Daily Archives: अप्रैल 20, 2009

सिगरेट पीने की आदत छुड़ा दी एक सपने ने

मनुष्य अपने स्वभाव की कमजोरी के कारण कभी-कभी नशे का शिकार हो जाता है । नशे के लत के पीछे कई कारण हो सकते हैं । संगत-सोहबत उन कारणों में सबसे अहम रहता है ऐसा आम तौर पर माना जाता है । सोहबत के असर से बचना कठिन होता है, और यदि उसके कारण नशे की लत लग गई, तो उससे मुक्त हो पाना आसान नहीं होता है । लेकिन लत छोड़ना कठिन भले ही हो, नामुमकिन नहीं होता ऐसा मेरा सोचना है । हां उस लत के प्रति किसी कारण से अलगाव या विरक्ति का भाव यदि मन में पैदा हो जाये तो उसे छोड़ना काफी आसान हो जाता है । अपनी बात मैं अपने एक अनुभव से स्पष्ट कर सकता हूं ।

कोई पैंतीस वर्ष पहले की घटना है । तब मेरी उम्र लगभग पच्चीस वर्ष की थी । मैंने भौतिकी विषय में डाक्टरेट उपाधि का कार्य पूरा कर ही रखा था । जून-जुलाई का समय था और मैं एक-डेड़ माह के लिए बेंगलुरु (तब बंगलोर) गया था, इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस नामक देश की प्रमुख शैक्षिक संस्था में उच्च अध्ययन के लिए । वहां मैं संस्थान के छात्रावास के एक कमरे में अकेले ठहरा हुआ था ।

उन दिनों मैंने सिगरेट पीने की आदत पाल रखी थी । मुझे याद नहीं कि सिगरेट पीना मैंने कैसे शुरू किया और किससे वह आदत सीखी । मेरे विश्वविद्यालय में तब विज्ञान के छात्रों में सिगरेट, बीड़ी, पान आदि की आदत आम तौर पर देखने को नहीं मिलती थी । बस चाय पीना प्रायः सबकी कमजोरी होती थी, लेकिन उसे त्याज्य आदत के रूप में कोई नहीं देखता था । फिर मैं क्यों सिगरेट पीने लगा यह अब नहीं बता सकता । शायद शौकिया इसकी शुरुआत हुयी होगी । सिगरेट की आदत पाले हुए मुझे तब करीब साल भर हो गया था । मैं ‘चेन-स्मोकर’ तो नहीं था, किंतु दिन भर में दस सिगरेटों की एक डिब्बी इस्तेमाल हो जाती थी ।

अपने बेंगलुरु प्रवास के उस दौरान एक रात मैं शोध संबंधी कार्य संपन्न करने के बाद सोने की तैयारी करने लगा । करीब ग्यारह बजे होंगे । शौचालय के कार्य से निवृत्त होकर कमरे में लौटने पर मुझे सिगरेट पीने की तलब महसूस हुयी । मैंने डिब्बी से सिगरेट निकालकर सुलगाई, बिजली की बत्ती बुझाई, और बिस्तर पर पीठ के बल लेटकर उसे पीने लगा । सिगरेट पी चुकने पर उसका बचा हुआ टुकड़ा लेटे-लेटे एक हाथ के सहारे फर्श पर बुझाकर मैंने वहीं डाल दिया । अभी तक कुछ भी खास नहीं घटा ।

रात में मुझे एक अजीब सपना दिखा । सपने में मैं अपने मित्रों के साथ तंबाकू का काढ़ा पी रहा था । कुछ घूंट पी चुकने पर मुझे उसका अजीब स्वाद बेचैन करने लगा । मित्रगण कुछ और पीने पर जोर डाल रहे थे और मैं मना कर रहा था । मैंने उन्हें समझाया कि उसे पी कर मुझे उबकायी-सी आ रही है और मैं गले में जलन-सी महसूस कर रहा हूं । अपनी बेचैनी का हवाला देते हुए कुछएक पल बीते होंगे कि अनायास मेरी नींद खुल गयी । मुझे उल्टी का सा आभास हो रहा था । मुंह में कड़ुवाहट भर चुकी थी और गले में खराश का एहसास हो रहा था । मैं बिस्तर से उठा और कमरे से निकल तेजी से शौचालय की ओर चला गया । मैंने कुल्ला करते हुए मुंह धोया । तब उल्टी बगैरह कुछ नहीं हुयी । कमरे में लौटते-लौटते तक मैंने राहत महसूस की । मैं पानी पीकर बिस्तर पर पुनः लेट गया । पता नहीं फिर कब मुझे गहरी नींद आ गयी ।

सुबह समय पर मेरी आंख खुली । उस प्रातः मेरे मन में पहला विचार यह आया कि जिस सिगरेट से वैसा कष्टकर सपना आया उससे रिश्ता बनाये रखने की जरूरत ही क्या है । मैंने तभी सिगरेट (वस्तुतः धूम्रपान) त्यागने का निर्णय लिया । बिस्तर से एक झटके के साथ उठकर सबसे पहला काम मैंने यह किया कि बचे हुए सिगरेटों के साथ डिब्बी और उसके साथ दियासलाई की डिब्बी को तोड़-मरोड़कर कूड़ेदान में फेंक दिया । बाद में मुझे इस बात पर जरूर कोफ्त हुयी कि ख्वाहमख्वाह ही दियासलाइयां भी बरबाद कर दीं । वे तो काम आ ही सकती थीं ! खैर, कहा जा सकता है कि सिगरेट की कुसंगति उन्हें भी ले डूबी !

उस दिन के बाद मैंने जिंदगी में दो-चार सिगरेटें जरूर पी हैं । फिर भी पिछले बीस-एक सालों में उन्हें कभी छुआ हो ऐसा स्मरण नहीं होता । – योगेन्द्र

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