सौतेली मां, फिर भी सौतेली नहीं

मैं एक परिवार से परिचित हूं, पिछले पंद्रह-बीस सालों से । परिवार में कुल चार सदस्य हैं: पति-पत्नी और उनके दो बच्चे – एक बेटा और एक बेटी । मौजूदा संदर्भ के लिए मैं परिवार के सदस्यों को सप्रयोजन काल्पनिक नाम प्रदान करते हुए अपनी बात कहने जा रहा हूं । परिवार के मुखिया का नाम मैं ज्ञानेन्द्र और उसकी पत्नी का नाम रोहिणी रख लेता हूं । मैं उनके बेटे-बेटी को क्रमशः जयेश एवं जाह्नवी नाम से पुकारूंगा । दोनों बच्चे बड़े हो चुके हैं । जाह्नवी की शादी हो चुकी है और वह अब अपनी गृहस्थी में मग्न है । जयेश नौकरी-पेशे के कारण अन्य शहर में रहता है । दोनों बच्चे मां-बाप से मिलने यदाकदा आते-जाते रहते हैं ।

ऊपरी तौर पर देखा जाए तो उक्त परिवार आधुनिक ‘हम दो हमारे दो’ की श्रेणी के एक मध्यमवर्गीय औसत भारतीय परिवार से कुछ भिन्न नहीं है । फिर भी परिवार से जुड़े अपने एक अनुभव के कारण मैं उसका जिक्र कर रहा हूं । पहले यह बता दूं कि जयेश रोहिणी का सौतेला बेटा है । वह वस्तुतः ज्ञानेन्द्र की पहली पत्नी द्वारा जाया बेटा है, जो उसके पैदा होने के चंद हफ्तों में ही गंभीर रोग की चपेट में आकर परलोक सिधार गयी थी । उस समय नवजात शिशु, जयेश, को पालने की जिम्मेदारी बुढ़ापे में कदम रख चुकी उसकी दादी के ऊपर आ पड़ी थी । आरंभ में ज्ञानेन्द्र की दो बड़ी बहनों ने स्थिति संभालने में मदद की थी, परंतु अपनी-अपनी निजी गृहस्थी के कारण अधिक काल तक मदद कर पाना उनके लिए संभव नहीं था । अतः घर के सदस्यों को यही सही रास्ता दिखा कि ज्ञानेन्द्र की दूसरा विवाह कर दिया जाये । जयेश कुछ ही महीनों का था जब रोहिणी ने अपने उस नये घर में कदम रखा था, और उसके लालन-पालन का दायित्व उठाया था ।

जिस घटना का उल्लेख में यहां पर कर रहा हूं वह तब की है जब जयेश आठ-दश साल का रहा होगा । एक दिन मैं सपत्नीक उनसे मिलने चला गया उनके घर पर । हमें यह नहीं मालूम था कि उस दिन उस दम्पती की शादी की सालगिरह थी । बातचीत के दौरान हमारे जिज्ञासा व्यक्त करने पर रोहिणी ने हमें बताया कि उसकी शादी हुए कितने वर्ष बीत चुके हैं । उसके बगल में बैठा जयेश हम लोगों की बात को गौर से सुन रहा था । रोहिणी की बात सुनने पर उसने तपाक से जिज्ञासु स्वर में पूछ डाला, “लेकिन मां, मेरी उम्र तो इससे अधिक है, तो क्या मैं तुम्हारी शादी से पहले ही पैदा हो गया था ?

रोहिणी समझ गयी कि उससे क्या गलती हुई । बात टालते हुए उसने उसने कह दिया, “अरे नहीं, यह तो मैं गलत बता बैठी । हमारी शादी को तो उससे अधिक साल बीत चुके हैं ।” और उसने तुरंत विषय बदलते हुए अन्य बातें करना शुरू कर दिया । हम भी मामले को समझ गये ।

