“सेवा में कुछ मिलेगा?” – जल निगम कर-संग्राहक की मांग

आजकल भ्रष्टाचार की बातें जोर-शोर से की जा रही हैं । महज बातों से कुछ होना नहीं है, फिर भी उन पर बहसें चल रही हैं, बौद्धिक विलास के लिए ही सही । समाज अपने तरीके से चलता आया है और आगे भी चलेगा । बातें करते समय हम भूल जाते हैं कि भ्रष्टाचार तो हमारे खून में घुल चुका है, उसे दूर करेंगे कैसे । हालात कुछ वैसे ही वैसे ही हैं जैसे दूध में नमक घुल गया हो । नमक की डली दूध में घुल जाए उसके पहले ही यदि दूध निथार लिया जाए तो उसकी अशुद्धता स्वीकार्य स्तर पर बनी रह सकती है । लेकिन जब नमक घुल ही चुका हो तो आप कुछ नहीं कर सकते हैं । दूध फेंक सकते हैं, बस । लेकिन दूध फेंकने की हैसियत ही न हो तो आपको उसी से काम चलाना पड़ेगा । हम हिंदुस्तानियों के हाल कुछ ऐसे ही हैं । जिंदगी के दूध में भ्रष्टाचार का नमक घुल चुका है । असल दूध तो आप नाली में उड़ेल सकते हैं, किंतु जिंदगी को तो छोड़ नहीं सकते हैं । उसे जीना ही पड़ेगा, भ्रष्टाचार को सहज भाव से सहते हुए । यही सब चल रहा है । अस्तु ।

मेरा वास्ता सरकारी महकमों से कम ही पड़ता है । इसलिए किसी सरकारी दफ्तर में बैठी भ्रष्टाचार की राक्षसी के दर्शन करने की नौबत लंबे समय से नहीं आई है । लेकिन पिछले हफ्ते वह मुझे घर बैठे ही दर्शन दे गई, भले ही कुछ सेकंडों के लिए । इतने भर से मैं भयभीत नहीं हुआ, किंतु उसका संदेश मेरे सवा लीटर के भेजे में घुस ही गया, “मूर्ख मानुष, इस मुगालते में नहीं रहना कि मैं अब जिंदा नहीं रहूंगी । मैं तो तब तक जीती रहूंगी जब तक तुम्हारी यह मानव जाति घरती पर है । तुम मेरे विरुद्ध जो चाहो बको, मुझे फर्क नहीं पड़ता है । … और सुन लो, उत्तर में हिमालय और दक्षिण में हिंद महासागर के बीच का यह भूखंड तो मुझे खास पसंद है । इसे छोड़ मैं कहीं भी जाने वाली नहीं ।” और यह मूक संदेश देकर वह अंतर्धान हो गयी ।

पिछले हफ्ते हुआ क्या इसकी चर्चा पर लौटता हूं । मेरे शहर वाराणसी में जल निगम के कर-संग्राहक पानी एवं सीवर का टैक्स आम तौर पर संबंधित उपभोक्ताओं के मकानों पर जाकर नगद वसूलते हैं । आप चाहें तो उनके कार्यालय की खिड़की पर जाकर भी टैक्स जमा कर सकते हैं । घर पर आकर उनके टैक्स इकट्ठा करने पर किसी को आपत्ति नहीं होती होगी । शायद निगम के तत्संबंधित कर्मियों को भी वसूली दिखानी पड़ती होगी, इसीलिए वे इतनी दिलचस्पी लेते होंगे । अन्यथा सरकारी कर्मी क्योंकर जहमत मोल लेगा ? हां, तो पिछले सप्ताह एक टैक्स कर्मी घर पहुंचे । शिष्टाचार के नाते मैंने उनका हल्के-फुल्के जलपान के साथ स्वागत किया । ऐसा शिष्टाचार मैं अधिकांश मौकों पर बरतता ही हूं । बीते दो-चार सालों से जो सज्जन आ रहे थे उनसे मेरा सामान्य परिचय हो चुका था । किंतु इस बार का चेहरा नया था । मैंने टैक्स की राशि के बारे में पूछा तो पता चला कि इस बीच कुछ वृद्धि हो चुकी है । उन्होंने दो हजार एक सौ छियानबे का हिसाब समझाते हुए कहा, “दो हजार दो सौ का ही हिसाब समझ लीजिए ।”

