बिनु कक्षा परीक्षा बिनु पावहिं ते उपाधि

मैं अपने शैक्षणिक जीवन के एक अनुभव का जिक्र करने जा रहा हूं । इस अनुभव का संबंध दस-बारह वर्ष पहले अपने एक पूर्वछात्र के साथ संपन्न वार्तालाप से है । उस समय वह मेरे विश्वविद्यालय (बीएचयू) के स्नातकोत्तर पूर्वार्ध, अर्थात् एमएससी प्रीवियस, कक्षा में भौतिकी (फिजिक्स) विषय का छात्र था । मेरा अनुमान है कि करीब पचास छात्र-छात्राओं की उस कक्षा में वह पढ़ाई के लिहाज से शीर्ष के दसएक में से एक रहा होगा । कक्षा के अन्य जिज्ञासु छात्रों की भांति वह भी यदाकदा मेरे बैठने-पढ़ने के कमरे में अपनी शंकाएं लेकर आ जाया करता था । मैं उन लोगों से कभी-कभी विषय से हटकर अन्य प्रकार की दो-चार बातें भी कर लिया करता था । एक बार ऐसी ही बातें तनिक अधिक विस्तार से उस छात्र के साथ भी हुई थीं । बातें एक नजरिये से दिलचस्प थीं, तो दूसरे नजरिये से तकलीफदेह और निराशाप्रद । वे बातें मुझे आज भी कुछ हद तक याद हैं । मैं उसी वार्तालाप की चर्चा कर रहा हूं ।

उस दिन संबंधित छात्र से मेरी बातों की शुरुआत निजी सवालों से हुई थी । मैंने उससे जानना चाहा था कि उसका घर किस गांव अथवा शहर में है, और यह भी कि उसने बीएससी की परीक्षा किस विश्वविद्यालय अथवा महाविद्यालय से उत्तीर्ण की थी । उसने बताया कि उसका घर मेरठ में है और उसने इलाहाबाद में रहकर वहां के ईविंग क्रिश्चियन कालेज से बीएससी की उपाधि अर्जित की है । उक्त कालेज इलाहाबाद का एक प्रतिष्ठित कालेज हुआ करता है इस बात से मैं सुपरिचित रहा हूं । मैं जानता हूं कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय की तुलना में मेरठ विश्वविद्यालय दोयम दर्जे का माना जाता है । इलाहाबाद सदा से शिक्षा का केंद्र रहा है और 19वीं शताब्दि में वहां अवस्थित विश्वविद्यालय देश के उच्चस्तरीय शिक्षण संस्थाओं में से एक रहा है । अगर कोई उस विश्वविद्यालय में पढ़ने का विचार करे तो यह बात समझ में आती है । किंतु स्थानीय विश्वविद्यालय छोड़ कोई घर से दूर इलाहाबाद के एक कालेज में पढ़ने पहुंचा हो यह बात एक शिक्षक के नाते मेरी समझ से परे थी । मैंने उससे यह जानना चाहा कि मेरठ में विश्वविद्यालय के होते हुए क्यों उसने घर से दूर इलाहाबाद में पढ़ाई की, और वह भी एक कालेज में न कि विश्वविद्यालय में ।

छात्र का उत्तर था, “सर, मेरठ यूनिवर्सिटी बस ऐसी ही है । मेरे पिताजी ने कहा था कि कुछ ढंग की पढ़ाई करनी हो तो इलाहाबाद जाओ । वहां यूनिवर्सिटी में एड्मिशन न हो पाने के कारण मैंने ‘इसीजी’ (ईविंग क्रिश्चियन कालेज का संक्षिप्त नाम) में एड्मिशन लिया । दरअसल मेरे पिताजी ने अपने वक्त में वहीं से ग्रैजुएशन किया था । उनकी राय थी कि मेरठ यूनिवर्सिटी से तो इसीजी बेहतर है ।”

