कितना अंतर है उनमें और हममें ! – किस्सा ड्राइविंग लाइसेंस का

यह वाकया करीब पच्चीस वर्ष पुराना है । तब मैं सपरिवार द्विवर्षीय उच्चानुशीलन (हायर स्टडीज) हेतु इंग्लैंड गया हुआ था । मेरा कार्यस्थल लंदन से एक सौ बारह  किलोमीटर दूर दक्षिण में स्थित साउथहैम्पटन विश्वविद्यालय था ।

ब्रिटेन में भारतीय मूल के नागरिकों की संख्या काफी है । लंदन के साउथहॉल इलाके के प्रायः सभी बाशिंदे तो भारतीय ही हैं । वहां पहुंचने पर आपको लगेगा ही नहीं कि आप इंग्लैंड में हैं । अन्य प्रमुख शहरों में भी उनकी संख्या पर्याप्त है । अतः भारतीय भोजन की सामग्री तथा अन्य उपयोगी वस्तुएं आपको सरलता से इन सभी जगहों पर मिल जायेंगी । साउथहैम्पटन में भी भारतीय मूल के लोगों की संख्या कम नहीं है ।

साउथहैम्पटन में हमारा किराए का आवास ‘बिटर्न’ नामक इलाके में था । आवास से सौ-डेड़-सौ मीटर की दूरी पर ही पंजाबी मूल का एक परिवार रहता था । मेरी पत्नी का उस परिवार से अच्छा-खासा परिचय हो गया था । परिवार के सदस्यों में एक बुजुर्ग महिला, उनका एकमात्र पुत्र, उसकी पत्नी, और उनके दो छोटे बच्चे शामिल थे । उन बुजुर्ग महिला को इंग्लैंड में रहते हुए वर्षों गुजर चुके थे, लेकिन वे अंगरेजी सीख नहीं पाईं । वे केवल पंजाबी ही बोल पाती थीं, हिंदी भी नहीं । उनके पुत्र का जन्म इंग्लैंड में ही हुआ था, अतः वह अंगरेजी तो जानता था, किंतु पंजाबी न के बराबर । उसकी पत्नी पंजाब की थी और शादी के बाद वहां पहुंची थी । वह पंजाबी और हिंदी के अतिरिक्त अंगरेजी भी जानती थी । मेरी पत्नी उनसे तो हिंदी में बातें कर लेती थीं, लेकिन उनकी सास की ठेठ पंजाबी मुश्किल से समझ पाती थीं ।

पंजाबी महिला (बहू) ने मेरी पत्नी को एक बार बताया कि वे तीन या चार दफे कार-चालन के लाइसेंस के लिए आवेदन कर चुकी हैं, किंतु हर बार वे परीक्षण में असफल हो जाती हैं । लाइसेंस के अभाव में कभी-कभी उन्हें परेशानी होती है, क्योंकि वे कार से कहीं अकेले आ-जा नहीं सकती हैं । बारबार की असफलता से उनका आत्मविश्वास डगमगा गया था । इस घटना के कुछ महीनों के बाद हम स्वदेश लौट आये । लौटने पर मेरी पत्नी का उनसे कुछ समय तक संपर्क बना रहा । अपने देश में उन दिनों टेलीफोन सुविधा मुश्किल से आम आदमी को उपलब्ध थी । अतः संपर्क का माध्यम चिट्ठी-पत्री ही थी । एक दिन अनायास उस महिला की चिट्ठी हम लोगों को मिली, जिसमें उन्होंने इस ‘खुशखबरी’ का जिक्र किया था कि उनको अंततोगत्वा वाहन-चालन का लाइसेंस मिल ही गया । यह लाइसेंस उनको संबंधित परीक्षण उत्तीर्ण करने के चौथे या पांचवें प्रयास के बाद मिल पाया था । हमने भी प्रत्युत्तर में उन्हें बधाई संदेश भेज दिया ।

इस किस्से का जिक्र मैं यह बताने के लिए कर रहा हूं कि ब्रिटेन में किसी आवेदक को वाहन-चालन का लाइसेंस तभी दिया जाता है जब वह तत्संबंधित अर्हता की परीक्षा उत्तीर्ण कर लेता है । परीक्षण की प्रक्रिया गंभीर रहती है और वाहन-चालन के विभिन्न पहलुओं की उसकी जानकारी का मूल्यांकन कर लिया जाता है । कुछ ऐसी ही प्रक्रिया विश्व के सभी प्रमुख देशों में अपनाई जाती है । लेकिन हमारे देश में क्या होता है ? सब खानापूरी के तौर पर होता है । अपने यहां यह लाइसेंस किसी व्यक्ति की वाहन-चालन की योग्यता का प्रमाण नहीं है । वस्तुतः कभी जरूरत पड़ जाने पर यह महज कानूनी पचड़े से बचने के लिए मददगार एक दस्तावेज है, जिसका इंतजाम संबंधित कार्यालय जाकर आवेदन करके तथा आवश्यकता पड़ने पर सुविधा-शुल्क देकर, अथवा किसी दलाल की सहायता लेकर बखूबी किया जा सकता है ।

मैं उन भाग्यशाली व्यक्तियों में नहीं हूं जो ऐसे लोगों को जानते हों जिन्होंने वाहन-चालन के किसी सार्थक परीक्षण के बाद लाइसेंस प्राप्त किया हो । एक बार आंध्र प्रदेश निवासी मेरे एक छात्र ने अवश्य बताया था कि परिवहन कार्यालय के एक कर्मी ने उसके साथ स्कूटर में बैठकर कुछ दूरी तक उसे चलवाया था । लेकिन अन्य मामलों में किसी ने परीक्षण से गुजरने की बात नहीं कही । मेरा अनुमान है कि अपने शहर वाराणसी में वाहन-चालन का लाइसेंस किसी भी व्यक्ति को मिल सकता है – लूला-लंगड़ा-बहरा – किसी को भी । यह पुराने अनुभवों के आधार पर कह रहा हूं । अब चीजों में सुधार हो गया हो तो मुझे अवश्य आश्चर्य होगा । और तब मुझे क्षमा मांगनी होगी । – योगेन्द्र जोशी

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