हिंदी की दुरवस्था का एक अनुभव यह भी

मेरे मोहल्ले में बंदरों का आतंक छाया हुआ है । पहले यहां बंदर नहीं दिखाई थे, लेकिन कोई डेड़ दशक पहले उन्होंने अपने कदम यहां जो रखे तो उसके बाद लौटने का नाम नहीं लिया । तब सुना गया था कि संकटमोचन मंदिर (वाराणसीवासियों की असीम श्रद्धा का प्रतीक प्रख्यात हनुमान् मंदिर) से खदेड़े जाने पर ही उन्होंने इस मोहल्ले में शरण ली थी । कालांतर में वे इस स्थान के स्थाई बाशिंदे हो गये । आप कहेंगे बंदर तो अपने देश के प्रायः सभी शहरी इलाकों में दिखाई दे जाते हैं, आपके मोहल्ले में भी हैं तो आश्चर्य ही क्या है, न होते तब आश्चर्य होता । आप सच कह रहे हैं । जैसे आदमी गांव-देहात छोड़कर शहर में बसने चले आ रहे हैं, ठीक वैसे ही बंदर भी अपना आशियाना शहरों में खोज रहे हैं । कारण दोनों के अलग-अलग भले ही हों । खैर इन बंदरों की मौजूदगी का हिंदी से कोई लेना-देना नहीं । मुझे तो हिंदी से जुड़े एक अनुभव का जिक्र करना है, जिसका मंकी (बंदर) शब्द से संबंध अवश्य है । इसीलिए इतना कह गया । सो सुनिए उसके बारे में ।

बस दो रोज पहले की ही बात है । सुबह-सुबह मैं निकल गया अपने घर के सामने की चालीस-फुटा सड़क पर करीब सौ मीटर चलते हुए पास के मुख्य मार्ग पर दुकान से कुछ सामान लेने । लौटते वक्त आठएक साल का एक बच्चा, जो मेरे मकान के सामने ही रहता है, मुझे मिल गया सड़क के किनारे किसी का इंतिजार-सा करता हुआ । जैसे ही मैं उसके पास से गुजरा, उसने मुझे देखा और दौड़कर मेरे बगल में आ गया । मुझसे लगभग सटते हुए-सा वह मेरे साथ चलने लगा । मैं उस बच्चे को जानता तो था ही, पर कभी राह चलते उससे बात की हो या वह दो कदम भी मेरे साथ चला हो ऐसा याद नहीं पड़ता । सो उसके उस समय के बरताव से मैं कुछ चौंेका । मैंने पूछ डाला, “क्यों भई, क्या हो गया जो मेरे साथ बगल में चल रहे हो ?”

उसने सामने आगे सड़क की ओर इशारा करते हुए कहा, “वहां मंकी हैं, काटते हैं ।”

“मंकी हैं या बंदर ?” मैंने पूछा, जानने के लिए कि देखूं क्या जवाब देता है । सामने कुछ दूरी पर दो-तीन बंदर दिखाई दे रहे थे । मोहल्ले के बंदर कभी-कभी काटने भी दौड़ पड़ते हैं, खासकर तब जब उन्हें छेड़ा जाए । उस बच्चे का डर स्वाभाविक था और वह कदाचित् मेरे साथ खुद को सुरक्षित महसूस कर रहा था ।

मेरे सवाल का जवाब उसने यों दिया, “बंदर तो हिंदी में कहते हैं, अंगरेजी में तो मंकी कहते हैं ।”

मैंने उसे टोकते हए कहा, “पर तुम तो हिंदी में बोल रहे हो, अंगरेजी में तो नहीं ।”

वह चुप रहा । उसके पास मेरे प्रश्न का शायद कोई उत्तर नहीं था । वयसा आठएक साल के उस बच्चे के पास भला क्या उत्तर हो सकता था ? कह नहीं सकता कि उसके मन में कोई विचार उठे भी होंगे । लेकिन एक चीज मैं महसूस कर रहा था । उस बच्चे के मन में स्कूली पढ़ाई यह विचार भर रही थी कि तुम्हें अंगरेजी सीखना ही नहीं, बल्कि उसे बोलना भी है । और उसकी शुरुआत अपनी रोजमर्रा की बोली में अधिकाधिक अंगरेजी शब्दों को ठूंसने से ही होगी । अंगरेती की श्रेष्ठता एवं अनिवार्यता और हिंदी की निरर्थकता के भाव उसके मन में उपजाये जा रहे होंगे ऐसा मेरा विश्वास है ।

स्थिति का समुचित आकलन करने में उस बच्चे की पृष्ठभूमि पर विचार करना आवश्यक है । बता दूं कि उसके दादा पांच भाइयों में से एक हैं । आर्थिक, सामाजिक तथा शैक्षिक तौर पर पिछड़े वर्ग के पांचों भाई मेरे घर के सामने छोटे तथा अतिसामान्य अलग-अलग मकानों में गुजर-बसर करते हैं । कभी इन भाइयों के बाप-दादा इस मोहल्ले की कृषि योग्य पूरी जमीन पर मालिकाना हक रखते थे । करीब पचास वर्ष पूर्व जब उनकी जमीन पर कालोनी विकसित हुई तो वे लोग जमीन के एक छोटे-से टुकड़े में सिमटकर रह गये । जमीन का जो भी मूल्य तब मिला होगा उसका सदुपयोग उनके बाप-दादा शायद नहीं कर पाये । मौजूदा पांचों भाई निपट निरक्षर हैं, अपनी पूर्ववर्ती पीढ़ियों की तरह । इन भाइयों के बच्चों — जिनकी कुल संख्या बीस-पच्चीस है और जिनमें से केवल तीन-चार ही शादीशुदा तथा बाल-बच्चेदार हैं — तक अब साक्षरता पहुंच चुकी है, लेकिन मात्र प्राथमिक दर्जे की । शायद एक या दो ने हाईस्कूल तक पढ़ भी लिया है, किंतु उसके आगे नहीं । भाइयों के बाद की इस बीच की पीढ़ी के सदस्य अब स्कूली पढ़ाई के प्रति सजग हो चुके हैं । वे स्वयं भले ही अंगरेजी न जानते हों, किंतु अंगरेजी की महत्ता को समझने लगे हैं । और इसी कारण अपनी सीमित आमदनी के भीतर वे अपने बच्चों को सरकारी प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाने के बजाय चौराहे-चौराहे पर खुल चुके आजकल के ‘इंग्लिश मीडियम’ निजी विद्यालयों में से किसी एक में भेज रहे हैं । वह बच्चा ऐसे ही किसी स्कूल से ‘बंदर’ के बदले ‘मंकी’ कहना सीख गया है ।

यह वाकया एक कटु सच को उजागर करता है । वह यह कि जैसे-जैसे अपने देश की उम्र बढ़ रही है, वैसे-वैसे अंगरेजी की जड़ें ‘इंडियन सोसाइटी’ में गहरे उतरती जा रही हैं, और हिंदी अपने ही लोगों के मध्य तिरस्कृत होती जा रही है । वाकई विचित्र है इस देश के बाशिंदों का रवैया । – योगेन्द्र जोशी

2 टिप्पणियाँ

Filed under अंग्रेजी, अनुभव, कहानी, लघुकथा, हिंदी साहित्य, Hindi literature, Short Stories

2 responses to “हिंदी की दुरवस्था का एक अनुभव यह भी

  1. यह अंग्रेजीयत का विषय कुछ अलग और रोचक ढंग से इस पोस्ट में उठाया गया है और बखूबी उठाया गया है।

    बढिया पोस्ट।

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