उसका जवाब मेरे लिए कुछ हद तक चौंकाने वाला था । उसका यह कहना कि मेरठ यूनिवर्सिटी बस ऐसी ही है उस विश्वविद्यालय पर एक नकारात्मक टिप्पणी थी । इलाहाबाद, बीएचयू तथा अन्य स्तरीय विश्वविद्यालयों की तुलना में मेरठ का स्तर कमतर होने की बात से मैं वाकिफ था, किंतु उसके हाल इसीजी से भी बदतर होंगे यह मैं नहीं सोचता था । इस बारे में उसकी धारणा के आधार को समझने की जिज्ञासा मेरे मन में जगी । मैंने उससे पूछा, “क्यों भई ऐसी क्या खराबी है वहां ?”

“सर वहां पढ़ाई-लिखाई तो कुछ होती नहीं है । न स्टूडेंट्स को और न ही टीचर्स को कोई दिलचस्पी रहती है । इम्तहान में नकल का जोर रहता है, और नंबर कैसे दिये जाते हैं यह तो भगवान ही जाने ।” उसने अपने खयालात पेश किए ।

“हो सकता है तुम्हें गलतफहमी हो । ऐसा नहीं होगा, किसी ने तुम्हें गलत बताया होगा । तुम तो वहां पढ़े नहीं, तुम्हारा अपना अनुभव तो है नहीं । सुनी-सुनाई बातें कभी-कभी अतिरंजित भी होती हैं ।” मैंने उसे समझाया ।

“नहीं सर, ऐसी बात नहीं । आप खुद ही समझ सकते हैं ।” उसने अपनी बात स्पष्ट करते हुए कहा, “मेरी बहन ने उसी यूनिवर्सिटी से बीए किया । कैसे किया यह मुझे मालूम है । मुश्किल से कभी-कभार क्लास अटेंड की होगी । क्या अटेंड करती, क्लास होती तब न ! आप मानेंगे नहीं, लेकिन उसने खुद इम्तहान नहीं दिया । किसी और ने दिया और उसे डिग्री मिल गयी ।”

मुझे उसकी बातें अविश्वसनीय लग रही थीं । मैं सोच नहीं पा रहा था कि वह सच बाल रहा था या झूठ । भला झूठ बोलने की उसे क्या जरूरत थी, वह भी अपनी बहिन को लेकर । मैं अपनी कक्षा के एक छात्र होने के नाते उसे जितना समझ सकता था उसके अनुसार वह सही बोल रहा था । उन दिनों एमएससी पूर्वार्ध की अधिकतम पीरियडों, सैद्धांतिक एवं प्रायोगिक, से में संबंद्ध था, अतः छात्रों से सुपरिचित होना मेरे लिए अपेक्षया अधिक मौके थे । उसकी बातें में नकार नहीं पा रहा था । उसके साथ आगे क्या-क्या बातें हुईं इसकी अहमियत नहीं है । मेरी लिए जो बात चिंतनीय थी वह मैं सुन चुका था ।

उसने जो बताया उसमें दम है इसका अहसास मुझे कुछ सालों बाद तब हुआ, जब मेरठ विश्वविद्यालय के परीक्षा घोटालों की खबरें जोरशोर से अखबारों और टीवी चैनलों पर आने लगीं । खबरें आ रही थीं कि कैसे वहां की परीक्षा पुस्तकों का मूल्यांकन परीक्षकगण प्राइमरी से इंटर तक के छात्रों से करवा रहे हैं ।

अपने देश में कदाचार के अनेक रूप हैं । किसी और क्षेत्र में हम कितने ही पिछड़े हों, इस क्षेत्र में शायद ही कोई प्रमुख देश हमें मात दे सकता है । मेरा देश महान । वाकई महान है यह देश । – योगेन्द्र जोशी

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Filed under अनुभव, कहानी, भ्रष्टाचार, लघुकथा, हिंदी साहित्य, Hindi literature, Short Stories

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