सिगरेट पीने की आदत छुड़ा दी एक सपने ने

मनुष्य अपने स्वभाव की कमजोरी के कारण कभी-कभी नशे का शिकार हो जाता है । नशे के लत के पीछे कई कारण हो सकते हैं । संगत-सोहबत उन कारणों में सबसे अहम रहता है ऐसा आम तौर पर माना जाता है । सोहबत के असर से बचना कठिन होता है, और यदि उसके कारण नशे की लत लग गई, तो उससे मुक्त हो पाना आसान नहीं होता है । लेकिन लत छोड़ना कठिन भले ही हो, नामुमकिन नहीं होता ऐसा मेरा सोचना है । हां उस लत के प्रति किसी कारण से अलगाव या विरक्ति का भाव यदि मन में पैदा हो जाये तो उसे छोड़ना काफी आसान हो जाता है । अपनी बात मैं अपने एक अनुभव से स्पष्ट कर सकता हूं ।

कोई पैंतीस वर्ष पहले की घटना है । तब मेरी उम्र लगभग पच्चीस वर्ष की थी । मैंने भौतिकी विषय में डाक्टरेट उपाधि का कार्य पूरा कर ही रखा था । जून-जुलाई का समय था और मैं एक-डेड़ माह के लिए बेंगलुरु (तब बंगलोर) गया था, इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस नामक देश की प्रमुख शैक्षिक संस्था में उच्च अध्ययन के लिए । वहां मैं संस्थान के छात्रावास के एक कमरे में अकेले ठहरा हुआ था ।

उन दिनों मैंने सिगरेट पीने की आदत पाल रखी थी । मुझे याद नहीं कि सिगरेट पीना मैंने कैसे शुरू किया और किससे वह आदत सीखी । मेरे विश्वविद्यालय में तब विज्ञान के छात्रों में सिगरेट, बीड़ी, पान आदि की आदत आम तौर पर देखने को नहीं मिलती थी । बस चाय पीना प्रायः सबकी कमजोरी होती थी, लेकिन उसे त्याज्य आदत के रूप में कोई नहीं देखता था । फिर मैं क्यों सिगरेट पीने लगा यह अब नहीं बता सकता । शायद शौकिया इसकी शुरुआत हुयी होगी । सिगरेट की आदत पाले हुए मुझे तब करीब साल भर हो गया था । मैं ‘चेन-स्मोकर’ तो नहीं था, किंतु दिन भर में दस सिगरेटों की एक डिब्बी इस्तेमाल हो जाती थी ।

अपने बेंगलुरु प्रवास के उस दौरान एक रात मैं शोध संबंधी कार्य संपन्न करने के बाद सोने की तैयारी करने लगा । करीब ग्यारह बजे होंगे । शौचालय के कार्य से निवृत्त होकर कमरे में लौटने पर मुझे सिगरेट पीने की तलब महसूस हुयी । मैंने डिब्बी से सिगरेट निकालकर सुलगाई, बिजली की बत्ती बुझाई, और बिस्तर पर पीठ के बल लेटकर उसे पीने लगा । सिगरेट पी चुकने पर उसका बचा हुआ टुकड़ा लेटे-लेटे एक हाथ के सहारे फर्श पर बुझाकर मैंने वहीं डाल दिया । अभी तक कुछ भी खास नहीं घटा ।

रात में मुझे एक अजीब सपना दिखा । सपने में मैं अपने मित्रों के साथ तंबाकू का काढ़ा पी रहा था । कुछ घूंट पी चुकने पर मुझे उसका अजीब स्वाद बेचैन करने लगा । मित्रगण कुछ और पीने पर जोर डाल रहे थे और मैं मना कर रहा था । मैंने उन्हें समझाया कि उसे पी कर मुझे उबकायी-सी आ रही है और मैं गले में जलन-सी महसूस कर रहा हूं । अपनी बेचैनी का हवाला देते हुए कुछएक पल बीते होंगे कि अनायास मेरी नींद खुल गयी । मुझे उल्टी का सा आभास हो रहा था । मुंह में कड़ुवाहट भर चुकी थी और गले में खराश का एहसास हो रहा था । मैं बिस्तर से उठा और कमरे से निकल तेजी से शौचालय की ओर चला गया । मैंने कुल्ला करते हुए मुंह धोया । तब उल्टी बगैरह कुछ नहीं हुयी । कमरे में लौटते-लौटते तक मैंने राहत महसूस की । मैं पानी पीकर बिस्तर पर पुनः लेट गया । पता नहीं फिर कब मुझे गहरी नींद आ गयी ।

सुबह समय पर मेरी आंख खुली । उस प्रातः मेरे मन में पहला विचार यह आया कि जिस सिगरेट से वैसा कष्टकर सपना आया उससे रिश्ता बनाये रखने की जरूरत ही क्या है । मैंने तभी सिगरेट (वस्तुतः धूम्रपान) त्यागने का निर्णय लिया । बिस्तर से एक झटके के साथ उठकर सबसे पहला काम मैंने यह किया कि बचे हुए सिगरेटों के साथ डिब्बी और उसके साथ दियासलाई की डिब्बी को तोड़-मरोड़कर कूड़ेदान में फेंक दिया । बाद में मुझे इस बात पर जरूर कोफ्त हुयी कि ख्वाहमख्वाह ही दियासलाइयां भी बरबाद कर दीं । वे तो काम आ ही सकती थीं ! खैर, कहा जा सकता है कि सिगरेट की कुसंगति उन्हें भी ले डूबी !

