मेरे घर के सामने रहते हैं जो

मेरे घर के सामने सड़क के उस पार पांच सगे भाइयों के अपने-अपने परिवार रहते हैं । सुनने में आता है कि पैंतालीस-पचास वर्ष पहले जब अपनी कॉलोनी की नींव डाली गयी थी तब उसके लिए खरीदे गये भूखंड के मालिकों में से एक इन भाइयों के पिता भी थे । उन बुजुर्ग महोदय को मैंने भी देखा है । कोई दसएक साल हो गये होंगे उन्हें गुजरे हुए । मुझे नहीं मालूम कि इन भाइयों की बहिनें कितनी थीं । जानने की कोशिश मैंने कभी नहीं की और संयोग से उन्हें कभी मैंने देखा भी नहीं । अवश्य ही वे सभी अपने-अपने गार्हस्थ जीवन में व्यस्त होंगी । इन भाइयों और आकार में बेरोक-टोक बढ़ते उनके परिवारों को मैं अवश्य ही करीब दो दशकों से देख रहा हूं । संख्या में परिवार कैसे तेजी से बढ़ते हैं इसका एक दृष्टांत ये परिवार प्रस्तुत करते हैं

ये पांच भाई सड़क से लगे सत्तर-पचहत्तर फुट चौड़े भूखंड पर अपने-अपने मकान बनवाकर रह रहे हैं । भूखंड की सड़क से लंबवत् गहराई नब्बे फुट तक होगी ऐसा मेरा अनुमान है । इस भूखंड को इन भाइयों ने चौढ़ाई में पांच बराबर हिस्सों में बांटकर अपने-अपने आशियाने बसाये हैं । हर आशियाना भूखंड की गहराई तक एक लंबी पट्टी के माफिक बना है जिसमें कमरों की कतार समाई है ।

इन सभी भाइयों में हरएक के औसतन आधा दर्जन संतानें हैं, कुछ लड़के तो कुछ लड़कियां । अवश्य ही एक के केवल दो बेटे और दो बेटियां हैं । शेष भाई संतानों के मामले में अधिक ‘भाग्यशाली’ हैं । औरों के मामले में मैं आजतक ठीक से हिसाब नहीं लगा सका कि किसके कितने बच्चे हैं । सामने छोटे-बड़े तमाम लड़के-लड़कियां नजर आते हैं, परंतु मैं भरोसे के साथ यह नहीं कह सकता कि कौन किस भाई की संतान है । सबसे छोटे भाई के घर में तो बस कुछएक महीने पूर्व ही पांचवीं या छटी संतान ने जन्म लिया है । मेरी जानकारी में पांचों भाई निरक्षर हैं और साग-सब्जी के कारोबार जैसे उद्यम से जीवनयापन करते हैं । लेकिन नई पीढ़ी के बच्चे थोड़ा-बहुत पढ़-लिख गये हैं या पढ़-लिख रहे हैं । उनमें से शायद केवल एक हाई-स्कूल भी पास कर चुका है ।

पिछले कुछ समय से मैं बड़े जिज्ञासु भाव से यह जानने और समझने की कोशिश करता आ रहा हूं कि क्या इन परिवारों की नई पीढ़ी, यानी इन पांच भाइयों की संतानों, में भी ‘परिवार वृद्धि’ के प्रति वही पुराने ढर्रे की सोच विद्यमान है ? या इनकी सोच कुछ हद तक बदली और ‘समझदारी’ भरी है ? उनके वयस्क हो चुके बच्चों से मैंने कभी पूछा नहीं । दरअसल हिम्मत ही नहीं होती है; पता नहीं क्या प्रतिक्रिया हो; कहीं बुरा न मान जायें ऐसे संवेदनशील मुद्दे को लेकर । लेकिन कुछ बातें हैं जिनसे मुझे लगता है कि बात कुछ बदल जरूर रही है ।

सबसे बड़े भाई के खुद के पांच लड़कों में से दो की शादी अंदाजन सात-आठ साल पहले हुई होगी । दोनों के पांच-पांच छः-छः साल के दो-दो बच्चे हैं जो अब स्कूल जाते हैं । इन लोगों के जिन लड़कियों की शादी वर्षों पहले हुई स्वयं उनके बच्चे भी स्कूल जाते हैं, जैसा उनमें से किसी एक ने कभी मुझे बताया था । लेकिन बीते सात-आठ सालों में इन चाचा-ताऊओं के अन्य लड़के-लड़कियों में से किसी की भी शादी नहीं हुई । कुल पच्चीस-तीस की संख्या वाले इन लड़के-लड़कियों की उम्र में परस्पर क्रमशः एक-एक साल या ऐसा ही अंतर होना चाहिए, अधिक नहीं । इस लिहाज से चार-पांच अन्य जनों की भी शादी हो ही जानी चाहिए थी, खासकर तब जब कि ये लोग पुरानी रूढ़ियों से बंधे हों और कम उम्र में विवाह की परंपरा निभाते आ रहे हों । फिर अन्य वयस्क संतानों का विवाह क्यों रुका होगा ? मेरी जिज्ञासा का यही विषय है ।

मुझे लगता है कि ये बच्चे आज की दुनिया देख रहे हैं, और वे भी संपन्न लोगों की तरह की जिंदगी जीना चाहते हैं । इसीलिए जिनकी शादी हो चुकी उनकी अपने बाप-दादों की तरह अधिक संतानें नहीं हैं । और जो अभी अविवाहित हैं वे कदाचित् जल्दी विवाह के पक्ष में नहीं हैं । वे चाहते होंगे कि अपनी आर्थिक स्थिति पहले कुछ सुधार लें । मेरे दिमाग में यह बात तब आई जब एक दिन इनमें से एक (हाई-स्कूल पास) ने मुझसे कहा था “अंकलजी, काश! हम भी आपके यहां पैदा हुए होते । तब हम भी कुछ कर पाये होते ।” उस समय मैंने यह कहते हुए बात टाल दी थी कि सभी लोग टाटा-बिड़ला के घरों में थोड़े ही पैदा होते । पर उसकी बात के अवश्य ही कुछ गहरे अर्थ थे ऐसा मैं सोचता हूं । नई पीढ़ी के ये बच्चे शायद पुराने ढर्रे पर नहीं जीना चाहते हैं । और अगर ऐसा है तो देश की बढ़ती आबादी के संदर्भ में यह शुभ संकेत होगा । – योगेन्द्र

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Filed under आपबीती, किस्सा, जनसंख्या, लघुकथा, हिंदी साहित्य, population, Short Stories

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