सहज नहीं सहज बुद्धि का होना

अंग्रेजी में एक शब्द (असल में पदबंध या फ्रेज) है ‘कॉमन सेंस’, जिसका मतलब है वह बौद्धिक क्षमता जिसके हर व्यक्ति (नादान बच्चों को छोड़कर) में होने की सामान्यतः उम्मीद की जाती है, और जिसके बल पर व्यक्ति रोजमर्रा के छोटे-मोटे कार्य संपन्न करने में मूर्खता या गलती करने से बच जाता है । इस कॉमन सेंस को अर्जित करने के लिए किसी को स्कूल-कालेज जाने की जरूरत नहीं होती है, और न ही किसी से प्रशिक्षण लेना पड़ता है । यह तो उम्र के साथ सहज रूप से विकसित होने वाली बुद्धि में निहित रहता है । कहा जाता है कि कॉमन सेंस वास्तव में उतना कॉमन नहीं होता है जितना लोग सोचते हैं । मनुष्य कई मौकों पर हास्यास्पद भूलें कर बैठता है, जो कॉमन सेंस के अभाव का द्योतक होती हैं । शब्दकोश के अनुसार हिंदी में इस शब्दयुग्म के लिए सामान्य बुद्धि है, लेकिन मैं इसे ‘सहज बुद्धि’ कहना पसंद करता हूं – बुद्धि लोगों में जिसके मौजूद होने की उम्मीद सहज या स्वाभाविक तौर पर की जाती है ।

मैं कभी-कभी बहुत खिन्न होता हूं यह देखकर कि कुछ लोगों में सहज बुद्धि का निराशाजनक अभाव होता है – ऐसा अभाव जो मेरी समझ से परे हो । अपनी बात स्पष्ट करने के लिए मैं अभी दो-चार दिन पहले के अपने अनुभव का जिक्र करता हूं ।

मेरे पड़ोस में, मेरे मकान के दाहिने बगल, एक बुजुर्गवार रहते हैं । चंद रोज पहले वे मेरे पास आए, मुझसे नट-बोल्ट खोलने-कसने के काम आने वाला रिंच मांगने । उन्हें अपने घर में पानी-पाइप की टोंटी का वाशर बदलना था, या ऐसा ही कोई काम था । बता गये कि उनके परिचित दो युवक वह काम कर लेंगे । करीब आधे घंटे के बाद पड़ोसी के परिचित वे युवक मेरे पास रिंच लौटाने आए । मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि काम नहीं बन सका, अतः किसी जलकल मिस्त्री से ही काम करवाना होगा । उस समय मेरे लिए बात आई-गई हो गयी ।

कोई डेड़-दो घंटे के बाद मेरे घर की घंटी बजी तो मैं बाहर आया । गेट पर एक व्यक्ति खड़ा था । उससे मैंने पूछा, “किसको पूछ रहे हैं ?”

उत्तर मिला, “आपके घर पर पानी-नल की टोंटी ठीक करने आया हूं ।”

मैंने कहा, “मैंने तो किसी को नहीं बुलाया है । किसके यहां जाना है आपको ? नाम-पता तो होगा आपके पास ? टेलीफोन नंबर भी शायद होगा ?”

“यहीं कहीं बताया गया था मुझे ।” उत्तर था ।

“अरे भई नाम तो मालूम होगा मकान मालिक का, या मकान नंबर ही सही । आपको बुलाने वाले ने कुछ तो बताया होगा, लिखकर दिया होगा, आपने नोट किया होगा ।”

“दो-तीन घंटे पहले मेरे परिचित ‘हार्डवेयर’ की दुकान पर दो लड़के पहुंचे थे । वे ही दुकानदार से प्लंबर भेज देने को कह गये थे । यहीं कहीं उन्होंने बताया था ।”

“कमाल के आदमी हैं आप । बिना ठीक-से जाने-बूझे चल पड़े अपने ग्राहक का घर ढूढ़ने । अरे भई, भला नाम-पते के बिना कोई कैसे कुछ बता सकता है ।” मैंने अपनी झल्लाहट को काबू में रखते हुए टिप्पणी की ।

