अपराधी कौन? – किस्सा जुड़वां भाइयों का

कभी-कभी दिलचस्प किस्से-कहानियां अखबारों के माध्यम से पढ़ने-सुनने को मिल जाती हैं । ऐसा ही एक वाकये के बारे में मुझे पढ़ने को मिला । चंद रोज पहले अपनी दक्षिण-भारत यात्रा से लौटते समय मार्ग में मैंने एक दैनिक समाचारपत्र खरीदा, जिसमें मुझे एक रोचक वार्ता पढ़ने को मिली । मैं अखबारों में छपी बातों को अक्षरशः सही नहीं मानता, फिर भी यह समझता हूं कि छपी खबर का कुछ तो सही आधार होगा ही, भले ही उसका प्रस्तुतिकरण अतिरंजित हो ।

उस वाकये की बात करने से पहले इस तथ्य की ओर पाठकों का ध्यान खींचना प्रासंगिक होगा कि जुड़वां बच्चे दो प्रकार के हो सकते हैं । पहला वे जो एक साथ गर्भ में पलकर पैदा होते हैं और दैहिक दृष्टि से परस्पर प्रायः उतने ही हमशक्ल होते हैं जितना कोई दो सहोदर-सहोदरा हो सकते हैं । ऐसे बच्चों के व्यक्तित्व में भी कोई उल्लेखनीय समानता नहीं पायी जाती है । उनके मध्य का भेद जीवनपर्यंत बना रहता है । दूसरे वे जुड़वां बच्चे होते हैं जो करीब-करीब पूरी तरह हमशक्ल होते हैं । उनमें दैहिक साम्य तो होता ही है, उसके साथ ही उनके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं में भी पर्याप्त समानता देखने को मिलती है । ऐसे बच्चों को पहचानने के लिए उनके माता-पिता कोई न कोई अंतर सामान्यतः ढूढ़ ही लेते हैं, फिर भी वे स्वयं कभी-कभी धोखा खा जाते हैं । जीवविज्ञानियों के मतानुसार ऐसे जुड़वां बच्चों का मूल एक ही निषेचित स्त्री-डिंब होता है, जो कि संयोग से द्वि- अथवा बहु-भाजित हो जाता है और फलतः एकाधिक भ्रूणों का विकास गर्भ में होता है । इसके विपरीत असमान जुड़वां बच्चों में मामले में एक से अधिक डिंब गर्भ में एक साथ संयोग से उपलब्ध होते हैं और स्वतंत्र रूप से निषेचित होकर भ्रूण रूप में विकसित होते हैं । स्त्री-गर्भ को प्रति माह सामान्यतः एक ही डिंब प्राप्त होता है ।

यह किस्सा हमशक्ल जुड़वां भाइयों से जुड़ा है । कुछ वर्ष पहले मलेशिया की राजधानी क्वालालंपुर में एक व्यक्ति को पुलिस ने सौ किलो से अधिक मादक पदार्थों के साथ उसके घर के पास से पकड़ा । उसके पास घर की चाबी नहीं थी । कुछ ही मिनटों में उसका जुड़वां भाई भी घर पहुंच गया, जिसके पास घर की चाबी थी । पुलिस ने उसे भी इस आरोप के साथ पकड़ लिया कि जिस घर से मादक पदार्थों का धंधा होता है उसकी चाबी तो उसी के पास थी । लिहाजा दोनों पुलिस हिरासत में आ गये ।

दोनों पर न्यायालय में मुकदमा चला । किंतु न्यायालय को यह बता पाने में पुलिस असफल रही कि किस भाई को वास्तव में अफीम-गांजा के साथ पकड़ा गया था और किसको केवल संदेह के आधार पर हिरासत में लिया गया । एक के विरुद्ध साक्ष थे, परंतु दूसरे पर केवल संदेह जताया गया । चूंकि दोनों भाई हमशक्ल थे, पुलिस यह बताने में असमर्थ हो गयी कि उनमें से असली अपराधी कौन है । महिला न्यायाधीश के लिए यह निर्णय कर पाना संभव नहीं था कि केवल किसी एक को ही संदेह का लाभ दिया जा सके । फलस्वरूप हमशक्ल होने के कारण मादक द्रव्य के धंधे में लगे असली अपराधी भाई, उनमें से जा भी रहा हो, को भी संभावित सजा से मुक्ति मिल गयी । हो सकता है कि दोनों भाई उस धंधे में शरीक रहे हों, परंतु उस समय तो केवल एक ही मादक द्रव्यों के साथ पकड़ा गया था । न्यायिक व्यवस्था की मजबूरी देखिये कि उसे पुख्ता सबूतों के अभाव में अपराधियों को मुक्त करना पड़ता है । न्यायालयों में देर ही नहीं अंधेर भी कम नहीं होता ! – योगेन्द्र

टिप्पणी करे

Filed under अनुभव, कहानी, किस्सा, लघुकथा, Uncategorized

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s