स्कूली बच्चे के दो नामः परेशानी अध्यापिका को

मेरी पत्नी एक प्राथमिक पाठशाला यानी प्राइमरी स्कूल में अध्यापिका हैं । वह और उनकी साथी अध्यापिकाओं को कक्षा एक से लेकर पांच तक के छोटे बच्चों को पढ़ाना होता है । उन बच्चों की उम्र आम तौर पर छः से ग्यारह साल के बीच रहती है । उनमें से कई सीधे-सादे और अबोध से रहते हैं, खास तौर पर कक्षा एक-दो के । उनके साथ यदा-कदा दिलचस्प घटनाएं भी घट जाती हैं, जिनके बारे में कभी-कभार मुझे भी सुनने को मिल जाता है । यहां मैं ऐसे ही एक किस्से का जिक्र कर रहा हूं ।

उनके विद्यालय के कक्षा दो में एक बच्चा पढ़ता था जिसे घर में रोहित नाम से पुकारा जाता था । उसके अभिभावकों को पता नहीं क्या सूझा होगा कि उन्होंने विद्यालय में प्रथम प्रवेश के समय उसका नाम आशुतोष रखवा दिया । बच्चे को उन्होंने यह भी ठीक से समझा दिया कि उसका नाम विद्यालय में आशुतोष है । अतः हाजिरी के समय वह नाम पुकारे जाने पर सही उपस्थिति भी दर्ज करा लेता था । उसकी कक्षाध्यापिका भी उसके दोनों नामों से परिचित हो गयी थीं ।

जब बच्चा कक्षा दो में प्रोन्नत हुआ तो उसके घर वालों ने उसकी कापी-किताबों के जिल्द पर सही नाम ही लिखा । पर बाद में कुछ महीनों के बाद जब उसकी एक कापी भर गयी और उसे नई कापी इस्तेमाल करनी पड़ी तो समस्या उठ खड़ी हुयी । उसके माता-पिता ने नई कापी दे दी और साथ में उन्होंने उस पर उसका घर पर प्रचलित नाम रोहित लिख दिया । उनको यह ध्यान ही नहीं रहा कि उसका स्कूली नाम तो आशुतोष है । बहरहाल उसकी कक्षाध्यापिका, जो स्वयं अब कक्षा दो की प्रभारी बन गयी थीं, को इससे खास फर्क नहीं पड़ा । इसलिए कापी-किताबों पर लिखित नाम उन्होंने यथावत चलने लगा । उन्हें ध्यान रहता था कि वह आशुतोष का वैकल्पिक नाम है ।

एक बार वह कक्षाध्यापिका दो-चार दिन की छुट्टी पर चली गयीं । उनके स्थान पर एक अन्य अध्यापिका को अस्थायी दायित्व सोंप दिया गया । उसी दौरान बच्चों के द्वारा किये गये गृहकार्य को जांचने के लिए उन्होंने कापियां इकट्ठा कीं और अगले दिन उनको लौटाने लगीं । उन्होंने एक-एक कर बच्चों का नाम पुकारा और हरएक की कापी लौटा दी । रोहित नाम पुकारे नाम जाने पर कहीं से कोई जवाब उन्हें नहीं मिला । उन्होंने एक-दो बार नाम दोहराया भी लेकिन कोई हांमी भरने वाला नहीं दिखा । और अंत में एक कापी बच गयी ।

उन्होंने फिर उस अकेली कापी को लेकर बच्चों से पूछताछ की । बच्चों के भी उत्तर तरह-तरह के थे । एक ने कहा, “टीचर, वह आज नहीं आया है ।” । किसी दूसरे का जवाब था, “वह तो जुलाई से ही नहीं आ रहा है ।” । कोई और बोल पड़ा, “क्लास में तो रोहित नाम का कोई है ही नहीं ।” किस्म-किस्म के उत्तर और अध्यापिका भ्रमित ।

अंत में अध्यापिका ने बच्चों से पूछा, “क्या कोई ऐसा है जिसे कापी वापस न मिली हो ?”

वह अकेला अबोध-सा बच्चा, आशुतोष उर्फ रोेहित, बोला, “टीचर, मुझे नहीं मिली ।”

“क्या नाम है तुम्हारा ?”

जवाब मिला, “आशुतोष ।”

“पर मेरे पास तो रोहित के नाम की कापी है । तुम्हारा नाम आशुतोष है कि रोहित ?”

अब जाकर उस बच्चे के मुख से निकला, “टीचर, घर में मुझे रोहित कहते हैं ।”

माजरा क्या है यह अध्यापिका के समझ में आ गया । उसने कापी पर बच्चे का स्कूली नाम लिखा और उसके अभिभावकों को आगे सावधानी बरतने की सलाह भेज दी ।

वास्तव में एक से अधिक नाम रखना अपने आप में भ्रामक हो सकता है । पता नहीं क्यों लोग बच्चों को एकाधिक नामों से पुकारते हैं ! – योगेन्द्र

3 टिप्पणियाँ

Filed under अनुभव, आपबीती, कहानी, मानव व्यवहार, लघुकथा, Uncategorized

3 responses to “स्कूली बच्चे के दो नामः परेशानी अध्यापिका को

  1. मतदाता सूची में नाम जोड़ने आए सरकारी कर्मचारियों ने मेरा फार्म (समय बचाने के लिए) पड़ोस में रह रहे रिश्तेदारों से भरवा लिया, उन्होंने घर में प्रचलित नाम से फॉर्म भर दिया, जब सूची में नाम आया तो वह घरेलू नाम से था, न की ऑफिशियल नाम से. अब निर्वाचन अधिकारीयों ने हाथ खड़े कर दिए हैं, रिश्तेदारों और कर्मचारियों की गलती की सज़ा अब मुझे भुगतनी पड़ेगी. या कहें की अपना एक अदद ‘पैट नेम’ होने की सज़ा!

  2. नाम भी समस्या है। जहां खानदान में नाम प्रथम,द्वितीय करके रखे गये उनका क्या होता होगा?

  3. mere khayal se ek se adhik nam rakhne me koi problam nahi hoti hai itna sense to us bachche ke paas bhi hoga ki uske do name hai kyuki vo std 2 me tha i think std 2 ka bachcha itna nasamajh to nahi hoga………….

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