घाटा नहीं नौकरी से निलंबन में

सालों पहले की घटना है यह । तब मैं अपने परिवार के साथ किराये के मकान में रहता था । मेरे मकान-मालिक एक सरकारी मुलाजिम हुआ करते थे । वे राज्य सरकार के किस महकमे में कार्यरत थे यह मुझे पता नहीं, मैंने कभी उनसे पूछा भी नहीं । पर उनकी बातों से मुझे इतना पता है कि वे बुनकरों से सरोकार रखने वाले विभाग में कार्यरत थे । उनका ओहदा बहुत साधारण था पर वे जिस पद पर थे उसमें अच्छी-खासी आमदनी जरूर हो जाती थी । यह सब उन्हीं के मुख से सुनी हुई बातों के बल पर मैं कह रहा हूं । जोश में आकर वे कभी-कभी खुदबखुद बता देते थे कि कितना-कितना पैसा उन्होंने कहां-कहां से कमाया ।

बाद में मैं किसी और मुहल्ले में अपना मकान बनवाकर रहने लगा । फलतः अपने उन पूर्व मकान-मालिक से मेरा संपर्क टूट गया । फिर भी दो-चार माह में कभी उनसे मेरी मुलाकात हो जाती थी ।

एक बार लंबे अर्से क बाद उनसे मेरी भेंट हुयी तो कुशल-क्षेम की चर्चा के दौरान उन्होंने बताया कि वे कुछ हफ्तों से निलंबित चल रहे हैं । जैसा मुझे मालूम है निलंबन के नियमों के तहत निलंबन-काल में किसी व्यक्ति को अपनी सुविधा के अनुसार, जैसे चाहा वैसे, समय बिताने की छूट नहीं होती है । उसको अपना समय कार्यालय में वैसे ही बिताना होता है जैसे सामान्य नौकरी के दौरान । कार्यालय में उसे निठल्ले बैठना होता है, क्योंकि उस काल में उस व्यक्ति से कार्य नहीं लिया जाता है । लेकिन व्यवहार में इस नियम का पालन किसी भी सरकारी विभाग में नहीं होता और निलंबित व्यक्ति आम तौर पर उन दिनों घर पर बैठ जाता है । निलंबित हो जाने पर कई लोग अपने खाली समय का लाभ भी उठाने से नहीं चूकते । मेरे उन मकान-मालिक ने अपने निलंबन-काल का बुद्धिमत्तापूर्वक उपयोग किया और कुछ कार्य उस बीच कर डाले । मुझे नहीं याद कि उन्होंने उस दौरान कौन-कौन सं कार्य संपन्न किये । एक कार्य का जिक्र उन्होंने अवश्य किया था, और वह था गेहूं पीसने की चक्की का । इससे उनकी आमदनी में कुछ जुड़ जाता था । खैर यहां पर इसके बारे में कुछ अधिक कहने का मेरा इरादा नहीं ।

फिर महीनों बाद उनसे मेरी भेंट शहर के लंका नाम के इलाके में हो गयी । तब मेरी पत्नी भी मेरे साथ थीं । वे उस समय पास के श्री संकटमोचक हनुमान मंदिर से दर्शन-पूर्जन करके आ रहे थे । उनके हाथ में प्रसाद में चढ़ाये गये बेसन के लड्डूओं का डिब्बा था । शिष्टाचार के नाते संपन्न हुए शुरुआती दुआ-सलाम के बाद उन्होंने प्रसाद का डिब्बा खोलकर हमारी ओर बढ़ाया और बोले, “लीजिए भाईसाहब-भाभीजी, संकटमोचन का प्रसाद ग्रहण करें ।” हम दोनों ने एक लड्डू लेकर आधा-आधा स्वीकार किया और उनके हाल-चाल जानना चाहा । बड़े प्रसन्न-हृदय उन्होंने शुभ समाचार सुनाया, “आपको एक खुशखबरी सुनाऊं ? … आपको तो याद ही होगा कि मेरा निलंबन चल रहा था । बस दो-तीन रोज हुए हैं कि मैं नौकरी पर बहाल हो गया हूं । आज शनिबार है न, सो प्रसाद चढ़ाने आ गया । और संयोग से आपके भी दर्शन हो गये ।”

“बड़ी खुशी की बात है यह । इस दौरान आप खामखाह ही परेशान हुए होंगे । चलिये समस्या से छुट्टी मिली ।” अपने चेहरे पर कृत्रिम मुस्कान बिखेरते हुए मैंने टिप्पणी की ।

वे बोले, “अरे परेशानी क्या थी, मैंने तो चक्की का अच्छा कारोबार इस बीच शुरु कर लिया था । निलंबन भी ज्यादा दिन नहीं चलेगा यह मालूम ही था । और सबसे बड़ी बात तो यह है कि मुझे प्रभु संकटमोचन पर पूरा भरोसा जो था कि वे अपनी नैया जरूर पार लगायेंगे ।”

कुछ अन्य औपचारिक बातों के बाद हमने उनसे बिदा ली । रास्ते में मैं यही सोचने लगा कि जब भ्रष्टाचारी को भगवान् भी बचाने को तैयार हों तो सरकारी महकमों को क्या दोष दिया जाये ।- योगेन्द्र

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