बैंक अधिकारी का कुतर्क: विलंब का औचित्य

अपने देशवासियों की एक विचित्र आदत मुझे सदैव से ही विचलित करती रही है । यह आदत है अपने अनुचित कार्यों को दूसरों के उदाहरण देकर उचित ठहराने की कोशिश करना । मेरे अनुभव में यही आया है कि आम आदमी जिस कार्य को दूसरों के द्वारा किया जाता हुआ देखता है उसे स्वयं करने को अनुचित नहीं समझता है, भले ही वस्तुनिष्ठ तार्किक चिंतन उसकी इस प्रकार की सोच गलत सिद्ध करे । राजनैतिक दल अपनी गलतियों को ढांपने के लिए दूसरे दलों की कमियों के बखान में पूछे गये सवालों के उत्तरों को ही उलझा देते हैं । उनसे इससे अधिक उम्मींद की भी नहीं जा सकती है । विचलित करने वाली बात तो यह है कि प्रशासनिक अधिकारी भी इधर-उधर की अमान्य बातें करके अपने रवैये को सही ठहराने में संकोच नहीं करते हैं । ऐसे ही एक वाकये की याद मुझे आज भी है । वाकया कुछ यूं है:

मैं जिस विश्वविद्यालय में कार्यरत हुआ करता था उसके परिसर में एक राष्ट्रीयकृत बैंक की शाखा है । उन दिनों उक्त संस्था के कर्मचारियों के खाते उसी बैंक में होते थे । मेरा भी एक बचत-खाता उस बैंक में था जिसमें मासिक वेतन आदि नियमतः जमा हुआ करते थे । एक बार उस बैंक में मुझे खाते संबंधी कोई कार्य संपन्न करना था । संयोग से परिसर में ही अवस्थित विश्वविद्यालय स्वास्थ्य केंद्र पर मेरी पत्नी को स्वास्थ्य संबंधी किसी समस्या के बारे में चिकित्सकीय परामर्श भी लेना था । हमने निर्णय लिया कि दोनों कार्य एक साथ ही निबटा लेना सुविधाजनक होगा । अतः स्वास्थ्य केंद्र के दैनिक कार्यारंभ समय को ध्यान में रखते हुए हम प्रातः उपयुक्त समय पर घर से निकल पड़े ।

स्वास्थ्य केंद्र में हमको अधिक समय नहीं लगा । उसके बाद हम बैंक शाखा की ओर चल पड़े । करीब साड़े-दस बजे हम उस स्थान पर पहुंच गये । जैसा कि आम तौर पर प्रचलन में है अधिकांश बैंकों की शाखाएं पूर्वाह्न दस बजे अपना कार्य आंरभ कर देती हैं । नियमानुसार उस शाखा को भी दस बजे अपना दैनिक कार्य आरंभ कर देना चाहिए था । मेरे विश्वविद्यालय के विभिन्न कार्यालयों के खुलने का समय आम तौर पर साड़े-दस बजे होता था । (शायद विलंब की वह परंपरा आज भी चल रही है ।) चूंकि उस बैंक शाखा का लगभग पूरा व्यावसायिक कारोबार विश्वविद्यालय पर ही निर्भर करता था, अतः साड़े-दस ग्यारह बजे से पूर्व वहां विशेष सक्रियता नहीं रहती थी । उस समय इक्के-दुक्के लोग ही नजर आते थे और असली कार्य उक्त समय के बाद ही चलने लगता था । दुर्भाग्य से उस स्थिति का लाभ उठाने की प्रवृत्ति वहां के कर्मचारियों में पनप चुकी थी, और वे जानबूझ कर आराम से ग्यारह-ग्यारह बजे तक अपने उस कार्यालय में पहुंचते थे । इसके फलस्वरूप कार्यालय खुलने के आंरभ के कुछ समय तक वहां के ग्राहक-पटलों (कस्टमर-काउंटर्स) पर कर्मचारियों के दर्शन नहीं हो पाते थे ।

उस दिन भी उक्त कार्यालय में हमारे पहुंचते समय सन्नाटा-सा छाया था । वहां के आठ-दस पटलों में से शायद ही एक-दो पर कोई कर्मचारी मौजूद रहा हो । हमें जिस पटल पर कार्य था वहां कोई नहीं था । हमने चार-पांच मिनट तक इंतजार भी किया । जब हमें लगा कि अभी किसी की भी उम्मींद नहीं है, तब हम शाखा के शीर्षस्थ अधिकारी, शाखा प्रबंधक, के पास पहुंचे शिकायत करने । मैंने उनसे कहा, “महोदय, इस समय पौने-ग्यारह बजने को हैं । बैंक का समय दस बजे है, लेकिन अभी तक काउंटर्स पर लोग पहुंचे नहीं हैं । हम यहां यह सोचकर पहुंचे हैं कि अब तक काउंटर्स अवश्य ही खुल चुके होंगे ।”

मैं आगे कुछ और कहता इसके पहले ही वे बोल पड़े, “कहिये, क्या काम है आपका ?”

