एक अनुभव यह भी, सब्जीसट्टी में

पूर्वाह्न का समय है । मैं सागभाजी खरीदने निकल पड़ता हूं घर से । मेरे घर से कोई तीनएक सौ मीटर की दूरी पर सब्जीसट्टी है, जहां सागसब्जी का कारोबार प्रातः करीब छः बजे आरंभ हो जाता है और दोपहर तक चलता है । शहर के पास के गांवों से किसान ताजा सब्जी ले आते हैं और वहां सब्जी कारोबारियों को बेच जाते हैं । थोक कारोबारियों के साथ-साथ फुटकर विक्रेताओं की भी दुकानें वहां सज जाती हैं ।

मैं सागसब्जी खरीद चुकने के बाद एक भुट्टा-विक्रेता (यानी मक्के की बाल बेचने वाले) के पास पहुंचता हूं । पूछता हूं, “क्या हिसाब है भई भुट्टा ?”

जवाब मिलता है, “सोलह रुपये ।”

“सोलह रुपये ? सोलह रुपये दर्जन (गिनती के दर्जन भर बालें सोलह रुपये में) या …?”

“सोलह रुपये किलो, बाबू जी ।”

“सही हैं दाम ?” मैं यूं ही पूछ लेता हूं । मोलभाव का कोई इरादा नहीं मेरा, फिर भी देखना चाहता हूं कि क्या कहता है वह ।

“अरे बाबूजी बाजार में देख लीजिए न, कम में कहां मिल रहा है । आप तो रोज के खरीददार हैं, आपसे अधिक दाम वसूलेंगे क्या ?”

उसका अंतिम वाक्य सुनकर मैं मन ही मन मुसकराता हूं । ‘मैं रोज का गाहक हूं’ वह कहता है, क्या वाकई ? हर किसी से यही रटा-रटाया वाक्य बोलना बेचारे का ‘धर्म’ बन चुका है । इस बार के मौसम में मैंने मुश्किल से तीन या चार बार ही भुट्टा खरीदा होगा और वह भी कभी किसी से तो कभी किसी और से । इस व्यक्ति से तो पहली बार । याद नही आता कि पहले कभी उससे खरीदा भी है । हाल-फिलहाल तो नहीं । मैं उससे एक किलो बालें तौलने को कहता हूं । मैं छांटकर उसे सौंपता हूं, गिनती की कुल छः बालें तराजू पर चढ़ती हैं ।

इस बीच चढ़ती उम्र के एक सज्जन वहां पहुंचते हैं और भुट्टे वाले से विक्री दर के बारे में पूछते हैं । विक्रेता कहता है, “अरे साहब यही सोलह-बीस रुपया किलो चल रहा है ।”

“अरे भई हम तो रोज के हैं न, ठीक-ठीक लगाओ ।” इतना कहते हुए वे बालें छांटने लगते हैं । तब तक भुट्टे वाला मेरे लिए तौल चुका होता है । गिनती की छः बालें मैं अपने झोले में भर लेता हूं । जब तक जेब से पैसा निकालकर उसे दूं तब तक वह उन सज्जन द्वारा छांटी गयीं बालें तराजू पर रख तौलने लगता है । मेरी नजर उनकी गिनती करने लगती है, जिज्ञासावश । छः बालें, वही संख्या जो खरीद में मुझे मिलीं और लगभग वैसी ही, उन्नीस-बीस । दूसरे पलड़े पर देखता हूं कि एक किलो के साथ सौ ग्राम (शायद; या पचास का हो) का बांट रखा है । वह एक बाल हटाने की कोशिश करता है । वह सज्जन रोकते हुए कहते हैं, “अरे रखो, रखो उसे भी । रोज के गाहक हैं हम और तब भी सोने के माफिक तौलोगे क्या ?”

भुट्टे वाला उनकी बात रख लेता है । मैं उसे पैसा देता हूं और घर लौट चलता हूं । रास्ते में सोचता हूं कि क्या उस बेचने वाले ने उन्हें कुछ सस्ता दिया होगा ? मुझे शंका होती है । कहीं ऐसा तो नहीं कि वह उनके मोलभाव के तरीकों से परिचित हो और अपने मुनाफे को बनाये रखने के लिए कोई तरीका अपनाता हो अन्यथा उनके तौलते समय भी लगभग उतनी ही बालें चढ़ी जितना मेरी खरीद के समय । और बांट ? एक किलो के ऊपर । उसने कही उन्हें दिखाने भर के लिए सौ-पचास का अतिरिक्त बांट तो नहीं रखा था ?

यह तो रहा घटना का एक पहलू, दूकानदार से संबंधित । दूसरा पहलू देखिए: मेरा उन सज्जन से औपचारिक परिचय नहीं है, किंतु मुझे मालूम है कि वे हिंदू विश्वविद्यालय में हैं, जहां पहले कभी मैं भी कार्यरत था । मेरे अनुमान में वे कृषि संकाय में अध्यापक हैं । अब तक काफी वरिष्ठता पा चुके होंगे । आज के दिन साठ-सत्तर हजार रुपये से कम की माहवारी तनख्वाह नहीं होनी चाहिए उनकी । तब एक अदने दुकानदार से खरीद-फरोख्त में एक-दो रुपये उनके लिए कोई माने रखते हैं क्या ? उसके विपरीत अगर दो-एक रुपये अतिरिक्त उस आदमी को मिल ही जाते तो उसके लिए अवश्य माने रखता । इतनी उदारता तो उनके सामर्थ्य में है ही !

पर आम जिंदगी में उदारता कम ही देखने को मिलती है । मेरे जीवन का अनुभव है कि सामान्यतः हर व्यक्ति कम से कम खोते हुए अधिकाधिक लाभ प्राप्त करना चाहता है । वह ऐसा चिंतन-मनन के बाद लिए गये निर्णय के आधार पर नहीं करता है, बल्कि ऐसा उसके स्वभाव में निहित रहता है । जब तक सागसब्जी वाले से मोलभाव न कर लें कुछ लोगों को तसल्ली नहीं होती है । और सब्जी वाले भी इस बात को बखूबी समझते हैं और अपने भाव उसी के अनुरूप बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं । असल में हमारी सामुदायिक जिंदगी कुछ यूं ही चलती है । – योगेन्द्र

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Filed under अनुभव, आपबीती, किस्सा, लघुकथा, हिंदी साहित्य, Short Stories

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