जानते नहीं मैं कौन हूं?

सूर्यास्त हो चुका है, लेकिन अभी काफी रोशनी चारों ओर फैली हुई है । बरसात का मौसम है, फिर भी आसमान साफ है । कहीं-कहीं हल्के नारंगी से गहरी ललाई की ओर बढ़ रहे बादलों के टुकड़े बिखरे पड़े हैं । इस सांध्य वेला पर मैं दो-एक सब्जियां खरीदने घर के पास के मुख्य मार्ग की दुकानों की ओर चला जाता हूं । प्रायः सभी दुकानें मेरी जानी-पहचानी हैं । वर्षों से वे लोग सड़क के किनारे जमीन पर सब्जियों की ढेरी लगाकर बेचते आ रहे हैं । मैं कभी एक से तो कभी दूसरे से सब्जियां खरीद लेता हूं । मैं यहां अक्सर पूर्वाह्न आठ-नौ बजे आता हूं, जब आसपास के गांवों के किसान अपना माल वहां बेचने आते हैं, किंतु कभी-कभार सायंकाल भी मेरा आना हो जाता है ।

मैं एक दुकान पर आकर रुक जाता हूं । सब्जी-विक्रेता एक किनारे बैठा है । आज उसकी जगह उसका किशोरवय बेटा – मेरे अनुमान में बेटा – काम संभाल रहा है । निकट भविष्य में उसे ही तो रोजी-रोटी के इस ‘खानदानी’ धंधे को संभालना है । लगता है अभी प्रशिक्षण ले रहा है । पहले कभी उसे मैंने नहीं देखा था । अभी वह एक गााहक के लिए सब्जी तौल रहा है । गाहक खुद ही एक किशोर है, बहुत हुआ तो उन्नीस-बीस साल का होगा, अधिक नहीं । वह लड़का चुन-चुनकर टमाटर तराजू पर रखता जाता है और साथ ही उनका विक्रय मूल्य पूछता है, “क्या हिसाब हैं टमाटर ?”

“आठ रुपये पाव, तीस रुपये किलो ।” किनारे बैठे सब्जी वाला जवाब देता है ।

“सात रुपये पाव लगाओ ।”

“नहीं, इतने में हमें पड़ता नहीं । आजकल सभी सब्जियों के दाम चढ़े हैं ।”

अब तक तौले जा चुके उन टमाटरों को वह किशोर गाहक लेने से मना कर देता है, और उठकर वहां से चलने के लिए अपनी साइकिल पर सवार होने लगता है । सब्जी-विक्रेता बड़बड़ाने लगता है, “चले आते है सौदा लेने; लेना-वेना कुछ है नहीं गाहक बने चले आते हैं ।”

वह गाहक लगता है नया ही है । रोजमर्रा का होता तो सब्जी वाला इतनी रुखाई से पेश न आता । उसके शब्द उस लड़के के कान में पड़ते हैं । उससे भी रहा नहीं जाता है । अब तक अपनी साइकिल पर चढ़ चुका वह लड़का ठिठककर रुक जाता है । दोनों के बीच नोक-झोंक शुरु हो जाती है । बात थमती-सी नहीं नजर आती है; लड़के के अहम को ठेस जो लग चुकी होती है । आजकल बात-बात पर लोगों का खून खौलने लगता है, खास तौर पर किशोरों-नौजवानों का । तैश में आकर वह लड़का विक्रेता को चुनौती दे डालता है, “जानते हो मैं कौन हूं ?”

सब्जी वाला भी पीछे नहीं रहता है, “हर आने-जाने वाले को जानने का ठेका नहीं ले रखा है हमने । बहुत देखे हैं तुम्हारे जैसे । क्या समझते हो अपने आप को ?”

“अच्छा तो जानते नहीं हो न मैं कौन हूं ? ठीक है बताता हूं ।”

अभी तक मैं उस तमाशे को देख रहा होता हूं । मैं सब्जी वाले के रूखे व्यवहार को उचित नहीं कह सकता । लेकिन मुझे उस लड़के का रवैया ज्यादा खल रहा था । उसके लिए सब्जी वाला तो एक बुजुर्ग ही था, हो सकता है उसके अपने मां-बाप के उम्र का हो । उसको कुछ तो लिहाज करना चाहिए था । और “जानते नहीं मैं कौन हूं” जैसे शब्दों से मुझे सख्त चिढ़ है । मर्यादाओं-शिष्टाचारों को ताक पर रखते हुए अपनी ताकत जताने का लोगों के बीच आजकल फैशन चल चुका है । मैं उस लड़के को टोक देता हूं, “बेटा, यहां अपने यार-दोस्तों को इकट्ठा करके झगड़ा-फसाद करोगे क्या ? माना कि तुम्हारी पहुंच बहुत ऊपर तक है, तो क्या ऐसा करना ठीक है ?”

वह मेरी बात सुनता है । उसकी कोई अशिष्ट प्रतिक्रिया नहीं होती है । “ठीक है, अंकल जी ।” कहते हुए वह आगे बढ़ जाता है ।

मैं इच्छित सब्जियां खरीदकर लौट अता हूं । रास्ते भर मैं यह प्रश्न स्वयं से पूछता हूं कि हम अपने जीवन में संयत-संयमित व्यवहार क्यों नहीं अपना पाते हैं । मुझे कोई उत्तर नहीं सूझता । – योगेन्द्र जोशी

अंत में एक तस्वीर:

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