बाद की किसी अन्य मुलाकात में रोहिणी ने हमें बताया कि जयेश को यह नहीं बताया गया है कि वह उसका अपना खुद का जाया बेटा नहीं है । परिवार के सदस्यों ने यह बुद्धिमत्ता दिखाई कि इस बारे में कभी कोई बात जयेश के सामने न की जाये । मामले की गोपनीयता बनाये रखने में शहरी माहौल ने उनकी मदद ही की । शहरी मोहल्लों में आम तौर पर अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोग रहते हैं । उनके परस्पर के संबंध नाते-रिश्ते या जात-बिरादरी पर आधारित नहीं होते हैं, और लोग एक-दूसरे के निजी जिंदगी में दखल कम ही रखते हैं । गांव-देहात का माहौल काफी कुछ भिन्न होता है । विरासत से मिले रिश्ते लोगों को आपस में जोड़ते हैं और अक्सर लोगों के बीच इस बात का खुलासा हो ही जाता है कि किसका किससे कौन-सा संबंध है और क्यों है । अगर प्रश्नगत परिवार गांव में होता तो अवश्य ही जयेश को सब बातें पता चल गयी होतीं ।

दरअसल रोहिणी ने आरंभ से ही यह कोशिश की थी कि जयेश को कभी यह न लगे कि वह उसका सौतेला बेटा है । हमने जानने को कोशिश नहीं की है कि उसे इस तथ्य की जानकारी अभी तक हुई है कि नहीं । अब उसे पता भी चल गया हो, या पता चल भी जाये, तो मैं समझता हूं कि कोई फर्क नहीं पड़ने का, क्योंकि वह अब वयस्क हो चुका है और समझदार भी है । अब उसके अपनी इस मां, जो उसकी जन्मदात्री मां नहीं है, से और (सौतेली) बहिन जाह्नवी से पर्याप्त मधुर संबंध हैं । उसका सौतेला होना न होना अब कोई अहमियत नहीं रखता है । किंतु मैं सोचता हूं कि अगर बचपन में ही उसे कोई यह बता देता कि रोहिणी उसकी सौतेली मां है, और यदि उसके दिलो-दिमाग में ‘सौतेला’ शब्द का नकारात्मक अर्थ कोई बिठा चुका होता तो शायद स्थिति इतनी सरल न रह गयी होती । मेरा अनुमान है कि रोहिणी ने जयेश को किसी न किसी मौके पर अवश्य ही डांटा-डपटा होगा और संभवतः उसके गाल पर हल्की चपत भी जड़ी होगी । ऐसा उसने अपनी जायी बेटी के साथ भी किया होगा । हमारे परंपरागत समाज में बच्चों के साथ एक हद तक सख्ती बरतना उनको अनुशासित रखने और उन्हें उचितानुचित का अंतर समझाने के लिए आवश्यक समझा जाता है । प्रायः सभी बच्चे थोड़ा-बहुत डांट-डपट मार-पीट को सहज रूप से स्वीकार लेते हैं, और उसे अपने अभिभावकों का विशेषाधिकार भी मानते हैं । लेकिन इससे आगे रोहिणी का व्यवहार अपने दोनों बच्चों के प्रति समान और सामान्य रहा होगा ऐसा सोचना है मेरा । परंतु यदि जयेश को उसके सौतेले होने का ज्ञान बाल्यावस्था में किसी ने दे दिया होता तो कदाचित् वह रोहिणी के हर व्यवहार को सौतेलेपन के नजरिये से देखने लगता और उसका व्यवहार शायद सामान्य न रह पाया होता ।

सौतेला’ शब्द कदाचित् सभी समाजों में निंद्य अर्थ में प्रयुक्त होता है । इतिहास में ऐसे किस्से मिलते हैं जो ‘सौतेले’ के नकारात्मक पहलू को स्थापित करते हैं । लेकिन ‘सौतेला’ में सदैव ही ‘सौतेलापन’ हो ऐसा आवश्यक नहीं हैं । दुर्भाग्य से ऐसे मामलों की चर्चा कम होती है । लोगों के जबान पर उन किस्सों की बातें जमीं रहती हैं जिनमें ‘सौतेले’ का नकारात्मक पहलू उजागर हो । मैं ऐसे मामलों से वाकिफ हूं जिनमें इस शब्द का अपारंपरिक अर्थ नजर आता है । उक्त परिवार का मामला ऐसा ही एक है । – योगेन्द्र जोशी

1 टिप्पणी

Filed under अनुभव, कहानी, लघुकथा, हिंदी साहित्य, Hindi literature, Short Stories

One response to “सौतेली मां, फिर भी सौतेली नहीं

  1. ia tarah ke udaharnon ki nitaant aavashyakta hai aaj ke yug me. aabhar

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