आत्महत्या क्यों की होगी उस छात्रा ने?

जिजीविषा प्राणीमात्र की सहज वृत्ति है, किंतु आत्महत्या कदाचित् मनुष्य की विशिष्टता है । आत्महत्या दी हुई परिस्थितियों से सामंजस्य बिठाने में असफलता का परिणाम है ऐसा आम तौर पर माना जाता है । पशुओं में भविष्य की अवांछित अथवा विकट समस्याओं के बारे में सोचने की क्षमता शायद नहीं होती है, या होती भी हो तो वह बहुत सतही और अपेक्षया तात्कालिक होती होगी ऐसा मेरा अनुमान है । इसलिए उनके मामले में आत्महत्या की बातें नहीं सुनी जाती है । लेमिंग नामक जानवरों (क्लिक करें) (चूहे से मिलते-जुलते स्तनपायी जंतु) के बारे में एक किंबदंती कभी प्रचलित रही है कि वे विशेष परिस्थितियों में सामूहिक आत्महत्या करते हैं, जिस बात के कोई वैज्ञानिक प्रमाण अभी तक नहीं मिले हैं ।

आत्महत्या के मामले सदा से ही होते आये हैं । कोई आर्थिक संकट बरदास्त करने में असमर्थ हो जाता है, तो कोई शारीरिक रोग से हताश हो जाता है । किसी को अपने किसी आत्मीय का देहत्याग का दुःख घेर लेता है, तो किसी के लिए असफल प्रेम निराशा का कारण बन जाता है । अनेकानेक कारण हो सकते हैं जो किसी को आत्महत्या के लिए प्रेरित करें । ऐसे तमाम अवसरों पर आदमी टूटने लगता है, फिर भी वह स्वयं तथा सुहृदों के बल पर वस्तुस्थिति को स्वीकारने की शक्ति जुटा लेता है और नये सिरे से जीवन जीने के प्रयास में लग जाता है । किंतु सभी लोग इतने मजबूत नहीं होते हैं कि अपने को संभाल लें । मैंने कहा कि कारण तो अनेक हो सकते हैं और वे मानव समाज में सदा ही सर्वत्र व्याप्त रहे हैं । परंतु एक कारण है जो मुझे लगता है पहले नहीं हुआ करता था, या जो प्रायः निष्प्रभावी होता था । वह है प्रतिस्पर्धा में सफल होने की तीव्र लालसा जिसकी जद में आधुनिक मानव समाज आ चुका है । अब मनुष्य इतने से संतुष्ट नहीं रह पाता है कि उसे कोई विशेष आर्थिक कष्ट नहीं है, कि वह और उसके परिवार के सदस्य प्रायः स्वस्थ है, कि उसके व्यवसाय में सब ठीक चल रहा है, इत्यादि । आज के युग में ऐसे लोगों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है जो अपने को दूसरों के आगे या बराबर देखना चाहते हैं । मेरे पड़ोसी या रिश्तेदार के पास कार है, मेरे पास नहीं इस बात से वह दुःखी हो बैठता है । मेरा सहयोगी मुझसे पहले प्रोन्नति या व्यावसायिक लाभ पा गया है यह तथ्य उसे बेचैन किये डालती है । मेरा फलां परिचित समाज में मुझसे अधिक प्रतिष्ठित हो गया है यह देख पाना उसे असह्य लगता है । मेरी सहेली मुझसे अधिक खूबसूरत है, मैं क्या करूं का भाव अवसादित कर जाता है । इस प्रकार की बातें पहले की अपेक्षा अब अधिक प्रभावी कारण बनने लगे हैं आत्महत्या के । ऐसा कुछ हो सकता है इस बात का अनुभव मुझे अपने अध्यापकीय जीवन में एक घटना से हुआ था ।

कोई दस-ग्यारह वर्ष पहले की घटना है यह । उस लड़की ने मेरे विभाग के स्नातकोत्तर (एम.एससी.) कक्षा में प्रवेश लिया था । मुझे उसका असली नाम अब याद नहीं रहा, लेकिन मैं उसे मौजूदा प्रसंग में ‘अनामिका’ संबोधित कर ले रहा हूं । अनामिका रायबरेली के किसी सामान्य कालेज से स्नातक (बी.एससी.) परीक्षा पास करके आयी थी । पाठ्यक्रम के उस सत्र के आरंभ में उसने मुझसे कहा था कि वह हिंदी माध्यम से पढ़कर आयी है । उसने मुझे बताया था कि उसने अपनी परीक्षा विद्यालय में प्रथम स्थान पाते हुए पास की है और वह स्वयं से काफी उम्मींदें लेकर इस बड़े और विख्यात विश्वविद्यालय (बनारस हिंदू विश्वविद्यालय) में पहुंची है । लेकिन यहां उसे अपने से तेज छात्र-छात्राएं देखने को मिल रहे हैं । कइयों की अंग्रेजी उससे कहीं अच्छी है । वह तो खुद ठीक-से अंग्रेजी नहीं बोल सकती है । उन सबको देखकर वह स्वयं को काफी पीछे पा रही है । प्रयोगशाला में यदाकदा वह इस प्रकार की बातें मुझसे कह लेती थी । मेरे मन में उसके प्रति सहानुभूति भी पैदा हुयी थी । उसे मैं इन शब्दों के साथ तसल्ली दे दिया करता था, “अभी यहां नयी आई हो, छोटी जगह से आयी हो, कुछ दिनों में यहां के माहौल से तालमेल बिठा लोगी । तुम्हारी जैसी समस्याएं औरों की भी रहती हैं । पढ़ाई-लिखाई में मन लगाओ, सफल रहोगी ।”

