हिंदी के जहाज से उतर, अंग्रेजी की नाव पर जा बैठ

अपने लोग कभी-कभी इस बात पर गर्वान्वित-से दिखते हैं कि अपनी भाषा हिंदी – ‘इंडिया दैट इज भारत’ की राजभाषा – विश्व की दूसरी-तीसरी सर्वाधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा है । यह बात शायद सही हो, लेकिन यह तो सच है ही कि यह विश्व की प्रमुख भाषाओं में सर्वाधिक तिरस्कृत है । कोई भी ‘हिंदीभाषी’ व्यक्ति जो अंग्रेजी पढ़ने-लिखने से परिचित हो चुका हो इसे आम जनों के साथ बोलचाल के लिए मजबूरन प्रयोग में लेता है, अन्यथा उसकी प्राथमिकता तो अंग्रेजी ही रहती है, जो देशवासियों की नजर में श्रेष्ठ एवं उपयोगी भाषा ही नहीं है, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा का आधार एवं द्योतक भी है । आप अंग्रेजी जानते हुए भी हिंदी ही प्राथमिकता के साथ प्रयोग में लेते हों इसकी उम्मीद आम तौर पर नहीं की जा सकती है । मेरा अनुभव तो कुछ ऐसा ही है । मैं ऐसे ही एक ताजे अनुभव की बात करता हूं ।

दो-तीन दिन पूर्व मैं सपत्नीक दो-तीन सप्ताह के नई दिल्ली प्रवास के बाद वापस अपने शहर वाराणसी आ रहा था । मुरादाबाद होकर चलने वाली काशी-विश्वनाथ नाम की गाड़ी के आरक्षित डिब्बे में हमारे बर्थों (शायिकाओं) के पास खिड़की से सटी बर्थ एक युवती के नाम थी । वह युवती गाजियाबाद के किसी तकनीकी संस्थान में अध्ययन कर रही है यह बात बाद में दो-तीन अन्य युवा यात्रिकों, जो स्वयं भी तकनीकी विषयों के छात्र थे, के साथ उसके वार्तालाप से मुझे ज्ञात हो गयी । मतलब यह है कि उनके छात्र होने का अनुमान मैंने उनकी आपसी बातचीत के आधार पर लगाया था ।

हमारे उस डिब्बे में मुरादाबाद स्टेशन पर एक सज्जन भी सवार हुए । उनकी बर्थ हम लोगों के ही अगल-बगल थी । साथी यात्रिकों से उनकी बातों से स्पष्ट हो गया था कि वे बीएचयू (पूर्व में मेरा कार्यस्थल) में अध्यापक हैं और मेरठ में आयोजित एक वैज्ञानिक गोष्ठी में भाग लेकर वाराणसी लौट रहे हैं ।

रेलगाड़ी के मुरादाबाद स्टेशन से आगे बढ़ने के कुछ मिनटों बाद उन अपेक्षया नवागन्तुक यात्री ने उस छात्रा से यह जानना चाहा कि वह क्या करती है और कहां जा रही है । केवल उसी छात्रा में उनकी दिलचस्पी क्यों जगी थी यह मैं समझ नहीं सका । खैर, जैसा कि उम्मीद की जाती है उन दोनों के बीच की आरंभिक बातचीत सामान्य हिंदी में ही हुई । किंतु जैसे ही उन सज्जन को यह अहसास हुआ कि वह युवती तकनीकी विषय की छात्रा है, और तदनुसार अंग्रेजी भाषा के प्रयोग से सुपरिचित है, तो वे हिंदी से अंग्रेजी पर उतर आये । उन दोनों के बीच चंद मिनटों की बाद की वार्ता अंग्रेजी में ही संपन्न हुई । मुझे याद आता है कि उन्होंने अपनी निकटता दर्शाने के लिए छात्रा को कुछ ‘स्नैक्स’ भी अर्पित किए जिन्हें उसने विनम्र भाव के साथ अस्वीकार कर दिया था ।

मैं उस वार्तालाप में भागीदार नहीं था और अपनी सीट पर बैठे अखबार के पन्ने कुछ यूं उलट-पलट रहा था कि गोया मैं उस वार्तालाप से अनजान, था या उसमें मेरी कोई दिलचस्पी नहीं थी । किंतु बाहरी तौर पर अनभिज्ञ-सा बना मैं वस्तुतः पूरे वाकये पर गौर कर रहा था । मेरे लिए उनकी बातचीत के असली विषय की कोई अहमियत नहीं थी । उस समय जो बात मेरी दृष्टि में अहम थी और जो मुझे खटक रही थी वह थी उनका हिंदी से अंग्रेजी पर उतर आना । दोनों हिंदी जानते थे, और मुझे पक्का विश्वास है कि दोनों की मातृभाषा – भले ही कहने भर को ही मातृभाषा हो – हिंदी ही रही होगी ।

उस समय मैं सोचने लगा कि आखिर वह कौन-सी मजबूरी रहती है जिसके कारण एक हिंदीभाषी अन्य हिंदीभाषी के साथ भी हिंदी में बात करने से कतराता है, और तुरंत ही अंग्रेजी को वरीयता देते हुए उसमें बतियाने लगता है । कोई व्यक्ति अन्य भाषाभाषियों के साथ भी पहले हिंदी में प्रयास करे और काम न चलने पर ही अंग्रेजी का प्रयोग करे तो यह बात मेरे समझ में आती है । किंतु अपने देश में हाल उल्टे ही लगते हैं । यहां तो अजनबियों के साथ अंग्रेजी में बात करना अंग्रेजी पढ़े-लिखे अनेकों लोगों की प्राथमिकता रहती है । क्या इस मानसिकता से हम भारतीय कभी मुक्त हो पाएंगे यह प्रश्न मेरे मन में शेष यात्रा के दौरान उठता रहा ।

