पुरस्कृत होने के मतलब दायित्व न निभाने का अधिकार

व्यावसायिक जीवन से जुड़े अनुभव अपने ही किस्म के होते हैं और आम आदमी उनका अंदाजा नहीं लगा सकता है । कई मौकों पर ये अनूठे और अपने किस्म के अकेले होते हैं, कुछ ऐसे कि उनकी जानकारी अनुभव में शरीक दो-चार लोगों तक ही सीमित रहती है । और अगर वे घटना के प्रति असंवेदन हों, अर्थात् उसे गंभीरता से लेने के आदी न हों, तो समय बीतते उन्हें घटना की याद ही नहीं रहती । इसलिए ऐसे अनुभवों का ज्ञान समय के साथ लुप्त हो जाता है । लेकिन संवेदनशील व्यक्ति को लंबे अर्से तक, कदाचित् जीपनपर्यंत, उसकी याद रहती है । विश्वविद्यालयीय अध्यापन के अपने व्यावसायिक जीवन का इस प्रकार का एक अनुभव मुझे आज भी याद है । संभव है कि याद दिलाने पर उन छात्रों को भी उसका ध्यान हो आये जिनसे वह जुड़ा है । बहुत संभव है कि वे अब तक अपने-अपने काम-धंधों में इस कदर व्यस्त हो चुके हों कि अब वे उस पुरानी घटना को बिसरा चुके हों । अस्तु, बर्षों पहले की उस घटना के बारे में बताता हूं ।

एक बार मुझे स्नातक (बी.एससी.) की उसी कक्षा में अपने विषय का एक सैद्धांतिक प्रश्नपत्र पढ़ाने का मौका मिला था, जिसमें विषय के अन्य प्रश्नपत्र के अध्यापन का दायित्व मेरे एक वरिष्ठ सहयोगी को मिला था । मेरे वे सहयोगी राष्ट्रीय स्तर पर विख्यात वैज्ञानिक थे । कदाचित् अंताराष्ट्रीय स्तर पर भी एक वैज्ञानिक के नाते उनकी ख्याति अच्छी थी । वे उच्च शिक्षा एवं वैज्ञानिक अनुसंधान के क्षेत्र में पहुंच रखने वाले व्यक्ति थे । अनुसंधान कार्य के लिए विभिन्न सरकारी-गैरसरकारी संस्थाओं से धन जुटाने में उन्हें सिद्धहस्त माना जाता था, और इसीलिए स्थानीय स्तर पर उनके गैरजिम्मेदाराना व्यवहार को नजरअंदाज कर दिया जाता था । व्यक्तिगत बातचीत में मेरे अन्य सहयोगी उनकी आलोचना करने में नहीं हिचकते थे, लेकिन खुलकर उनका विरोध करने का साहस कम ही जुटा पाते थे । मैं तो यही कहूंगा कि लोग एक प्रकार से उनसे भय खाते थे । क्यों पचड़े में पड़ा जाए !

संयोग से उस कक्षा में पढ़ाने के लिए मेरे सहयोगी को मेरे बाद वाला ‘पीरियड’ मिला था । मैं जब पढ़ाने के अपने हिस्से का कार्य पूरा करके लेक्चर-हॉल से बाहर निकलता था तो कभी-कभार उनसे मुलाकात हो जाती थी, पर सदैव नहीं । एक दिन की बात है कि मैं कार्य संपन्न करके हॉल से निकला और गलियारे से होते हुए बाहर लॉन में आ गया । जाड़ों के दिन थे और उस समय की धूप अच्छी लग रही थी । मेरा मन हुआ कि 10-15 मिनट वहीं लॉन में धूप का आनंद ले लूं ।

करीब 5-7 मिनट बीते होंगे कि बी.एससी. की मेरी उस कक्षा के पांच-सात छात्र पास ही गलियारे में आकर रुक गये । जैसा आम तौर पर होता है छात्रों के ऐसे समूह परस्पर वार्तालाप के शोर से मुक्त नहीं होते । नजर उन पर पड़ी तो मैंने उन्हें इशारे से अपने पास बुलाया और पूछा, “क्यों भई, तुम लोग यहां कैसे पहुंच गये ? इस समय तो तुम्हें क्लास में होना चाहिए था । क्लास छोड़कर यहां क्या कर रहे हो ?”

