बैंक अधिकारी ने मेरी बात पर विश्वास किया और …

बैंकों एवं इसी प्रकार की अन्य सेवाप्रदाता कंपनियों के कर्मचारियों का अपने ग्राहकों के पति रवैया सभी देशों में एक जैसा नहीं होता है । ब्रिटेन में मिले अनुभव के आधार पर कम से कम मैं तो यही कहूंगा । अपने देश में बैंक कर्मचारियों की कोशिश यह नहीं होती है कि ग्राहकों को नियम-कानूनों के नाम पर कोई असुविधा न पहुंचने पाये । मेरा अनुमान है कि विश्व के कई देशों के बैंक कर्मचारी आम ग्राहक के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं, और वे अपनी संस्था की साख बनाये रखने की तमाम कोशिशें करते हैं, भले ही ऐसा करने में बैंक को थोड़ा-बहुत वित्तीय खतरा क्यों न उठाना पड़ रहा हो । इस संदर्भ में मुझे कोई पच्चीस वर्ष पहले का एक अनुभव याद आता है ।
घटना तब की है जब मैं विज्ञान-विषयक उच्चाध्ययन के लिए द्विवर्षीय ब्रितानी प्रवास पर था । वहां के एक विश्वविद्यालय में अपना कार्यकाल पूरा कर चुकने के बाद मुझे सपरिवार स्वदेश लौटना था । अपनी वापसी यात्रा की तैयारी के साथ मुझे अपना बैंक खाता भी बंद करना था । वापसी हवाई यात्रा के एक दिन पूर्व मैं इस कार्य के लिए बैंक की संबंधित शाखा में पहुंचा । मैंने अपनी पास बुक तथा बचे हुए अप्रयुक्त चेकों को काउंटर पर बैठी महिला कर्मचारी को सौंपा और उससे खाता बंद करके बची हुई जमा राशि लौटाने का निवेदन किया । उसने अपने कंप्यूटर पर मेरे खाते और लौटाए गये चेकों की पड़ताल की और मुझसे कहा कि मेरे चेकबुक में ऐसे दो चेक मौजूद नहीं हैं, जिनका भुगतान खाते के ब्योरे के अनुसार तब तक नहीं हुआ था । उस महिला कर्मचारी के अनुसार उन चेकों का अभी भुगतान बचा था, तदनुसार खाता बंद करने में तकनीकी दिक्कत आ रही थी ।
खाता बंद कराने में मुझे दिक्कत आ सकती है इस संभावना को ध्यान में रखते हुए मैं बैंक नहीं पहुंचा था । एक बारगी मुझे समझ नहीं आया कि मैं क्या जवाब दूं । मुझे अपनी गलती का अहसास हो आया और उसके सामने वस्तुस्थिति स्पष्ट करते हुए मैंने अपना पक्ष रखा । वह बैंककर्मी अंदर अपने अधिकारी के पास गयी और दो-तीन मिनट में लौटकर मुझसे बोली, “हम आपकी बात पर विश्वास करते हैं, और यह मानते हैं कि बैंक को धोखा देने का आपका कोई इरादा नहीं है।
इतना कहकर उसने शेष औपचारिकताएं पूरी कीं, और मेरा खाता बंद करते हुए उसने शेष जमा राशि लौटा दी । धन्यवाद ज्ञापन के साथ मैं लौट आया । खाता बंद कराने में क्या दिक्कत थी मैं इसका खुलासा कर दूं । दरअसल मुझे मिली चेकबुक का हर चेक 50 पौंड (ब्रितानी मुद्रा) के लिए ‘गारंटीड’ था । गारंटीड का मतलब यह था कि जिस किसी को भी 50 पौंड (आज के करीब 3500 रुपये) तक की रकम का चेक काटकर दिया जाता बैंक उसको उस राशि का भुगतान अवश्य करता, भले ही संबंधित खाते में पर्याप्त धनराशि न हो । ऐसे चेक स्वीकारने में किसी को धोखे का डर नहीं रहता था, क्योंकि उसको भुगतान मिलना सुनिश्चित था । घाटा सहना बैंक का काम होता और ग्राहक से वसूलना उसका सिरदर्द । अतः उन दिनों ब्रितानी बाजारों में अनजान व्यक्ति से भी इस प्रकार के गारंटीड चेक स्वीकारने में किसी को कोई खतरा नहीं दिखता था, और चेकों द्वारा पैसे का लेनदेन एक सामान्य बात थी ।
चूंकि मैं दो चेक बैंक को नहीं लौटा सका था, अतः बैंक यह मान सकता था कि मैंने किसी को वे चेक 50-50 पौंड तक की राशि भरकर दे रखे होंगे, जिनका भुगतान तब तक नहीं हुआ था । ऐसे में बैंक 100 पौंड तक की राशि काटकर मुझे शेष जमा लौटाने की बात कर सकता था । लेकिन बैंक ने ऐसा नहीं किया और मेरे प्रति विश्वास व्यक्त करते हुए पूरी जमा राशि लौटा दी । असल में मैंने किसी को चेक नहीं दिए थे, बल्कि उन्हें पहले कभी कारणवशात् निरस्त करते हुए फाड़कर कूड़ेदान में डाल दिया था । मुझे उन निरस्त चेकों को रिकार्ड के तौर अपने पास रखना चाहिए था । मेरी गलती यही थी कि मैंने ऐसा नहीं किया था ।
दूसरे दिन मैंने विश्वविद्यालय के एक अध्यापक को पूरा किस्सा सुनाया, और उससे जानना चाहा कि बैंक ने मेरे प्रति जो नरमी दिखाई उसका संभव कारण क्या रहा होगा । उसने जो बात मुझे समझाई उसके अनुसार आम तौर पर बैंक अपने अनुभवों के आधार पर यह मानकर चलते हैं कि अधिकांश ग्राहक ईमानदार होते हैं और बैंक को धोखा देने का उनका कोई इरादा नहीं होता है । वे भूल कर सकते हैं जिसे वे सुधार भी लेते हैं । बैंकों की नीति रहती है कि ग्राहक की ऐसी भूलों को तूल देकर बैंक को उनके प्रति संवेदनाविहीन व्यवहार नहीं दिखाना चाहिए । ग्राहक की बातों पर विश्वास करते हुए उसकी परेशानी हल करना व्यावसायिक कार्यकुशलता एवं व्यवहारपटुता मानी जाती है । अवश्य ही ऐसा करने में बैंक को खतरा उठाना पड़ सकता है । किंतु कभी-कभार – बहुत कम मामलों में – होता है । उन मौकों पर बैंक को जो वित्तीय घाटा हाता है, उसके लिए भी वे प्रस्तुत रहते हैं । किंतु उस संभावित घाटे से बचने के लिए वे सभी ग्र्राहकों पर अविश्वास करने लगें यह नीति उन्हें स्वीकार्य नहीं । ग्राहकों के बीच सद्व्यवहार की साख बनाये रखने के लिए ऐसे खतरे उठाने ही पड़ते हैं ।
मैं समझता हूं कि इस प्रकार की नीति के तहत ही उस बैंक अधिकारी ने मेरी बात मान ली होगी और वांछित कार्य निष्पन्न किया होगा । यदि ऐसी ही किसी स्थिति का सामना मुझे अपने देश में करना पड़ा होता, तो नियम-कानूनों का हवाला देते हुए बैंक ने कार्य-निष्पादन में असमर्थता जताई होती । इस माने में हम शायद पीछे हैं । – योगेन्द्र जोशी

