दहेज में कार: सामाजिक प्रतिष्ठा का सवाल

अपने देश की विशेषता को कई जन ‘अनेकता में एकता’ जैसे वाक्यांश से व्यक्त करते हैं । वास्तव में विलक्षण है अपना देश । यह विचित्रताओं, विसंगतियों, और विरोधाभासों का धनी है । यहां परस्पर विरोधी बातें एक साथ देखने को मिल जाती हैं और सामाजिक विकृतियों की भरमार है, जिनकी आलोचना विभिन्न मंचों से की जाती रही है । फिर भी वे परंपरा के नाम पर जीवित हैं और लोगों के द्वारा खुलकर अपनाई जाती हैं । ऐसी विकृति में एक है दहेज प्रथा । दहेज लेना तथा देना, दोनों, अनुचित हैं । यदि आप सर्वेक्षण पर निकल पड़ें तो शायद ही दो-चार लोगों को पायेंगे, जो दहेज को स्वीकार्य प्रथा के तौर पर मान्यता देते हों । अधिकांश लोग इसे कुरीति कहेंगे और इसके विपक्ष में बोलेंगे, परंतु जब उनके व्यवहार पर गौर करेंगे तो ठीक इसका उल्टा पायेंगे । उनका तर्क होगा ‘क्या करें जी, इसी समाज में रहना है, जो प्रचलित है उसके हिसाब से ही चलना होगा न !’ मतलब साफ है । किसी बात को सिद्धांततः अनुचित कहना एक बात है, और उस अनुचित बात को अमल में न लाना दूसरी बात । दोनों एक साथ देखने को मिलेंगी आपको अपने हिंदुस्तान में ।

जहां तक दहेज का सवाल है, मैंने अनुभव किया है कि एक ओर इसे निंद्य तथा त्याज्य घोषित किया जाता है तो दूसरी ओर इसे सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए आवश्यक समझा जाता है । अक्सर देखने में आता है कि वर के माता-पिता अधिक से अधिक दहेज मिले इसकी लालसा करते हैं । संपन्न होने पर कन्या के अभिभावक भी दहेज देने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं, और ऐसा करके वे अपनी ‘हैसियत’ दिखाने की अघोषित इच्छा पूरी करते हैं । हैसियत न हो तो भी कन्यापक्ष के लोग अपनी ‘इज्जत’ के लिए अच्छे दहेज के प्रबंध में जुट जाते हैं । मतलब यह कि दहेज दोनों ही पक्षों के लिए प्रतिष्ठा की बात होती है

कदाचित् कुछ लोग यह सोचते होंगे कि प्रेम-विवाह के मामलों में दहेज का सवाल और प्रतिष्ठा की बात नहीं उठती होंगी । यदि लड़का-लड़की घर वालों की मरजी के बिना ही विवाह करने पर तुल जायें तो बात अलग है । अन्यथा वहां भी दहेज की बात उठ ही जाती है, प्रतिष्ठा के नाम पर । लेकिन प्रतिष्ठा बचाने के चक्कर में दिलचस्प एवं असामान्य कदम भी कभी-कभी लोग उठाते होंगे, यह मैं कभी सोच नहीं सकता था । लेकिन हाल की एक रोचक घटना ने मेरी धारणा ही बदल दी । उसी का ब्यौरा आगे प्रस्तुत है ।

मेरे पड़ोस में वर्षों पहले एक परिवार रहता था । उस परिवार का दस-बारह साल का एक लड़का यदाकदा मेरे पास आया करता था अपनी पढ़ाई-लिखाई के संबंध में । मैं उसकी मदद कर देता था । तब उसके तथा मेरे बीच अच्छे संबंध स्थापित हो गये थे । बाद में वह परिवार दूसरे शहर चला गया था । उस लड़के का जब कभी मेरे शहर आना होता था तो मुझसे अवश्य मिल लेता था । साल-छः महीनों में कभी फोन वगैरह से भी वह मेरे हाल पूछ लेता था । अब तो वह पच्चीस-तीस साल का नौकरी-पेशा युवक है ।

एक दिन मध्याह्न में अप्रत्याशित रूप से वह मेरे घर पहुंच गया । हमारे बीच सामान्य शिष्टाचार तथा पारिवारिक कुशलक्षेम की बातें हुईं । जिज्ञासावश मैंने उसके आने का कारण भी पूछा । उसने बताया कि वह अपने एक मित्र के विवाहोत्सव में सम्मिलित होने आया है । वैवाहिक कार्य कब और कहां होना है इत्यादि की जानकारी भी मैंने उससे लेनी चाही । बातों-बातों में उसने कहा कि उसके मित्र का विवाह दरअसल प्रेम-विवाह है । मित्र के बताये अनुसार उसके परिवार के सदस्य आरंभ में उस रिश्ते के विरोध में थे । उसकी होने वाली पत्नी के घर वाले भी इच्छुक नहीं थे, क्योंकि दोनों पक्षों में जातीय भेद था ।

मेरे परिचित उस युवक ने विस्तार से बताना आरंभ किया कि पे्रमी युगल की जिद पर कन्यापक्ष तो तैयार हो गया; आखिर लड़की की शादी का सवाल जो था । हमारे हिंदू समाज में लड़की की शादी करना कोई आसान काम तो होता नहीं; कुछ नहीं तो दहेज की समस्या उठ खड़ी हो जाती है; उसी को लेकर बात बनते-बनते अक्सर बिगड़ जाती है । कन्या पक्ष को उम्मींद थी कि हांमी भरने पर दहेज की समस्या शायद न रहे ।

