परेशानी का सबब ‘टाइट जींस-टीशर्ट’ पहनना

दो रोज पहले किसी टीवी चैनल पर खबर सुनने को मिली कि कानपुर शहर के एक महिला डिग्री कालेज में प्राचार्या ने छात्राओं के जींस तथा टीशर्ट (टॉप?) पहनकर कालेज परिसर में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया है । साथ ही उन्हें हिदायत दी गयी है कि वे सेलफोन लेकर परिसर में न आवें । रेडियो बीबीसी के सांध्यकालीन हिंदी कार्यक्रम में इसी आशय के समाचार को यह कहकर प्रसारित किया गया था कि उत्तर प्रदेश के ‘कुछ’ कालेजों में छात्राओं के जींस-टीशर्ट पहनने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है । मुझे नहीं मालूम कि इस प्रकार के आदेश कहां-कहां पारित हुए हैं । पिछले कुछ वर्षों से स्कूल-कालेजों में ‘ड्रेस कोड’ संबंधी निर्देशों की बातें सुनने को अवश्य मिलती रही हैं । ऐसे निर्देशों का विरोध भी हर बार देखने-सुनने को मिलता रहा है । स्त्री स्वतंत्रता के हिमायती संगठन ‘तालीबानी’ फरमान कहते हुए इनके विरुद्ध आवाज उठाते आ रहे हैं ।

उक्त समाचार सुनने पर मुझे एक घटना का स्मरण हो आया । कोई चार साल पहले मैं सपत्नीक मैसुरु (मैसूर, कर्नाटक) गया था । वहीं से हम दिन भर के एक ‘कंडक्टेड बस टूर’ पर तमिलनाडु राज्य की पर्यटक नगरी उदगमंडलम (यह उसका आधिकारिक नाम है, अन्यथा उसे ऊटी या ऊटकमंड ही अधिक पुकारा जाता है) भी चले गये थे । यह नगरी नीलगिरि पर्वतशृंखला की एक चोटी पर करीब 7200 फुट की ऊंचाई पर बसी है और मेरे अनुमान से इसकी आबादी लाख-एक से अधिक नहीं होगी । सदाबहार हरियाली, हल्की ग्रीष्मकालीन ठंड, झील, विभिन्न पेड़-पौधों और फूलों वाला विस्तृत उद्यान, और निकट का संरक्षित वन क्षेत्र इसे एक आकर्षक पर्यटक स्थल बनाते हैं । 20-25 यात्रियों से भरी हमारी बस में युवक-युवती का एक जोड़ा में बैठा था । उनकी उम्र तथा हाव-भाव से हमें अनुमान हो चला था कि वह एक नवविवाहित जोड़ा था, जो कदाचित् दो-चार दिन के सैर (या हनीमून) पर ऊटी जा रहा था । बाद में हमें पता चल भी गया कि वे वास्तव में परस्पर विवाहित थे । उस शाम हम जैसे अन्य यात्रियों की तरह वे उस बस से मैसुरु लौटे भी नहीं ।

नीलगिरि पर्वत की संबंधित चोटी पर सर्पिल राजमार्ग पर चढ़ते हुए दिन के बारह-एक बजे के करीब हमारी बस सीधे उदगमंडलम या ऊटी झील के किनारे पहुंची । वहां पर घंटे भर के लिए हम लोगों को चायपान अथवा भोजन करने और झील का आनंद लेने के लिए छोड़ दिया गया । उसी के बाद उस नगरी के अन्य स्थलों का दर्शन कराया गया ।

हम दोनों, यानी मेरी पत्नी और मैं, थोड़ा घूमफिर चुकने के बाद वहीं बस के पास लौट आये । झील में नौकायन का हमारा इरादा था नहीं और आजूबाजू में दर्शनीय अधिक चीजें थीं भी नहीं । आसपास की दुकानों से छोटी-मोटी सजावटी या उपहार में देने योग्य कलात्मक सामान खरीदकर अपने लिए बोझा बढ़ाने का विचार भी हमारे मन में नहीं था । अतः हम चेहलकदमी करते हुए और चाय-काफी पीते हुए बस के इर्दगिर्द ही उसके चलने की प्रतीक्षा में समय बिताने लगे ।

