परपीड़ाजनित आनंदलाभ

आनंदित अनुभव करने के कई मार्ग हैं इस संसार में । कुछ लोग विभिन्न तरीकों से दूसरों की मदद करके सुखानुभूति प्राप्त करते हैं, तो कुछ अन्य औरों को अड़चन या कष्ट में डालकर खुशी महसूस करते हैं । दूसरों को कष्ट में देखकर जो सुख मिलता है उसे अक्सर सादवाद या सैडिज्म् कहा जाता है । शब्द सादवाद को एक फ्रांसीसी लेखक एवं सैनिक, मार्कस द साद, से जोड़ा जाता है, जिसने खुले तौर पर इस विकृत मानसिकता के साथ अश्लील साहित्य लिखा था । हमारे दैनिक जीवन में यदा-कदा सादवाद की घटनाएं घटती रहती हैं । मुझे एक घटना का स्मरण अक्सर हो आता है ।

बात तब की है जब मैं अपने विश्वविद्यालय में अध्यापक के तौर पर नया-नया नियुक्त हुआ था । मेरे संबंध तब वरिष्ठ सहकर्मियों से कम और हमउम्र शोधछात्रों से अधिक थे । शीघ्र ही मेरी अपने विभाग में प्रायः सभी शोधछात्रों से निकट-परिचय अथवा मित्रता हो गयी थी और उनके साथ ही उठना-बैठना अधिक होने लगा था ।

एक बार उनमें से एक मित्र किसी कार्य से रेलवे-स्टेशन के पास गये थे । लौटते समय उन्होंने स्टेशन के पास जाकर लौटने के लिए बस ली और सीधे विश्वविद्यालय में अपने विभाग आ गये । विभाग में प्रवेश करते समय जब उन्हें मेरे बैठने-पढ़ने का कमरा खुला दिखा तो वे सीधे मेरे कमरे में आ गये । मैंने उनसे अपने सामने की कुर्सी पर बैठने का अनुरोध किया और पूछा “क्यों भई, कहां से आ रहे हो इस समय ?” ।

वे कहां और क्यों गये थे यह सब बताने के बाद उन्होंने कहा, “मजा आ गया आज मियां-बीवी के एक जोड़े को बेवकूफ बनाकर ।”

घटना का विवरण जानने की मेरी उत्सुकता देख उन्होंने आगे बताना आरंभ किया, “हुआ ये कि मैं स्टेशन के पास सिटी-बस में बैठ गया । मेरे बाद उस बस में एक दक्षिण-भारतीय प्रौढ़ दम्पती भी दाखिल हुआ । पति-पत्नी का वह जोड़ा मेरी बगल की सीट पर बैठ गये । वे तीर्थयात्री लग रहे थे और हिंदी नहीं समझ पा रहे थे । मुझे देख उन्हें शायद लगा होगा कि मैं अंग्रेजी में उनसे बात कर सकता हूं । उनके पूछने पर मैंने उन्हें बताया कि मैं विश्वविद्यालय जा रहा हूं । तब उन्होंने मुझे बताया कि वे विश्वविद्यालय परिसर के विश्वनाथ मंदिर के दर्शन करने जा रहे हैं । तत्पश्चात् रास्ते में बीच-बीच में उनसे मेरी दो-चार बातें भी हो गयीं । जब हमारी बस विश्वविद्यालय गेट पर पहुंची तो गेट का ढांचा देख उन्हें लगा कि वे विश्वनाथ मंदिर के पास पहुंच गये हैं । उन्होंने मुझसे अंग्रेजी में पूछा कि क्या मंदिर आ गया है । और मैंने हां कहते हुए उन्हें वहीं उतरने की सलाह दे डाली । अब पैदल रूट-मार्च करते हुए जा रहे होंगे वे मंदिर ।”

मैंने टिप्पणी करते हुए कहा कि यह उन्होंने ठीक नहीं किया । दरअसल विशाल परिसर वाले विश्वविद्यालय के प्रवेशद्वार से विश्वनाथ मंदिर करीब दो किलोमीटर होता है । उन दिनों स्टेशन से आने वाली बस मंदिर तक जाती थी और वह दम्पती वहां तक सरलता से पहुंच सकता था । अवश्य ही उन्हें परेशानी हुयी होगी, पर मेरे मित्र को उनकी परेशानी की कल्पना से आनंद मिल रहा था । – योगेन्द्र

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Filed under अनुभव, आपबीती, कहानी, मानव व्यवहार

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