उधर प्रेमासक्त युवक के घर वाले भी जात्यंतर को लेकर विवाह के विरोध में थे । किंतु इससे बड़ी समस्या उनके सामने दहेज को लेकर थी । युवक के बड़े भाई की शादी दो-तीन वर्ष पूर्व बड़े धूमधाम से हुई थी और उसमें अच्छा-खासा दहेज भी परिवार को मिला था । तब संपन्न हुए विवाह को लेकर मित्रों-संबंधियों में प्रशंसात्मक चर्चा रही थी । पर इस बार उन लोगों को डर था कि दहेज से हाथ धोना पड़ेगा और उसके साथ ही उनकी ‘प्रतिष्ठा’ दांव पर लग जाएगी । बड़े भाई के मामले में स्वीकारे गये दहेज के मद्देनजर वे लोग दहेज के विरोधी तथा सादे विवाह के पक्षधर होने का दिखावा नहीं कर सकते थे ।

प्रेमी युगल युवक के परिवार की इच्छा के विरुद्ध अदालत या मंदिर में जाकर दांपत्यसूत्र में बंध सकता था, जैसा कि बहुधा सुनने को मिलता है । लेकिन वे इतना गंभीर कदम भी नहीं उठाना चाहते थे । अतः उनके प्रयास जारी रहे । अंत में वे सफल भी हो गये, लेकिन युवक के परिवार की दहेज की मांग पूरी किए जाने की शर्त पर ।

दहेज को लेकर एक दिलचस्प बात मेरे परिचित युवक को उसके मित्र ने बताई थी । वह यह कि दहेज में एक कार की मांग मित्र के परिवार वालों ने कन्यापक्ष के सामने रख दी, और कार भी ऐसी-वैसी नहीं, बड़ी तथा थोड़ी महंगी, छः-साड़े-छः लाख तक की, उनकी प्रतिष्ठा के अनुकूल । दहेज में कार की मांग आजकल सामान्य बात हो चुकी है इस बात को समझते हुए लड़की वाले कार के लिए राजी तो हो गये, परंतु महंगी कार उनके बजट में ‘फिट’ नहीं हो रही थी । वे अधिक से अधिक चार-साड़े-चार लाख तक खर्च करने को तैयार थे, लेकिन मांग पूरी करने में डेड़-दो लाख अधिक चाहिए थे । मामला कुछ पेचीदा होने जा रहा था । जहां एक पक्ष अपनी आर्थिक सीमा का हवाला देते हुए रियायत की मांग कर रहा था, वहीं दूसरा पक्ष अपनी इज्जत दांव पर लगी देख रहा था ।

जब महंगी कार की बात दूसरे शहर में नौकरी कर रहे उस प्रेमी युवक के कान तक पहुंची तो वह थोड़ा घबड़ाया । बड़े सौभाग्य से तो उसके विवाह का संयोग बन रहा था, और अब डर लग रहा था कि बात फिर कहीं अटक न जाए । उसने लाखएक का जुगाड़ अपनी जेब से किया और अपनी प्रेमिका के माध्यम से उनकी मदद कर दी । आखिर वह उस परिवार का भावी दामाद जो था । उसने सोचा कि विपदा में मदद करने का कर्तव्य उसे विवाह से पूर्व ही निभाना आरंभ करना चाहिए । इस मदद के बारे में किसी को पता न चले यह उसने स्पष्ट कर दिया था ।

उसी दौरान लड़की के पिता द्वारा वरपक्ष को मनाने का प्रयास भी चलता रहा । लड़के के पिता इस बात पर टिके रहे कि कार तो प्रतिष्ठा के अनुरूप ही रहनी है । कुछ सोच-विचार करने के बात समस्या सुलझाने हेतु उन्होंने खुद लाख-एक की मदद करने का प्रस्ताव लड़की के पिता के सामने रख दिया । लड़की वालों को राहत मिल जाये और वरपक्ष की इज्जत भी रह जाये इससे भली बात और क्या हो सकती थी । मेरा परिचित युवक उसी मित्र के पाणिग्रहण संस्कार में शामिल होने आया था इसी बात से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि आगे क्या हुआ होगा ।

उस विवाह के बारे में इतना सब बताने के बाद उस युवक ने टिप्पणी करते हुए कहा, “चाचाजी, दहेज को लेकर बनते हुए रिश्तों का टूटना अपने समाज में कोई नई बात नहीं है । दहेज के चक्कर में विवाहिताओं के प्रताड़ित किए जाने की घटनाएं भी सुनने में आती रहती हैं । लेकिन कन्यापक्ष से लिए जाने वाले दहेज में वरपक्ष भी अपना योगदान देता हो ऐसा आपने पहले कभी सुना है क्या ?”

मेरे समझ में नहीं आ रहा था कि उत्तर क्या दूं । मैंने हंसते हुए कहा, “अविश्वसनीय है यह वाकया, पर तुम कह रहे हो तो विश्वास करना ही पड़ेगा । झूठ तो मुझसे बोलोगे नहीं ।”

“विश्वास कीजिए, एकदम सच है ।” कहते हुए वह भी मेरे साथ हंस दिया । – योगेन्द्र जोशी
(अपनी जानकारी में आई एक घटना पर आधारित । यहां पर कुछ घुमा-फिराकर विवरण प्रस्तुत किया गया है, सकारण ।)

1 टिप्पणी

Filed under कहानी, लघुकथा, हिंदी साहित्य, Hindi literature, Short Stories

One response to “दहेज में कार: सामाजिक प्रतिष्ठा का सवाल

  1. shayad aapne pahli baar suna hai ..ye aam baat hai mujhe padhkar koi ascharya nahi hua..haan ye samaj ke liye chintan ki baat jaroor hai .samaj digbharamit ho chuka hai

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