बेचारा मिस्त्री अगल-बगल खोजी नजर डालते हुए आगे बढ़ने लगा । तभी मुझे अनायास याद आई कुछ देर पहले की वह घटना, जब पड़ोसी बुजुर्ग रिंच ले गए थे । मैंने उस आदमी को रोका और पड़ोसी के मकान की ओर इशारा करते हुए कहा, “देखो, शायद इन्होंने आपको बुलाया होगा; जाकर पूछ लो ।”

वह व्यक्ति पड़ोसी का गेट पार कर अंदर चला गया । मैंने डेढ़-दो मिनट इंतजार किया और समझ गया कि वह सही जगह पहुंच गया है ।

दरअसल यह उन कई घटनाओं में से एक है जो मेरे अनुभव में आए हैं । कभी कोई कुकिंग गैस का ‘ट्रालीमैन’ गेट खटखटाता है । पूछे जाने पर “गैस सिलिंडर है सा’ब ।” का उत्तर मिलता है । मुझे कोई आश्चर्य नहीं होता सुनकर । क्योंकि उसे मकान का वहीं पता मिला होता है जो मेरे मकान का है; जब कि पते में मोहल्ले का ‘एक्सटेंशन’ भी होना चाहिए, जिसे न जाने क्यों नहीं लिखा होता है । मैं उस व्यक्ति को समझाता हूं और उसे सही पते पर भेज देता हूं ।

गैस वाले की तरह ‘हार्डवेयर’ का सामान लेकर भी कुछ ट्राली वाले दरवाजे पर पहुंच जाते हैं । मैं उन्हें अक्सर भटकते हुए देखता हूं । मेरा मोहल्ला काफी बड़ा है । मैं ठीक से नहीं जानता, परंतु सुनता हूं कि इसमें हजारएक से अधिक परिवार रहते हैं । मेरे परिचय क्षेत्र में अधिक लोग नहीं हैं । अतः अक्सर मदद नहीं कर पाता हूं । महीने में दो-तीन वाकये सामने आते ही हैं । किस्म-किस्म के भटकते हुए लोग मुझे देखने को मिल जाते हैं । कोई मरीज को लेकर चिकित्सक को खोजता है, तो कोई अपने नाते-रिश्तेदार को । “किसे खोज रहे हैं ?” पूछे जाने पर नाम-पता ठीक से नहीं बता पाते । कुछ ऐसा जवाब सुनने को मिलता हैः “कान के डाक्टर हैं वे” या “फलां जगह डाक्टर हैं, उन्हींने घर पर बुलाया है ।”

नाते-रिश्तेदार को खोज रहा व्यक्ति कुछ यों पूछता है, “मनोरंजन दुबे कहां रहते हैं, भाईसा’ब ?” “पता-ठिकाना कुछ मालूम है आपको ?” “बी एच यू हैं पढ़ाते हैं जी, इसी मोहल्ले में रहते हैं ।” अधिक कुछ बताने में असमर्थ ।

मैं यह नहीं समझ पाता कि लोग आवश्यक जानकारी लेकर क्यों नहीं चलते । वे इस बात को क्यों नहीं समझ पाते हैं कि जानकारी के अभाव उन्हें भटकना पड़ेगा ? ये बातें सहज बुद्धि की हैं । मुझे लगता है कि कई जनों में सहज बुद्धि वास्तव में नहीं रहती है । – योगेन्द्र जोशी

3 टिप्पणियाँ

Filed under अनुभव, आपबीती, मानव व्यवहार, लघुकथा, हिंदी साहित्य, Hindi literature, Short Stories

3 responses to “सहज नहीं सहज बुद्धि का होना

  1. ajit gupta

    आप सही कह रहे हैं लेकिन मुझे लगता है कि ये सारे ही प्रकरण लापरवाही को बयान करते है। सहज बुद्धि वो होती है जब आप किसी बात को त्‍वरित रूप से और भली्-भांति समझ लेते हैं।

  2. it is written true that सहज बुद्धि वो होती है जब आप किसी बात को त्‍वरित रूप से और भली्-भांति समझ लेते हैं।

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