प्रतिष्ठा का सवाल: खरीदारी महंगी कार की

प्रदर्शन की लालसा या प्रवृत्ति प्रायः हर मनुष्य के व्यक्तित्व का एक खास पहलू होता है । मैं इसे एक हानिकारक कमजोरी के रूप में देखता हूं, क्योंकि मानव समाज की कई समस्याओं का मूल इसी में देखा जा सकता है । उदाहरणार्थ, हमारे समाज में संपन्न व्यक्तियों के यहां तड़क-भड़क के साथ विवाह रचे जाते हैं, दूसरों को अपनी हैसियत और दौलत दिखा-दिखाकर । देखा-देखी में अन्य लोग भी ऐसे ही प्रदर्शन के चक्कर में पड़ जाते हैं, भले ही उनकी हैसियत कमतर हो । ऐसे मौकों पर धन की जो बरबादी होती है उसका समाजोपयोगी कार्यों में निवेश हो सकता है, किंतु ऐसा होता नहीं है ।

कम ही लोग होते हैं, जो इस प्रवृत्ति से मुक्त हों, संस्कारवश अथवा आत्मसंयम के द्वारा । जो लोग ऊपरी तौर पर दिखावे की मानसिकता से मुक्त दिखते हैं उनमें अधिकतर वे होते हैं जिनके पास इतना कुछ नहीं होता है कि प्रदर्शन कर सकें; उनकी मजबूरी होती है । दिखावे की बात में बहुत कुछ शामिल हो सकता है; जो कुछ भी आपके पास हो, और जो सामान्यतः कम ही लोगों के पास हो । जैसे औरतों के मामले में दैहिक सौंदर्य तथा आकर्षक आभूषण । पुरुषों के लिए लंबी-चौढ़ी, गठी हुई काया । गोरापन तो सबके लिए ही आकर्षण की चीज है । जो किसी कला में विशेष रूप से पारंगत होता है, वह मन ही मन यह सोचकर प्रमुदित होता है कि अन्य जन उस कला को ईर्ष्या की दृष्टि से देखते हैं । जिसके पास विशेष बौद्धिक क्षमता होती है वह भी अपनी तेज बुद्धि प्रदर्शित करने के अवसर नहीं छोड़ता है । हर चीज का प्रदर्शन हर समय, हर जगह, संभव नहीं होता है । परंतु एक चीज है जिसके प्रदर्शन के अवसर नहीं खोजने पड़ते हैं, वह है धन-संपदा, दौलत । और यह प्रदर्शन है जिसने आज के जमाने में अन्य सब चीजों को पीछे छोड़ दिया है । आपके रहन-सहन के स्तर पर तो लोगों की दृष्टि न चाहते हुए भी पड़ ही जायेगी । आप सड़क पर ऐसी कार में बैठकर निकलें जिसके टक्कर की पूरे मुहल्ले या इलाके में इक्का-दुक्का ही हो तो भला किसकी नजर आपकी संपन्नता पर नहीं पड़ेगी, कौन आपकी दौलत का कायल नहीं होगा ?

दिलचस्प बात तो यह है कि प्रदर्शन का रोग व्यक्तियों तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि इसकी चपेट से समाज के विभिन्न समुदाय और राष्ट्र भी नहीं बचे हैं । विश्व के संपन्न एवं सक्षम देश उन मौकों को हाथ से नहीं जाने देते हैं, जब वे दूसरों को मूक शब्दों में कह सकें कि देखा हम तुमसे कितना आगे हैं । ऐसे प्रदर्शनों को स्वस्थ और प्रतिष्ठात्मक माना जाता है । लेकिन जब प्रतिष्ठा के नाम पर प्रदर्शन करने के चक्कर में हम अपनी प्राथमिकताओं को ही भूल जायें, तब उसे क्या बुद्धिमत्ता कहेंगे ? निश्चय ही हम सबका उत्तर एक जैसा नहीं रहेगा; सोच अपनी-अपनी ।