 

2 टिप्पणियाँ

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2 responses to “बैंक अधिकारी ने मेरी बात पर विश्वास किया और …

  1. सर जी, अपने देश मे भी आजकल बैक आपके साथ कुछ ऐसे ही पेश आयेगे | competition की बात है कोई बैक अपनी साख खराब नही करना चाहता बस परिसि्थती ही ऐसी हो जाती है की बैको को सतर्क होना पडता है

  2. हमारे यहाँ तो सब लकीर के फकीर हैं. जो रूल बूक के हिसाब से ही चलते हैं.
    हाल ही का वाकया बताता हूं. रतलाम में मेरा बैंक खाता था. पुराना था. उसे भोपाल ट्रांसफर करवाना था. भोपाल के बैंक में अर्जी दी तो उन्होंने पहले टालना चाहा और कहा कि रतलाम में दो. मैंने जबरन थमाया – रूल बुक दिखाकर तो ले लिया. पर दो महीने में भी ट्रांसफर नहीं हुआ. पता किया तो भोपाल से तो पत्र भेजा गया है, पर रतलाम नहीं पहुँचा. मजबूरी में रतलाम में नया आवेदन दिया. इस बार बैंक खाते के पासबुक की फोटोकॉपी मांगी गई! आप बैंक से अपने खाते से सिर्फ अपने दस्तखत से पैसा निकाल सकते हैं, मगर खाता ट्रांसफर करने के लिए पासबुक की फोटोकापी चाहिए! फिर कहा गया कि फोटोकापी में खाताधारी का फोटो नहीं है. जबकि उनके कंप्यूटर रेकॉर्ड में फोटो हस्ताक्षर सब हैं. बैंक के अधिकारियों को पता था कि मैं रतलाम से भोपाल शिफ़्ट हो गया हूं. मगर, बात वही – आपणो क्या!

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