एक दुःस्वप्न – राजनीति में सत्ता, सत्ता पर कब्जा, कब्जे की राजनीति

पूरे एक माह के लोकसभा चुनाव की प्रक्रिया का आज अंतिम दिन है । सायं पांच बजे पंचम चरण का मतदान भी संपन्न हो चुका है । मतों की गिनती दो रोज बाद होनी है । राजनेताओं को तो परिणामों का बेसब्री से इंतजार है ही, जनता की भी उत्सुकता कोई कम नहीं । उसके लिए यह नयी सरकार चुनने का मौका ही नहीं है बल्कि एक मनोरंजक खेल भी है । यह तो हर कोई समझता है कि कोई दल सरकार बनाये, आम आदमी की जिंदगी वैसी ही चलनी है जैसे अभी तक चलती आ रही है । वही बिजली-पानी की किल्लत, अस्पतालों में लगती मरीजों की लंबी कतारें, बच्चों के एड्मिशन के लिए एक स्कूल से दूसरे, तीसरे, चौथे तक की दौड़ और उस पर बढ़ती फीस के जुगाड़ की चिंता, रेलगाड़ियों के डिब्बों में ठुंसकर सफर करने की मजबूरी । और भी न जाने क्या-क्या देखना-सहना पड़ता है । बस, रोजमर्रा की समस्याओं को सुलझाते-सुलझाते जिंदगी गुजारना सबकी नहीं तो कइयों की नियति है, जिससे निजात नहीं मिलनी है, चाहे कोई राजकाज संभाले ।

रात का वक्त है । भोजन कर चुका हूं । सोचता हूं टेलीविजन चैनलों पर चुनाव संबंधी समाचार, परिचर्चाएं तथा समीक्षाएं देख-सुन लिये जायें । रिमोट कंट्रोल का बटन दबा-दबाकर एक चैनल से दूसरे-तीसरे पर भटकता हूं । खबरें कमोबेश वही हैं, बातें भी वही । मतदान का प्रतिशत क्या है, जहां कम है तो क्यों है । किस दल को कितनी सीटें मिलनी हैं और कैसे किसी भी मोरचे को बहुमत नहीं मिलना है । वे गठबंधनों के टूटने और दलों के बीच नये रिश्तों के बनने की बात करते हैं । जोड़तोड़ की राजनीति आरंभ हो चुकी है यह मुझे सुनने को मिल रहा है । जो कल तक एक-दूसरे के प्रतिद्वंदी थे अब साथ आने की फिराक में हैं, और जिनके बीच दोस्ती थी वे अब साथ छोड़ रहे हैं । सत्ता कैसे हाथ लगेगी यह चिंता सबको सता रही है । देश कहां जायेगा, आम आदमी की समस्याएं कैसे सुलझेंगी जैसी बातें नदारद हैं । ऐसा लगता है कि बस सत्ता पाना एकमेव उद्येश्य है सबका । सत्ता हथियाने की बात खुलकर कही जा रही है । टीवी पर्दे पर नजर गड़ाये और उसके स्पीकरों पर कान दिये हुए तीन-एक घंटे का अंतराल बीत जाता है । अर्धरात्रि होने को है । देश की राजनीति को लेकर मन नैराश्य भाव से भर जाता है । टीवी ऑफ कर देता हूं और चला जाता हूं अपने बिस्तर पर लेटने । कुछ देर के लिए देश की भावी तस्वीर के मंसूबों में खो जाता हूं, और फिर कब आंख लग जाती है पता नहीं ।

नींद में एक सपना देखता हूं । किसी गांव का एक परिवार मेरे सपने में आ पहुंचता है । एक परिवार जिसमें कई पीढ़ियों से एक ही वारिस पैदा होता आ रहा है । मौजूदा वारिस के बाप, दादा, परदादा, सभी अपने-अपने मां-बाप की इकलौती संतानें रहीं । बिरादरी लंबी-चौढ़ी है, लेकिन उसमें कोई नजदीकी रिश्तेदार नहीं उस परिवार का । समय बीतता है और फिर एक हादसा घटता है जिसमें उस परिवार का अस्तित्व मिट जाता है, बिना किसी वारिस को अपने पीछे छोड़ते हुए ।

बिरादरी के लोगों की नजर आ टिकती है उस जमीन-जायदाद पर जो वह परिवार छोड़ गया है । कौन हो सकता है सही दावेदार । सभी अपने-अपने दावे करने लगते हैं । वह संपदा अशांति का कारण बन बैठती है । गांव खेमों में बंट जाता है उसे कब्जियाने के लिए । गाली-गलौज, मारपीट की नौबत आ जाती है । लाठी-डंडे चलने लगते है । लोगों का एक दल जमीन-जायदाद हथियाने में सफल रहता है । उनमें से जो जितनी ताकत दिखाता है वह उतना ही बड़ा हिस्सा पा जाता है । लेकिन दूसरे दलों के लोग शांत नहीं बैठते हैं । वे एकजुट हो आगे की योजना बनाते हैं । पहले दल के लोगों को तोड़ते हैं, उन्हें बेहतर हिस्सेदारी का भरोसा दिलाते हैं । और दो-चार साल में तस्वीर बदल जाती है । गांव के दूसरे लोग जमीन हथियाने में सफल हो जाते हैं । हार खा चुके लोग हार मानते नहीं । वे चुप नहीं बैठते । उनकी कोशिशें होती हैं दुबारा कब्जा पाने की । गाली-गलौज, लाठी-डंडे अपनी भूमिका निभाते हैं । कालांतर में वे उसे वापस पा जाते हैं । कुल मिलाकर एक-दूसरे से कब्जा छीनने का एक खेल गांव में चल निकलता है, अमन-चैन की कीमत पर ।

अचानक मेरी नींद खुलती है । बाहर चिड़ियों के चहचहाने का शोर सुनाई देता है । संकेत है कि सुबह हो चुकी है । मैं बिस्तर से उठ खड़ा होता हूं । सपने की याद अभी ताजा है । दो-चार दिन में भूल जाऊंगा । शायद अगले चुनाव के मौके पर फिर ऐसा ही एक सपना दिखे, कौन जाने ! – योगेन्द्र

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Filed under अंग्रेजी, आपबीती, कहानी, लघुकथा, हिंदी साहित्य

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