सर, मैं भी आप की जाति का हूं !

भारतीय समाज मुख्यतया हिंदू समाज है, जिसकी विशेषताओं में से एक है जातीयता, जिसे मैं विशेषता कम विचित्रता अधिक मानता हूं । कहा जाता है कि प्राचीन वैदिक काल की वर्णाश्रम व्यवस्था में समय के साथ विकार आते गये और वे अंत में जातीयता के रूप में समाज में स्थापित हो गये । बहरहाल जातीयता की भावना का आरंभ जैसे भी हुआ हो, यह निर्विवाद सच है कि हमारे समाज में इसकी जड़ें गहरे जमी हुई हैं । मेरे अनुमान से ऐसे लोगों की संख्या बहुत ही कम होगी जो इस भावना से मुक्त हों । जाति प्रथा एवं जातीय भेदभाव को समाज से मिटाया जाना चाहिए की बातें जोरशोर करने वालों की संख्या अपने देश में कम नहीं है, किंतु जातीयता की भावना से ऊपर उठकर व्यवहार करने वाले समाज में अधिक नहीं हैं ।

अपने ‘महान्’ देश की राजनीति में जाति की अहमियत कुछ वैसी ही है जैसे दाल में नमक, मिठाई में शक्कर, दिये में तेल, कुएं में पानी, पार्क में हरे-भरे पेड़-पौधे, आदि-आदि । नमक बिना दाल बेस्वाद, बिना शक्क्र के मिठाई क्या, वह दिया कैसा जिसमें तेल नहीं, पानी बिना कुआं बेकार, पार्क और वह भी बिना पेड़-पौधों के! हमारी राजनीति में जाति की बात न हो तो राजनीति का मजा ही क्या ? यहां तक तो सब ठीक है । लेकिन इधर जब से देश में जनगणना आरंभ हुई है, जाति की राजनीति ने भी करवट बदल ली है । स्वतंत्र भारत में अभी तक जनगणना की ओर जाति की दृष्टि नहीं गयी थी । किंतु अब राजनीति के कुछ खिलाड़ियों ने मांग कर डाली है कि जब एक नागरिक से उससे जुड़ी तमाम जानकारी मांगी जानी है तो उसकी जाति की भला कैसे अनदेखी की जा सकती है ? एक आदमी अपना सब कुछ खो सकता है, पर जाति नहीं । वह स्वर्गवासी हो जाए तो भी जाति उसके साथ जुड़ी रहेगी । भला ऐसी जाति को भुला देना अनैतिक नहीं है ?

माफ कीजिएगा, मैं उस किस्से से भटक गया हूं जिसे यहां पर बयान करने का मेरा इरादा है । हाल में जब जाति की बातें की जा रही थीं तो मुझे अपने छात्र जीवन के दो अनुभव याद आ गये । बात करनी थी उनकी और कहने बैठ गया कुछ और । खैर, कोई बात नहीं । अब सुन लीजिए उन अनुभवों के बारे में ।

घटना करीब चार दशक पुरानी है । तब मैं देश के एक अग्रणी विश्वविद्यालय में स्नातक यानी एम.एससी. (भौतिकी) कक्षा में पढ़ता था । मेरे दो सहपाठी थे जिनको मैं ‘फलां’ सिंह एवं ‘अमुक’ कुमार के नाम से संबोधित कर रहा हूं । मैं उनके वास्तविक प्रथम नाम लेने से परहेज कर रहा हूं, क्योंकि किस्से में इन प्रथम नामों का कोई महत्त्व नहीं है । उनमें से एक अब इस संसार में हैं भी नहीं । उनको लेकर किसी अनुभव की बात करना आपको शिष्टता के विरुद्ध लग सकता है । लेकिन अनुभव की बात के लिए तो उनका नाम लेना ही पड़ेगा न । यह स्पष्ट कर दूं कि मेरे इन दोनों सहपाठियों से सौहार्दपूर्ण संबंध थे, जैसे अन्य सभी सहपाठियों से थे । उनसे मुझे कोई व्यक्तिगत शिकायत भी नहीं रही ।

