मोल-भाव करना इनकी आदत है

मैं अपने घर से निकल पड़ता हूं सब्जीसट्टी तक जाने के लिए । यह सब्जीसट्टी, जिसे आप लघुतर आकार की सब्जीमंडी कह सकते हैं, मेरे घर से तकरीबन तीन सौ मीटर दूर होगी । मैं दो-तीन दिन में एक बार वहां हो आता हूं । वहां पर स्थानीय किसान प्रतिदिन तड़के सुबह अपने खेतों से ताजा सब्जियां लाते हैं । थोक का कारोबार करने वाले व्यापारी कुछ सब्जियां दूर-दराज से मंगवाकर भी वहां बेचते हैं । छोटे-मोटे फुटकर दुकानदार किसानों और थोक-व्यापारियों से खरीदकर सड़क के आसपास अपनी दुकानें सजाकर बैठ जाते हैं अथवा अपने ठेलों पर सब्जियां लादकर पास की गल्ली-मुहल्लों में फेरी पर निकल जाते हैं । पूरा कार्य-व्यापार प्रायः सुबह के पांच-छः बजे से दोपहर तक चलता है ।

मैं अपनी परिचित एक सब्जीवाली के पास पहुंचता हूं । वहां पहले से ही पहुंचे एक सज्जन उससे उलझ रहे हैं । मेरा उन सज्जन से खास परिचय नहीं है । इतना जानता हूं कि अपनी ही कालोनी के किसी कोने में वे भी रहते हैं । मुझे याद नहीं कि कभी उनसे मेरी दुआ-सलाम हुयी हो । वे भी मुझे शक्ल से जानते होंगे ऐसा मेरा अनुमान है, क्योंकि राह चलते एक-दूसरे को हम देखते ही हैं ।

उन दोनों की बातें मैं ध्यान से सुनता हूं । किसी सब्जी की ओर इशारा करते हुए वे सज्जन बोलते हैं, “सब जगह तो ये आठ रुपये किलो बिक रही है, तुम दस रुपये क्यों ले रही हो । आठ रुपये में दो ।”

सब्जीवाली प्रतिवाद करती है, “अरे बाबूजी, इस दाम पर तो हमीं को नहीं पड़ रही है ये । पचास रुपये पसेरी आयी है ये । दो पैसा हमें न मिले तो खायेंगे क्या ?”

वे मिनट पर जिरह करते हैं और फिर बैरंग वहां से चल देते हैं । मेरा मन होता है कि कहूं, “अरे सा’ब, जब सस्ती मिल ही रही है तो यहां से खरीदने की जरूरत ही क्या है ?” किंतु कुछ कहता नहीं, खामखाह झगड़ा मोल लेना मूर्खता जो होगी । मैं भला क्योंकर दखल दूं उनके बीच में ?

उसके यहां से दो-तीन सब्जियां खरीदकर मैं आगे बढ़ जाता हूं । कुछ दूरी पर अपना अमरूद वाला दिखता है । सोचता हूं कि आधा किलो अमरूद ले लूं । बीच की दो-एक दुकानों के चक्कर लगाते हुए उसके निकट पहुंचता हूं । देखता हूं कि वही सज्जन उसके पास खड़े होकर अपने झोले में अमरूद डलवा रहे हैं । मैं उनके बीच लेन-देन संपन्न होने की कुछ क्षण प्रतीक्षा करता हूं । जब वे जा चुकते हैं तो आधा किलो अमरूद फलवाले से लेकर पैसे के बाबत पूछता हूं । वह पांच रुपये मांगता है । मैं चुटकी लेता हूं, “अभी जिन सज्जन ने तुमसे खरीदा उनको तो तुमने आठ रुपये किलो दिये होंगे और मेरे लिए दस का रेट लगा रहे हो ?”

वह कहता है, “अरे नहीं बाबूजी, भला आपसे क्यों अधिक पैसा लेने लगा मैं । आप तो रोज के गाहक हैं और कभी मोल-भाव भी नहीं करते !”

“अच्छा ? ताज्जुब है, इतना देने को वे तैयार हो गये ।”

“अरे बाबूजी आप जानते नहीं होंगे इन्हें । मोल-भाव करना इनकी आदत है । लगता है उसके बिना इनका जी नहीं मानता । जब और गाहक मौजूद रहते हैं तो फिर सही दाम बताना पड़ता है, और वे सुनकर चल देते हैं । लेकिन जब कोई पास नहीं होता, तो हम भी रेट बढ़ाकर बताते हैं और फिर उनकी तसल्ली के लिए घटाते हैं । अभी उनको बारह रुपये किलो कहा तो दस रुपये पर तैयार हो गये । ऐसे तरीके भी कभी-कभार अपनाने पड़ जाते हैं हम लोगों को । क्या करें सभी गाहक एक जैसे नहीं होते हैं न !”

मैं मुस्कराते हुए उसके पास से आगे बढ़ जाता हूं । – योगेन्द्र

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Filed under अनुभव, आपबीती, कहानी, मानव व्यवहार, लघुकथा, Uncategorized

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