पोते की अंग्रेजी से खुश दादाजी

देश की राजधानी दिल्ली में अपने अल्पकालिक प्रवास के बाद मेरे एक मित्र घर लौट आये । एक दिन संयोग से राह चलते जब मेरी भेंट उनसे हुयी तो कुशलक्षेम की औपचारिक बातों के पश्चात् उन्होंने हर्ष और चिंता के मिले-जुले भाव के साथ मुझे बताना आरंभ किया कि प्राथमिक पाठशाला में पढ़ रहा उनका पोता स्कूली पढ़ाई में अव्वल चल रहा है । उन्होंने इतना और जोड़ा कि वह इंग्लिश अच्छी बोल तथा लिख लेता है, किंतु हिन्दी में उसकी प्रगति अच्छी नहीं चल रही है । वह हिन्दी शब्दों का ठीक-ठीक उच्चारण नहीं कर पाता है और देवनागरी में लिखने में उसे कठिनाई होती है । उनकी समस्या के मूल में वह प्रतिष्ठित और खर्चीली शिक्षण संस्था थी जिस में बच्चों को हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं की अनदेखी करते हुए अंग्रेजी में पारंगत करने की हर संभव कोशिश की जाती है । देश में अनेकों ऐसी शिक्षण संस्थाएं हैं जहां बच्चों को प्रकारांतर से भारतीय भाषाओं के ‘घटियापन’ तथा ‘अनुपयोगिता’ का संदेश दिया जाता है ।

पोते की अंग्रेजी को लेकर वे काफी उत्साहित और उसके अच्छे व्यावसायिक भविष्य के प्रति आशान्वित थे । लेकिन हिन्दी को लेकर उन्हें कुछ चिंता भी सता रह थी यह उनकी आवाज और माथे की लकीरों में झलक रहा था । उन्हें आश्वस्त करते हुए मैंने कहा “यह तो बहुत अच्छी बात है । पोता अंग्रेजी का एक्सपर्ट हो जाये तो समस्या की बात ही क्या है ? बड़ा हो जाने पर आम बोलचाल के लिए कामचलाऊ हिन्दी तो यूं ही सीख जायेगा । भला हिन्दी की जरूरत कहां है, और हिंग्लिश तो वह बखूबी बोल ही लेगा । हिन्दी लिखने की जरूरत उसे होगी नहीं, तब देवनागरी में न भी लिख सके तो क्या फर्क पड़ेगा ?”

“आपका कहना सही है । अंग्रेजी के बिना तो अब देश-दुनिया में काम चलता नहीं । आखिर इंटरनैशनल भाषा जो है । फिर भी कहीं-कहीं हिन्दी की जरूरत पड़ ही जाती है । और असल बात तो यह है कि आगे की उच्चतर कक्षाओं के हिन्दी पेपर भी तो उसे पास करने होंगे । तब रिजल्ट गड़बड़ा सकता है । इसलिए सोचते हैं कि कुछ हिन्दी सीख लेता तो ठीक रहता ।” वे प्रत्युत्तर में बोले ।

अपने देश में अपनी मूल भाषाओं की दशा और उन पर अंग्रेजी के वर्चस्व पर हम दोनों के बीच कुछ देर तक विचार-विमर्ष चलता रहा । बाद में मैंने उनसे जिज्ञासावश पूछ डाला कि अंग्रेजी इंटरनैशनल भाषा है इस कथन का वह क्या अर्थ लगाते हैं । उनका उत्तर सुनना मेरे लिए दिलचस्प था । साथ ही मुझे उनकी अज्ञानता पर हैरानी भी हो रही थी । उनका कहना था कि दुनिया के हर कोने में तो अंग्रेजी चल रही है । वैज्ञानिक विषयों के अध्ययन, व्यावसायिक क्रियाकलाप तथा प्रशासन इत्यादि सभी कुछ तो सर्वत्र अंग्रेजी में होने लगा है । उनका सोचना था कि बिना अंग्रेजी के अब किसी भी देश की प्रगति संभव नहीं और उसके बिना कोई व्यक्ति आगे बढ़ भी नहीं सकता ।

अंग्रेजी की ‘अंतरराष्ट्रीयता’ को लेकर उनके मन में व्याप्त भ्रम को मैंने तोड़ने की कोशिश की और कहा, “यह कहना शायद ठीक होगा कि विश्व के प्रमुख देशों में अंग्रेजी एक अतिरिक्त भाषा के रूप में स्वीकारी जा रही है । परंतु वहां के लोगों को यह मान्य नहीं कि अंग्रेजी उनकी भाषाओं को विस्थापित कर उन्हें दोयम दर्जे का बना डाले, जैसा कि अपने यहां है । वहां के लोग अंतरराष्ट्रीय प्रकृति के कार्यों के लिए अंग्रेजी का प्रयोग भले ही करें, अपने घरेलू कामकाज में अपनी ही भाषाएं प्रयोग में लेते हैं और उनका सम्मान करते हैं । चाहे डाक्टरी नुस्खा हो, या उपभोक्ता वस्तुओं के बाबत जानकारी, या सरकारी कामकाज, सर्वत्र उनकी अपनी भाषाएं काम देती हैं ।”

