टेलीफोन नंबर 911 और पुलिस

इस समय मैं अमेरिका की ‘सांता क्लारा’ नगरी में हूं, करीब एक माह के प्रवास पर । यह स्थान कैलिफोर्निया राज्य की सिलीकॉन वैली में वहां के बड़े शहर ‘सान होजे’ से लगा हुआ और अंतरराष्ट्रीय महत्त्व के शहर ‘सान फ्रांसिस्को’ के हवाई अड्डे से साठ-पैंसठ किलोमीटर दूर है । मैं पहले भी एक बार यहां आ चुका हूं । मेरे बेटे, जिसके आग्रह पर मैं तब और इस बार दुबारा यहां आया, ने पहली बार के आगमन पर यहां के नियम-कानूनों का एक संक्षिप्त परिचय मुझे दिया था, ताकि मैं कहीं अनजाने में उनका उल्लंघन न कर बैठूं । तब उसने स्पष्ट किया था कि नियमों के उल्लंघन का मामला पुलिस की नजर में आने पर दंडात्मक काररवाही भुगतनी पड़ सकती है, और किसी प्रकार की रियायत की अपेक्षा उनसे नहीं की जा सकती है ।

तब उसने दो बातों पर खास जोर डाला था । पहला तो यह कि कार में बैठने पर हर यात्रिक (पैसेंजर) को ‘सीट बेल्ट’ बांधना या पहनना अनिवार्य है, और यह वाहन चलाने वाले की जिम्मेदारी होती है कि वह सभी यात्रिकों द्वारा ऐसा कर लेना सुनिश्चित कर ले । लापरवाही होने पर दो-तीन सौ डालर (दस-बारह हजार रुपये) के अर्थदंड (फाइन) के लिए तैयार रहना पड़ता है । यातायात संबंधी किसी भी नियम के उल्लंघन पर इसी प्रकार का दंड देना पड़ता है । उसने मुद्दे की गंभीरता समझाने के लिए अपने तथा परिचितों के दो चार अनुभव भी मुझे सुनाये थे । उसने दूसरी बात यह बताई कि पैदल चलने वालों को भी सड़क पार करते समय विशेष सावधानी बरतना आवश्यक होता हैं । आम तौर पर सड़क पर चलने की मनाही रहती है । सड़क के किनारे-किनारे बने पैदल मार्ग पर ही चलने की अनुमति रहती है, और जहां ऐसा मार्ग न हो वहां पैदल चलना मना रहता है । नियमों के विरुद्ध चलने पर दो सौ डालर का अर्थदंड । उसने सड़क पार करने के तौर-तरीके भी समझा दिये थे । मेरे लिए यही जानकारी आवश्यक थी, क्योंकि मैं सुबह-शाम नियमित रूप से टहलने के लिए निकला करता था ।

एक बात, जो मेरे बेटे ने शायद मुझे नहीं बताई थी, या कभी बताई हो तो मेरे ध्यान में नहीं है, यह है कि पूरे अमेरिका में आपात्कालीन सेवा के लिए टेलीफोन नंबर 911 नियत किया गया है । इस सेवा के अंतर्गत पुलिस, अग्निशमन तथा आकस्मिक चिकित्सा शामिल रहते हैं । अगर आप टेलीफोन पर यह नंबर घुमा भर दें, ताकि दूसरी तरफ टेलीफोन की घंटी बज उठे, तो ये सेवाएं तुरंत हरकत में आ जाती हैं । यह आवश्यक नहीं कि पुलिस बगैरह आपसे कोई विवरण जानना चाहें । कितनी गंभीरता से आपात्कालीन सेवा ली जाती हैं इसका अनुभव मुझे हाल में चौदह-पंद्रह दिन पहले हुआ ।

मेरे बेटे के घर पर जो टेलीफोन सेवा उपलब्ध है उसमें अमेरिका से बाहर अन्य देश के टेलीफोन पर संपर्क साधने के लिए डायल किये जाने वाले नंबर के प्रथम तीन अंक 011 रहते हैं । तत्पश्चात् संबंधित देश के कोड, जो अमेरिका में भारत के लिए 91 है, के दो अंक डायल करने होते हैं, और उसके बाद देश के भीतर का वांछित टेलीफोन नंबर । एक दिन मैं अपने देश में छोटे बेटे को फोन करने में जुट गया । जैसा कह चुका हूं, मुझे टेलीफोन के ‘नंबर पैड’ पर 01191… इत्यादि टाइप करना था । मुझसे शायद गलती से आरंभिक अंक 0 (शून्य) के बदले 9 (नौ) दब गया और फलतः 91191… आदि अंक टाइप हो गये । टेलीफोन ने इस नंबर के आंरभिक तीन अंकों 911 को स्वीकारते हुए आपात्कालीन सेवा को डायल कर दिया । कुछ ही क्षणों में टेलीफोन सेवा से जवाबी फोन आ गया कि क्या वास्तव में कोई आकस्मिक समस्या हम लोगों के सामने आ गयी है, यदि हां तो किस प्रकार की समस्या है वह । मेरा बेटा माजरा तुरंत समझ गया । उसने मेरे हाथ से टेलीफोन का चोंगा ले लिया और दूसरे पक्ष को नकारात्मक उत्तर देते हुए समझा दिया कि फोन गलती से लग गया था । बात आयी-गयी हो गयी ।

