रात का सन्नाटा और अज्ञात का भय

कल्पना कीजिए कि आपके सामने दो जने खड़े हैं । एक का जीवन उतार-चढ़ावों एवं उथल-पुथलों के बिना केवल रोजमर्रा की छोटी-मोटी परेशानियों का अनुभव लेते हुए गुजरा हो, और उस सब के विपरीत दूसरे का खट्टे-मीठे अनुभव लेते हुए, आशा-निराशा की स्थितियों का सामना करते हुए, और भांति-भांति की कठिनाइयों को झेलते हुए बीता हो तो आप किसे भाग्यशाली कहेंगे ? अवश्य ही हर कोई पहले को ही भाग्यशाली कहेगा । भला कौन सुखमय जीवन की अपेक्षा नहीं करेगा, कष्टों का साक्षात्कार करना चाहेगा ? कह नहीं सकता हूं कि वर्षों पहले मैं कुछ ऐसा ही सोचता था या नहीं । किंतु जीवन की सांध्यवेला की ओर अग्रसर होते हुए आज मैं दूसरे को भाग्यशाली मानता हूं । ऐसा इसलिए कि उस व्यक्ति के पास वैविध्यपूर्ण अनुभवों की भारी झोली होती है । वह उस व्यक्ति के समान है जिसने तमाम दुनिया की सैर की हो, जिसने मरुभूमि में चल के देखा हो, हिमाच्छादित प्रदेशों की सैर की हो, समुद्र में नौकायन किया हो, तेज धूप का कष्ट सहा हो, वर्षा के पानी में भीगा हो, रात के निविड़ अंधकार में आकाश के तारे गिने हों, अस्तोन्मुख सूर्य की लालिमा देखी हो । जब मैं पीछे मुड़कर जीवन के बीते दिनों की ओर नजर डालता हूं तो लगता है कि मैं इस दूसरे आदमी की तरह ही हूं, एक ऐसा व्यक्ति जिसने जीवन की अनेकरसता भोगी हो । यह जानना काफी नहीं कि जीवन में कष्ट होते हैं; अहमियत इस बात की है कि उनका अनुभव स्वयं ले के देखा है । सुख-दुःखों के सम्मिलित अनुभव अपने-आप में एक पूंजी है ऐसा मेरा मानना है ।

मेरा जीवन-मार्ग कहीं सपाट तो कहीं टेढ़ामेढ़ा, दलदली रहा है, कहीं चढ़ाव तो कहीं उतार । मेरे पास खट्टे-मीठे अनेकों अनुभव हैं । उनमें से एक ऐसा है जो मुझे रह-रहकर याद आता है । बात तब की है जब मैं कक्षा आठ में पढ़ता था । मुझे उत्तराखंड के सुदूर क्षेत्र में अवस्थित अपने गांव से 7-8 किलोमीटर दूर के विद्यालय में पढ़ना था । हर दिन घर से विद्यालय तक की इस दूरी को आने-जाने में पैदल तय करते हुए पढ़ाई कर पाना संभव नहीं था । पैदल चलने के अलावा कोई विकल्प आम तौर पर कहां रहता है पहाड़ों पर ? उतराते-चढ़ते उस सर्पिल पहाड़ी रास्ते को शायद ही कोई दो घंटे में एकतरफा तय कर सकता हो । अतः मुझे विद्यालय के पास ही कहीं एक कमरे का डेरा लेकर रहना था । पारिवारिक परिस्थिति ऐसी नहीं थी कि वैकल्पिक व्यवस्था सोची जा सके । मां दो साल पहले ही इहलोक छोड़ चुकी थीं । पिताजी को हम भाई-बहनों का दायित्व अपने सीमित संसाधनों के साथ अकेले निभाना था । अगर मैं पढ़ने में अव्वल न चल रहा होता या मुझे पढ़ाई के प्रति विशेष ‘शौक’ न होता (जो आज भी है!) तो मेरी पढ़ाई शायद छूट गई होती ।

इंटर तक के मेरे उस विद्यालय में एक छोटा हास्टल भी था । मुझे बताया गया था कि हास्टल का माहौल अच्छा नहीं । मैंने हाईस्कूल तक की पढ़ाई उसी विद्यालय में की थी, लेकिन उस अंतराल में कभी प्रत्यक्षतः जानने का प्रयास नहीं किया कि वहां का माहौल वाकई कैसा है । इतना मैं जानता हूं कि उन दिनों दूरदराज के गांव-घरों से आने वाले कई छात्र आसपास डेरा लेकर ही पढ़ाई करते थे । आम तौर पर परस्पर परिचित दो-तीन छात्र एक डेरे में रहा करते थे । मैं नहीं जानता कि किस कारण से मुझे एकदम अकेले ही डेरे में रहना पड़ा । मेरे गांव के आसपास का मेरा कोई पूर्वपरिचित वहां नहीं पढ़ रहा था, शायद इसी कारण अकेले रहने की व्यवस्था मेरे लिए की गई हो ।

