चेन्नै में मदद मांगता मिला एक परिवार

मेरा एक सवाल है: अगर आपको राह चलते कोई व्यक्ति मिल जाये जो आपसे किसी प्रकार की मदद मांगने लगे, तब आप क्या करेंगे ? आप कहेंगे कि इसका उत्तर तो इस पर निर्भर करेगा कि वह किस प्रकार की मदद मांगता है, और यह भी कि वह मदद आपकी सामर्थ्य में है कि नहीं । मान लीजिए कि मांगी जा रही मदद आपकी सामर्थ्य में है, जैसे कि वह आपसे सौ-पचास रुपये की मांग करे । ऐसे मौके पर यह संभव है कि आप मदद करने से बच निकलें, यह कहकर कि लोग काम-धाम तो कुछ करते नहीं बस मांगकर खाने की आदत पाल लेते हैं । परंतु क्या ऐसा हर मामले में होता होगा ? क्या ऐसा नहीं हो सकता है कि उस व्यक्ति को सच में मदद की दरकार हो ? मैं उन लोगों को भाग्यशाली मानता हूं जिनकी संवेदना ऐसे अवसरों पर सुप्त रह सकती है, और जो बिना विचलित हुए अपनी राह आगे बढ़ सकते हैं । यदि आपकी संवेदना जाग गयी तब आप मदद के लिए हाथ तो बढ़ा देंगे, लेकिन उस व्यक्ति की ईमानदारी के प्रति आपके मन में शंका अवश्य उठ सकती है । यह भी हो सकता है कि बाद में कुछ ऐसे संकेत आपको मिलें जिनसे उस शंका को बल मिले । ऐसा ही एक अनुभव मुझे हाल की दक्षिण भारत यात्रा में मिला था, जिसका उल्लेख आगे कर रहा हूं ।

मैं अपने अन्य तीन पारिवारिक सदस्यों के साथ चेन्नै, रामेश्वरम्, कन्याकुमारी, तथा मदुरै के पर्यटन पर निकला था । उसी दौरान एक दिन चेन्नै रुककर हम लोग नगर के बाहर के पर्यटक-स्थलों का बस द्वारा दर्शन करने निकले । लौटते-लौटते हम लोगों को रात्रि के साड़े-नौ बज गये । हम चेन्नै सेंट्रल स्टेशन से कुछ ही दूर होटल में ठहरे हुए थे । उसी के पास बस से उतरकर निकट के एक भोजनालय में हम पेटपूजा के लिए दाखिल हो गये । भोजन के बाद मेरे तीनों साथी वहीं काफी पीने के लिए रुक गये, लेकिन मैं स्वयं नजदीक की चाय-दूध की एक दुकान पर गर्म दूध का आस्वादन करने निकल गया । काफी पीने में मेरे साथियों को कुछ अधिक ही विलंब लग गया, अतः मैं दूध पी चुकने पर वापस उस भोजनालय की ओर चल दिया । मैं दो-तीन कदम आगे बढ़ा ही था कि एक नौजवान मेरे सामने आ टपका और कहने लगा, “आप मराठी जानते हैं क्या ?”

मेरे लिए वह सवाल अप्रत्याशित एवं अटपटा था । मैंने उत्तर दिया, “नहीं, मैं नहीं जानता । मैं हिन्दी बोलता हूं । कहिए क्या बात है ?”

उस व्यक्ति के साथ एक कम-उम्र युवती और पांच-एक साल का एक बच्चा थे । उसने मुझे बताया कि वह महाराष्ट्र के अकोला जिले का रहने वाला है और अपनी पत्नी तथा बच्चे के साथ कन्याकुमारी दर्शन के लिए घर से निकला है । उसने यह भी कहा कि गाड़ी में किसी ने उसका बैग, जिसमें रुपये-पैसे भी थे, गायब कर दिया है । उसके पास किसी प्रकार घर वापस लौटने के अलावा कोई चारा न था, लेकिन उसके लिए अब उसके पास पैसे नहीं थे । वह कुछ मदद चाहता था । उसने बताया कि नागपुर तक रेलगाड़ी से लौटने के लिए उसे करीब पांच सौ रुपये की जरूरत होगी । उसके कथनानुसार किसी सज्जन ने स्टेशन पर दोपहर के समय उन तीनों को चावल खिलाये थे और किसी और ने उसे पचास के एक नोट से सहायता भी की थी ।

उस समय रात के लगभग साड़े-दस बज रहे थे । उसके साथ का वह बच्चा ऊंघ रहा था । युवती भी थकी-मांदी-सी लग रही थी । मेरे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या जवाब दूं । मेरे जेब में बटुआ जरूर था और उसमें कुछ रुपये भी थे । फिर भी मैंने टालने के इरादे से कह दिया, “लेकिन मेरे पास तो इस समय पैसे नहीं हैं । मेरी पत्नी के पास हैं जो कुछ दूरी पर होटल में खाना खा रहीं हैं ।”

