मुफ्त की नगर बस सेवा

घटना सन्‌ २००६ की है जब मैं अमेरिका में प्रवास में रह रहे अपने बेटे से मिलने कैलिफोर्निया राज्य के एक अपेक्षतया छोटे शहर सांता क्लारा गया हुआ था । उन दिनों वैश्विक तापन अर्थात् ग्लोबल वार्मिंग की बातें चल रही थीं । दुनिया के गैरसरकारी संगठन तथा प्रमुख सरकारें विश्व स्तर पर निरंतर बढ़ रहे औसत तापमान के प्रति चिंता व्यक्त करते हुए उस पर अंकुश लगाने के विविध साधनों पर विचार कर रहे थे । यह तो सभी अनुभव कर रहे थे कि यदि हम अपनी ऊर्जा जरूरतों को कुछ हद तक घटा सकें तो काफी राहत मिल सकती है । पर ऐसा करेगा कौन ?

लोग सार्वजनिक बस सेवा का उपयोग करने लगें अथवा निजी कारों को परस्पर मिल-जुलकर उपयोग में लेना सीखें इस आशय से वहां नये-नये प्रयोग होते रहते हैं । एक ऐसा ही प्रयोग मेरे देखने में भी आया । तब जून का महीना था । शायद तीसरा सप्ताह रहा होगा जब गुरुवार के दिन मेरा बेटा खबर लाया कि अगले दिन, यानी शुक्रवार, नगर की बस सेवा मुफ्त में उपलब्ध रहेगी । अर्थात् आप बिना टिकट का पैसा खर्च किये उस दिन शहर के किसी भी कोने में आ-जा सकते थे । मेरे मन में विचार उठा कि क्यों न हम लोग उस दिन बस से ही कहीं घूम-फिर आयें । इस बहाने वहां की बस सेवा के अनुभव का अतिरिक्त लाभ भी मिल जायेगा यह विश्वास जगा ।

अगले दिन प्रातःकालीन सभी कार्य संपन्न करके हम लोगों ने करीब दस मील (अमेरिका में अभी किलोमीटर नहीं चलता है) दूर के एक मॉल तक जाने का विचार किया । मेरा बेटा रोज की भांति अपने काम पर चला गया । मेरी पुत्रबधू, पत्नी एवं मैं नौ-दस बजे अपने अभियान पर निकल पड़े । हमारे आवास से कुछ ही दूर के एक बस-स्टाप से हमें नगर बस मिल गयी ।
बस सेवा मुफ्त की थी यह प्रायः सभी नगरवासियों को पता होगा । लेकिन उनकी दिलचस्पी को जरा देखें । मेरा अनुमान है कि करीब पच्चीस सीटों वाली उस बस में कुल सात या आठ लोग रहे होंगे । उनमें तीन तो हम (बहू, पत्नी एवं मैं) ही थे । बस में शारीरिक रूप से किंचित् अक्षम और तदनुरूप ‘ह्वीलचेयर’ का उपयोग करने वाली एक उम्रदराज महिला भी थीं । बताता चलूं कि वहां की बसों में ह्वीलचेयर से चलने-उतरने वालों के लिए विशेष प्रबंध रहता है । शेष तीन या चार लोग बतौर यात्री और थे । अगर हम न होते तो केवल चार-पांच जने ही वहां होते । मैंने पाया कि बस में सामान्य दिनों की तरह ही चार-छह यात्री थे — यात्री जो कदाचित् रोज ही बस से आते-जाते हैं । अन्य दिनों सड़कों पर घूमते-फिरते मैंने अगल-बगल से गुजरने वाली बसों को देखा था कि उनमें नगण्य संख्या में यात्री बैठे रहते हैं । उस दिन मुफ्त की बस सेवा के बावजूद स्थिति भिन्न नहीं थी ।

उस दिन के अनुभव के बाद मुझे लगा कि लोगों की संपन्नता के नकारत्मक परिणाम कुछ कम नहीं होते हैं । जब व्यक्ति संपन्न हो और अपने लिए निजी सुख-सुविधा का प्रबंध कर सकने में समर्थ हो तो सार्वजनिक सेवाओं के प्रति उसका आकर्षण भला कैसे हो सकता है । अमेरिका जैसे संपन्न देश में कम ही होते हैं जो निजी कार उपयोग में ले सकने में असमर्थ हों । उस दिन की मुफ्त की बस सेवा का उनके लिए खास महत्त्व नहीं था । गनीमत है वैसे प्रयोग की नौबत अपने देश में कभी नहीं आती, अन्यथा यहां बस के पहिये यात्रियों का वजन देखकर ही बैठ जायें । – योगेन्द्र

1 टिप्पणी

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One response to “मुफ्त की नगर बस सेवा

  1. बहुत ही रोचक संस्मरण है – जो यह सीख भी देता है कि हर तरफ हल्ला मचाने से कुछ नहीं होगा – ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्या से जूझने के लिए ठोस उपाय करने होंगे.

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