अंत में छात्रों की शंका का समाधान हो ही गया

घटना पंद्रह-बीस साल पुरानी है, जब मैं विश्वविद्यालय मैं कार्यरत था । एक दिन अपने भौतिकी (फिजिक्स) विभाग के गलियारे से गुजरते वक्त बी.एससी. कक्षा के दो छात्र मेरे सामने आ खड़े हुए । उन्होंने मुझसे भौतिकी पाठ्यक्रम के एक प्रश्न का हल जानना चाहा । वे छात्र मेरी स्वयं की कक्षा के छात्र नहीं थे । दरअसल उन दिनों मैं बी.एससी. कक्षा का कोई भी सैद्धांतिक प्रश्नपत्र (थ्यॉरेटिकल पेपर) नहीं पढ़ा रहा था । अध्यापन के मेरे दायित्व तब बी.एससी. की भौतिकी प्रयोगशाला और एम.एससी. के सैद्धांतिक-प्रायोगिक प्रश्नपत्रों तक सीमित था । अतः असमर्थता व्यक्त करते हुए मैंने उन्हें टालने की कोशिश की, “मैं तो पिछले कुछ अर्से से बी.एससी. में पढ़ा ही नहीं रहा हूं । कई टापिकों (प्रसंगों) से संपर्क भी आजकल छूटा पड़ा है । इस समय ठीक-से तैयार हुए बिना मैं कहां तुम्हारी मदद कर सकूंगा,  भई ?”

“आप सवाल सॉल्व कर लेंगे, सर । आपको अधिक नहीं सोचना पड़ेगा, हमें मालूम है ।” उनका सम्मिलित उत्तर था ।

“तुमसे किसने कह दिया कि मैं सॉल्व कर लूंगा ? न तो मैं तुम्हारी क्लास लेता हूं, और न ही मैं किसी और सेक्सन को थ्यौरी पढ़ा रहा हूं । … खैर छोड़ो । … भला सवाल है किस टॉपिक का, और पढ़ा कौन रहा है तुम लोगों को ?” मैंने अपनी जिज्ञासा व्यक्त की ।

“सर, मिकैनिक्स (यांत्रिकी) का सवाल है” कहते हुए उन्होंने मुझे संबंधित अध्यापक का नाम बताया । मैं जानता था कि वे सज्जन उनके सवाल में दिलचस्पी नहीं ले रहे होंगे । उनके पास इतनी फुरसत नहीं होगी कि वे सवाल सुनें और उसे हल करने का तरीका बतायें । ऐसे काम में क्योंकर कोई समय गवाये जिससे प्रत्यक्षरूपेण कोई अतिरिक्त लाभ ही न हो ? एक अध्यापक-सह-वैज्ञानिक के नाते उनका ‘कर्तव्य-दर्शन’ कुछ इसी प्रकार का था यह बात एक लंबे अर्से से सहकर्मी होने के नाते मैं उनके बारे में महसूस करता आ रहा था ।

उस समय मेरी मनोदशा (मूड) उन छात्रों की समस्या सुलझाने की नहीं थी । मैं सोचने लगा कि ख्वाहमख्वाह क्यों जहमत मोल लूं । इसलिए बहुत कुछ जानने-समझने के बावजूद मैंने उन्हें टालने के इरादे से कहा, “लेकिन तुम लोगों को तो विषय पढ़ा रहे अपने टीचर से सवाल पूछना चाहिए । अगर वे न मिल पा रहे हों तो दूसरे सेक्सन में जो पढ़ा रहा हो उस टीचर से पूछना चाहिए । मेरे जैसों, जिनका उस टॉपिक से संपर्क छूट चुका हो, के पास जाने का कोई तुक नहीं है ।”

उन्होंने मेरी बात सुनी और बोले, “ठीक है, सर, उन्हीं से पूछ लेते हैं ।”

उसके बाद मैं विभाग में अपने कमरे की ओर बढ़ गया । वे भी विपरीत दिशा में बाहर बरसाती (पोर्च) की तरफ चल दिए । मैं महसूस कर रहा था कि वे निराश हुए होंगे, और यह अच्छी तरह जानता था कि वे संबंधित अध्यापक के पास नहीं जाएंगे । वहां उन्हें पहले भी निराशा हाथ लगी होगी । मुझे लगा कि मैंने नहीं लौटाना चाहिए था । हो सकता है उनका सवाल मेरे लिए कठिन न रहा हो । यों भी एक अध्यापक के नाते बी.एससी. की भौतिकी मेरे लिए कोई कठिन विषय नहीं रही है । बहुत संभव है कि मुझे सवाल पर अधिक दिमाग न खपाना पड़ता ।

अनायास मुझे लगा कि मैंने उनकी मदद करनी चाहिए थी । मैं पीछे मुड़ा और तेज कदमों से उसी ओर चल दिया जिधर छात्र गए थे । बरसाती के पास वे मुझे दिखाई दिए । मैंने उन्हें आवाज दी और अपने पास बुलाया । फिर उन्हें साथ लेकर अपने कमरे में आया और उनसे संबंधित सवाल के बारे में पूछा । मुझे उसको सुलझाने में कोई दिक्कत नहीं हुई । समय के दस-बारह मिनट के अंतराल में उस सवाल का हल समझाकर उन दोनों को विदा कर दिया ।

उस समय आत्मसंतोष का भाव मेरे मन में भर आया । कमरे की शांतता में बैठे मैं सोचने लगा कि एक अध्यापक के दायित्वों को एकदम साफ तौर पर परिभाषित किया जा सकता है क्या । क्या यह कहा जा सकता है कि उससे बस इतना ही अपेक्षित है और इसके आगे नहीं ? क्या व्यक्ति को अपने दायित्व अक्सर स्वयं निर्धारित नही करने होते हैं ? दायित्व सदैव पूर्वतः नियत नहीं होते । कभी-कभी उन्हें तात्कालिक आवश्यकताओं या परिस्थितियों के अनुसार नियत करना होता है । मैं फलां कार्य करूं या उसे भूल जाऊं जैसे विचारों के ऊहापोह का सामना करना पड़ सकता है । तब आपको दूसरों एवं अपने हितों के बीच सामंजस्य बिठाते हुए निर्णय लेना पड़ता है । आपका हित नहीं भी सध रहा हो, लेकिन किसी का भला उस कार्य में निहित हो तो उसे किया जाना चाहिए । उक्त घटना यों तो बहुत छोटी है, किंतु इसमें निहित संदेश अवश्य गंभीर है । – योगेन्द्र जोशी

2 टिप्पणियाँ

Filed under अनुभव, आपबीती, कहानी, लघुकथा, हिंदी साहित्य, Hindi literature, Short Stories

2 responses to “अंत में छात्रों की शंका का समाधान हो ही गया

  1. Its a beautiful instance. Thanks for sharing with us. Very inspiring and motivating indeed.

  2. नीरज रोहिल्ला

    बहुत सी पुरानी यादें इस घटना के बहाने याद आ गयीं।

    बहुत धन्यवाद…

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