ये हिंदुस्तान है

काशी हिंदू विश्वविद्यालय, जिसे लोग इस नाम से कम और बी.एच.यू. नाम से अधिक जानते हैं, के परिसर में भोलेबाबा विश्वनाथ का मंदिर है । यह मंदिर नगर के पुराने तथा व्यस्त इलाके में अवस्थित तीर्थयात्रियों के श्रद्धा के प्रतीक प्राचीन विश्वनाथ मंदिर से भिन्न है । इस अर्वाचीन मंदिर के मुख्य प्रवेशद्वार के सामने से एक सड़क सीधे विश्वविद्यालय के केंद्रीय कार्यालय के भवन के प्रवेशद्वार तक चली जाती है । वस्तुतः मंदिर और कार्यालय भवन परस्पर आमने-सामने हैं । दोनों के बीच लगभग चार सौ मीटर की दूरी है । इस सड़क की कुल चौड़ाई बीस-एक फुट होगी परंतु इसके बीच की करीब दस फुट की पट्टी ही केवल पक्की है और दोनों ओर का शेष भाग कच्चा परंतु समतल है ।

एक बार मैं मंदिर की ओर से केंद्रीय कार्यालय की ओर उक्त सड़क पर साइकिल से जा रहा था । मैंने देखा कि सात-आठ युवा छात्र मेरे आगे कुछ दूरी पर चले जा रहे हैं । वे सभी एक दूसरे के अगल-बगल सड़क के पक्के हिस्से पर अन्य लोगों के गमनागमन के प्रति बेपरवाह रहते हुए चल रहे थे । मैंने यह भी देखा कि सामने से आ रहे दुपहिया तथा चौपहिया, दोनों प्रकार के, वाहन सड़क के कच्चे हिस्से पर उतर कर उन छात्रों के बगल से निकल जा रहे थे । जैसा कि हम लोगों की आदत है ऐसे मौकों पर कोई सीधे तौर पर शिकायत नहीं करता । अपना काम कैसे निकले इसके आगे कम ही लोग सोचते हैं । उस समय यही हो रहा था ।

पर मैं उपनी आदत से मजबूर था । उन लोगों के समीप पहुंचने पर साइकिल से उतरते हुए मैंने उन्हें सलाह दी कि अच्छा होता यदि वे सड़क का पक्का हिस्सा छोड़ बगल के कच्चे हिस्से पर पैदल चलते ताकि आने-जाने वाले वाहनों को असुविधा न होती । मेरी बात उन लोगों को स्वीकार्य नहीं थी । उनमें से एक तपाक से बोला, “ये हिंदुस्तान है हिंदुस्तान । यहां यह सब चलता है ।” मुझे लगा कि वह आगे कहेगा कि यहां, इस देश में, पैदा होने का फायदा ही क्या यदि हम स्वच्छंद तथा निरंकुश न घूम-फिर सकें । वे लोग पूर्ववत् सड़क घेरे आगे चलते रहे ।

मैंने उनसे अधिक बहस करना मुनासिब नहीं समझा और आगे बढ़ गया । उन्हें शायद इस बात का आभास नहीं हुआ होगा कि मैं विश्वविद्यालय में कार्यरत एक अध्यापक हूं । हो सकता है तब मेरी बात को वे कुछ तवज्जू देते । कम से कम तब अपनी बात इतनी साफगोई से न कहते । पर मुझे पूरा विश्वास है कि तब भी उनका रवैया रहता वही । यही तो खूबी है अपने देश की, बस हमारी मर्जी । – योगेन्द्र

Advertisements

टिप्पणी करे

Filed under अनुभव, आपबीती, कहानी, मानव व्यवहार, लघुकथा

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s