उस दिन के बाद मैंने जिंदगी में दो-चार सिगरेटें जरूर पी हैं । फिर भी पिछले बीस-एक सालों में उन्हें कभी छुआ हो ऐसा स्मरण नहीं होता । – योगेन्द्र

9 टिप्पणियाँ

Filed under अनुभव, आपबीती, कहानी, किस्सा, लघुकथा

9 responses to “सिगरेट पीने की आदत छुड़ा दी एक सपने ने

  1. सिगरेट-रूपी डायन से छुटकारा पाने पर बधाई! “प्रेरक प्रसंग” हमसे साझा करने के लिये धन्यवाद!

  2. मुझे आपकी तरह कोइ सपना तो नही आया पर मैंने भी सिगरेट छोड़ दिया.

    http://paricharcha.wordpress.com/2009/03/06/quit-smoking/

  3. birender tripathi

    jab maine app ki kahani pathi to sigret chor diya jis wakt maine sigrat chorne ka faisala kiya us wokt maine dekha ki mere sigrate ki dibbi me 8 pees bache huye the maine ek bar socha ki main bhi pure 8 pees sigrat ko tor dalu lekin fir man me khyal aayaa ki es mahgaee ke jamane me nuksaan karna thik nahi hai fir maine o sab bhi pee dali parantu dubara na peene kia fasla le liya ur mujhe yaad rahega ki main ek jhatake mein sigrate chhor diya aur dr. yogender josi sahab ko thans

  4. rachna

    sigret chhodne ke liye mubarakbad, aapki kahani sunkar achha laga sath hi hairani bhi hui, ki aaj k zamane me jaha pakka faisla karne k bad bhi sigret nahi chhut pati, wahi aapne ek sapne k ehsas k bad sigret chod di, welldon mr. yogendra joshi…

  5. jab maine app ki kahani pathi to mein sigrate chhor diya

    प्रत्युत्तर:
    आपने सिगरेट पीना छोड़ दिया यह जानकर हर्षमिश्रित आश्चर्य हुआ । यदि मेरे अनुभव की घटना ने आपको प्रेरित किया तो अवश्य ही मेरा लिखना सार्थक रहा । वास्तव में बहुत से कार्य मनुष्य की क्षमताओं के भीतर होते हैं, लेकिन इसलिए नहीं हो पाते हैं कि मनुष्य दृढ संकल्प नहीं ले पाता है । वह मानसिक कमजोरी से ग्रस्त रहता है और त्तात्कालिक या अल्पकापिक आनन्द के सामने हथियार डाल देता है । वह अपने एवं अपने से संबद्ध जनों तथा व्यापक स्तर पर सामाजिक अथवा अन्य प्रकार के हितों – सामान्यतः दीर्घकालिक हितों – के अनुकूल व्यवहार करने का विचार नहीं कर पाता है । इस प्रकार के कार्यों के लिए किसी विशेष दैवी शक्ति का साथ नहीं चाहिए, महज वैचारिक दृढ़ता का धनी बनना पड़ता है । मुझे भरोसा है कि आप अपने निर्णय पर टिके रहेंगे भविष्य में भी । मेरी शुभकामनाएं । – योगेन्द्र जोशी

  6. Yogendra ji aap ne jo karya kiya hai jo bahut hi muskil hai. lekin na mumkin nahi tha. Me Bhi isi Bimari Ka sikaar hu Aur kahi baar ise tyaag bhi diya lekin kambakhat sali talab ho hi jati hai. lekin me aap ke jitni to nahi pita. lekin aaj ahsaas hua ki vo cheej hi kya jo muje apna gulam bana de aaj se sigret pina yaani apne bachho ka khoon pina barabar hai. Talak of the sigrate.

    Bishan singh

  7. Rajan

    My friends age is 18 aur vo roj 2 ciagrettes pita hai aur aaj kal use gale m bohot dard rehne laga he is afraid and tenssed so pls suggest me to hlp him

  8. ye dard kahin bhi ho skta hai jaise mujhe chest me hua tha lekin ek din no smok se araam ho gaya ab me bhi nahi smoke karoonga
    a.khan

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