मेरी बात सुनकर वह निराश हुआ और आगे बढ़ गया उसी ओर जहां मेरे साथ के अन्य तीनों जने काफी पी रहे थे । कुछ क्षण के बाद मुझे लगा कि उसकी कुछ मदद तो कर ही देनी चाहिए थी । लेकिन मैं झूठ बोल चुका था कि मेरे पास पैसे नहीं हैं, अतः तब सीधे मदद करने में प्रतिष्ठा का सवाल पैदा जाता । मैं तेजी से आगे बढ़ा, उसके बराबर में पहुंचा और उसे होटल के बाहर रोक लिया । संयोग से तभी मेरी पत्नी तथा अन्य दोनों साथी भी बाहर आ गये थे । मैंने उस व्यक्ति की समस्या उन्हें बतायी । कुछ देर तक परस्पर सलाह-मशविरा किया । यह तो हम मान ही रहे थे कि उसकी मदद करना हमारी सामर्थ्य में था, किंतु मामले की सत्यता पर आश्वस्त नहीं हो पा रहे थे । काफी सोच-विचार के बाद हमने उसकी मदद का फैसला ले लिया, खासकर उस बच्चे और युवती पर तरस खाते हुए । हमने उसे तीन सौ रुपया दिया और कहा कि हमारी ही तरह कुछ और लोगों से उसे मदद मिल जायेगी और वह घर जा सकेगा । उसे मैंने एक ब्रेड भी खरीदकर विदा किया ।

मेरे मन में एक बार विचार आया था कि क्यों न पैसे के बदले गाड़ी का खरीदकर मैं उसकी मदद कर दूं । पर रात के करीब ग्यारह बजने और दिन भर की थकान के कारण मैंने ऐसा नहीं किया ।

अस्तु, उसका मामला झूठा नहीं होगा इस विचार के साथ मैंने उस घटना पर अधिक सोचने की जरूरत नहीं समझी । लेकिन अगले दिन कुछ ऐसा हुआ कि जिसने मुझे संशय में डाल दिया । हुआ यह कि अगले दिन हमें चेन्नै से लौटना था । हम अपने होटल से दो-तीन घंटा पहले ही स्टेशन पर पहुंचकर अपनी गाड़ी के छूटने की प्रतीक्षा करने लगे । इसी दौरान वाराणसी तक की अपनी दो रात की यात्रा के लिए मैं फल, बिस्किट, नमकीन आदि खाद्य वस्तुएं खरीदने नजदीक की दुकानों पर चला गया । लौटते समय स्टेशन परिसर में मेरे पास एक नौजवान पहुंचा और बोला, “आप मराठी माणूस हैं क्या ?”

मैंने ‘नहीं’ कहा और उससे कुछ और बोले बिना तेजी से प्रतीक्षालय की ओर बढ़ गया । उस समय मुझे पिछली रात की घटना याद आ गयी । क्योंकर उसने मुझसे मराठी होने की बात पूछी ? मैंने सोचा अवश्य ही यह भी कुछ मांगना चाहता था । तो क्या यह महज एक संयोग था कि परेशानी में फंसा एक और व्यक्ति मेरे पास पहुंचा ? अथवा कहीं इस प्रकार मांगने वालों का कोई गिरोह यहां कार्यरत तो नहीं ? तरह-तरह के सवाल मेरे मन में उठने लगे । मुझे लगने लगा कि विगत रात्रि मेरे साथ धोख हुआ । मैंने यह अनुभव अपने तक ही सीमित रख लिया और उसका जिक्र साथियों से यह सोचकर नहीं किया कि उनके मन में भी धोखा खा चुकने का भाव खामखाह उठेगा । – योगेन्द्र

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3 टिप्पणियाँ

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3 responses to “चेन्नै में मदद मांगता मिला एक परिवार

  1. यही गिरोह मुझे मध्यप्रदेश के विभिन्न शहरों में मिल चुका है. पहले परिवार को मन किया तो मन में थोडा अपराधबोध सा था, फिर अगले मोड़ पर दूसरा फिर तीसरा परिवार मिला; और फिर कुछ अन्य शहरों में मैंने इसे देखा.

  2. अनिल

    मुझे भी हैदराबाद में एक ऐसा परिवार मिल चुका है. बेहतर यही होगा अगर
    दया भाव आ भी जाए और मन में संशय हो की याचक जरूरतमंद है या नहीं,
    तो केवल उस समय के भोजन का प्रबंध करा के किसी भी बोध से मुक्त हुआ जाए.
    मानवीय संवेदनाओं की आड़ में धोखाधडी आम बात हो चली है .

    • योगेन्द्र जोशी

      धन्यवाद, अनिलजी । ऐसे अवसरों पर ‘क्या करें?’ का उत्तर हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग रहता है । कई जन संबंधित व्यक्ति को ‘चले आते हैं मांगने, काम-धंधा कुछ करते नहीं …’ कहते हुए बुरी तरह दुत्कार देते हैं, तो कुछ लोग जो बन पड़ा कर देते हैं । मामला अपनी-अपनी सोच का है, और उस विशेष मौके पर आपके मन में क्या विचार आता है इस पर निर्भर करता है । हो सकता है आप अपने ही कदम को बाद में मूर्खतापूर्ण समझें । – योगेन्द्र जोशी

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