जातीय अभिमान का एक उदाहरण

जातीय मानसिकता हमारे हिंदू समाज की विशेषता कही जाती है, एक ऐसी विशेषता जिस पर गर्व नहीं किया जा सकता है और न ही जिसे उचित ठहराया जा सकता है । जातीय व्यवस्था को प्राचीन काल की वर्णाश्रम व्यवस्था का विकृत रूप माना जा सकता है । वर्णाश्रम को स्वयं में कोई दोषपूर्ण सामाजिक व्यवस्था कहना ठीक नहीं होगा, क्योंकि उसके सैद्धान्तिक आधार में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है । किंतु क्या प्राचीन काल में उन सिद्धांतों का पालन समुचित रूप से समाज में हो रहा था इस प्रश्न का उत्तर असंदिग्ध हां में दे पाना कठिन है । कदाचित् आरंभ में व्यवस्था ठीक चली हो, परंतु कालांतर में वर्णभेद सामाजिक भेदभाव और ऊंचनीच का आधार बन गया हो, जिसने अंततः आज के जातिगत भेदभाव का रूप ले लिया हो ।

क्या यह जातीय मानसिकता हिंदू समाज तक ही सीमित है ? मुझे लगता है कि यह भारतीय उपमहाद्वीप की विशेषता है और इस क्षेत्र के अन्य धर्मावलंबियों में भी व्याप्त है, भले ही वह खुलकर देखने को न मिले । मैंने सुना है कि अपने देश में मुस्लिमों और सिखों में भी ऊंचनीच की बातें प्रचलित हैं । यह एक तथ्य है कि आज के हिंदुस्तानी गैरहिंदुओं के पूर्वज प्रायः हिंदू ही थे, जिन्होंने परिस्थितिवश अन्य धर्म स्वीकार तो कर लिया, लेकिन जो जातीय दृष्टि से ऊंचे या नीचे होने के भाव से मुक्त नहीं हो सके । जिनके पूर्वज पहले कभी बतौर हिंदू के तथाकथित उच्च जाति में थे, वे धर्मांतरण के बाद भी अपने को ऊंचा समझते रहे । पीढ़ियों पहले की हिंदू पृष्ठभूमि से जुड़े ऐसे विचार वास्तविक हैं इस बात का अनुभव मुझे अपने इंग्लैंड प्रवास में हुआ था, जिसका उल्लेख मैं यहां पर कर रहा हूं । (जातीय मानसिकता का एक किस्सा मैं पहले भी अन्य पोस्ट (क्लिक करें) में बयान कर चुका हूं ।)

कोई ढाई दशक पहले मैं दक्षिणी इंग्लैंड के साउथहैम्पटन विश्वविद्यालय में वैज्ञानिक उच्चानुशीलन के लिए गया हुआ था । अपने वहां के प्रवास के समय मेरा परिचय एक पाकिस्तानी शोधछात्र से हुआ था, लगभग मेरा हमउम्र और इस्लाम-धर्मावलंबी । मुझे उसका नाम अब ठीक-ठीक याद नहीं है; इतना ही अब याद आता है कि उसका पारिवारिक नाम (सर्नेम) रफीक था । हम दोनों की भेंट यदाकदा हो जाया करती थी । हमारी परस्पर बातचीत हिंदुस्तानी में ही हुआ करती थी । भेंट होने पर रफीक ‘नमस्ते’ कहकर मेरा अभिवादन करता था । वह जानता था कि कई हिंदीभाषी हिंदू अभिवादन के तौर पर ‘नमस्ते’ का प्रयोग करते हैं । यहां पर इतना बता दूं कि हिंदुस्तानी और पाकिस्तानी अपने-अपने घरों, यानी देशों, में रहकर एक-दूसरे को जितना भी भला-बुरा कहें, इंग्लैंड प्रवास के दौरान उनके संबंध पर्याप्त मैत्रीपूर्ण और घनिष्ठ रहते हैं । यह बात उत्तरभारतीय हिंदीभाषियों पर खास तौर पर लागू होती है । इसका कारण उनके खान-पान और बोली में पर्याप्त समानता का होना कहा जायेगा । अस्तु, जातीयता संबंधी अपनी आंरभिक बात पर लौटता हूं ।

एक बार रफीक और मेरे बीच की बातचीत में संयोगवश जातीयता का जिक्र आ गया । प्रसंग क्या रहा होगा अब ध्यान में नहीं आता है, किंतु उसके दो-चार शब्द मेरे स्मरण में आज भी हैं । रफीक बोला “भाई साहब, आपको बताऊं, हम राजपूत यानी क्षत्रिय मुसलमान हैं ।”

मेरे यह पूछने पर कि राजपूत मुसलमान होने का मतलब क्या है, उसका जवाब था “असल में हमारे पुरखे राजस्थान के रजवाड़े या उनके खानदान से थे । धर्मांतरण के बाद वे मुसलमान हो गये, लेकिन हमारी जाति अन्य मुस्लिमों से ऊपर रही है । हम ऐसे-वैसे मुसलमान नहीं हैं; हम तो अपने को औरों से ऊंचा मानते हैं ।”

उसकी बात में जातीय गर्वानुभूति की झलक मुझे मिल रही थी । इस संबंध में रफीक से अन्य क्या बातें हुईं अब याद नहीं, लेकिन उसके राजपूत मुस्लिम होने के गर्व का खयाल मुझे आज भी आ जाता है । मुझे लगता है कि वंशानुगत श्रेष्ठता की भावना सभी समाजों में कमोबेश मौजूद रहती है । – योगेन्द्र

1 टिप्पणी

Filed under अनुभव, आपबीती, मानव व्यवहार, लघुकथा, हिंदी साहित्य, Short Stories

One response to “जातीय अभिमान का एक उदाहरण

  1. rakeshkoshi

    यह सब अहम के ही विभिन्न रूप है

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