सिगरेट का धुआं न उड़ा सके तो जिंदगी का मजा क्या? (विश्व धूम्रपान निषेध दिवस – 31 मई)

आज विश्व तंबाकू निषेध दिवस (World no Tobacco Day) – 31 मई – है । आम जनों से अपेक्षा की जाती है कि वे इस दिन किसी भी रूप में तंबाकू का सेवन न करने का संकल्प लें । कोई चार दशक पहले मैं भी सिगरेट पीता था, बहुत नहीं फिर भी करीब एक डिब्बी प्रतिदिन, 10 बत्तियों वाली । तब किसी दिन एक झटके के साथ मैंने उसे छोड़ दिया था । उस घटना के बारे में मैंने इसी ब्लाग में अन्यत्र (20 अप्रैल 2009) लिखा है । धूम्रपान छोड़ना सरल नहीं होता है, लेकिन इतना कठिन भी नहीं होता कि ऐसा करने का इरादा ही न बने । इस अवसर पर मुझे दो घटनाओं का स्मरण हो आता है ।

पहली घटना इंग्लैंड की है करीब 25-26 साल पहले की । मैं तब वहां एक शिक्षा-संस्थान में उच्चानुशीलन के लिए गया हुआ था । जिस प्रोफेसर के साथ मैं अनुसंधान-कार्य में संलग्न था उसकी पत्नी काफी सिगरेट पीती थी, वह शायद चेनस्मोकर थी । वह स्वयं सिगार-सिगरेट का शौकीन नहीं था । (यूरोप में महिलाओं में सिगरेट एवं पुरुषों में सिगार लोकप्रिय है ।) उसने मेरे समक्ष अपनी पत्नी की इस आदत का जिक्र किया था ।

एक दिन मैं प्रोफेसर के घर पर भोजन पर आमंत्रित था । भोजनोपरांत उसकी पत्नी ने सिगरेट सुलगाकर पीना आरंभ किया, तो मुझे सिगरेट पर बहस छेड़ने का मौका मिल गया । मैंने जब उससे जानना चाहा कि वह सिगरेट क्यों पीती है तो उसका सीधा और सपाट उत्तर था कि उसे अच्छा लगता है । यों मेरा प्रश्न बेमानी ही था क्योंकि सिगरेट पीने वाला हर व्यक्ति उसका लुत्फ उठाने के लिए ही ऐसा करता है । लेकिन इस बाबत बात शुरू करने के लिए कुछ तो पूछना ही था । सिगरेट पर बहस छिड़ गयी तो सभी ने अपने-अपने मत किए । प्रोफेसर और मैंने उसे यह समझाने की कोशिश की कि सिगरेट स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाती है । मैंने कहना चाहा कि सिगरेट तो कैंसर रोग तक पैदा कर सकती है । कम से कम इसे ध्यान में रखते हुए तो उसे सिगरेट छोड़ ही देनी चाहिए ।

सिद्धांततः वह हमसे सहमत थी । लेकिन उसने मुझसे पूछा, “क्या सिगरेट ही कैंसर जैसे रोग पैदा करती है? क्या रोजमर्रा की जिंदगी में तमाम ऐसी बातों का सामना नहीं करना पड़ता है जो आपके शरीर को नुकसान पहुंचाती हैं? क्या सड़क पर वाहन चलाने पर दुर्घटना नहीं घट सकती है? तो क्या कोई वाहन चलाना बंद कर दे? इस प्रकार के अनेकों प्रश्न मेरे समक्ष रखते हुढ उसने इस बात पर जोर डाला कि निःसंदेह अकाल मृत्यु के संभव कारणों में से एक सिगरेट भी है । किंतु सवाल यह था कि सिगरेट का अपना योगदान कितना होगा, आधा फीसदी, एक फीसदी? यों सुरक्षित अनुभव करने के लिए एक-एक करके अनेकों चीजें छोड़नी पड़ जाएंगी । ऐसे में तो जिंदगी ही बेमजा हो जाए । नीरस जीवन जीने से अच्छा है कि मौत के पास पहुंच लिया जाए ।”

मैंने अनुभव किया कि जिंदगी के प्रति हर व्यक्ति का अपना दर्शन होता है । बिना मजे के जिंदगी बिताने का कोई मतलब नहीं । मजे के लिए कुछ हद तक जोखिम उठाना ही पड़ता है । सवालों का उस महिला को स्वीकार्य उत्तर प्रस्तुत कर पाना उस समय मेरे लिए संभव नहीं हो सका ।