पहले कभी उक्त विश्वविद्यालय में देश के कोने-कोने से विद्यार्थी पढ़ने आते थे । लेकिन अब वह बात नहीं है । फिर भी संस्था की ख्याति से प्रेरित हो आज भी दूर-दराज से कई मेधावी या तीक्ष्णबुद्धि विद्यार्थी यहां पर आते हैं । अनामिका के पूर्व की शिक्षण संस्था में इस श्रेणी के छात्रों की संख्या नगण्य रही होगी । अतः उसे अव्वल दर्जे के दूसरे छात्रों के सापेक्ष अपनी क्षमताओं के आकलन का अवसर नहीं मिला होगा ऐसा मेरा सोचना है । नयी संस्था में स्थिति भिन्न थी और उसे कदाचित् यह लगने होगा कि उसकी बौद्धिक क्षमता वैसी नहीं जैसी वह तब तक समझती आ रही थी । इसी कारण वह कभी-कभार मुझसे पूछ बैठती थी कि वह कैसे औरों के बराबर आ सकेगी । मैं एक अध्यापक के नाते तब उसे दिलासा देता था और समझाता था कि उसे यह सब नहीं सोचना चाहिए । कभी-कभी विषय संबंधी उसकी शंकाएं भी मैं दूर कर देता था । लेकिन भौतिकी जैसे विषय में सभी प्रश्नपत्रों के संदर्भ में उसकी मदद कर सकना किसी एक अध्यापक के लिए संभव नहीं था ।

उसकी कक्षा में करीब पचास छात्र-छात्राएं थीं, जिनमें दस-ग्यारह छात्राएं रही होंगी । लगभग सभी छात्रावास में रहती थीं । उनमें से एक कोलकाता की छात्रा भी थी । मुझे अब उसका भी नाम याद नहीं । चलिए उसे ‘मेधा’ पुकार लेता हूं । मेधा महानगरी से आई छात्रा थी और मेरी नजर में ‘आधुनिक’ कहलाने वाली छात्राओं में गिनी जा सकती थी, अनामिका से काफी अलग । अच्छी अंग्रेजी बोल सकती थी, पढ़ाई में भी अच्छी-खासी कही जा सकती थी, और शायद अपने को औरों से ‘सुपीरियर’ (श्रेष्ठतर) समझती थी । न मालूम किस कारण से अनामिका ने उसके साथ दोस्ती बढ़ाने की कोशिश की । मुझे बाद में अन्य छात्राओं से यह सुनने को मिला था कि मेधा अपने अधिकतर सहपाठियों से रूखेपन से पेश आती थी । मुझे यह भी बताया गया कि अनामिका के साथ उसका व्यवहार अच्छा नहीं था और वह अक्सर उसे तिरस्कृत करती थी । लेकिन अनामिका सब सहते हुए उससे घनिष्ट संबंध बनाने में प्रयासरत थी । क्या कारण रहे होंगे इसका अब अनुमान ही लगाया जा सकता है । कदाचित् वह कुंठाग्रस्त रही होगी और मेधा के सान्निध्य से उसके जैसा बनने का मार्ग चुना होगा उसने ।

परीक्षा काल आ गया और दो-एक प्रश्नपत्र हो भी चुके थे । उस दिन परीक्षा नहीं थी, अतः सभी छात्र-छात्राएं अगले दिन की तैयारी में जुटे थे । उस मनहूस दिन प्रातः अनामिका की मेधा से न जाने क्या खटपट हुई कि वह छात्रावास से निकलकर विश्वविद्यालय के परिसर के निकट के बाजार जा पहुंची । वहां उसने सल्फास की गोलियां खरीदीं और छात्रावास लौटकर उन्हें निगल गयी । कुछ समय बाद उसकी हालत बिगड़ने लगी, अन्य छात्राओं को पता चला, उनके बीच कोहराम मच गया और किसी प्रकार उसे परिसर स्थित अस्पताल में भर्ती कराया गया । खबर मेरे विभाग तक पहुंची । आनन-फानन में सब हरकत में आये । उसके घर वालों को सूचित किया गया । चिकित्सकों ने उसको बचाने की भरसक कोशिश की । जब तक उसे होश था वह गुहार लगाती रही कि उसे बचा लें । लेकिन देर हो चुकी थी और अगले दिन अपराह्न में उसकी इहलीला समाप्त हो गयी ।

उस आत्महत्या के कारणों को सही-सही कोई नहीं बता सका था । शायद मेधा को कुछ अंदाजा हो, लेकिन उसने बताया किसी को नहीं । मुझे लगता है कि मेधा के साथ तुलना को लेकर अनामिका के मन में हीनभावना घर कर गयी होगी । उसी कमजोरी के कारण दोनों के बीच जो भी छोटी-मोटी बात घटी होगी उसके चलते उसने भावावेश में वह कदम उठाया होगा । आमीन । – योगेन्द्र

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