चे बैठे थे। छोटा ब्च्चा कोई ५ साल का रहा होगा और उससे बड़ी बच्ची, अनुमानतः उसकी बहिन, डेढ़-दो साल बड़ी रही होगी।

बच्चों की मां के पास एक स्मार्टफोन था। गाड़ी के प्रस्थान करने के थोड़ी देर बाद छोटे बच्चे ने अपना मनपसंद वीडियो देखने के लिए मां से स्मार्टफोन हथिया लिया। जब बड़ी बहिन ने देखा कि स्मार्टफोन पर भाई ने कब्जा जमा लिया है तो उसे लगा कि फोन के प्रयोग का अधिकार उसे भी मिलना चाहिए। थोड़ी देर तक उसकी नजर फोन पर चल रहे वीडियो पर बनी रही। उसके हावभावों से लग रहा था कि उसे वह वीडियो उबाऊ लग रहा है। अंततः अधीर होकर उसने बहलाते-फुसलाते हुए भाई से स्मार्टफोन छीन लिया और अपने मन का वीडियो चलाने के लिए उसके ऊपर उंगलिया फेरना शुरू कर दिया। इससे छोटे भाई का रोना-गाना आरंभ होना स्वाभाविक था। मां ने उससे स्मार्टफोन वापस लेकर भाई को सौंप दिया। अब रोने-चीखने की बारी बहिन की थी।

उस मां की समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे दोनों को शांत करे। उसने स्मार्टफोन बच्चों से लेकर अपने पर्स में रख लिया। किंतु ऐसा करना कारगर नहीं रहा। दोनों ने रोना शुरू कर दिया। उसने स्मार्टफोन पर्स से निकालकर एक ऐसा वीडिओ खोजा जो दोनों बच्चों को बहला सके। दोनों ने मिलकर हाथ में फोन लिया और वीडियो देखते हुए शांत हो गए। तब कुछ समय के लिए शान्ति छा सकी।

बच्चों की चीख-पुकार सुनना मुझे अच्छा नहीं लग रहा था। आसपास के यात्रियों की नींद में या उनके पत्र-पत्रिका पढ़ने में उनके रोने-गाने से अवश्य ही खलल पड़ रहा होगा। लेकिन बच्चों की जिद के सामने भला कोई कर भी क्या सकता था? गतंव्य तक पहुंचने का इंतिजार सभी को ही था।

निःसंदेह बच्चों की उस हरकत को देखना कुछ हद तक दिलचस्प भी लग रहा था। मैं सोच रहा था कि स्मार्टफोन किस कदर बच्चों के आकर्षण की चीज बनता जा रहा है। मुझे तो यह सब भविष्य के खतरे की ओर संकेत करता हुआ-सा दिख रहा था। ये बच्चे आने वाले समय में क्या आत्मसंयमी हो सकेंगे? क्या वे एकाग्रचित्त हो पाने की कला सीख पाएंगे? क्या इन युक्तियों पर उपलब्ध होने वाले इलेक्ट्रॉनिक यानी कंप्यूटर खेलों से अपने को अलग रख पाएंगे? इस प्रकार के अनेक प्रश्न मेरे मन में उठने लगे। – योगेन्द्र जोशी

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“न विश्वसेत् अविश्वस्ते …” – पंचतंत्र में वर्णित कौवे एवं चूहे की नीतिकथा

पंचतंत्र के नीतिवचनों पर आधारित अपनी 7 फरवरी 2010 की पोस्ट में मैंने ग्रंथ का संक्षिप्त और एक प्रकार से अधूरा परिचय दिया था। उसके बारे में इस स्थल पर विस्तार से बताना मेरा उद्देश्य नहीं है। फिर भी इतना कहना चाहूंगा कि इसमें व्यावहारिक जीवन से संबंधित सार्थक नीति की तमाम बातें कथाओं के माध्यम से समझाई गयी हैं । इन कथाओं में अधिकतर पात्र मनुष्येतर प्राणी यथा लोमड़ी, शेर, बैल, कौआ आदि हैं। कथाएं आपस में शृंखलाबद्ध तरीके जुड़ी हुई हैं अर्थात्‍ एक कथा में दूसरी कथा और उसमें तीसरी आदि के क्रम से कथाओं का बखान किया गया है। उक्त ग्रंथ पांच खंडों में विभक्त है जिन्हें “तंत्र” पुकारा गया है। ये हैं:

1. मित्रभेदः, 2. मित्रसंप्राप्तिः, 3. काकोलूकीयम्, 4. लब्धप्रणाशम्, एवं 5. अपरीक्षितकारकम् ।

प्रत्येक तंत्र में किसी एक प्रकार की विषयवस्तु लेकर कथाएं रची गई हैं, जैसे मित्रभेदः में वे कथाएं हैं जो दिखाती हैं कि…

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