आरक्षित रात्रिकालीन रेलयात्रा और तिथि-वार का भ्रम

रेलगाड़ी से यात्रा करना कभी-कभी असामान्य अनुभव दे जाता है, ऐसे अनुभव जो कभी आनंदित कर जाता है तो कभी परेशानी में डाल देता है और कभी आपको एक नसीहत दे जातक है । चार-छः रोज पहले की एक ऐसी ही स्मरणीय घटना का जिक्र मैं यहां पर कर रहा हूं । बात तब की है जब मैं दिल्ली से वाराणसी की रेलयात्रा शिवगंगा एक्सप्रेस नाम की गाड़ी से कर रहा था, जो संध्याकाल दिल्ली से रवाना होती है और दूसरे दिन प्रातः अपने गंतव्य वाराणसी पहुंचती है । गाड़ी रात के करीब एक बजे कानपुर पहुंचती है, जहां पर कई यात्री चढ़ते-उतरते हैं ।

जैसा आम तौर पर होता है, गाड़ी के किसी बड़े रेलवे स्टेशन पर ठहराव के समय प्लेटफार्म पर ही नहीं आरक्षित डिब्बों के भीतर भी हलचल शुरू हो जाती है । अधिकांश यात्रियों की नींद ऐसे अवसरों पर खुल ही जाती है, भले ही घनघोर निद्रा का अर्धरात्रि से अधिक का समय ही क्यों न हो । डिब्बे के भीतर की चहल-पहल और शोर-शराबे में मेरी भी नींद खुल गयी । तब मैंने देखा की अनुमानतः अधेड़ अथवा उससे कुछ कम उम्र की एक महिला अपनी शायिका (बर्थ) खोज रही हैं । मैंने अक्सर देखा है कि अधिकांश रेलयात्री यह हिसाब नहीं लगा पाते हैं कि डिब्बे के अंदर उनकी आरक्षित शायिका कौन-सी और कहां पर होनी चाहिए । उन्हें शायिका-संख्या के लिए डिब्बे की दीवालों पर लगी चिप्पियों पर गौर से नजर डालनी पड़ती है । सीधे अपनी शायिका तक पहुंचना कोई कठिन काम नहीं है, क्योंकि शायिकाएं सुनियोजित रूप से क्रमांकित रहती हैं । अस्तु, मैंने उनकी शायिका संख्या 49 (निचली) की ओर इशारा किया । उन्होंने अपना सामान वहां फर्श पर रखा और आश्वस्त होकर शायिका पर बैठ गयीं ।

कुछ ही सेकंड या मिनट भर का समय गुजरा होगा कि एक और यात्री वहां पहुंचा, तकरीबन पैंतीस वर्ष का युवक । उसने भी उसी शायिका (संख्या 49) पर अपने आरक्षण का दावा पेश किया । दोनों के पास आरक्षण का टिकट था और दोनों ही का ही दावा था कि उसी शायिका पर उनका आरक्षण है । दोनों भ्रमित थे और अपने-अपने दावे को सही बता रहे थे । यह जरूर था कि महिला का आरंभिक आरक्षण प्रतीक्षा संख्या 1 के साथ हुआ था, और उसके कथनानुसार पहले दिन पूर्व ही शायिका संख्या 49 के आबंटन के साथ ही उसके आरक्षण की पुष्टि (कंफर्मेशन) हो गयी थी । मेरी जानकारी के अनुसार प्रतीक्षा सूची के यात्रियों के आरक्षण की पुष्टि भले ही बाद में हो जाए, किंतु किसको कौन-सी शायिका मिलेगी यह आरक्षण-चार्ट बनते समय ही नियत होता है । तब उस महिला को कैसे यात्रा से एक दिन पहले ही शायिका संख्या की जानकारी मिल गयी यह प्रश्न मेरे लिए अनुत्तरित था । हो सकता है मेरी जानकारी सही न हो । खैर, मैंने उन दोनों के बीच की समस्या में अपने को उलझाने की जरूरत नहीं समझी । गनीमत की बात यह रही कि दोनों आपस में नहीं झगड़े, बल्कि दोनों ने संचालक (कंडक्टर) का इंतजार करना या उसको खोजना ही मुनासिब समझा ।

अब तक गाड़ी कानपुर स्टेशन छोड़ चुकी थी । कुछ ही मिनटों के पश्चात् डिब्बे में नये प्रविष्ट यात्रियों के टिकटों की पड़ताल करते हुए कंडक्टर वहां पहुंचा । दोनों यात्रियों ने शायिका संबंधी समस्या उसके समक्ष रखी । एकबारगी वह भी चकरा गया । उसके पास उपलब्ध आरक्षण सूची में उस महिला का कहीं नाम नहीं था । उसके टिकट पर प्रतीक्षित ही तो लिखित था । फलतः उसने उस युवक को सूची के अनुरूप शायिका सोंप दी । महिला बार-बार जोर डाल रही थी कि रेलवे अंतरजाल (इंटरनेट) पृष्ठों के अनुसार उसे आरक्षण मिल चुका था । कंडक्टर “अच्छा देखते हैं” कहते हुए उस समय आगे बढ़ गया । इस बीच महिला ने अपने घर मोबाइल से भी बात की और वहां से जवाब मिला कि आरक्षण तो होना ही चाहिए । तो गड़बड़ कहां हुई ? महिला की बातों से लग रहा था कि वह झूठ नहीं बोल रही थी । अवश्य उसे और उसके घर वालों को धोखा हो गया था । सच पूछें तो उस मामले से मेरा कोई वास्ता नहीं था, फिर भी मुझे जिज्ञासा हो रही थी कि जानूं माजरा क्या है ।