संबंधित अध्यापक का नाम लेते हुए वे समवेत स्वर में बोले, “सर क्लास में पहुंचे ही नहीं । कुछ देर तक तो हम लोग उनका इंतजार करते रहे; फिर सभी उठ कर चले आये ।”

वे छात्र असंतुष्ट नजर आ रहे थे । आगे बातचीत में उन्होंने यह भी बताया कि ऐसा पहले भी कई बार हो चुका है कि वे नियमित तौर पर कक्षा में नहीं आते हैं । फिर उनमें से एक ने मुझसे सवाल किया “हमने सुना है कि साइंटिफिक रिसर्च के नाम पर उन ‘सर’ को कई पुरस्कार मिले हैं ।”

“बिल्कुल सही सुना है आप लोगों ने ।” मैंने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया ।

तब किसी दूसरे ने एक और सवाल पूछ दिया, “देश का सबसे प्रतिष्ठित ‘फलां’ पुरस्कार भी उन्हें मिल चुका है । क्या यह सच है ?”

उनका इशारा विज्ञान के क्षेत्र में उपलब्ध सर्वाधिक प्रतिष्ठित उस पुरस्कार की ओर था, मेरे खयाल से जिसे अपने देश का ‘नोबेल प्राइज’ माना जाता है । मैंने सिर हिलाकर हां में उत्तर दिया । (उस पुरस्कार का नामोल्लेख मैं यहां पर नहीं कर रहा हूं ।)

दो-एक सेकंड की चुप्पी के बाद छात्र ने एक और सवाल पूछ दिया, “सर, पुरस्कार पाने का क्या यह अर्थ है कि क्लास न लेने की छूट रहेगी ?”

यह सीधा सवाल नहीं था । यह मुझ जैसे श्रोता को निश्चय ही उलझन में डालने वाला था । यों तो इसका उत्तर कोई भी सोच सकता था । पर यह वस्तुतः एक कटाक्ष था, जिसका समुचित उत्तर मेरे पास नहीं था । यह सामाजिक जीवन में क्या उचित है और क्या अनुचित इस व्यापक प्रश्न से जुड़ा था । यह उस अध्यापक समुदाय के आचरण के प्रति शंका की अभिव्यक्ति थी जिसका मैं एक सदस्य था । प्रश्न सुनकर मुझे ऐसा लगा कि जैसे यह मेरे ही आचरण के प्रति टिप्पणी हो । मैंने हंसते हुए उन छात्रों को टाल दिया, “उत्तर खुद ही सोचो, मैं क्या कहूं ।”

और मैंने वार्तालाप जारी रखने के बजाय उनसे छुट्टी लेकर अपने कमरे में लौट जाना ही बेहतर समझा ।

अपने जीवन में पाए इस प्रकार के अनुभवों के आधार पर मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि बौद्धिक क्षमता के बल पर उपलब्धियां हासिल कर चुके व्यक्ति के मानवीय, चारित्रिक एवं नैतिक पक्ष के बारे में आश्वस्त नहीं हुआ जा सकता है । – योगेन्द्र जोशी

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1 टिप्पणी

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One response to “पुरस्कृत होने के मतलब दायित्व न निभाने का अधिकार

  1. ‘हिन्दी की सेवा’ करने के बदले में असगर वजाहत को कुछ दिन पहले पुरस्कार मिला है । लेकिन मेरा आकलन कहता है कि वे प्रत्यक्ष वा परोक्ष रूप से हिन्दी और देवनागरी की जड़ काटने के लिये कमर कस कर काम कर रहे हैं। वैसे भी यह ‘सामान्य ज्ञान’ है कि भारत में गिने चुने लोगों को ही उनके काम के कारण पुरस्कार मिलता है। अधिकाश ‘जुगाड़ू’ लोग (मैनिपुलेटर्स) ही इसका लाभ उठाते हैं।

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