किसी को धूर्त कह देना उचित नहीं

आम तौर पर लोग किसी व्यक्ति के बारे में बहुत सोच-विचार कर अपनी धारणा नहीं बनाते हैं । बहुधा वे अपरिपक्व अनुभवों पर आधारित पूर्वाग्रहों से ग्रस्त रहते हैं और जल्दीबाजी में बहुत कुछ दूसरों के समक्ष कह जाते हैं । कुछ इसी प्रकार का एक वाकया कभी मेरे सामने घटा था ।

बात तब की है जब मैं अपने किसी पूर्वपरिचित के मकान में किराये पर रह रहा था । मकान-मालिक नगर में ख्यात ज्योतिषी थे । उनके पास सुबह-शाम अपनी समस्याओं के समाधान के लिए लोग आते रहते थे । मेरे साथ उनके पारिवारिक संबंध थे और वयसा वे मेरे पिताश्री के लगभग बराबर थे, अतः मैं उनसे पूरे लिहाज से पेश आता था । उनकी मेरे साथ ज्योतिष् को लेकर बातें होती रहती थीं । वे जानते थे कि मैं भवितव्य के ज्ञान की इस विधा में विश्वास नहीं करता । तदनुसार वे मुझसे अपने मिलने वालों की अक्सर आलोचना करते थे और उनके अंधविश्वासी होने की बात करते थे । कह नहीं सकता कि वे ऐसी बातें महज मेरे संतोष के लिए करते थे या सचमुच में वे ज्योतिष् के खोखलेपन को स्वयं भी अनुभव करते थे । बहरहाल वे अपने अनुभवों को फुरसत के समय मेरे साथ बांट लिया करते थे । मेरे भातिकीविद् होने के कारण मेरे तर्क-वितर्क का तरीका उन्हें कदाचित् रोचक लगता था ऐसा मेरा अनुमान है ।

उसी शहर के दूसरे कोने पर मेरे एक रिश्तेदार भी सरकारी कार्यालय में अधिकारी थे । हम लोगों का एक-दूसरे के पास आना-जाना अक्सर होता रहता था । फलतः मेरे मकान-मालिक ज्योतिषीजी का उनसे अच्छा-खासा परिचय हो गया था । एक बार मेरे रिश्तेदार का एक अधीनस्थ कर्मचारी ज्योतिषीजी से मिलने आया । मेरा अनुमान है वे अपने अधिकारी की सलाह पर ही इतनी दूर आया होगा । मैंने यह बात उस व्यक्ति से कभी पूछी नहीं, यद्यपि मेरा भी उससे थोड़ा-बहुत परिचय हो चुका था । मैं कह नहीं सकता कि मेरे रिश्तेदार ने उस व्यक्ति को मेरे उसी मकान में रहने की बात कभी बतायी थी या नहीं । हो सकता है उस आदमी को मालूम हो, पर ख्वाहमख्वाह ही मुझसे मिलने में तब उसे हिचक हुयी हो । संयोग से दूसरी मंजिल पर स्थित अपने आवास की खिड़की से मैंने उसे आते हुए अवश्य देखा था । ज्यातिषीजी से परामर्ष लेने के बाद वह कब वापस लौटा यह मुझे नहीं मालूम ।

उसी शाम गपशप हेतु कुछ देर के लिए मैं अपने मकान-मालिक के पास चला गया । बातों ही बातों में उन्होंने बताया कि पूर्वाह्न में एक व्यक्ति उनसे ज्योतिषीय परामर्ष हेतु आया था । वे बोले, “… अपने को तुम्हारे रिश्तेदार के कार्यालय में कार्यरत बता रहा था । पता नहीं सच बोल रहा था कि झूठ । आदमी बड़ा धूर्त लग रहा था । … इलाके के लोगों का कोई भरोसा नहीं ।” वह और भी बहुत कुछ कह गये ।

मैंने उनकी टिप्पणियां सुनी और ‘अच्छा’ कह कर अपना कृत्रिम आश्चर्य व्यक्त किया । मैंने उन्हें यह नहीं बताया कि उस आगंतुक से मैं परिचित हूं । भले ही मैं उस व्यक्ति से बहुत घनिष्ट रूप से परिचित नहीं था, फिर भी उसके बारे में मेरा आकलन यही था कि वह सामान्यतः ठीक ही व्यक्ति था, बिना समुचित प्रमाण के उसे धूर्त समझ लेने को मैं तैयार नहीं था । पर मैंने अपनी इस धारणा का खुलासा मकान-मालिक से कभी नहीं किया । कह नहीं सकता कि उनकी धारणा उनके ज्योतिर्ज्ञान पर आधारित थी अथवा नहीं । मैं आज भी सोचता हूं कि तब ऐसा क्या हुआ होगा जिससे उस व्यक्ति के धूर्त होने की बात उनके मन में घर कर गयी । वह तो उनसे अपनी शंकाओं-समस्याओं के बारे में परामर्श लेने ही तो आया होगा ! उसका भला और क्या कार्य रहा होगा ? मैं यही समझता हूं कि ऐसा आधारहीन तथा अनावश्यक वक्तव्य किसी के बारे में नहीं देना चाहिए, खासकर तब जब कि उसकी प्रासंगिक आवश्यकता ही न हो । लेकिन व्यवहार में कितना कुछ कहा जाये और कहां पर विराम लगा लिया जाये यह बात हम अक्सर भूल जाते हैं । -योगेन्द्र

1 टिप्पणी

Filed under अनुभव, आपबीती, कहानी, किस्सा, लघुकथा

One response to “किसी को धूर्त कह देना उचित नहीं

  1. छोटी सी बात, लेकिन सोचने का नजरिया कितना फर्क पैदा कर सकता है!

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