लेकिन कोई पांच-सात मिनट बीते ही होंगे कि घर के प्रवेश-द्वार की घंटी बज उठी । दरवाजा खोला गया तो देखा कि सामने गहरे नीले रंग का परिधान पहने हुए और कंधे/बांह पर पुलिसिया प्रतीकों को धारण किए हुए एक ‘पुलिसमैन’ खड़ा है । एक-दो क्षण तक हम लोग भौंचक्के-से देखते रह गये, और फिर संभलते हुए उसे पूरी घटना समझा दी । पुलिस का वह कर्मचारी जल्दी ही आश्वस्त हो गया कि हम लोगों के साथ कुछ गंभीर नहीं घटा है । लौटते-लौटते उसने खुद ही यह बात कही कि हिंदुस्तानियों के साथ ऐसी घटनाएं अक्सर होती हैं, क्योंकि टेलीफोन पर वे शून्य के स्थान पर गलती से कभी-कभी नौ दबा बैठते हैं (गौर करें कि टेलीफोन के नंबर पैड पर शून्य तथा नौ के अंक एकदम पास-पास होते हैं ), और तब ‘टेलीफोन कॉल’ आपात्कालीन सेवा को पहुंच जाती है । ऐसे अवसर पर पुलिस सबसे पहले हरकत में आती है, क्योंकि उनकी गाड़ियां शहर में लगातार यत्र-तत्र चक्कर लगाती रहती हैं । टेलीफोन करने वाले के पते पर सबसे निकट वाला पुलिसमैन तुरंत ही पहुंच जाता है ।

पुलिस विभाग की त्वरित कार्यवाही में जुट जाने की संस्कृति एक भारतीय के नाते मेरे लिए अकल्पनीय है ।
अमेरिका में किसी दुर्घटना की खबर और उससे संबंधित समस्त जानकारी बिजली की गति से सभी संबंधित पक्षों को सेकंडों या मिनटों में मिल जाती है । खेद होता है यह देखकर कि हमारे देश में टेलीफोन या गाड़ी के नंबर के आधार पर किसी व्यक्ति का पता खोजने में पुलिस विभाग को कई-कई दिन लग जाते हैं । पाठकों को मेरा यह कहना अप्रिय लगेगा (क्षमा करें) कि अगर उपर्युक्त घटना अपने यहां घटी होती और पुलिसमैन अपने दरवाजे पर पहुंचे होते तो वे दो-चार गालियां दे गये होते, या दस-बीस रुपये वसूल कर ले गये होते । हमारे देश में अमेरिका की नकल करने का फैशन चल पड़ा है, लेकिन कार्यसंस्कृति के मामले में उनसे कुछ सीखने का विचार हमारे मन में नहीं आता । इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि अमेरिका की भौगोलिक सीमाओं के भीतर कोई आतंकवादी घटना नहीं घटती है, क्योंकि वहां के कभी सरकारी विभाग मुस्तैदी से कार्य करते हैं । अपने यहां ? – योगेन्द्र जोशी

4 टिप्पणियाँ

Filed under अनुभव, आपबीती, किस्सा, लघुकथा, हिंदी साहित्य, Short Stories

4 responses to “टेलीफोन नंबर 911 और पुलिस

  1. आपका ये प्रवास सुखमय हो इसी की कामना है।

    वैसे आजकल गाड़ी की सीटबेल्ट न बाँधने वालों पर फ़ाइन होती है (कनाडा में), न कि ड्राइवर पर और पाइंट्स कटते हैं, सो अलग।

  2. सही कहा दो-चार गालियाँ दे जाता और दस बीस में तो कहाँ मानते हैं आजकल महँगाई हो गई है। परंतु ये भी सत्य है कि आपदा प्रबंधन को जिस गंभीरता से लिया जाना चाहिये वह गंभीरता नहीं है।

  3. जोशी जी कमाल है साँटा क्लारा मे मैं दो माह रह कर आयी तब पता होता तो आप से जरूर मिलती। मेरी बेटी रहती है साँटा क्लारा मे आज वो भारत आ रही है कुछ दिन के लिये।यह्aaMM aur vaha MMमे फर्क ये है कि वहाँबडे से बडा व्यक्ति भी छोटे सेछोटे नियम को मानता है और यहां बडे से बडे नियम को भी छोटे से छोट व्यक्ति भी धत्ता बता देता है राष्ट्रियता का अभाव है बस शुभकामनायें अगले साल शायद फिर आऊँ तो आपसे मुलाकात जरूर करूँगी

  4. RAJNISH PARIHAR

    बस यही बुनियादी फर्क है,हम उनकी फालतू बातें तो तुंरत ही ग्रहण कर लेते है जबकि अन्य काम की बातों को हलके में लेते है!तभी तो हमारे यहाँ ऐसी कल्पना भी नहीं कर सकते..!फिर अपनी पुलिस के तो क्या कहने!!!

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