कुछ इसी प्रकार का दूसरा अनुभव मुझे अपने ही नगर वाराणसी में हुआ था । वह घटना भी लगभग तभी की है, शायद बीसएक वर्ष पहले की । मेरे एक रिश्तेदार एवं मित्र मेरे विश्वविद्यालय के ‘रेडियोथेरपी’ विभाग के वरिष्ठतम अध्यापक-चिकित्सक थे । बता दूं कि उक्त विभाग में कैंसर-पीड़ित रोगियों की चिकित्सा होती है । ‘नाभिकीय विकिरण’ यानी ‘न्यूक्लियर रेडिएशन’ से इलाज की व्यवस्था भी वहां थी, जिसे आम बोलचाल में ‘सेंकना’ कहा जाता है । यह सब कहने का तात्पर्य यह है कि एक चिकित्सक के नाते वे कैंसर का निदान और उपचार करते थे । उम्र में वे मुझसे बारह-चौदह वर्ष बड़े थे । उनसे मेरी मुलाकातें यदाकदा होती रहती थीं, लेकिन किसी भी मुलाकात में मैंने उन्हें सिगरेट पीते नहीं देखा था । वे सिगरेट भी पीते हैं यह बात मेरी जानकारी में नहीं थी, और न ही कभी उनके सिगरेट पीने की संभावना का विचार मेरे मन में आया था ।

एक दिन दोपहर के आसपास कार्यवशात् मैं उनसे मिलने रेडियोथेरपी विभाग पहुंचा । रोगीगण तब तक बहिरंग विभाग छोड़ चुके थे और वे अंदर के अन्य कमरे में आराम करने जा चुके थे । बाहर एक कर्मचारी से मैंने उनसे मिलने की बात कही तो वह अंदर संदेश दे आया । प्रत्युत्तर में डाक्टर साहब ने मुझे कमरे ही बुलवा लिया । अंदर पहुंचने पर मैंने देखा कि वे सिगरेट के कस ले रहे हैं । मेरे लिए यह अप्रत्याशित दृश्य था । सामान्य शिष्टाचार प्रदर्शन के बाद मैंने उनसे पूछ डाला, “आप सिगरेट भी पीते हैं? मैंने पहले कभी सिगरेट पीते नहीं देखा आपको, और न ही किसी के मुख से इस बारे में सुना ।”

मेरी बात पर वे मुस्कुरा दिए और बोले, “अकेले में पीता हूं । बहुत कम लोगों को इस बारे में जानकारी होगी ।”

“लेकिन आप तो अपने मरीजों को सिगरेट छोड़ने की सलाह देते होंगे? और खुद सिगरेट पीते हैं?” मैंने आश्चर्य व्यक्त करते हुए पूछा ।

वे हंसते हुए बोले, “इसीलिए तो छिपकर पीता हूं । खुद सिगरेट पियूं और दूसरों को न पीने की सलाह दूं, कुछ अजीब नहीं लगता है?”

“इसीलिए तो मैं भी चकित हूं । डाक्टर होने के बावजूद आप सिगरेट पीते हैं यह मेरी समझ से परे है । जानते हैं कि पीना नहीं चाहिए, फिर भी पीते हैं । ऐसा क्यों?”

“अरे यार जोशीजी, आखिर सिगरेट अकेले तो कैंसर का कारण नहीं है । सिगरेट पीने वाला भी बचा रहता है और न पीने वाला भी कैंसर का रोगी हो जाता है । वास्तव में अनेकों कारक हैं रोगों के पीछे । कोई नहीं जानता किसका कितना योगदान है । किस-किस चीज से बचा जाए? मरीजों को सलाह देना पेशे की एक मजबूरी है, और व्यक्तिगत स्तर पर जिंदगी का अपने तरीके से मजा लेना दूसरी मजबूरी है । इसलिए देखा जाएगा ।”

मैंने उनकी बात सुनी और टिप्पणी किए बिना वार्तालाप का विषय बदल दिया ।

दुर्योग देखिए कि इस घटना के करीब दसएक साल बाद वे स्वयं कैंसरयुक्त अर्बुद (ट्यूमर) के रोगी हो गये । समुचित चिकित्सा की गयी, लेकिन वे मृत्यु से बच नहीं सके । – योगेन्द्र जोशी

 

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Filed under कहानी, किस्सा, मानव व्यवहार, लघुकथा, हिंदी साहित्य, Hindi literature, Short Stories

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