नैनोकार निर्माण की प्रेरणा

जब देश के लब्धप्रतिष्ठ उद्योगपति रतन टाटा ने लखटकिया नैनो-कार बाजार में उतारने का संकल्प लिया और अपनी योजना के कार्यान्वयन की जानकारी समाचार माध्यमों को दी तो सर्वत्र खुशी की लहर दौड़ पड़ी । चारों ओर हर्षमिश्रित आश्चर्य की लहर दौड़ पड़ी थी । कोई भी सहजता से विश्वास नहीं पर पा रहा था, पर हर कोई यह तो मानता ही था कि यह बात एक बड़े तथा सफल उद्योगपति के मुंह से निकली है तो कार तो आनी ही है और वह भी समय पर । यूं तो अब कारों की कीमत वह नहीं रही जो दशकों पहले थी । उनकी उपलब्धता भी अब आम बात हो चुकी है । फिर भी आर्थिक रूप से निचले स्तर के मध्यम वर्ग के लिए बाजार में मिल रहीं कारें खरीद पाना आसान नहीं है । इसलिए कार-निर्माण की उस घोषणा से उनके चेहरे तो खिल ही गये ।

कार की घोषणा के बाद उद्योगपति से साक्षात्कारों का भी सिलसिला चल पड़ा । कब बनेगी कार और कैसे होगी उसकी कीमत कम जैसे तमाम सवाल उनसे पूछे जाने लगे । मैं कह नहीं सकता कि किस समाचारदाता ने उनसे क्या पूछा और उन्होंने क्या जवाब दिया । मैं तो उतना ही जानता हूं जितना टीवी चैनलों ने दिखाया और समाचार-पत्रों ने छापा । किसी अखबार में छपी खबर के अनुसार तब उनसे एक संवाददाता ने पूछा था कि उन्हें ऐसी सस्ती कार बनाने का विचार आया कैसे । उनका जवाब कुछ यूं था, “एक बार मैंने चार जनों के परिवार को स्कूटर पर सवार हो सड़क पर जाते हुए देखा था । तब हल्का पानी बरस रहा था । दो छोटे बच्चों तथा पत्नी के साथ भींगते हुए उस स्कूटर-चालक को वाहन चलाना पड़ रहा था । तब मैंने सोचा कि इस दम्पती की माली हालत इतनी मजबूत नहीं होगी कि बाजार में मिल रही कार खरीद सके । यदि एक निहायत सस्ती कार बेचारे परिवार को मिल सकी होती तो इस बरसात में वह बेफिक्री से जा रहा होता । बस तब क्या था, मैंने ठान लिया इनके जैसों लोगों की पहुंच वाली कार मैं बनाऊंगा ।”

जाहिर है कि ये शब्द मेरे हैं, पर उनमें निहित भाव अखबार के कथनानुसार उद्योगपति के हैं । सुबह के उस हिन्दी अखबार के मुख-पृष्ठ पर एक ओर नैनो-कार की बात और उसके पीछे की प्रेरणा की बात छपी थी, तो दूसरी ओर नगर-समाचार वाले भीतरी पृष्ठ पर मयतस्वीरों के यह भी छपा था कि किस तरह छोटे स्कूली बच्चे नगर के व्यस्त इलाकों में दोपहर के घंटों के जाम में फंसे बिलबिलाते रहे । ऐसे जाम अपने शहर की रोजमर्रा की जिंदगी के हिस्से बन चुके हैं । इस शहर में हर साल इंसानों की तादात ही नहीं बढ़ रही है, बल्कि मोटर-वाहनों की संख्या भी बढ़ रही है । और जब नैनो-कार सड़क पर उतरेगी तब क्या होगा इसकी कल्पना मैं नहीं कर पा रहा हूं ।

मैं स्वयं से पूछता हूं कि यदि कोई कार-निर्माता यहां के जाम में घंटों फंसा रहे तो उसे और क्या करने की प्रेरणा मिलेगी । काश कि इन सड़कों को रबर की भांति खींचकर और चौड़ा किया जा सकता ! – योगेन्द्र

1 टिप्पणी

Filed under अनुभव, कहानी, मानव व्यवहार, लघुकथा, Uncategorized

One response to “नैनोकार निर्माण की प्रेरणा

  1. very nice informative article you are invited to my blog to read my sattires poem etc.

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