जातिबोध: समाज का एक सच यह भी

एक बार अपने प्रातःकालीन वार्तापत्र में मुझे बुद्धिजीवियों की किसी गोष्ठी के बारे में समाचार पढ़ने को मिला (हिंदुस्तान, 10 अगस्त, 2008) ।  गोष्ठी में जातीयता की प्रथा की  आलोचना करते हुए यह मत व्यक्त किया गया था कि लोगों को अपने नामों में जातिबोधक अंश का प्रयोग बंद करना चाहिए । सुझाव से सहमत होने या न होने का मेरी दृष्टि में खास महत्त्व नहीं था । महत्त्व इस बात का था कि समाचार ने मुझे अपने पूर्व के कार्यक्षेत्र, विश्वविद्यालयीय शिक्षण संस्था, में विगत सातवें दशक में घटित एक घटना का स्मरण हो आया । किस्सा कुछ यूं है:

मेरी पूर्व की वह संस्था सदा से जातीयता की भावना से बुरी तरह से ग्रस्त रही है यह बात आम तौर पर वहां के कर्मचारियों द्वारा खुलकर स्वीकारी जाती है । यह तो मैंने भी अनुभव किया है कि नियुक्तियों तथा प्रोन्नतियों में संस्था के शीर्षस्थ व्यक्तियों की जातियों की छाप कमोबेश रहती ही है । संस्था के किसी विभाग में किसी जाति-विशेष के अध्यापकों की संख्या अधिक हो तो आश्चर्य नहीं होगा कि यह सब वहां के अध्यक्ष की मेहरबानी से हुआ हो । हां तो मैं एक मामले का जिक्र करता हूं । संस्था के एक विभाग में एक सज्जन, जिनके नाम का अंतिम पद ‘राय’ था, बतौर शोधछात्र कार्य करते थे । आम तौर पर ‘राय’ पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा पश्चिम-मध्य बिहार में एक विशेष गैर-क्षत्रिय समुदाय द्वारा जातिसूचक शब्द के तौर पर प्रयोग में लिया जाता है, यद्यपि अन्य कई जातिनाम भी प्रचलन में देखे जा सकते हैं । पर वे सज्जन जाति से विशुद्ध क्षत्रिय यानी स्थानीय बोलचाल में ठाकुर थे और जातिबोधक अंश उनके नाम में वस्तुतः नहीं शामिल था । उस विभाग के अध्यक्ष उस काल में ‘राय’ जाति के थे और कहा जाता है कि उन्हें उस शोधछात्र के बारे में यह भ्रम हो गया कि वे स्वजातीय हैं । अतः अध्यक्ष महोदय ने अपने मन में उनके प्रति अनुकंपा भाव तो पाल ही लिया । पता नहीं कि उन्होंने उस छात्र के बारे में भरोसेमंद स्रोतों से ठोस जानकारी पाने की कोशिश की भी थी कि नहीं । किंतु छात्र ने उस भ्रम का लाभ अवश्य उठाया । उन्हीं अध्यक्ष के कार्यकाल में शोध-उपाधि अर्जित करने के बाद बतौर अध्यापक के नियुक्ति भी प्राप्त कर ली ।

मैं घटना की सच्चाई का दावा नहीं कर सकता, क्योंकि संबंधित व्यक्ति मुझसे तीन-चार साल वरिष्ठ थे और मैं स्वयं अन्य शिक्षण संस्था से पढ़-लिखकर वहां नियुक्त हुआ था । किस्से के बारे में मैंने मित्र-परिचितों से सुना था । उनकी जाति के बारे में संस्था के कई अन्य लोग भी तब संभवतः भ्रमित रहे थे । बाद के बर्षों में अवश्य ही यह राज खुल गया । परंतु जातीयता से जो लाभ-हानि हो सकती थी वह तो हो ही गयी । कहने का तात्पर्य है कि जातिबोधक नाम न भी प्रयोग किया जाये तो भी जातीयता की मानसिकता अपने समाज में बनी रहेगी, भले ही कहीं कभी धोखा हो जाय ।

अपने परिवेश के लोगों की जाति पता लगाने की इच्छा प्रायः सभी में देखने को मिलती है । मुझे वर्षों बाद की उस घटना का स्मरण है जब संस्था में ‘गौतम’ जातिनाम के एक शिक्षाविद् बतौर कुलपति नियुक्त हुए । बताया जाता है कि यह जातिनाम ब्राह्मणों, क्षत्रियों तथा दलितों में प्रचलित रहा है । उनके आने पर लंबे अर्से तक वे एक पहेली बने रहे, शायद इसलिए कि वे विश्वविद्यालय समुदाय के लिए पहले से सुपरिचित नहीं थे । मैंने लोगों को परस्पर उनकी संभावित जाति के बारे में बातें करते हुए सुना था । काफी समय बाद राज खुल ही गया । वे किस जाति के थे इसकी अब कोई अहमियत नहीं है । – योगेन्द्र

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Filed under अनुभव, आपबीती, कहानी, किस्सा, मानव व्यवहार, लघुकथा

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