एम.एससी. पूर्वार्ध (प्रीवियस) में हमें प्रोफेसर राजेन्द्र सिंहजी भी पढ़ाते थे । (बाद में वे समयपूर्व सेवानिवृत्ति लेकर पूर्णकालिक सामाजिक कार्य में लग गये थे । वे राष्ट्रीय स्तर के ख्यातिलब्ध व्यक्ति थे और कुछ सालों तक अपने संगठन के शीर्ष पर भी रहे ।) उन दिनों वे हमारी प्रयोगशाला के प्रभारी थे । जाति से वे क्षत्रिय थे । पूर्वोक्त मेरे सहपाठी ‘फलां’ सिंह ने अपने नाम के द्वितीय भाग ‘सिंह’ को क्षत्रियों के परिचायक के रूप में प्रस्तुत करते हुए प्रोफेसर साहब से लाभ लेने की सफल-असफल कोशिश की होगी ऐसा हम छात्रों में से कईएक का अनुमान था । सो कैसे सुनिए ।

दूसरे वर्ष जब हम एम.एससी. उत्तरार्ध (फाइनल) में प्रविष्ट हुए तो ‘फलां’ सिंह ने अपनी कापियों के जिल्द पर ‘फलां’ सिंह श्रीवास्तव लिखना आरंभ कर दिया । तब तक हम में से शायद ही किसी को यह मालूम रहा हो कि वह जाति से ‘श्रीवास्तव’ है । यह सब जानने की हमें तब कोई जरूरत थी भी नहीं । ‘श्रीवास्तव’ तो अभी तक ‘फलां’ सिंह के घोषित नाम का हिस्सा ही नहीं था । जिज्ञासा हुई और हमें इसका रहस्य भी समझ में आ गया । दरअसल हम छात्रों में लगभग आधे ने विषय-विशेषज्ञता के तौर पर इलेक्ट्रानिकी को चुना था । इलेक्ट्रानिकी से संबंधित समस्त शैक्षणिक प्रबंधन का दायित्व विभागाध्यक्ष के बाद के वरिष्ठतम अध्यापक पर था, जो स्वयं श्रीवास्तव कायस्थ थे, यद्यपि उनके नाम में यह शामिल नहीं था । यहां पर यह खुलासा कर दूं कि अपना विश्वविद्यालय जातिगत राजनीति से मुक्त नहीं था, अतः वरिष्ठ अध्यापकों की जातीयता किसी से छिपी नहीं थी । सोचने-विचारने पर स्पष्ट हो गया कि ‘फलां’ सिंह ने उक्त अध्यापक के साथ जातीय निकटता दिखाने के लिए अपने नाम में ‘श्रीवास्तव’ जोड़ लिया था । यह भी समझ में आ गया कि एम.एससी. पूर्वार्ध में ऐसा क्यों नहीं किया गया था, और कैसे ‘सिंह’ के प्रयोग से भ्रम बनाए रखा ।

हम छात्र ‘फलां’ सिंह का मामला समझ ही पाए थे कि पता चला कि ‘अमुक’ कुमार ने भी अपने नाम में ‘अग्रवाल’ शामिल कर लिया है । इस बार कारण जल्दी ही समझ में आ गया । जिस इलेक्ट्रानिकी विशेषज्ञता की पढ़ाई हम छात्र कर रहे थे उसकी प्रयोगशाला यानी लैब का प्रभार डा. अग्रवाल नाम के हमारे एक अध्यापक के पास था । ऐसे में ‘अमुक’ कुमार को यह उपयोगी लगा होगा कि उसकी जाति कथित अध्यापक महोदय की जानकारी में आ जावे ।

मुझे इस बात का अंदाजा नहीं है कि मेरे उन दोंनों सहपाठियों को अपनी जाति का उपर्युक्त तरीके से खुलासा करने पर सचमुच में कोई लाभ हुआ कि नहीं । मैं इतना जानता हूं कि एक आम भारतीय की कोशिश रहती है कि अन्य महत्त्वपूर्ण सजातीय व्यक्तियों को उसकी जाति का पता चल जाये । तब यह उम्मीद जगती है कि शायद वे व्यक्ति हमारे प्रति सहानुभूति रखें, नरम रवैया अपनाएं और वक्त-बेवक्त हमारे लिए मददगार सिद्ध हों । – योगेन्द्र जोशी

2 टिप्पणियाँ

Filed under अनुभव, कहानी, लघुकथा, हिंदी साहित्य, Hindi literature, Short Stories

2 responses to “सर, मैं भी आप की जाति का हूं !

  1. जातियता केवल हिन्दुओं में नहीं संपूर्ण भारतीय समाज में हैं। आज भी भारत का तमाम मुस्लिम समाज जातियों में बंटा हुआ है और ईसाई भी।

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