मैंने उनके सवाल का उत्तर देते हुए अपनी शिकायत दर्ज करने की कोशिश की, “काम तो मेरा काउंटर पर ही था और वह अभी नहीं तो थोड़ी देर में हो ही जायेगा । दरअसल मैं तो आपके पास अपना काम करवाने के लिए नहीं आया हूं । मेरी आपत्ति तो यह है कि बैंक का कामकाज शुरू होने में इतना विलंब नहीं होना चाहिए । आपको देखना चाहिए कि कर्मचारी समय पर आवें और ग्राहक-सेवा आंरभ कर दें ।”

सही बात यह थी कि वे मेरी बात को सुनें और उसे तवज्जू देते हुए कुछ कदम उठावें । मैं यह मानता हूं कि यदि लोग ऐसे अवसरों पर शालीनता से अपनी बातें संबंधित अधिकारियों के समक्ष रखें तो अवश्य ही कार्यसंस्कृति में सुधार लाया जा सकता है । दुर्भाग्य से हम भारतीयों की आदत यह है कि हम शिकायतों की व्यापकता को ध्यान में रखते हुए सक्षम अधिकारी के पास नहीं पहुंचते हैं, बल्कि अपनी वैयक्तिक शिकायत के निराकरण से संतुष्ट होकर लौट आते हैं । इस रवैये से व्यापक स्तर के सुधार की आशा नहीं की जा सकती है । मैंने अपने इन विचारों को ध्यान में रखते हुए ही अपनी बात कही थी ।

मेरे लिए यह देखना रोचक तथा साथ ही निराशाप्रद था कि उन महोदय ने मेरी बात के प्रति सही भावना व्यक्त करने के बजाय उल्टा मुझसे पूछ डाला, “आपका केंद्रीय कार्यालय कब खुलता है ? और वहां के कर्मचारी क्या समय पर अपने-अपने स्थान पर बैठ जाते हैं ?”

मेरे लिए उनके सवाल का उत्तर दे पाना आसान नहीं था, क्योंकि वहां के हालात भी कोई अच्छे नहीं थे । मैंने कहा, “जी, वह तो साड़े-दस बजे तक खुलता है । मैं जानता हूं कि वहां भी लोग विलंब से आते हैं, ग्यारह-सवाग्यारह तक । मैं जब कभी वहां जाता हूं और ऐसे ही हालात देखता हूं तो वहां भी शिकायत करने से नहीं चूकता । हां, इतना अवश्य कहूंगा …”

मेरी पूरी बात सुनने से पहले ही वे बोल पड़े, गोया कि उन्होंने अपने बचाव का कोई अचूक तर्क खोज लिया हो, “जब आपके विश्वविद्यालय के कर्मचारी विलंब से आने का लाभ उठा रहे हों तो हमारे कर्मचारी ही समय पर क्यों आयें ?

हमारे लिए उनकी बात चौंकाने वाली थी । हम उनके मुख से ऐसा (कु)तर्क सुनने के लिए तैयार नहीं थे । हम सोचते थे कि वे शिष्ट तरीके से किसी न किसी प्रकार की समस्या या विवशता का उल्लेख करते हुए अपनी सफाई पेश करेंगे । मैं वस्तुतः निरुत्तर था, फिर भी इतना तो कहा ही, “माफ कीजियेगा, मेरा नियंत्रण न तो आपके कर्मचारियों पर है और न ही अपने विश्वविद्यलय के कर्मियों पर । मैं तो संबंधित अधिकारी के सामने सुधार की बात कर सकता हूं । यदि अधिकारी अवांछित माहौल के पक्ष में ही तर्क गढ़ने लगे, तो मुझे चुपचाप बाहर चला जाना चाहिए ।”

और हम वहां से ठगे-से लौटकर वापस काउंटर पर इंतजार करने लगे । – योगेन्द्र

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Filed under अनुभव, आपबीती, कहानी, किस्सा, प्रशासन, मानव व्यवहार, लघुकथा

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