अंत में घूम-फिरकर कंडक्टर दुबारा वहां पहुंचा । उसने महिला के टिकट पर एक बार फिर से नजर दौड़ाई । पहली नजर में टिकट ठीक ही लग रहा था । तब आरक्षण सूची में उसका नाम क्यों नहीं है इसे शायद वह भी नहीं समझ पा रहा था । उसने टिकट पर की एक-एक प्रविष्टि को दुबारा गौर से देखना आरंभ किया । ‘यात्रा की तिथि’ पर पहुंचते ही माजरा उसके समझ में आ गया । उसने साश्चर्य महिला से कहा, “बहिनजी, आपकी ट्रेन तो कल ही जा चुकी है । इस पर तो 23 की तारीख (शुक्रवार) अंकित है, और आज 24 तारीख (शनिवार) है । यह टिकट तो अब वैलिड ही नहीं है ।” इस जानकारी से महिला चौंक उठी और बोली, “यह भला कैसे हो सकता है ?” कंडक्टर ने पूरी बात महिला को समझाई । आगे क्या हुआ होगा, आप अंदाजा लगा सकते हैं । महिला अब कुछ कर नहीं सकती थी, उसे तो यात्रा पूरी करनी ही थी । हमारे समाज की ‘आदर्श मानवीय’ परंपरानुसार कुछ लेन-देन हुआ, और उसके गंतव्य तक की यात्रा की व्यवस्था कर दी गयी ।

उस पूरे वाकये के दौरान मेरी नींद उचट गयी थी । डिब्बे के बल्बों को बुझा दिये जाने के बाद मैंने फिर से सोने की चेष्टा की । मैं इस पर विचार करने लगा कि क्यों 23 तारीख के आरक्षण के बावजूद वह महिला 24 को यात्रा करने निकल पड़ी । किस भ्रम में वह और उसके घर के सदस्य यात्रा की असल तिथि भूल गये । इसका रोचक कारण मेरे समझ में आ गया । असल बात यह है कि भारतीय परंपरा में नयी तिथि तथा नये दिनवार की शुरुआत सूर्योदय के साथ मानी जाती है । जब मनुष्य रात की नींद के बाद सुबह उठता है तो उसे एक नये दिन के आरंभ होने की स्वाभाविक अनुभूति होती है, और उस नये दिन से वह सहज रूप से नई तिथि भी जोड़ लेता है । लेकिन जिस ‘कलेंडर’ को वैश्विक स्तर पर अब अपनाया जा चुका है, उसके अनुसार अर्धरात्रि के समय (24:00 बजे) अगली तारीख और अगला वार क्रमानुसार आरंभ हो जाते हैं । घड़ी से अर्धरात्रि के आगमन का पता चल जाता है और यदि व्यक्ति सचेत रहे तो एक नये दिन के आरंभ को भी वह मान लेता है । किंतु अर्धरात्रि कोई ऐसा एहसास नहीं दिलाती है जिससे एक नयी तारीख की अनुभूति होवे । वस्तुतः हम पूरे रात की तारीख दिन तथा संध्याकाल की सततता के रूप में देखने के आदी होते हैं । ऐसे में रात्रि के बारह बजने के बाद भी अपरिवर्तित तारीख की भूल कर बैठते हैं । पूरी रात को एक ही तारीख से जोड़कर देखना सामान्य भूल होती है । उस महिला को यह ध्यान ही नहीं रहा होगा कि 23 तारीख का 01:00 बजे का समय वास्तव में 22 तारीख की अर्धरात्रि के 24:00 बजने के घंटे भर बाद आ जाता है, न कि 23 तारीख के पूरे दिन बीतने के बाद की अर्धरात्रि के बाद । रात्रिकालीन तारीख के बारे में भ्रम कई लोगों में देखा जाता है । वास्तव में जो सावधानी बरतने के आदी होते हैं वे उपर्युक्त रात की तारीख को 22-23 की रात्रि कहकर स्पष्ट करते हैं । उस महिला ने गलती यह कर डाली कि 23 तारीख की 01:00 ए.एम. को 23-24 की अर्धरात्रि के बाद का समय मान बैठी ।

उक्त घटना में यह संदेश निहित है कि अर्धरात्रि के बाद की यात्र के समय तथा दिनांक पर सावधानी से विचार करना आवश्यक है, अन्यथा उपरिवर्णित घटना के समान ही बहुत कुछ अनुभव करना पड़ सकता है । – योगेन्द्र जोशी

3 टिप्पणियाँ

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3 responses to “आरक्षित रात्रिकालीन रेलयात्रा और तिथि-वार का भ्रम

  1. ये वाकया अच्छे-अच्छों के साथ हो जाता है-हम दो बार भुगत चुके है। जिस गाड़ी से उतरे थे जरनी ब्रेक करने के लिए उसी गाडी का आगे का टिकट था सिर्फ़ कोच और सीट बदली थी गाड़ी वही थी,
    रेल्वे के समय का ध्यान रखना आबश्यक है। अन्यथा व्यर्थ मे परेशानी उठानी पड़ती है, जानकारी के लिए आभार्।

  2. अब क्या कहें हम भी एक बार भुगत चुके हैं !

  3. K.VERMA

    humbhi ek bar 360 rupaye ki chapat lagwa chka hoon …dhnywad

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