आगे-आगे सड़क बनत है पीछे-पीछे होत खुदाई

आगे-आगे सड़क बनत है पीछे-पीछे होत खुदाई ।
इस नगरी की रीत निराली शासन को नहि देत दिखाई ।।

प्रशंसा के ये शब्द मैंने अपनी विश्वप्रसिद्ध नगरी वाराणसी (वाराणसी) के लिए लिखे हैं । वाराणसी कुछ लोगों के लिए तीर्थस्थली है तो औरों के लिए यह दर्शनीय पर्यटन स्थल है । जहां हिंदू धर्मावलंबी गंगास्नान एवं भोलेबाबा विश्वनाथ के दर्शन करके पुण्यलाभ पाते हैं, वहीं बौद्ध मतावलंबी भगवान् बुद्ध की उपदेशस्थली सारनाथ के दर्शन पाकर स्वयं को कृतार्थ मानते हैं । पर्यटकों के लिए सारनाथ के श्रीलंकाई, चीनी, तिब्बती एवं जापानी आदि मंदिर महत्त्व रखते हैं । उनके लिए उत्तरवाहिनी गंगा के पश्चिमी किनारे के 4-5 किलोमीटर तक विस्तार पाये परस्पर जुड़े घाटों का दृश्य भी आकर्षण का केंद्र रहता है । प्रातःकाल उगते सूर्य की किरणों से नहाए इन घाटों की झलक पाना उनके लिए सौभाग्य की बात होती है । रामनगर का किला, काशी हिंदू विश्वविद्यालय का विशाल परिसर, और भारत सरकार का रेल इंजन कारखाना भी दर्शनीय स्थल माने जाते हैं । पूरे नगर में यत्रतत्र स्थापित छोटे-बड़े मंदिरों का आकर्षण अपनी जगह पर है ।

जिसने वाराणसी न देखा हो वह जीवन में एक बार इस नगरी का भी दर्शन कर ले ऐसा निवेदन मैं उनसे अवश्य करना चाहूंगा । मेरे निवेदन के कारण सर्वथा भिन्न हैं । मैं तो उनसे कहूंगा कि 18-20 लाख की आबादी वाला पूरी तरह दुर्व्यवस्थित नगर कैसा होता है यह बात इस नगरी के दर्शन से ही समझ में आता है । मेरा मानना है कि मनुष्य को केवल सौन्दर्य के ही दर्शन नहीं करना चाहिए, उसे जीवन की कटु कुरूपता का भी साक्षात्कार करना चाहिए । और उस कार्य के लिए वाराणसी से बेहतर कोई स्थान नहीं हो सकता । जितने भी शहर मैंने आज तक देखे हैं उनमें सर्वाधिक दुर्व्यवस्थित मैंने वाराणसी को ही पाया ।

उक्त बातें मैं वाराणसी के बारे में विशद चर्चा के उद्येश्य से नहीं कर रहा हूं । मैं तो ये बातें यहां की दुर्व्यवस्था और उसके कारण-स्वरूप प्रशासनिक भ्रष्टाचार के अपने अनुभव को समझाने के लिए बतौर पृष्ठभूमि के पेश कर रहा हूं । वाकया 5-7 साल पहले का होगा जैसा मुझे याद आता है । उस समय मेरे घर के पास से गुजरने वाले मुख्य मार्ग पर सीवर-पाइप डालने का कार्य चल रहा था । सड़क के एक तरफ गहरे खुदाई करके 6-8 फिट व्यास की सीमेंट-कांक्रीट की पाइपें जमीन में डाली जा रही थीं । बनारस शहर की अति-उन्मुक्त जीवनशैली के अनुकूल सड़क पर चलने वाले काम को ‘फ्री-स्टाइल’ तरीके से अंजाम दिया जाता है । खुदाई में निकली मिट्टी के ढेर को गढ़े के किसी भी तरफ बेतरतीब तरीके से जमा कर दिया जाता है । ठेकेदार और सरकारी अधिकारियों को राहगीर और वाहन कैसे उस मार्ग से गुजरेंगे इस बात की चिंता नहीं रहती है । अधिकारी तो शायद ही कभी कार्यस्थल पर आते होंगे । सरकारी परंपरा के अनुरूप सब कार्य कागज पर ठीक से चल रहा होता है । जमीनी हकीकत से उन्हें कोई मतलब नहीं रहता । यह अपने देश की शासकीय खूबी है ।