मैंने खड़े-खड़े ही उनको एक छोटा-सा भाषण पिला दिया । मेरी बातें सुनकर वे बोले, “आप कह रहे हैं तो मान लेते हैं । लेकिन अपने यहां तो अंग्रेजी ही चलेगी न ?” और आगे बढ़ गये । मैं सोचने लगा कि क्या कभी अपने लोग अंग्रेजी के भ्रमजाल से बाहर निकल सकेंगे ? – योगेन्द्र

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3 responses to “पोते की अंग्रेजी से खुश दादाजी

  1. आपने एकदम सही बात कही है. हमारे देश के लोगों का बुरी तरह से “ब्रेन वाश” कर दिया गया है. स्वाभिमान नाम की चीज ही नही है.

  2. अब एक और आधार है अंतर्राष्ट्ररीय भाषा को स्वीकारने का कि जो भाषा एक से अधिक देशों में बोली जाय वह अंतर्राष्ट्रीय भाषा कहलायेगी। इस हिसाब से हिन्दी, बांग्ला, अंग्रेजी, चीनी, फ्रेंच, तमिल, भोजपुरी, स्पेनिश, जर्मन, रूसी, अरबी सब अंतर्राष्ट्ररीय भाषाओं में शामिल हो जायेंगी। आक्सफोर्ड की डिक्शनरी के अनुसार इंटरनेशनल का अर्थ है “Connected with or involving two or more countries” और हिन्दी शब्दकोश में अंतर्राष्ट्रीय का अर्थ है “सब या कुछ राष्ट्रों से संबंध रखनेवाला” जैसे मोहन अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में भारत का नेतृत्व कर रहा है”” इस शब्द के लिए पर्याय दिये गये हैं- बहुदेशीय या बहुराष्ट्रीय। इन दोनों हिसाब से अंग्रेजी अगर अंतर्राष्ट्रीय भाषा है तो अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं के नाम पर चलने वाला पक्षपात समाप्त होना चाहिए क्योंकि ऐसी बहुत सी भाषाएं हैं जो दस-बीस-पचास और ज्यादा देशों में भी बोली जाती है। इस हिसाब से हिन्दी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है। अगर कोई भाषा एक से अधिक देशों में बोली जाने के कारण अंतर्राष्ट्रीय है तो दुनिया की कम-से-कम सौ भाषाएं अन्तर्राष्ट्रीय हैं। हिन्दी दुनिया के 137 से ज्यादा देशों में बोली और इस्तेमाल की जाती है। भारत के बाहर 200 से ज्यादा विश्वविद्यालय ऐसे हैं जहां हिन्दी पढ़ायी जाती है। रूस, चेकोस्लोवाकिया, इंग्लैंड, युगोस्लाविया, हंगरी, जर्मनी, बुल्गारिया, रोमानिया आदि देशों में हिन्दी पढ़ाई जाती है। रूस मे तो हिन्दी कई दशकों से है। अकेले अमेरिका में 133 से ज्यादा विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती है। वैसे मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि कोई भी भाषा कितने देशों में पढ़ाई जाती है, इसका कोई खास महत्व नहीं है।
    तुर्की 3-4 देशों में, उज्बेक 4 देशों में, अरबी 33-34 देशों में, भोजपुरी 7 से ज्यादा देशों में, ग्रीक या यूनानी 8 देशों में, फ्रेंच 66 देशों में, रूसी 19 देशों में, स्पेनिश 33 देशों में, चीनी 14 देशों में, जर्मन 11 देशों में, पुर्तगाली 10-11 देशों में, मलय 5-6 देशों में, इटैलियन 10 से ज्यादा देशों में, उर्दू पांच देशों में और इसी प्रकार अन्य बहुत सारी भाषाएं भी तो संसार में बोली जाती हैं फिर अंग्रेजी क्यों रहेगी अंतर्राष्ट्रीय भाषा? यह एक साम्राज्यवादी खेल है। इनमें फ्रेंच 34 से ज्यादा देशों में सरकार की भाषा है। इसी तरह स्पेनिश भी बहुत से देशों की सरकारी या कार्यालयी भाषा है।

    -एक अधूरी किताब से उद्धृत

  3. Why not write Hindi / Urdu in india’s simplest Nuktaa and Shirorekhaa free Gujarati script?

    In the past priestly Sanskrit /Devanagari was not taught to masses why teach it now ?let it be a script for pundits only so they can chant holy verses.

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