किस्सा कदाचार की मानसिकता का

हम हिंदुस्तानी पश्चिम के विकसित देशों के लोगों को भौतिकवादी कहने में तनिक भी नहीं हिचकते हैं, गोया कि हम भौतिकवाद से ऊपर उठे हों । मेरा तो मानना है कि हम भौतिकवाद में उनसे भी आगे हैं, अन्यथा हमारे समाज में इतना भ्रष्टाचार क्यों होता ? ऐसा लगता है कि कदाचार हमारी सामूहिक सोच का एक अभिन्न अंग है और भ्रष्ट आचरण की निंदा हम केवल दिखावे के लिए करते हैं । हम लोगों की सोच में आर्थिक हितों को भ्रष्ट तरीके से साधने की इच्छा कितनी प्रबल रहती है इसका अनुभव मुझे एक बार देश के बाहर ब्रिटेन में भी हुआ था ।

आज से करीब अढ़ाई दशक पहले मैं इंग्लैंड के नगर साउथहैम्पटन में अवस्थित विश्वविद्यालय में उच्चाध्ययन हेतु गया हुआ था । मेरे साथ मेरी धर्मपत्नी तथा दो-चार वर्ष की उम्र वाले दो बच्चों का परिवार भी था । ब्रिटेन समाज-कल्याण वाला एक देश है और तदनुसार वहां पर प्रायः हर व्यक्ति को अपनी आमदनी के अनुसार सामाजिक कल्याण के राष्ट्रीय कोष में आर्थिक योगदान देना होता है । मेरे वेतन से भी नियमानुसार एक अंश की कटौती विश्वविद्यालय द्वारा कर ली जाती थी । ज्ञातव्य तथ्य यह है कि उस काल में वहां प्रचलित नियमों के अनुसार हर परिवार को बच्चों की परवरिश के लिये उक्त कोष से सरकारी अनुदान भी मिला करता था, जो सामान्यतः बच्चों की माता को दिया जाता था, पिता को नहीं । इसके पीछे यह तर्क दिया जाता था कि बच्चों के लालन-पालन का जिम्मा आम तौर पर माता को निभानी होती है, और माता-पिता के तलाक होने पर, जो कि असामान्य घटना नहीं हुआ करती थी, माता के ऊपर ही उनकी जिम्मेदारी आ पड़ती थी । मेरे परिवार को भी बच्चों के नाम पर सरकारी मदद मिलती थी, जो मेरी पत्नी निकटस्थ डाकघर से प्राप्त करती थीं ।

उन्हीं दिनों मेरे हमवतन एक सज्जन भी उसी शिक्षण-संस्था में उच्चानुशीलन के लिए आ पहुंचे । वे लंबे अर्से से विदेशों में अलग-अलग स्थानों पर कार्य कर चुके थे और उस समय वे अमेरिका से वहां आये थे । एक ही विभाग में कार्यरत होने और समान भाषाभाषी होने के कारण हमारे बीच मित्रता स्थापित हो गयी ।

समय बीतता गया और कालांतर में मेरा देश-वापसी का समय आ गया । इसी बीच मेरे वे मित्र भी हमसे भेंट करने पहुंचे । बातचीत के दौरान जब बच्चों के नाम मिलने वाले अनुदान की चर्चा हुयी तो उन्होंने सुझाव दिया कि मेरी पत्नी को चाहिए कि वे डाकघर को खाते में जमा पैसे को बैंक खाते में स्थानांतरण करने के निर्देश दें । उनकी राय थी कि हम डाकघर को इंग्लैंड छोड़ने की बात न बतायें ताकि डाकघर होते हुए बैंक खाते में पैसा जमा होता रहे । बैंक खाता चालू रखें और उसकी चेकबुक अपने साथ भारत लेते जायें । जब तक हो सके अपने भारतीय बैंक में इंग्लैंड से धनांतरण करते रहें । उनका मत था कि यह कुछ समय तक चलता रहे और अंत में पैसे की निकासी बंद होने पर डाकघर तथा बैंक के खाते स्वयमेव निष्क्रिय हो जायेंगे । उनके सुझाव बिना प्रतिवाद के हमने सुन किया और किया वही जो हमें करना था । वहां के अपने शेष बचे दायित्व मैंने पूरे किये और आने से एक दिन पहले अपने बैंक खाते को बंद करवाया । और पत्नी ने भी सप्ताह भर पहले ही अपने डाकघर को ब्रिटेन छोड़ने की सूचना देते हुए निवेदन-पत्र दे दिया कि किस दिन से उनका सरकारी अनुदान बंद किया जाना है । हमारे लौटने की पूरी हो चुकी थी ।

कह नहीं सकता कि वे सज्जन सुझाव देते वक्त गंभीर थे या नहीं । मैं नहीं समझता कि वे मजाक में सब कुछ कह गये हों । पर सोचता हूं कि मजाक में ऐसी बातें व्यक्ति की मानसिकता को प्रतिबिंबित करती हैं । भारत लौटने पर मेरा उनसे संपर्क टूट गया । बाद में उन्होंने अपने वक्त पर क्या किया होगा यह मालूम नहीं । – योगेन्द्र

1 टिप्पणी

Filed under अनुभव, आपबीती, कहानी, किस्सा, मानव व्यवहार, लघुकथा, Uncategorized

One response to “किस्सा कदाचार की मानसिकता का

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s