संयोग से एक छोटे-से कमरे का मेरा डेरा एकदम एकांत स्थान पर बने मकान में था, जिसके एक हिस्से में मकान-मालिक की दुकान थी । दुकानदार सायंकाल लगभग सात-आठ बजे पास ही के गांव में अपने घर चला जाता था । अन्य कोई व्यक्ति उस मकान में नहीं रहता था । मकान जिला-बोर्ड की ‘सड़क‘ के किनारे था, जो पैदल यात्रिकों तथा घोड़े-खच्चरों के लिए बना एक आम रास्ता था । आसपास के सभी इलाकों के लोगों का यह एक प्रमुख संपर्क मार्ग था । अतः उस पर लोगों का आना-जाना लगा रहता था । लेकिन रात्रि प्रथम प्रहर से प्रातः पौ फटने तक वह मार्ग सुनसान ही रहता था; केवल किसी आकस्मिकता में ही कोई उस पर चलता हो । यह मार्ग एक ओर विद्यालय को जाता था, जो मेरे डेरे से करीब एक-डेड़ किलोमीटर दूर था । दूसरी ओर यह सरयू एवं गोमती के क्षेत्रीय नामों से पुकारी जाने वाली ‘पवित्र’ नदियों के संगम पर अवस्थित एक नगरी (टाउनशिप, जो अब जिला मुख्यालय बन चुका है) को चला गया था । क्षेत्रीय लोग इस संगम में एक पवित्र तीर्थ के तौर पर आस्था रखते हैं । यहीं एक श्मशान घाट भी है जहां पर तीसएक किलोमीटर के दायरे में रहने वाले लोग शवदाह के लिए आज भी आया करते हैं ।

आप साचते होंगे कि इतनी लंबी-चौढ़ी पृष्टभूमि प्रस्तुत करने की जरूरत क्या है ? सीधे और संक्षेप में क्यों न अपना अनुभव बयान कर डालूं । अनुभव को ठीक-ठीक समझने के लिए यह जरूरी है ।

उस छोटे-से कस्बे की दुकानें और रिहायशी मकान मेरे विद्यालय के आसपास हुआ करती थीं । निकट ही कालिका-मंदिर भी था । लेकिन मेरे डेरे के निकट कोई मकान नहीं था । निकटतम मकान ढाई-तीन सौ ेमीटर दूर रहा होगा । वयसा 13-14 वर्ष के मुझ जैसे किशोर के लिए ऐसे एकांत में स्थित डेरे पर रात गुजारना आसान नहीं था । सच यह है कि मुझे अकेले में डर लगता था । लेकिन मजबूरी थी; हिम्मत करके मुझे वहां रहना ही था; पढ़ाई जो करनी थी । संध्याकाल जब चारों तरफ सन्नाटा छा जाता, सड़क पर लोगों का आवागमन बंद हो जाता, तो मैं अंदर से किवाड़ बंद करके लालटेन की रोशनी में कुछ देर पढ़ाई-लिखाई करता और फिर सो जाता । (उन दिनों उस इलाके में बिजली नहीं होती थी!) नींद आने के साथ ही मन से भय दूर हो जाता ।

इतना सब रोज की जिंदगी का अपरिहार्य हिस्सा बन चुका था । किंतु समस्या तब गंभीर हो जाती जब कभी रात की निःशब्दता को चीरते हुए ‘राम-नाम’ की ध्वनि के साथ उस रास्ते से कोई शवयात्रा गुजरती । उस ध्वनि को सुनकर मेरी नींद खुल जाती और डर के मारे मेरे रोंगटे खड़े हो जाते । कह नहीं सकता कि एकदम सामान्य ये शब्द तब मुझे क्यों भयभीत कर डालते थे । लगता था कि कोई प्रेतात्मा मेरे सामने चीखकर अपना भयावह रूप दिखाएगी और मुझे जैसे खा जाएगी । उस असहाय अवस्था में मैं सिर से पैर तक अपने शरीर को चादर या कंबल में कसकर लपेट लेता था, और उंगलियों से कसकर कान बंद कर लेता था, ताकि ‘राम-नाम’ के वे शब्द कान में न पड़ने पावें । मन ही मन किसी मंत्र या भगवद्नाम जैसी किसी चीज का जप करते हुए हिसाब लगाने लगता कि शव वहन करने वाले कितना दूर निकल चुके होंगे । उस अवस्था में कई-कई मिनट पड़े रहने के बाद मेरी उंगलियां ढीली पड़ती थीं और राहत की सांस लेते हुए मैं सामान्य हो जाता था । फिर कब दुबारा नींद के आगोश में चला जाता इसका अंदाजा नहीं रहता था ।

ऐसे अनुभव मुझे यदा-कदा हो जाते थे । सौभाग्य से मैं उस स्थान पर पांच-छः महिने ही रहा । बाद में विद्यालय के पास ही डेरा ले लिया था । वह स्थान सुनसान नहीं था और वहां मैं इस भय से मुक्त रहा । – योगेन्द्र जोशी

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