खैर, बहस को लंबा खींचने की आवश्यकता नहीं है । इन बातों के माध्यम से मैं भूमिका बांध रहा था दिखावे के एक वाकये का जिक्र बयान करने के लिए । कोई तीन-चार साल पहले की बात है यह, सुनिए: मेरे एक परिचित हैं, पेशे से बैंक अधिकारी और ऋण लेन-देन के मामलों को जानने-समझने वाले । एक दिन वे मुझसे मिलने आए थे । अन्य बातों के अतिरिक्त पारिवारिक जनों की कुशल-क्षेम की बातें भी हमारी बातचीत का एक हिस्सा थीं । उनके छोटे भाई का जिक्र छिड़ने पर उन्होंने उसके प्रति अपनी नाखुशी और खिन्नता मेरे समक्ष कर व्यक्त कर दीं । उन्होंने बताया कि पेशे से चिकित्सक उनका छोटा भाई अब दिल्ली जैसे महानगर के एक निजी अस्पताल में कार्यरत है । उसका वेतन अच्छा है, किंतु इतना अधिक नहीं है कि बिना सोचे-समझे अनाप-शनाप खर्च करने के लिए पर्याप्त हो । वे बोले कि आजकल डाक्टरी पेशे में सुस्थापित होने में ही कई वर्ष लग जाते हैं । हर आदमी को व्यावसायिक जीवन के आरंभिक वर्षों में अपनी प्राथमिकताओं को सोच-विचार कर तय करना चाहिए और हिसाब-किताब लगाकर ही अपनी आमदनी को विभिन्न मदों पर खर्च करना चाहिए । मैं उनकी बातों से सहमत था ।

समस्या क्या है पूछे जाने पर वे बोले, “मेरे छोटे भाई को निजी वाहन, कार, चाहिए थी । ठीक है, दिल्ली जैसे महानगर में कार की काफी उपयोगिता है इसे मैं स्वीकारता हूं । मेरे वृद्ध हो रहे माता-पिता भी स्वास्थ्य संबंधी कारणों से उसी के साथ रहते हैं । उन्हें अस्पताल ले-जाने-लाने में, परिवार को सामाजिक समारोहों में ले चलने, अतिथियों की आवभगत करने आदि में कार की उपयोगिता मुझे भी दिखती है ।”

“तो ठीक है, खरीद ले न एक कार । कार रखने की उसकी हैसियत तो अब हो ही रही है । और कारें भी तो अब कितनी सस्ती हो चुकी हैं? ढाई-तीन लाख में !” मैंने अपना मत व्यक्त किया ।

“वह ढाई-तीन लाख की कार से खुश होता तब न ? यही तो समस्या है । उसे छः-सात लाख की कार चाहिए थी । और इतनी महंगी के लिए उसके पास जमा-पूंजी तो थी नहीं । लोन लेकर खरीद ली । मैंने समझाया था कि अभी सस्ती कार से काम चला लो दो-चार साल में जब तुम्हारी आर्थिक स्थिति मजबूत हो जाए तो दूसरी खरीद लेना । मुझे अंदाजा था ही पांच-सात लाख के लोन की अदायगी-किश्तें काफी भारी भरकम पड़ेंगी । बताया भी था कि खामखा उसे अपना बजट ‘टाइट’ करना पड़ेगा । मेरी माना नहीं ।”

मैंने सवाल किया, “आपने पूछा नहीं कि क्यों वह महंगी कार के चक्कर में था ।”

“पूछा, जरूर पूछा । उसका कहना था कि उसके अस्पताल में डाक्टरों के पास एक से एक बढ़िया कारें हैं, कइयों की तो ‘इंपोर्टेड’ । उनके बीच रहकर सस्ती कार ? इज्जत का सवाल था । भला संगी-साथी क्या सोचेंगे – बेचारा ढंग की कार भी नहीं रख सकता ! आप ही बताएं, फिर मैं भला क्या कहता ।”

आगे क्या बातें हुई माने नहीं रखती हैं । अपने अंतिम शब्दों के तौर पर यही कह सकता हूं कि ऐसी घटनाएं समाज में व्याप्त अपनी-अपनी हैसियत दिखाने की मानसिकता के द्योतक होती हैं । – योगेन्द्र जोशी

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