वहां पर उस नवविवाहित जोड़े को थोड़ी परेशानी झेलनी पड़ी थी । हुआ यह था कि युवती ‘टाइट जींस-टीशर्ट’ धारण किये हुए थी जो उसकी देह पर लगभग चिपके हुए से लग रहे थे । आजकल ‘आधुनिक(?)’ तथा पाश्चात्य-से लगने वाले परिधानों का शौक किशोरियों-नवयुवतियों में काफी बढ़ चुका है, खासकर महानगरों में । उत्तर भारत की तुलना में दक्षिण में ऐसे नये तौर-तरीके अभी भी कम दिखाई देते हैं । उदगमंडलम में स्थानीय युवतियां दक्षिण की पारंपरिक वेशभूषा अथवा सलवार-सूट या साड़ी-ब्लाउज में ही नजर आ रही थीं । वैसे उनकी उपस्थिति विशेष नहीं थी । जिस युवती की मैं बात कर रहा हूं वह हिन्दीभाषी थी और मैं समझता हूं कि वह अवश्य ही उत्तर भारतीय रही होगी । उस स्थान पर शायद जींस-टीशर्ट पहने हुए वह कदाचित् अकेली युवती थी । हो सकता है वहां पहुंचे अन्य पर्यटकों में इस परिधान के साथ इक्का-दुक्का और भी कहीं हों, किंतु हमें आसपास में कोई नजर नहीं आया ।

टाइट जींस-टीशर्ट पहने वह युवती वहां चेहलकदमी करते हुए स्थानीय मनचले युवकों के आकर्षण का केंद्र बन गयी थी । सड़कों, गलियों, चौराहों, तथा पार्कों आदि जगहों पर फालतू घूमते-फिरते युवकों का दिखाई देना अपने देश में आम बात है । ऐसे युवक ‘आधुनिक-सी’ दिखने वाली युवतियों को घूरते हुए देखने के शौकीन होते हैं । वे अक्सर आसपास मंडराते रहते हैं, फब्तियां कसने से बाज नहीं आते हैं और दैहिक निकटता का मौका खोजते हुए छूने-छेड़ने का साहस भी कर जाते हैं । गनीमत है कि ऐसे फालतू इधर-उधर टहलने की आदत अभी युवतियों में नहीं पैदा हुई है । हां, तो तीन-चार युवक उस युवती के आसपास मंडराते हुए हमें भी दिखाई दिये । हरकतें खास गंभीर नहीं थीं, लेकिन उस जोड़े को बेचैन या परेशान करने के लिए काफी थीं । कुछ देर में उस जोड़े का पुरुष सदस्य मेरी पत्नी के पास पहुंचा और उसने अपनी परेशानी हमें समझाते हुए कहा कि हम उसकी पत्नी का जरा ध्यान रखें कि लोग परेशान न करें । मेरी पत्नी ने जिम्मेदारी ले ली । उस समय उसे कुछ भोज्य पदार्थों आदि का इंतजाम करना था । वह अपनी विवाहिता को साथ लेकर जा सकता था । लेकिन मेरा अनुमान है कि उसे शायद यह लगा होगा कि हम जैसे बुजुर्गों के सान्निध्य में वे युवक अधिक संयमित रहेंगे । अन्यथा वे भी उनके पीछे-पीछे हो लेते, सीटी बजाते या कुछ और करते । गनीमत रही कि हमारी उपस्थिति में उन युवकों ने आसपास खड़े होकर समय काटने के अतिरिक्त कोई आपत्तिजनक हरकत नहीं की । बाद में नवविवाहित युवक लौट आया और अपनी पत्नी के साथ बस में बैठ गया । किंचित् समय के बाद एक-एक कर अन्य यात्री भी लौटकर बस में सवार हो गये । अंत में बस ने हमें बाजार एवं होटलों वाले इलाके में पहुंचा दिया । वहीं वह नवदंपती बस से उतर कर अपने गंतव्य होटल की ओर चल दिया ।

उदगमंडलम घूमफिर लेने के बाद संध्याकाल जब हम अपनी बस से मैसुरु लौटने लगे तो उस नवदंपती को लेकर मिले कुछ मिनटों के अनुभव पर हम परस्पर बातचीत करते रहे । मेरी पत्नी की एक अहम टिप्पणी थी कि न जाने आज की इन नवयुवतियों के सामने टाइट जींस-टीशर्ट पहनने की मजबूरी क्यों आ पड़ती है । वे अपेक्षया सरल और हमारे समाज में प्रचलित परिधान पहनें तो कुछ लोगों के अवांछित आकर्षण से बच सकती हैं । उन्हें ऐसे पहनावे से बचना चाहिए जो आज के नवयुवकों को भड़काऊ या उत्तेजक लगें । क्योंकर अपने लिए आफत मोल लेती हैं ? मेरी पत्नी के ये विचार एक स्त्री के नाते थे । मैं तो ऐसा सोचता ही हूं । – योगेन्द्र

1 टिप्पणी

Filed under अनुभव, कहानी, किस्सा, लघुकथा, हिंदी साहित्य, Short Stories

One response to “परेशानी का सबब ‘टाइट जींस-टीशर्ट’ पहनना

  1. बेवकूफ़ थे वे दोनों, ऊटी की पुलिस को यदि बुलाते तो वे शोहदे उन्हें तो क्या किसी को भी छेड़ने का साहस नही करते.

    आपके और आपकी श्रीमती के विचार से तो उस लड़की को बुर्का पहनना चाहिये.

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