सरकारी नौकरी? न, नहीं करनी!

बात कोई दो दशक पहले की है । तब देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री (स्व. राजीव गांधी) ने कंप्यूटरों और सूचना प्रौद्योगिकी के प्रयोग को बढ़ावा देने की नीति अपनायी थी । फलतः उच्च शिक्षा संस्थानों में तद्विषयक अध्यापन के लिए नये-नये विभाग खोले जाने लगे और देश में डेस्क-टॉप श्रेणी के कंप्यूटरों का बहुतायत में निर्माण कार्य भी आरंभ हो गया, अथवा कुछएक का आयात किया जाने लगा । अध्यापन के लिए कंप्यूटर विज्ञान में डिग्रीधारकों की कमी भौतिकी (फिजिक्स) या गणित जैसे विषयों के अध्यापकों की मदद लेकर पूरी की जाने लगी । उन दिनों मुझ भौतिकी के अध्यापक को भी अपने विश्वविद्यालय (काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी) के नये स्थापित हुए कंप्यूटर विज्ञान विभाग की स्नातक कक्षाओं में अध्यापन का दायित्व सोंपा गया था । मुझे सैद्धांतिक प्रश्नपत्रों के साथ-साथ प्रयोगशाला में भी कार्य करना पड़ा था । तब का एक वाकया मुझे याद है ।

उस दौर में कंप्यूटर विभाग की प्रयोगशाला के लिए डी.सी.एम कंपनी के द्वारा निर्मित आठ-दस माइक्रोकंप्यूटर खरीदे गये थे । आज के डेस्क-टॉपों की तुलना में वे कहीं भी नहीं ठहर सकते थे । लेकिन तब माइक्रोप्रॉसेसर आधारित कंप्यूटरों का विकास शैशवावस्था में था । उनके दाम पैंतालीस-पचास हजार रुपये के लगभग और मेमॉरी (स्मृति) मुश्किल से एक मेगाबाइट और हार्डडिस्क दस-बीस मेगाबाइट; जी हां मेगाबाइट, गिगाबाइट नहीं । कंप्यूटरों के रखरखाव के लिए संबंधित कंप्यूटर कंपनी (डी.सी.एम) को ही ठेके पर जिम्मेदारी सोंपी गयी थी, अतिरिक्त मूल्य चुकाकर ।

कंपनी ने एक युवा ‘फील्ड इंजीनियर’ नियुक्त किया था, जिसके जिम्मे इलाहाबाद में रहते हुए उस क्षेत्र के सभी संस्थानों के कंप्यूटरों के रखरखाव का कार्य था । उसके पिता आयकर विभाग में आयुक्त-उपायुक्त स्तर के अधिकारी थे और इलाहाबाद में तैनात थे । वह उन्हीं के साथ रहता था और नियमित अंतराल पर अथवा सूचित किये जाने पर हमारे विभाग में भी आता था । फलतः हम लोगों की परस्पर मुलाकातें होती रहती थीं । फुरसत के क्षणों में हम लोग थोड़ी बहुत गपशप में मशगूल भी हो जाया करते थे ।

एक बार बातचीत के दौरान उसने मुझे बताया कि उसके पिता उससे नाखुश रहते हैं । मेरे कारण पूछने पर उसने कहा, “वे आयकर विभाग में एक वरिष्ठ अधिकारी हैं और चाहते हैं कि मैं भी उनकी तरह एक सरकारी अधिकारी बनूं, खास तौर पर एक आई.ए.एस. अधिकारी । वे सदा इस बात पर जोर देते रहे कि मैं संबंधित प्रतियोगिता परीक्षा में बैठूं । मेरे मना करने पर वे कहते कि मैं एक बार प्रयास तो करूं, उसे पास तो करूं, भले ही अंत में उस नौकरी को न स्वीकारूं । मैं हर बार मना कर देता । चूंकि मैं उनकी इच्छानुसार नहीं चल रहा था, अतः वे नाखुश रहने लगे ।”

“पर ये तो बतायें कि आपको सरकारी नौकरी, वह भी आई.ए.एस. की नौकरी, से परहेज क्यों था कि उसके लिए प्रयास भी करने को तैयार नहीं थे । इस बात से डरते थे क्या कि प्रतियोगिता में असफल हो जायेंगे ?” मैंने तब पूछा ।

“नहीं डरने की कोई बात नहीं थी । सफल-असफल होना तो जीवन में लगा ही रहता है । दरअसल मेरा कहना था कि जिस राह मुझे जाना नहीं उसके बारे में क्योंकर किसी से पूछूं ? मतलब यह कि मैं सरकारी नौकरी करना नहीं चाहता था । खामखाह मेहनत करना और चुन लिए जाने पर नौकरी छोड़ देना मेरी नजर में मूर्खता होती ।”

“बताया नहीं आपने कि सरकारी नौकरी से आपको परहेज क्यों था ?”

“दो कारण थे । पहला यह कि मैंने मेहनत करके आई.आई.टी., कानपुर से बी.टेक किया । मुझे कंप्यूटरों के साथ काम करना अच्छा लगता है । मैंने जो तकनीकी ज्ञान तथा दक्षता अर्जित किये हैं उनका उपयोग आई.ए.एस. जैसी सरकारी नौकरी में भला क्या हो सकता था ? मेरी यह योग्यता धरी की धरी न रह जाती क्या ? इसके अलावा यह बात भी माने रखती थी कि मैंने उनके सरकारी विभाग के कामकाज को देख रखा है । वहां काम सुस्ती तथा लापरवाही से होता है । कइयों के पास तो खास काम ही नहीं होता । मैं नहीं समझता कि मैं ऐसे माहौल के साथ सामंजस्य बिठा पाता । अपनी काबिलियत लोगों को दिखाने भर के लिए प्रतियोगिता परीक्षा में बैठना क्या जायज समझा जा सकता है ? सोचिये ।”

मुझे उसका उत्तर ठीक लगा । हर व्यक्ति की अपनी अभिरुचियां होती हैं । अवश्य ही सरकारी नौकरी के अपने फायदे होते हैं, अधिकारियों के रुतवे होते हैं, पद से जुड़े तरह-तरह के विशेष लाभ उन्हें प्राप्य रहते हैं, आदि । फिर भी एक कमी वहां प्रायः सदैव देखने को मिलती है, और वह है कार्यसंस्कृति तथा योग्यतानुरूप कार्य करने के अवसरों का अभाव । कुछ लोगों को यह अभाव खलता है । वह इंजीनियर ऐसे जनों में से एक था । – योगेन्द्र

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