बच गयी वह बस दुर्घटनाग्रस्त होने से !

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परसों के हिन्दी दैनिक समाचारपत्र, ‘हिन्दुस्तान’ (वाराणसी संस्करण, १० दि. २००८), के मुखपृष्ठ के शीर्ष पर एक हृदयविदारक दुर्घटना की खबर छपी थी । लिखा था ‘श्रद्धालुओं से भरी बस में आग, ६९ मरे’, और विवरण था कैसे यात्रियों के ठुंसी हुयी एक बस, जिसकी छत पर भी लोग बैठे थे, गंभीर हादसे का शिकार हुयी । दुर्घटना का कारण बताया गया कि तेज गति से चल रही बस का ‘एक्सल’ अचानक टूट गया और उसका पिछला हिस्सा बैठकर सड़क से रगड़ खाने लगा । उसके चलते डीजल की भारी-भरकम टंकी भी टूट गयी और उसमें आग लग गयी । पूरी बस तुरंत ही आग की चपेट में आ गयी । कुछ आहत हुए तो अधिकांश मुत्यु के ग्रास बन गये । उस समाचार को सुनने पर मुझे अनायास अपनी एक बस यात्रा का स्मरण हो आया, जिसके साथ इसी प्रकार की एक दुर्घटना घटित होते-होते बच गयी । पूरी कहानी कुछ इस प्रकार है:

वर्षों पहले में काठगोदाम (उत्तराखंड) से लखनऊ रात्रिकालीन बस से जा रहा था । मेरी बस रात्रि प्रथम प्रहर शायद आठ-नौ बजे गंतव्य के लिए रवाना हुयी होगी । उसे प्रातः करीब पांच बजे लखनऊ पहुंचना था । गरमियों के दिन थे, अतः रात की यात्रा में कष्ट कम होना था, भले ही बस में बैठे-बैठे ही सोने की विवशता थी । उस क्षेत्र की सड़कें लगभग ठीक-ठाक थीं, अतः यात्रा अधिक कष्टकर नहीं थी ।

घड़ी की सुइयों के आगे बढ़ने के साथ समय बीतता गया और यात्रीगण एक-एक कर अपनी-अपनी सीटों पर झपकी लेने लगे । अर्धरात्रि होते-होते प्रायः सभी गहरी नींद में सो गये, जैसा कि उनकी एक ओर निढाल होकर सीटों पर झुकी हुयी गरदनों से लगता था । ड्राइवर ने बस के भीतर की बत्ती बुझा दी थीं । फिर भी बीच-बीच में अगल-बगल से गुजरने वाले वाहनों की हेडलाइटों की रोशनी में भीतर का नजारा दिख जाता था । मैं भी कब सो गया इसका ध्यान मुझे नहीं है ।

अर्धरात्रि के बाद दो-ढाई बजे मेरी नींद अचानक खुल गयी । मैंने चारों ओर देखा । शायद दो-एक जनों को छोड़ सभी निद्रामग्न थे । संयोग से मेरी सीट बस के पिछले पहियों के पास थी । मुझे लगा कि बस में कुछ जलने की सी गंध आ रही है । तब मेरी नींद उचट गयी थी । मेरे मन में सवाल उठा कि कहीं किसी ने बीड़ी या सिगरेट पीकर उसे अधजला फर्श पर तो नहीं फैंक दिया, जिससे किसी चीज ने आग पकड़ ली हो । मैंने अपने स्थान पर खड़े होकर चारों तरफ नजर दौड़ायी । मुझे कहीं किसी चीज के आग पकड़ने के संकेत नहीं दिखे । मैंने बैठकर उस गंध पर गौर किया तो लगा कि वह जलते हुए रबर की सी महक है । सोचा क्या हो सकता है । कहीं बस के टायर के साथ तो कोई समस्या नहीं ! मेरे भीतर का वैज्ञानिक विभिन्न संभावनाओं पर विचार करने लगा । जो भी हो, सबसे पहले तो बस रोकी जानी चाहिए ऐसा मैंने निर्णय लिया । बस की धरघराहट के अतिरिक्त वहां स्तब्धता छायी हुयी थी । ड्राइबर को मैंने जोर से आवाज दी और बस रोकने के लिए कहा । उसने त्वरित गति से बस रोकी । मैंने अपनी सीट पर बैठे ही उसे बताया कि कहीं कुछ जल रहा है । उसने मेरे पास आकर उस विशेष गंध को महसूस किया और बस-कंडक्टर के साथ मिलकर वह बस के भीतर तथा बाहर मुआयने में लग गया । अब तक अन्य यात्री भी जग गये और लगे मामले के बारे में पूछने । कुछ पलों में ही यह ज्ञात हो गया कि मेरे सीट के पास वाले टायर का आलंबन इस बीच टूट चुका था और टायर बस के फर्श के निचली सतह से रगड़ खा रहा था और रगड़ की गरमी से वह जलने तथा धुआं छोड़ रहा था ।

अब बस आगे नहीं बढ़ सकती थी । सभी यात्रियों को नीचे मयसामान उतरना पड़ा । पीछे से आ रही अन्य बसों में किश्तों में यात्रियों की व्यवस्था की गयी । हम लोग किसी प्रकार नजदीक के अगले बस-अड्डे, सीतापुर, पहुंचे । वहां से बाद में सविलंब येनकेन प्रकारेण लखनऊ पहुंच पाये ।

मैं सोचता हूं कि अगर समय पर टायर के जलने का एहसास न हुआ होता तो शायद बड़ा हादसा हो सकता था । उस घटना के बारे में जब भी सोचता हूं यह मैं नहीं समझ पाता कि रगड़ खा रहे टायर ने तो ब्रेक की नाईं काम करना चाहिए था । फलस्वरूप बस अधिक पेट्रॉल खाते हुए भारी चलनी चाहिए थी, जिसका भान ड्राइबर को हो जाना चाहिए था । सवाल है कि क्या ड्राइबर ऐसी संभावना के प्रति बेखबर रहते हैं ? – योगेन्द्र

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