और अपने घर पहुंचने पर मैंने जब खुद की अनुपस्थिति में इकट्ठी हुई डाक पर नजर डाली तो उसमें एक निमंत्रण-पत्र मिला, जिसका विषय था हमारे एक पड़ोसी की पोती का जन्मदिन, जो इस बीच मनाया जा चुका था । निमंत्रण-पत्र था ग्रामीण पृष्ठभूमि वाले एक पड़ोसी परिवार का, जिससे जुड़े लोगों के लिए – मुझे पूरा विश्वास है – अंग्रेजी आज भी कमोबेश अनजान भाषा होगी । नवजात बच्ची के दादा से पहले की पीढ़ियां अनपढ़ या अल्पशिक्षित रही होंगी ऐसा सोचता हूं मैं । अवश्य ही अब ‘फॉरेन’ अनुभव वाले बच्ची के कंप्यूटर इंजीनियर ‘पापा’ को अब हिंदी से परहेज और अंग्रेजी से लगाव हो गया होगा ।

उपर्युल्लिखित अनुभव मेरे लिए नये नहीं हैं । हिंदी से जुड़े ऐसे अनुभव मुझे आए दिन होते रहते हैं, और हर बार हिंदी को लेकर हिंदीभाषियों में व्याप्त कुंठा मेरे चिंतन का विषय बन जाता है । मुझे लगता है हिंदी एक जहाज की तरह है जिसमें जहां-तहां सुराख हो गये हों, जिनसे रिसता हुआ पानी उसे डुबाए जा रहा हो । लेकिन उस भाषा के प्रति लगाव रखने वाले और उसे बचाए रखने को समर्पित अभिमानी कुछ गिने-चुने देशवासी उस पानी को उलीच कर हटाने और जहाज को बचाने की जुगत में लगे हैं । डुबाने को तत्पर रिसाव और उससे लड़ रही ताकतें परस्पर संघर्षरत हैं । वस्तुस्थिति की गंभीरता को भांपते हुए ऐसे लोगों की संख्या निरंतर बढ़ रही है, जो हिंदी के उस जहाज को छोड़ अंग्रेजी की नाव पर चढ़कर सुरक्षित हो चुकने का सुख पा रहे हैं । वर्तमान परिस्थिति में वही बुद्धिमान समझा जा रहा है जो हिंदी का जहाज छोड़ झट-से अंग्रेजी-नाव की ओर लपक रहा हो ।  योगेन्द्र जोशी

5 टिप्पणियाँ

Filed under अंग्रेजी, आपबीती, लघुकथा, हिंदी साहित्य, हिन्दी, Hindi literature, Short Stories

5 responses to “हिंदी के जहाज से उतर, अंग्रेजी की नाव पर जा बैठ

  1. क्या खूब कही सर जी आपने…
    ~R
    http://rrajivhind.wordpress.com

    क्षमा चाहूँगा हिंदी मे वर्डप्रेस वालों के पास कोई स्थाई पता नहीं था😉

  2. यथा राजा…तथा प्रजा…
    यथा राज…तथा कामकाज…

    बेहतर….

  3. बहुत बार तो मजबूरी में अपनाना पड़ता है. जैसे कि अभी मेरे पुत्र को अंग्रेज़ी में कम्यूनिकेशन स्किल डेवलप करना पड़ रहा है – लोगों से जबरन अंग्रेजी में बातचीत करके – ताकि उसका ठीक ठाक ‘कैम्पस’ सलेक्शन हो जाए.😦

  4. V.L.Gupta

    हिंदीभाषी अन्य हिंदीभाषी के साथ भी हिंदी में बात करने से कतराता है। अंग्रेजी आज भी कमोबेश अनजान भाषा है।

  5. anil

    Delhi High court allows RTI activist Mr. Rakesh Kumar Singh to file PIL against “Indian Rupee symbol selection process”.

    Mr. Rakesh Kumar Singh had submitted a LPA petition in the Delhi High Court challenging Delhi HC earlier judgment in which court had refused to entertain his petition challenging selection process of New Indian Rupee Symbol.

    After hearing the LPA, Hon’ble Chief Justice and Hon’ble Mr. Justice Sanjiv Khanna of Delhi High Court in their judgment said “We learned senior counsel appearing for the appellant submitted that he may be permitted to withdraw the appeal as he really does not have the grievance solely because the symbol has not been accepted but he intends to challenge the procedural aspects which are adopted by the Union of India at various levels relating to such kind of works which affect various provisions of the Official Languages Act and many other provisions of various statutes as well as Article 14 of the Constitution of India.

    If we understand the submission of Mr. Sawhney in a proper perspective, he wants to file a petition in the larger public interest.

    In view of the aforesaid, we are inclined to permit the withdrawal of the appeal with liberty to file a Public Interest Litigation with the appropriate pleadings and data which are necessary to sustain a Public Interest Litigation.” Order: LPA 310/2011

    http://www.saveindianrupeesymbol.org/

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