किस्सा मृत्यु की विफल भविष्यवाणी का

मैं भविष्यवाणी करने की किसी भी विधा को स्वीकार नहीं कर पाता । इसके कारण हैं । भौतिकीविद् की हैसियत से एक लंबा व्यावसायिक जीवन बीता है मेरा । उस काल के शैक्षिक अध्ययन तथा अनुसंधान के फलस्वरूप भौतिकी (Physics) के स्थापित नियमों के प्रति एक आस्था भाव मेरे मन में घर कर गया है, जिनके अनुसार भविष्य का अनुमान लगाना संभव नहीं । आधुनिक भौतिकी की निर्भरता उसकी क्वांटम शाखा पर आधारित है । आधुनिक समस्त इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की कार्य प्रणाली के मूल में क्वांटम भौतिकी (Quantum Physics) के ही नियमों की भूमिका रहती है । अतः उन नियमों को मिथ्या कहना उचित नहीं हो सकता है । क्वांटम भौतिकी के अनुसार कई भौतिक प्रक्रियाएं ऐसी होती हैं जो एक से अधिक वैकल्पिक घटनाओं में से किसी एक को जन्म दे सकती हैं, परंतु किसे इसे पूर्वतः कह पाना संभव नहीं । उन स्थितियों में यह निश्चय कर पाना संभव नहीं है कि कौन सी घटना वस्तुतः घटेगी । जब उस घटना के बारे में ही अनिश्चितता हो तो उसके पश्चात् क्या-क्या क्रमशः घटेगा कैसे कहा जा सकता है ? और संयोग से ऐसी घटनाएं प्रकृति में निरंतर होती रहती हैं जिनसे हम अछूते नहीं रह सकते हैं । अतः हमारा भविष्य क्या होगा कहा नहीं जा सकता

यह तो संक्षिप्त वक्तव्य था मेरे अविश्वास के पीछे के कारण का । इस विषय में भौतिकी पर आधारित व्यापक विवेचना प्रस्तुत करने का मेरा कोई इरादा नहीं और न ही ऐसा कर पाना यहां पर संभव है । मैं यहां अविश्वास के सैद्धांतिक आधार से आगे बढ़कर इस बात पर जोर डालने की आवश्यकता समझता हूं कि भविष्यवाणी के असफलता के अनेकों मामले हमें देखने को मिलते हैं । फिर भी श्रद्धावान का विश्वास बना रहता है । मैं एक घटना का जिक्र करता हूं ।

घटना वर्ष २००५ के अक्टूबर माह की तारीख २० (गुरुवार) की है । हिंदू तिथि-मास गणना-पद्धति के अनुसार उस दिन कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी थी । देश के कई भागों में अपने पतियों के आयुष्य के लिए महिलाओं के द्वारा परंपरागत रूप से मनाये जाने वाले करवा-चौथ व्रत की तिथि भी उसी दिन थी । घटना मध्य प्रदेश के बैतूल जिले के एक गांव में घटी थी, जहां पर एक प्राप्तवय ज्योतिषी महोदय से संबंधित है । जितना मुझे स्मरण है उनका नाम श्री कुंजीलाल था । उन्होंने भविष्यवाणी कर रखी थी कि उस दिन अपराह्न में ३-४ बजे उनकी इहलीला समाप्त हो जायेगी । उनकी विद्या के प्रति पर्याप्त श्रद्धा रखने वाले अधिसंख्य स्थानीय लोग उस दिन प्रातः से ही उनके आवास पर एकत्रित हो गये । उनके दीर्घायु बने रहने के लिए भजन-कीर्तन तथा पूजा-पाठ का दौर चलने लगा । ज्योतिषी महोदय स्वयं मंत्र-जाप में संलग्न होकर अपनी ‘अवश्यंभावी’ मृत्यु की प्रतीक्षा करने लगे । वाकये का दिलचस्प पहलू यह था कि दो-एक खबरिया इलेक्ट्रॉनिक चैनल भी उस घटना के जीवंत प्रसारण में लग गये । वस्तुतः उन्हीं के माध्यम से मुझे घटना का ‘आंखों देखा हाल’ टेलीविजन पर देखने-सुनने को मिला था । एक-दो चिकित्सकों की भी व्यवस्था वहां पर की गयी थी । जांच-पड़ताल के बाद उन्होंने ज्योतिषीजी के पूर्णतः स्वस्थ होने की बात तो कही पर उनकी भविष्यवाणी पर टिप्पणी करने से बचे रहे ।

मैं भी जिज्ञासावश टीवी के सामने बैठा रहा । लेकिन अपराह्न में मुझे सपत्नीक कहीं कार्यवशात् निकल जाना पड़ा । बाद में लौटने पर घर में प्रवेश करते ही मैंने सबसे पहले टीवी चालू किया, और संबंधित चैनल पर उक्त भविष्यवाणी के संदर्भ में क्या कुछ इस बीच घट चुका यह जानने बैठ गया । पता चला कि उस दिन के अनिष्ट का कथित संभावित काल बीत भी गया और कुछ भी अनहोनी नहीं हुयी । ज्योतिषीजी ने सहज भाव से घटना के न घटने का कारण लोगों के द्वारा की गयी प्रार्थना आदि को बताया जिसने मृत्युयोग को निष्प्रभावी कर दिया ।

उक्त घटना हमारे सामने दो प्रश्न खड़े करती है । पहला यह कि क्या वह भविष्यवाणी स्वयं में गलत थी और तदनुसार वैसा कुछ भी होना ही नहीं था ? कहा जायेगा कि इस विशेष मौके पर भविष्यवाणी त्रुटिपूर्ण थी, अतः गलत सिद्ध हुई, अन्यथा सही भविष्यवाणियां कर पाना संभव है । त्रुटि की बात कहकर किसी भी असफल भविष्यवाणी का बचाव किया जा सकता है, और ऐसा अमूमन किया भी जाता है । दूसरा यह कि क्या भविष्यवाणियां टाली भी जा सकती हैं और वस्तुतः क्या वही इस मामले में हुआ भी ? लोग कहेंगे कि पूजा आदि यदि न किये गये होते तो अनिष्ट घट गया होता । चूंकि अमुक घटना वैज्ञानिक अध्ययन में प्रयुक्त नियंत्रित विधि से संपन्न प्रयोग नहीं था, अतः निर्विवाद रूप से कुछ कह पाना सरल नहीं है । परंतु एक शंका उत्पन्न अवश्य होती है कि घटनाओं को होने से यदि किसी न किसी उपक्रम से रोकना संभव है तब भविष्यवाणी का अर्थ ही क्या रह जाता है । जो चीज अंततः होनी ही नहीं, कारण चाहे कुछ भी हो, तब उसके होने की भविष्यवाणी की सार्थकता ही क्या रह जाती है ? यह विषय गंभीर चिंतन-मनन का है । – योगेन्द्र

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Filed under अनुभव, कहानी, किस्सा, लघुकथा, हिंदी साहित्य

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