मैंने उनको पांच-पांच एवं सौ-सौ के नोटों के माध्यम से बाइस सौ रुपयों की राशि पेश की । ये छियानबे की राशि सौ के बेहद करीब थी, इसलिए मैंने सोचा कि वे चार रुपये लौटा देंगे । लेकिन उनके “… हिसाब समझ लीजिए” कहने पर मुझे अंदेशा तो हो ही गया कि उनकी नियत कुछ ठीक नहीं है । घर के ओने-कोने से बीन-बटोरकर फुटकर छियानबे का इंतजाम शायद हो भी जाता, लेकिन मैंने इसकी कोशिश नहीं की । मैंने सोचा कि वे चार रुपये नहीं भी लौटाएंगे तो बहुत बड़ी बात नहीं । चायपानी के तौर पर पांच-सात रुपये का खर्च तो मैं स्वेच्छया कर ही रहा था, चार रुपये और सही यही विचार मन में आया । उन्होंने टैक्स का पैसा जेब में रखा और उसकी रसीद तैयार कर मुझे सौंप दी । उनके साथ बैठे-बैठे दो-चार बातें इधर-उधर की भी हो गयीं ।

असल कार्य संपन्न हो चुका था और मैं इंतजार कर रहा था कि अब वे उठेंगे और विदा लेंगे । अंत में उठने से पहले वे बोल पड़े “सेवा वगैरह कुछ होगी ?”

मैं चौंका, क्षण भर के लिए सोच में पड़ा कि क्या मतलब । फिर संभला और समझ गया कि वे दान-दक्षिणा की उम्मींद लेकर चल रहे थे । मैं उसके लिए तैयार नहीं था और न उसकी कोई वजह ही थी । वे टैक्स इकट्ठा कर रहे थे तो विभाग का दायित्व निभा रहे थे । मैं उनसे कोई उल्टा-सीधा कार्य करवा रहा होता तो कुछ बात भी होती । मुझे तो उनका चार रुपया न लौटाना ही खल रहा था, जिसके बारे में मैंने कुछ कहा नहीं । मैंने संयत होकर जवाब दिया, “आज तक तो ‘ऐसा’ कुछ किया नहीं, भला आज कोई नयी बात तो हुई नहीं ।”

विचारे किंचित् नैराश्य भाव से बोले “हां, वो तो मालूम है … ।” और अपना झोला उठाकर वे चल दिए ।

उनके जाने के बाद मैं सोचने लगा कि कुछ सरकारी मुलाजिम पूरी बेशर्मी के साथ भिखमंगों की भांति पैसा मांगने में तनिक भी संकोच नहीं करते हैं । मुझे लगता है कोई भी कानून लोगों में संकोच भाव पैदा नहीं कर सकता । बेहयाई के साथ पैसा वसूलने में कइयों को कोई दिक्कत नहीं होती । तब भला भ्रष्टाचार की राक्षसी इस देश को छोड़ कहीं अन्यत्र  क्यों जाएगी ? – योगेन्द्र जोशी

2 टिप्पणियाँ

Filed under आपबीती, कहानी, प्रशासन, भ्रष्टाचार, लघुकथा, हिंदी साहित्य, Hindi literature, Short Stories

2 responses to ““सेवा में कुछ मिलेगा?” – जल निगम कर-संग्राहक की मांग

  1. नया जमाना आएगा…

    प्रत्युत्तर में –
    कहते हैं उम्मीद पर दुनिया टिकी है। जमाना बदलेगा, लेकिन कब यह शायद ख़ुदा जानता होगा। पता नहीं कितनी पीढ़ियों का इंतिजार करना होगा। –
    योगेन्द्र जोशी

  2. Hope ! it will ignite some moral glow within hearts of people harbouring darkness of immorality !

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