तिरुपति में मिला वह याचक

यदि आपको राह चलते कोई व्यक्ति मिले जो आपसे रुपया-पैसा मांगने लगे तो आप उसके बारे में क्या सोचने लगेंगे ? यही न कि यह कोई भिखमंगा होगा जिसने काम-धंधा छोड़ भीख से गुजारा करना सीख लिया है ? पर अगर वह ठीक-ठाक कद-काठी का हो, मैले-कुचैले तथा फटे-पुराने कपड़े न पहने हो और आपसे भीख मांगने की मजबूरी बताने लगे तो आपकी पहली प्रतिक्रिया यही होगी कि यह कोई ठग है जो आपसे बहाने बनाकर रुपया ऐंठना चाहता है । आप उसे दुत्कारते हुए अपनी राह चल देंगे । लेकिन वह सचमुच किसी परेशानी में हो तो क्या करेंगे ? अधिक अहम बात तो यह होगी कि उसकी बात पर विश्वास का आधार कैसे खोजेंगे ? आम तौर पर लोग यही कहकर आगे बढ़ जायेंगे कि इन लोगों का कोई भरोसा नहीं, आजकल धंधा बना रखा है ।

मैं एक बार आंध्र प्रदेश के सुविख्यात नगर तिरुपति गया हुआ था । वहां मैं अपनी पत्नी के साथ एक होटल में ठहरा हुआ था । उस दिन शाम को हम लोग टहलते हुए बस-अड्डे पर पहुंचे जहां से हमें अपने अगले गंतव्य के लिए बसों के आवागमन की जानकारी हासिल करनी थी । जानकारी ले चुकने के बाद हम संबंधित कार्यालय-खिड़की से हटकर बस-अड्डे के परिसर के बाहर आने लगे । दो चार कदम चले ही थे कि हमारा सामना कंधे पर बैग लटकाये हुए एक युवक से हो गया । उस युवक ने रोकते हुए हमसे मदद की मांग कर डाली । पहले उसने बताया कि वह तमिल तथा अंग्रेजी के अलावा अन्य कोई भाषा नहीं जानता, तलुगू भी नहीं जो उस क्षेत्र की भाषा है । अंग्रेजी में बोलते हुए उसने कहा कि उसका बटुआ कहीं गुम हो गया है और उसके पास चेन्नई लौटने के लिए भी पैसा नहीं है । उसके कथनानुसार उसे बस-अड्डे पर मिल रहे लोगों से अपनी बात समझाने में दिक्कत हो रही थी और तब तक कोई उसकी मदद के लिए तैयार भी नहीं हुआ । हममें विश्वास जगाने के लिए उसने यह भी बताया कि वह एक सरकारी मुलाजिम है । उसी प्रक्रिया में उसने अपने आधिकारिक दायित्वों का भी जिक्र कर डाला ।

हम असमंजस की स्थिति में थे । मैंने अपने जन्मस्थान की कुमाऊंनी बोली में पत्नी से पूछा, “क्या करें ? कुछ मदद करें क्या ? समझ नहीं आ रहा है कि बंदा सच बोल रहा है कि झूठ ।”

वे बोली, “कह नहीं सकते । हो सकता है बेचारा वास्तव में परेशानी में हो । … पूछ तो लो कितने पैसों से उसका काम चलेगा । सौ-पचास की बात हो तो सोचा जा सकता है ।”

हमने उससे इस बाबत सवाल किया । उसने सौ रुपये की मांग कर डाली । हम दोनों के लिए उस समय यह हिसाब लगाना कठिन था कि चेन्नई जाने के लिए कितने रुपये काफी होंगे । पत्नी ने तनिक सोचा, अपने बटुए से सौ का नोट निकाला और उसके हाथ में थमा दिये । उसकी ‘थैंक्यू’ को स्वीकारते हुए हम होटल लौट आये ।

रास्ते में आपसी वार्तालाप में हमने इसी बात पर तसल्ली करना ठीक समझा कि यदि वह व्यक्ति परेशानी में था तो हमने उसकी सहायता कर ठीक ही किया । और यदि उसने हमें धोखा दिया तो हमारे लिए सौ के नोट की अहमिसत इतनी नहीं कि उस पर अधिक सोचें । न ही उस पैसे के हाथ से निकल जाने से हमारी यात्रा पर कोई फर्क पड़ता था । हमने स्वीकार किया कि संदेह की स्थिति में मदद करना ही बेहतर था । – योगेन्द्र

8 टिप्पणियाँ

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8 responses to “तिरुपति में मिला वह याचक

  1. मैं भी ९-१० पहिले बंगलोर में था एक बार एक वृद्ध दम्पत्ति सड़क पर मिले और बोले उनके पास एक भी पैसा नहीं है उन्हें केवल २० रुपये चाहिए मैंने भी आपके जैसा सोचा और २० रूपये दे दिए | विजय दशमी पर्व की बहुत बहुत शुभ कामनाऍ |

  2. shobha

    बहुत अच्छा लिखा है. आपका स्वागत है.

  3. आपन सदकर्म किया, यही संतोष होना चाहिए।

  4. जिससे मन में सतोष हो वही कार्य सद्कर्म है अन्यथा जिस कार्य से बैचेनी हो वोह सदैव ही बुरा कार्य है आपने संतोष प्राप्त किया यही सफलता है आपका स्वागत् है
    मेरे ब्लॉग पर पधार कर कविता का आनद लें

  5. Swagat hai…bohot achha likha hai…seedhee saral bhashame…aapka man saaf tha, yahee badee baat hai, use zaroorat thee ya nahee ye uskee soch…!

  6. You are right. The best we can do in such a situation we should do because we are not cheating and ar sure of our motive. Respt we cna leave God Almighty to decide.
    Avtar Meher Baba Ki Jai
    Dr. Chandrajiit Singh
    kvkrewa.blogspot.com
    indinfoodconcept.blogspot.com

  7. amit vishwakarma

    esa hi kuch huva tha mere sath
    hum do dost tirupati ke market me ghum rahe the tabhi ik mahila ne aakar hme kaha ki kya aap ko hindi aati h to hum ne ha kaha uske sath uska ik bacha tha jo lagbhag 5 -6 saal ka tha vo apni baat kehne me hichkicha rahi thi to maine pucha ki aap ki poblum kya h batyiye
    to usne kaha ki vo wardha me rehte h or unke pati kho gaye h hamare paas mob. bhi n h or unhe bhukh lagi thi
    mere frnd ne unhe mana kr diya magar mera man nahi mana or mai ne unhe khana khilaya or vida li
    thodi der baad hum fir venugopal mandir ke gopuram me mile tb unke pati bhi sath the unho me hame paise dene chahe pr maine nahi liye unho ne apna pata hame diya or kaha ki kahi wardha aao to hame jarur milna

    • योगेन्द्र जोशी

      अमित जी, अपने अनुभव को साझा करने के लिए धन्यवाद। ऐसे मामलों में यह दुविधा खड़ी हो जाती है कि अमुक व्यक्ति वास्तव में जरूरतमंद है या धोखा दे रहा है। अगर यह निश्चित हो कि १०० प्रतिशत मामले धोखाधड़ी के होते हैं तो किसी की मदद करने की आवश्यकता नहीं हो। किंतु यह भी हो सकता है कि व्यक्ति वस्तुतः परेशानी में हो। ऐसी संभावना से प्रेरित हुआ जा सकता है। – योगेन्द्र जोशी

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