पालनकर्त्री मां का स्थान जन्मदात्री के ऊपर होता है

wishes-for-2009

मेरे शहर वाराणसी से दस-बारह किलोमीटर दूर एक गैरसरकारी संगठन द्वारा संचालित संस्था है, जिसमें उन बच्चों का लालन-पालन होता है जिनके माता-पिता किसी दुर्घटना में दिवंगत हो चुके हों, अथवा जिन्हें उनके मां-बाप ने किसी कारणवश त्याग दिया हो, अथवा जिनके साथ किसी अन्य प्रकार की घटना घटी हो । मैं उस संस्था के नाम का उल्लेख नहीं कर रहा हूं, ताकि जो कुछ यहां लिखा जा रहा है उसे संस्था की कार्यप्रणाली अथवा उसके किसी और पहलू पर टिप्पणी के तौर पर न देखा जा सके । मेरे अनुमान से उस संस्था में संप्रति करीब पौने-दो सौ छोटे-बड़े बालक-बालिकाएं होंगे । वहां उनके पालन का दायित्व महिलाओं के कंधों होता है, जिनमें से प्रत्येक के ऊपर नौ-दस बालक-बालिकाओं के संरक्षण का जिम्मा रहता है । ये महिलाएं स्वयं एक प्रकार से जरूरतमंद होती हैं और परिसर में रहते हुए संस्था के साथ बीस-तीस वर्षों तक कार्य करने को तैयार रहती हैं । इससे अधिक अहम बात यह है कि वे उन बच्चों को अपनी संतान के तौर पर पालने को प्रस्तुत रहती हैं, जिन्हें उन्होंने जन्म नहीं दिया होता है । प्रत्येक महिला अपने इन ‘बच्चों’ के साथ एक ‘घर’ (मकान) में रहती है और उनकी ‘मदर’ कहलाती है; सभी बच्चे आपस में भाई-बहन कहलाते हैं । वहां के नियमों के अनुसार चौदह साल की उम्र पा चुके लड़कों को पास के ही बृहत्तर आवास में पुरुष संरक्षक के अधीन रखा जाता है । प्रत्येक महिला के घर में मूलभूत सुविधाएं मौजूद रहती हैं और वहां के खर्चे-पानी की व्यवस्था संस्था चंदे से प्राप्त धन से करती है ।

मुझे उस संस्था के विषय में थोड़ा-बहुत मालूम था । पिछले कुछ समय से मेरी पत्नी और मुझे वहां की व्यवस्था को और निकट से देखने की इच्छा थी । उस संस्था के साथ कार्य करने वाले एक व्यक्ति से हमारा हाल में परिचय हो गया । उनके सहयोग से हमने वहां जाकर कुछ समय बिताने का कार्यक्रम नववर्ष की पूर्व संध्या, अर्थात् विगत एकतीस दिसंबर, पर बनाया । उस समय अनुभव में आयी बातों पर आधारित है यह विवरण ।

हमारे उस परिचित ने संस्था में रह रहीं दो बालिकाओं को हमारे साथ परिसर से परिचित करवाने के लिए भेज दिया था । उन्होंने हमको संस्था के भवनों, कार्यालयों, तथा कर्मचारी-आवासों आदि के बारे में प्रमुख जानकारियां दीं और बताया कि परिसर में कितनी ‘माताएं’ अपने ‘पाल्यों’ के साथ रहती हैं । नवजात शिशुओं से लेकर वयस्क हो चुके बालक-बालिकाओं के परस्पर कैसे पारिवारिक-से संबंध बनते हैं इसका खुलासा किया । उन्होंने बताया कि जो लोग बड़े होकर नौकरी-पेशे में चले जाते हैं वे कैसे अपने छोटे ‘भाई-बहनों’ के साथ अपने संबंध बनाये रखते हैं । ऐसी कई बातें हमें जानने को मिलीं ।

परिसर भ्रमण के पश्चात् हम एक ‘परिवार’ में पहुंचे, वहां की व्यवस्था का अवलोकन करने । दिसंबर एकतीस का दिन होने के कारण उस समय कई बच्चे घूमने-फिरने ‘घर’ से निकले हुए थे । उस घर की मालकिन यानी ‘मदर’ ने वहां मौजूद चार बच्चों से हमारा परिचय कराया । उनमें दो साल की एक बच्ची भी शामिल थी । वहां उपस्थित एक कर्मचारी ने हमारे कानों में इस तथ्य का उल्लेख भी किया कि कैसे वे उस बच्ची को पैदा होने के कुछ ही घंटों के भीतर अस्पताल से ले आये थे, जब जन्मदात्री मां उसे छोड़कर गायब हो गयी । कर्मचारी ने यह भी बताया कि कई बातें वे बच्चों के सामने इसलिए नहीं करते ताकि उन्हें भावनात्मक ठेस न लगे । उस ‘मदर’ ने बताया कि उसका एक बेटा उस दिनों दूसरे शहर में अवस्थित अपने कार्यालय से छुट्टी लेकर उन लोगों से मिलने आया हुआ है । बातों-बातों में उसने बताया कि वह पिछले चौबीस वर्षों से वहां रह रही है । उसने अपनी एक बेटी के विवाह की चर्चा करते हुये हमें उसके विवाहोपलक्ष्य पर खिंचा फोटो-एल्बम भी दिखा डाला और बड़े गर्व के साथ बताया कि उसकी बेटी के ससुराल वाले संपन्न हैं तथा वह वहां खुश है । उसने इस बात का उल्लेख भी किया कि कैसे उसके बेटी-दामाद उसके प्रति सम्मान रखते हैं, उसका खयाल रखते हैं और यदा-कदा उससे मिलने आते हैं । आरंभ में उसके मुख से बेटा-बेटी जैसे शब्द सुनकर हम चौंके भी थे, फिर अनायास खयाल आया कि वहां पल रहे बच्चे ही तो उसके अपने हो चुके थे । हमने देखा कि वार्तालाप के समय उस महिला की आंखें आंसुओं से नम हो गयी थीं । उसकी भावुकता हमारे मनों को भी छू गयी थी । अपनी ‘पालनकर्त्री’ मां के आसपास चक्कर काट रही और बीच-बीच में उसकी साड़ी के पल्लू से लिपट रही उस छोटी बच्ची की आदतों की बातें भी महिला ने हमें बतायीं । यह देखना हमारे लिए रोचक था कि वह बच्ची वहां मौजूद उस कर्मचारी को बारबार बालसुलभ अंदाज में धमका रही थी कि वह उनकी शिकायत अपनी ‘मां’ से कर देगी । उसका अपनी उस ‘मां’ पर अधिकार जताना वास्तव में प्रभावित करने वाला था ।

कुल मिलाकर उस स्थान पर प्राप्त डेड़-दो घंटे का अनुभव हमारे लिए नया था । हम यह सोचकर गदगद हो रहे थे कि एक महिला छोटी उम्र के बच्चों को अपने से जोड़कर वैसे ही लालन-पालन करे जैसे वे उसके अपने जाये हों यह स्वयं में असामान्य त्याग की भावना मांगता है । हमने मन ही मन उन ‘माताओं’ के प्रति सम्मान अर्पित किया और आशाप्रद यादों के साथ घर लौट आये । – योगेन्द्र

1 टिप्पणी

Filed under अनुभव, आपबीती, कहानी, किस्सा, लघुकथा

One response to “पालनकर्त्री मां का स्थान जन्मदात्री के ऊपर होता है

  1. sahamat hunpalane vali mata ka sthaan sarvopari hai . bahut hi bhavuk post. abhaar.

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