हां तो मैं कह रहा था कि सड़क के एक ओर गहरे खोदकर पाइपें डाली जा रही थीं । इस दौरान टहलते हुए एक दिन मैं उस सड़क पर जा रहा था । कुछ दूर पहुंचने पर देखता हूं कि सड़क की मरम्मत का कार्य चल रहा था । दर असल बीती बरसात के समय सड़क उखड़ चुकी थी और उसमें जगह-जगह गड्ढे बन चुके थे । इसलिए रोड़ी-तारकोल का मिश्रण सड़क पर बिछाया जा रहा था । मैं देखकर आ रहा था कि कुछ दूर पर पाइपें डाली जा रही थीं और जान रहा था कि उस स्थान पर भी दो-चार दिन में खुदाई होगी । मेरे दिमाग में सवाल घूमने लगा कि तब इस मरम्मत कार्य का तुक भला क्या है । मैंने रुककर एक श्रमिक से जिज्ञासावश पूछा, “क्यों भई, कोई अधिकारी भी है यहां जो इस काम को करवा रहा हो ?”

दूर खड़े एक सज्जन की ओर इशारा करते हुए वह बोला, “वो देखिए, हमारे जेई (जूनियर इंजीनियर) साहब वहां खड़े हैं ।”

आगे बढ़कर मैं उस सज्जन के पास पहुंचा और बोला, “भाई साहब, आप मरम्मत का कार्य यहां पर करवा रहे हैं । क्या आप देख नहीं रहे हैं कि पीछे से खुदाई करके पाइप डालने का कार्य भी चल रहा है । ऐसे में इस मरम्मत का क्या औचित्य है भला ?”

“आप ठीक कह रहे हैं, लेकिन … ।” ऐसा कहते हुए एक-दो क्षण को रुक गये ।

अपनी बात पूरी करने से पहले उन्होंने मेरा परिचय जानना चाहा । मैंने अपने बारे में समुचित जानकारी देते हुए फिर पूछा, “लेकिन आप ये काम इस समय करवा क्यों रहे हैं ?”

उनका जवाब था, “ऐसे ही आर्डर मिले हैं । अगला महीना मार्च का है न ? इसलिए सड़क के लिए मिले बजट का पैसा खर्च करना है ।”

मैं उनके उत्तर से अवाक् था । उनसे फिर पूछा “परंतु आपने अपने उच्चाधिकारियों को बताया नहीं कि इस समय पाइप डालने का काम भी चल रहा है ।”

उनका उत्तर निराशा पैदा करने वाला था । मेरे परिचय से वे आश्वस्त थे कि मैं कोई ‘खतरनाक’ व्यक्ति नहीं हूं । अतः मुझ पर भरोसा करते हुए वे बोले, “सा’ब, मेरी कुछ भी सलाह देने की हिम्मत कहां है ? आप जानते ही होंगे कि इस प्रकार के ठेकों के कार्य माफिया तंत्र को मिलते हैं । उनसे पंगा लेकर अपने और अपने परिवार की जान जोखिम में डालने की हिम्मत मुझ जैसे अदने कर्मचारी की कैसे हो सकती है । कुछ कहने का मतलब उनके गुस्से का शिकार होना ।”

मुझे लगा कि वह व्यक्ति झूठ नहीं बोल रहा था । सरकारी ठेके आपराधिक छबि के लोगों को मिलते हैं यह तो समाचारपत्रों में मैं पढ़ता ही आ रहा था । अतः मुझे लगा कि वह जेई सच ही कह रहा होगा ।

मेरे पास अधिक कुछ कहने को नहीं था । चुपचाप आगे बढ़ गया । – योगेन्द्र जोशी


3 टिप्पणियाँ

Filed under administration, अनुभव, कहानी, प्रशासन, भ्रष्टाचार, लघुकथा, हिंदी साहित्य, Hindi literature, Short Stories

3 responses to “आगे-आगे सड़क बनत है पीछे-पीछे होत खुदाई

  1. krjoshi

    अत्यंत प्रभावशाली प्रस्तुति|

  2. यह कडुवी सच्चाई है अपने यहां की। शहर का नाम कोई भी हो होता यही है!

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